Saudi-Pakistan Defense Agreement 2025: परमाणु हथियार साझा करने का ऐतिहासिक कदम
रियाद/इस्लामाबाद। 17 सितंबर 2025 को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने एक ऐतिहासिक Saudi-Pakistan Defense Agreement 2025 समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस मौके पर दोनों नेताओं ने एक-दूसरे को गले लगाया और अपने गहरे सामरिक सहयोग का संकेत दिया।
समझौते का महत्व और प्रमुख बिंदु
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने बताया कि इस समझौते के तहत पाकिस्तान अपने न्यूक्लियर हथियारों की क्षमता सऊदी अरब के साथ साझा करेगा। समझौते के अनुसार यदि किसी एक देश पर हमला होता है, तो इसे दोनों पर हमला माना जाएगा।
आसिफ ने स्पष्ट किया कि इस समझौते का उद्देश्य रक्षा है, न कि आक्रामकता। उन्होंने कहा,
“हमारे पास युद्ध के लिए प्रशिक्षित सेनाएं हैं। हमारी परमाणु क्षमता पहले से ही मजबूत है और इस समझौते के तहत दोनों देशों को सुरक्षा का आश्वासन मिलेगा।”
सऊदी अरब और पाकिस्तान: रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय
समझौते की घोषणा के तुरंत बाद पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने बताया कि सऊदी अरब के साथ इस ऐतिहासिक डिफेंस डील के बाद कई अन्य देशों ने भी पाकिस्तान के साथ रणनीतिक साझेदारी के लिए रुचि दिखाई है।
डार ने कहा कि यह समझौता लंबे समय से चल रहे गहरे सहयोग का औपचारिक रूप है। इसके जरिए दोनों देशों की सुरक्षा और विश्व में शांति स्थापित करने की प्रतिबद्धता दिखती है।
सऊदी अरब ने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को वित्तीय और तकनीकी सहयोग दिया है। पाकिस्तान के पास लगभग 170 परमाणु हथियार हैं, जो भारत के 172 हथियारों के लगभग बराबर हैं।
डिफेंस कॉर्पोरेशन और मिलिट्री सहयोग
समझौते के तहत दोनों देशों के बीच डिफेंस कॉर्पोरेशन विकसित किया जाएगा। इसमें मिलिट्री सहयोग और जरूरत पड़ने पर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की संभावना शामिल है। इस अवसर पर पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर, उप प्रधानमंत्री इशाक डार, रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ, वित्त मंत्री और हाई-लेवल डेलिगेशन सऊदी अरब पहुंचे थे।
पाकिस्तान ने स्पष्ट किया कि यह समझौता किसी विशेष देश या घटना के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के लंबे समय से चले आ रहे सहयोग का औपचारिक रूप है।
परमाणु हथियारों का साझा करना और सुरक्षा आश्वासन
ख्वाजा आसिफ ने कहा कि समझौता केवल रक्षा के उद्देश्य से है। उन्होंने यह भी बताया कि सऊदी अरब ने किसी देश का नाम नहीं लिया और न ही पाकिस्तान ने किसी पर निशाना साधा। यह एक अम्ब्रेला एग्रीमेंट है, जो दोनों देशों को आपसी सुरक्षा का अधिकार देता है।
सऊदी-पाक डिफेंस समझौते के तहत, अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो इसे दोनों पर हमला माना जाएगा। यह कोई आक्रामक संधि नहीं है, बल्कि दोनों देशों की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने का उपाय है।
अन्य देशों के साथ संभावित रणनीतिक साझेदारी
डार ने लंदन में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि इस समझौते के बाद कई देशों ने भी पाकिस्तान के साथ इसी तरह के डिफेंस डील करने में रुचि दिखाई है। उन्होंने जोर दिया कि ऐसे समझौते निश्चित नियमों और प्रक्रियाओं के तहत ही तय होते हैं।
सऊदी-पाक डिफेंस समझौते को अंतिम रूप देने में महीनों का समय लगा। डार ने इसे एक ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया और कहा कि दोनों देश इससे संतुष्ट और खुश हैं।
इस्लामी देशों के बीच रणनीतिक पहल
इससे पहले पाकिस्तान ने सभी इस्लामी देशों को NATO जैसी जॉइंट फोर्स बनाने का सुझाव दिया था। इसका मकसद इजराइल जैसे खतरों के खिलाफ सामूहिक सुरक्षा सुनिश्चित करना था। उप प्रधानमंत्री इशाक डार ने कहा कि पाकिस्तान अपनी न्यूक्लियर क्षमता के साथ उम्माह के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएगा।
सऊदी-पाक समझौते की घोषणा ऐसे समय में हुई है, जब मध्य पूर्व में सुरक्षा और राजनीतिक तनाव उच्च स्तर पर हैं।
विशेषज्ञों का दृष्टिकोण
अफगानिस्तान और इराक में अमेरिका के पूर्व राजदूत जलमय खलीलजाद ने कहा कि यह समझौता औपचारिक संधि नहीं है, लेकिन इसकी गंभीरता को देखते हुए इसे बड़ी रणनीतिक साझेदारी माना जा सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या यह समझौता कतर में इजराइल के हालिया हमले का जवाब है या यह लंबे समय से चली आ रही गुप्त साझेदारी की पुष्टि करता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान के पास ऐसे मिसाइल सिस्टम हैं, जो मिडिल ईस्ट और इजराइल तक मार करने में सक्षम हैं। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान अमेरिका तक पहुंचने में सक्षम हथियार भी विकसित कर रहा है।
पाकिस्तान-अमेरिका और पुराने डिफेंस समझौते का संदर्भ
पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ भी सऊदी जैसे समझौते किए थे। 1950 के दशक में म्यूचुअल डिफेंस असिस्टेंस एग्रीमेंट (MDAA) के तहत दोनों देशों ने सामूहिक सुरक्षा के लिए सहयोग किया।
SEATO और CENTO जैसे संगठन शामिल थे।
अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियार, प्रशिक्षण और रणनीतिक सहयोग दिया।
इसका उद्देश्य सोवियत संघ के विस्तार को रोकना था।
इस इतिहास को देखते हुए, सऊदी-पाक समझौता रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय खोलता है।

