गणाचार्य श्री १०८ Pushpadant Sagar Ji Maharaj

दिल से

चाहे मेरी जिंदगी का सारा पुण्य ले लो , मैं तो कुएं का पानी हूंः गणाचार्य श्री १०८ Pushpadant Sagar Ji Maharaj

इस तरह हम भी कितनी भी भीड़ में रहे अकेले ही रहेंगे पेड़ पर कोई चोटी पर है कोई नीचे लटका है कोई पीला है लेकिन सबका स्वाद एक जैसा  है इस प्रकार से हम भी कोई छोटा है कोई बड़ा है कोई दुकान पर बैठा है कोई आफिस में बैठा है लेकिन सबको जाना एक ही जगह है आपका जीवन भी आम की तरह है चाहे पीला हो चाय हरा हो महावीर भी एक हैं २४ तीर्थकर भी एक है Pushpadant Sagar Ji Maharaj

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