Agra Custodial Death Case में 7 साल बाद फैसला: दरोगा को 10 साल, पड़ोसी को 7 साल की सजा, जांच पर कोर्ट सख्त
News-Desk
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Agra Custodial Death Case, agra news, CID investigation, Court Verdict, Custodial Death, Justice News, police case, UP crime newsAgra Custodial Death Case में करीब 7 साल 3 महीने 27 दिन बाद अदालत ने अहम फैसला सुनाया, जिसने एक बार फिर पुलिस हिरासत में मौत के मामलों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एडीजे-17 नितिन कुमार ठाकुर की अदालत ने इस मामले में दोषी पाए गए दरोगा और एक स्थानीय व्यक्ति को सजा सुनाई, जबकि एक अन्य आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया।
यह मामला वर्ष 2018 का है, जिसने उस समय पूरे आगरा में बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था।
दरोगा को 10 साल, पड़ोसी को 7 साल की सजा
Agra Custodial Death Case में अदालत ने दो आरोपियों को दोषी करार दिया—
तत्कालीन उपनिरीक्षक अनुज सिरोही
👉 10 साल का सश्रम कारावास
👉 10 हजार रुपये जुर्मानापड़ोसी अंशुल प्रताप सिंह
👉 7 साल का सश्रम कारावास
👉 10 हजार रुपये जुर्माना
दोनों को सजा सुनाए जाने के बाद हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया।
वहीं, तीसरे आरोपी विवेक कुमार सिंह को साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
क्या था पूरा मामला
यह घटना 21 नवंबर 2018 की है, जब थाना सिकंदरा क्षेत्र के नरेंद्र एन्क्लेव में रहने वाले राजू गुप्ता पर उनके पड़ोसी अंशुल प्रताप ने आभूषण चोरी का आरोप लगाया था।
आरोप है कि अंशुल और अन्य लोगों ने राजू को घर में बंधक बनाकर पीटा। इसके बाद पुलिस राजू को थाने ले गई।
राजू की मां रेनू गुप्ता ने आरोप लगाया था कि पुलिस ने उनके सामने ही बेटे को बेरहमी से पीटा। अगले दिन हवालात में उसकी तबीयत बिगड़ी और अस्पताल ले जाने से पहले ही उसकी मौत हो गई।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने खोली सच्चाई
Agra Custodial Death Case में पोस्टमार्टम रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हुई। रिपोर्ट में राजू के शरीर पर कई चोटों के निशान पाए गए, जिससे यह साबित हुआ कि मौत शारीरिक प्रताड़ना के कारण हुई।
अदालत ने अपने फैसले में इस रिपोर्ट को प्रमुख आधार माना।
आंदोलन के बाद दर्ज हुआ हत्या का केस
राजू गुप्ता की मौत के बाद वैश्य समाज ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया था। जिला मुख्यालय पर धरना-प्रदर्शन हुआ और न्याय की मांग उठी।
इसके बाद पुलिस ने अंशुल, विवेक और अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया।
सीआईडी जांच ने बदली केस की दिशा
Agra Custodial Death Case में मानवाधिकार आयोग के निर्देश पर जांच सीआईडी को सौंप दी गई थी।
करीब साढ़े छह साल बाद सीआईडी ने चार्जशीट दाखिल की, जिसमें—
तत्कालीन इंस्पेक्टर
दो सब-इंस्पेक्टर
चार हेड कांस्टेबल
अन्य पुलिसकर्मी
कुल 17 पुलिसकर्मियों को आरोपी बनाया गया।
सीआईडी जांच इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई।
कोर्ट ने जांच पर उठाए सवाल
अदालत ने अपने फैसले में विवेचना की प्रक्रिया पर भी गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने माना कि जांच में लापरवाही बरती गई और साक्ष्यों के साथ न्याय नहीं किया गया।
Agra Custodial Death Case में कोर्ट ने तत्कालीन—
सीओ चमन सिंह चावड़ा
प्रभारी निरीक्षक राजेश कुमार पांडेय
के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
जांच में खामियों पर सख्त रुख
अदालत ने अपने 82 पन्नों के विस्तृत आदेश में स्पष्ट किया कि—
जांच में कई महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज किया गया
साक्ष्यों को सही तरीके से प्रस्तुत नहीं किया गया
घटनास्थल और समय से जुड़े पहलुओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया
इस टिप्पणी से यह साफ है कि कोर्ट ने जांच एजेंसियों की भूमिका को गंभीरता से लिया है।
न्याय की लंबी लड़ाई का अंत
करीब सात साल तक चले इस मामले में आखिरकार फैसला आने से पीड़ित परिवार को न्याय की उम्मीद पूरी होती नजर आई है।
Agra Custodial Death Case यह भी दर्शाता है कि न्याय प्रक्रिया भले ही लंबी हो, लेकिन साक्ष्यों के आधार पर सच्चाई सामने आ सकती है।
कस्टोडियल डेथ पर फिर उठे सवाल
इस फैसले के बाद एक बार फिर पुलिस हिरासत में मौत के मामलों को लेकर बहस तेज हो सकती है। ऐसे मामलों में पारदर्शिता, जवाबदेही और मानवाधिकारों का पालन बेहद जरूरी माना जाता है।

