ग्रीनलैंड विवाद से बदली डेनमार्क की राजनीति: ट्रम्प की धमकी, Mette Frederiksen की कूटनीति और सोशल डेमोक्रेट्स की वापसी
Greenland dispute Denmark US के मुद्दे ने यूरोपीय राजनीति के नक्शे पर डेनमार्क को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। अमेरिका और डेनमार्क के बीच ग्रीनलैंड को लेकर उठे विवाद ने न केवल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को गर्माया, बल्कि डेनमार्क की आंतरिक राजनीति में भी बड़ा भूचाल ला दिया। अमेरिकी राजनीतिक वेबसाइट पोलिटिको की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक फायदा डेनमार्क की प्रधानमंत्री Mette Frederiksen और उनकी सोशल डेमोक्रेट पार्टी को मिला है। पार्टी की लोकप्रियता में अचानक आई तेजी ने कुछ ही हफ्तों में चुनावी समीकरणों को पलट कर रख दिया है।
🔴 गहराते संकट से उभरीं फ्रेडरिक्सन
कुछ महीने पहले तक फ्रेडरिक्सन की सरकार दबाव में नजर आ रही थी। नवंबर 2025 में हुए स्थानीय चुनावों में सोशल डेमोक्रेट पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। सबसे बड़ा झटका राजधानी कोपेनहेगन में लगा, जहां पार्टी ने करीब 100 साल में पहली बार सत्ता गंवा दी। यह हार न केवल राजनीतिक बल्कि प्रतीकात्मक भी थी, क्योंकि कोपेनहेगन को पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है।
इसी बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को लेकर बयान देकर राजनीतिक माहौल को बदल दिया। ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे किसी भी तरह ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करना चाहते हैं। इस बयान को डेनमार्क में देश की संप्रभुता पर सीधा हमला माना गया।
🔴 ग्रीनलैंड पर संप्रभुता का सवाल
ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है, लेकिन रक्षा और विदेश नीति जैसे अहम मुद्दों पर कोपेनहेगन का अधिकार बना रहता है। ट्रम्प के बयान के बाद डेनमार्क में राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज हो गई। प्रधानमंत्री मेट फ्रेडरिक्सन ने तुरंत मोर्चा संभालते हुए कहा कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और उसकी संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
उन्होंने यूरोपीय देशों को एकजुट करने की पहल की और इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाया। फ्रेडरिक्सन की इस कूटनीतिक सक्रियता को देशभर में व्यापक समर्थन मिला।
🔴 सर्वे में बदली तस्वीर, सोशल डेमोक्रेट्स की छलांग
ट्रम्प के बयान और फ्रेडरिक्सन के जवाब के बाद डेनमार्क की राजनीति में माहौल तेजी से बदला। मेगाफॉन नाम की एक डेनिश कंसल्टेंसी के सर्वे में सोशल डेमोक्रेट पार्टी को 22.7 प्रतिशत वोट शेयर और संसद की 41 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया।
यह उछाल इसलिए खास माना जा रहा है, क्योंकि दिसंबर में हुए पिछले सर्वे में पार्टी को सिर्फ 32 सीटें मिलती दिखाई गई थीं। यानी महज एक महीने में पार्टी की स्थिति में करीब 9 सीटों का सुधार हुआ है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 41 सीटों के साथ भी सोशल डेमोक्रेट्स संसद की सबसे बड़ी पार्टी बनी रह सकती हैं।
🔴 गठबंधन राजनीति में मजबूत स्थिति
डेनमार्क की संसद में कुल 179 सीटें हैं। फ्रेडरिक्सन की सोशल डेमोक्रेट पार्टी के पास इस समय 50 सीटें हैं और वे सेंटर-लेफ्ट गठबंधन सरकार चला रही हैं। इस गठबंधन में दो सेंटर-राइट पार्टियां, मॉडरेटर्स और वेनस्टर भी शामिल हैं।
हालिया सर्वे संकेत दे रहे हैं कि सोशल डेमोक्रेट्स फिर से गठबंधन सरकार बनाने की बातचीत में सबसे मजबूत स्थिति में आ सकती हैं। हालांकि सत्ता में बने रहने के लिए उन्हें सहयोगी दलों पर निर्भर रहना होगा।
🔴 वॉक्समीटर सर्वे और कैबिनेट को बढ़ता समर्थन
एक अन्य एजेंसी वॉक्समीटर के सोमवार को जारी सर्वे में फ्रेडरिक्सन की कैबिनेट को 40.9 प्रतिशत समर्थन मिला है। यह आंकड़ा पिछले दो सालों में सबसे ऊंचा माना जा रहा है। सर्वे के मुताबिक, अगर आज चुनाव होते हैं तो गठबंधन को लगभग 73 सीटें मिलने का अनुमान है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह समर्थन सीधे तौर पर ग्रीनलैंड विवाद में सरकार के सख्त और स्पष्ट रुख से जुड़ा है।
🔴 ट्रम्प का बयान और बदली वैश्विक राजनीति
जनवरी की शुरुआत में ट्रम्प ने यह बयान दिया था कि वे किसी भी तरीके से ग्रीनलैंड पर कब्जा कर सकते हैं। यह बयान अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियों में रहा। ट्रम्प इससे पहले भी ग्रीनलैंड को खरीदने की बात कह चुके थे, लेकिन इस बार उनके शब्दों को ज्यादा गंभीरता से लिया गया।
डेनमार्क की सरकार ने इसे देश की संप्रभुता पर सीधी चुनौती माना और कूटनीतिक स्तर पर कड़ा जवाब दिया। अंततः ट्रम्प को यह कहना पड़ा कि वे ग्रीनलैंड पर जबरदस्ती कब्जा नहीं करेंगे।
🔴 राष्ट्रीय संकट और सरकार के साथ एकजुटता
यूरोपीय राजनीति की एक्सपर्ट ऐन रासमुसेन ने पोलिटिको से बातचीत में कहा कि आखिरी बार डेनमार्क में सरकार के साथ इतनी व्यापक एकजुटता कोविड महामारी के दौरान देखने को मिली थी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय संकट के समय अक्सर लोग सत्ता में बैठी सरकार के समर्थन में खड़े हो जाते हैं।
ग्रीनलैंड विवाद ने भी कुछ ऐसा ही माहौल बनाया, जहां जनता ने सरकार को देश की संप्रभुता का रक्षक मानते हुए समर्थन दिया।
🔴 जल्द चुनाव की संभावना
डेनमार्क के चुनावी कानून के मुताबिक, 1 नवंबर 2026 से पहले आम चुनाव कराना अनिवार्य है। हालांकि मौजूदा राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि फ्रेडरिक्सन अपनी बढ़ती लोकप्रियता को भुनाने के लिए समय से पहले चुनाव करा सकती हैं।
फ्रेडरिक्सन पहले भी ऐसा कर चुकी हैं। 2022 में गिरते समर्थन के बीच उन्होंने अचानक चुनाव कराए थे और सत्ता में वापसी की थी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले कुछ महीनों में डेनमार्क एक बार फिर चुनावी माहौल में प्रवेश कर सकता है।
🔴 मिंक विवाद और गिरती लोकप्रियता का दौर
फ्रेडरिक्सन का राजनीतिक सफर हमेशा आसान नहीं रहा। कोरोना महामारी के दौरान उन्होंने देशभर में 1.7 करोड़ फर वाले जानवरों, यानी मिंक, को मारने का आदेश दिया था। उस समय वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि मिंक से कोरोना फैल सकता है।
हालांकि बाद में कोर्ट ने इस फैसले को गलत ठहराया। मिंक की खाल से जुड़ा फर उद्योग हजारों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ा था। इस फैसले के बाद फ्रेडरिक्सन की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई। 2020 के एक सर्वे में उनकी लोकप्रियता 79 प्रतिशत से गिरकर 34 प्रतिशत रह गई थी।
🔴 वैश्विक रुझान: कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में भी असर
रिपोर्ट के मुताबिक, यह राजनीतिक रुझान सिर्फ डेनमार्क तक सीमित नहीं है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया में भी जहां नेताओं ने ट्रम्प का खुलकर विरोध किया, वहां उन्हें चुनावी फायदा मिला।
कनाडा में एक समय कंजरवेटिव पार्टी बढ़त बनाए हुए थी और पियरे पोइलिव्रे को अगला प्रधानमंत्री माना जा रहा था। लेकिन ट्रम्प द्वारा कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की धमकी के बाद माहौल बदल गया। लिबरल पार्टी ने खुद को देश की संप्रभुता और आत्मसम्मान की रक्षा करने वाली पार्टी के रूप में पेश किया और सत्ता में वापसी की।
ऑस्ट्रेलिया में भी कई सर्वे अब एंथनी अल्बनीज की पार्टी को बढ़त दिखा रहे हैं, जबकि पहले राइट-विंग पार्टियां मजबूत स्थिति में नजर आ रही थीं।
🔴 अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संप्रभुता की नई बहस
Greenland dispute Denmark US ने यह दिखा दिया है कि वैश्विक राजनीति में संप्रभुता और राष्ट्रीय सम्मान जैसे मुद्दे कितनी तेजी से घरेलू राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। फ्रेडरिक्सन ने इस विवाद को केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता के सवाल के रूप में पेश किया।
यही वजह है कि जनता ने उन्हें एक मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में देखा, जिसका सीधा असर उनकी पार्टी की लोकप्रियता पर पड़ा।

