संपादकीय विशेष

Muzaffarnagar में आवारा कुत्तों से बढ़ता खतरा: समाज और स्वास्थ्य पर पड़ता गहरा प्रभाव

मुजफ्फरनगर।(Muzaffarnagar) मुजफ्फरनगर समेत कई शहरों और कस्बों में आवारा कुत्तों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जो लोगों के लिए एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। ये कुत्ते न केवल मोहल्लों और गलियों में आतंक फैला रहे हैं, बल्कि लोगों पर हमला कर उन्हें घायल भी कर रहे हैं। इस समस्या ने लोगों के जीवन को खतरे में डाल दिया है, खासकर छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए, जो आसानी से इन हमलों का शिकार बन जाते हैं।

अस्पताल में बढ़ते मामले: कुत्ते और बंदरों के काटने से संक्रमित लोग

मुजफ्फरनगर के स्वामी कल्याण देव जिला अस्पताल में हर दिन लगभग 70 से 100 लोग एंटी-रैबीज वैक्सीन (एआरवी) लगवाने आते हैं, जिनमें से अधिकांश को आवारा कुत्तों या बंदरों ने काटा होता है। चिकित्सकों का मानना है कि इन जानवरों में रैबीज वायरस के संक्रमण की संभावना रहती है, जिससे पीड़ितों को एहतियातन एआरवी लगवाना आवश्यक हो जाता है।

एक माह में करीब 1500 से 2000 लोग जिला अस्पताल में एआरवी लगवाने के लिए आते हैं, जो इस बढ़ती समस्या का स्पष्ट संकेत है। आवारा कुत्तों के काटने से होने वाली बीमारी, जिसे हाईड्रोफोबिया कहा जाता है, अत्यधिक खतरनाक है। इस बीमारी का सबसे अंतिम और गंभीर लक्षण होता है व्यक्ति का पानी के प्रति भय, जिसे देखते ही डॉक्टरों को यह समझ आता है कि रोग काफी विकराल रूप ले चुका है। इसलिए आवारा कुत्ते के काटते ही बिना देरी किए उपचार शुरू कराना जरूरी होता है।

रैबीज और हाईड्रोफोबिया: एक घातक बीमारी

रैबीज का संक्रमण आमतौर पर आवारा कुत्तों, बंदरों, या अन्य संक्रमित जानवरों के काटने से होता है। अगर संक्रमित जानवर की लार किसी घाव पर लग जाए, तो यह संक्रमण तेजी से खून में फैल जाता है और शरीर के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है।

रैबीज का सबसे बड़ा खतरा यह है कि सिर या गर्दन के करीब काटे जाने पर यह संक्रमण तेज़ी से शरीर में फैलता है। लेकिन हाथ-पैर पर काटने से संक्रमण थोड़ा धीमा होता है। बावजूद इसके, अगर संक्रमण हो गया है, तो रैबीज का कोई प्रभावी इलाज नहीं है। यह बीमारी मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को बुरी तरह प्रभावित करती है, जिससे पीड़ित व्यक्ति की मौत हो सकती है।

कुत्तों की बढ़ती संख्या: सामाजिक और प्रशासनिक चिंता

मुजफ्फरनगर ही नहीं, बल्कि देश के कई अन्य शहरों और कस्बों में भी आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या एक बड़ी सामाजिक समस्या बनती जा रही है। सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक लापरवाही के चलते यह समस्या दिन-ब-दिन विकराल होती जा रही है। इन कुत्तों के बढ़ते प्रकोप से न केवल लोगों की सुरक्षा खतरे में है, बल्कि यह एक प्रमुख स्वास्थ्य समस्या भी बन रही है।

कई बार प्रशासन इन कुत्तों को पकड़ने और उन्हें वैक्सीनेट करने का दावा करता है, लेकिन जमीन पर इन प्रयासों का कोई ठोस असर नहीं दिखाई देता। इसके चलते स्थानीय लोग प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि जल्द से जल्द इस समस्या का समाधान किया जाए।

रैबीज के लक्षण और बचाव के उपाय

रैबीज के लक्षण बहुत गंभीर होते हैं और इसे नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो सकता है। कुछ सामान्य लक्षणों में शामिल हैं:

  1. अत्यधिक सिरदर्द
  2. बुखार
  3. अनियंत्रित घबराहट
  4. हल्का बुखार और कमजोरी
  5. पानी या हवा से डरना (हाईड्रोफोबिया)

रैबीज से बचाव के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि संक्रमित जानवर के काटते ही तुरंत एंटी रैबीज वैक्सीन (एआरवी) लगवाएं। इसके अलावा घाव को तुरंत ताजे पानी और साबुन से धोएं ताकि संक्रमण का खतरा कम हो सके। साथ ही, जो लोग पालतू कुत्ते रखते हैं, उन्हें अपने पालतू जानवरों को समय-समय पर टीकाकरण कराना चाहिए ताकि उन्हें और समाज को इस गंभीर बीमारी से बचाया जा सके।

बंदरों की बढ़ती संख्या और उनकी आक्रमकता

कुत्तों के अलावा, मुजफ्फरनगर और अन्य शहरों में बंदरों की बढ़ती संख्या भी एक बड़ी समस्या बन गई है। बंदर न केवल लोगों के घरों में घुसकर सामान चुराते हैं, बल्कि कई बार वे आक्रामक हो जाते हैं और लोगों पर हमला कर देते हैं। बंदरों के काटने से भी रैबीज फैलने का खतरा होता है, और इसलिए ऐसे मामलों में भी तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। बंदरों की आक्रमकता और उनकी संख्या को नियंत्रित करने के लिए भी प्रशासन को सक्रिय कदम उठाने की आवश्यकता है।

सरकारी प्रयास और लोगों की मांग

मुजफ्फरनगर में आवारा कुत्तों की इस गंभीर समस्या को देखते हुए, स्थानीय लोग सरकार और प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि जल्द से जल्द इन कुत्तों को पकड़कर सुरक्षित स्थानों पर ले जाया जाए, ताकि मोहल्लों और गलियों में बढ़ रहे खतरों को कम किया जा सके। इसके अलावा, इन कुत्तों के लिए स्ट्रे डॉग मैनेजमेंट जैसी योजनाएं लागू की जानी चाहिए, जिनके तहत इन्हें वैक्सीनेट कर आवारा जानवरों की संख्या को नियंत्रित किया जा सके।

हालांकि, सरकारी स्तर पर कुछ योजनाएं बनाई गई हैं, लेकिन इनके क्रियान्वयन में लापरवाही और धीमी गति से समस्या हल नहीं हो पा रही है। आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक से निपटने के लिए आवश्यक है कि प्रशासन इस दिशा में जल्द और ठोस कदम उठाए।

समस्या का समाधान और जागरूकता

आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या और रैबीज जैसी जानलेवा बीमारियों से बचने के लिए समाज को जागरूक होना होगा। साथ ही, प्रशासन को भी इस मुद्दे पर ध्यान देना होगा और जल्द से जल्द इस समस्या का स्थायी समाधान निकालना होगा। इसके अलावा, आम लोगों को भी अपने पालतू जानवरों का ध्यान रखना चाहिए और समय-समय पर उनका टीकाकरण कराना चाहिए ताकि वे और समाज सुरक्षित रह सकें।

यह समय की मांग है कि आवारा कुत्तों और बंदरों से निजात पाने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएं, जिससे न केवल लोगों की जान बचाई जा सके, बल्कि समाज को भी इस गंभीर संकट से मुक्ति दिलाई जा सके।

 

Dr. S.K. Agarwal

डॉ. एस.के. अग्रवाल न्यूज नेटवर्क के मैनेजिंग एडिटर हैं। वह मीडिया योजना, समाचार प्रचार और समन्वय सहित समग्र प्रबंधन के लिए जिम्मेदार है। उन्हें मीडिया, पत्रकारिता और इवेंट-मीडिया प्रबंधन के क्षेत्र में लगभग 3.5 दशकों से अधिक का व्यापक अनुभव है। वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई प्रतिष्ठित समाचार पत्रों, चैनलों और पत्रिकाओं से जुड़े हुए हैं। संपर्क ई.मेल- [email protected]

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