Ahmed al-Sharaa ने सीरिया में नए चुनावों की शुरुआत की, लेकिन जनता की अनुपस्थिति पर उठे सवाल
सीरिया में 13 साल लंबी गृहयुद्ध और बशर अल-असद की तानाशाही के बाद हाल ही में संसदीय चुनावों का आयोजन हुआ। यह चुनाव एक ऐसे देश के लिए महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है, जो दशकों से संकट और संघर्षों से जूझ रहा है। इस चुनाव को असद युग के अंत और नए दौर की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा था। हालांकि, इस चुनाव में जनता की व्यापक अनुपस्थिति और चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवाल इसे विवादास्पद बना रहे हैं।
Ahmed al-Sharaa का राष्ट्रपति पद पर कदम
पिछले साल दिसंबर में तख्तापलट के बाद, अहमद अल-शरा ने अंतरिम राष्ट्रपति के तौर पर सत्ता संभाली थी। अल-शरा के नेतृत्व में, सीरिया ने संसदीय चुनाव की प्रक्रिया शुरू की, जिसमें 210 सदस्यीय संसद के 140 सीटों के लिए मतदान किया गया। ये चुनाव एक प्रकार से ‘लोकतांत्रिक बदलाव’ का प्रतीक बन सकते थे, लेकिन आलोचकों का कहना है कि चुनाव में जनता को कोई भागीदारी नहीं दी गई, और यह केवल शरा सरकार की वैधता को मजबूत करने का एक प्रयास था।
जनता की अनुपस्थिति: बड़ा विवाद
चुनाव की सबसे बड़ी आलोचना यह रही कि आम जनता और राजनीतिक दलों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया था। 210 सदस्यीय संसद के 140 सीटों पर मतदान 7,000 चुने हुए चुनावी कॉलेज सदस्यों ने किया, जिन्हें सरकार द्वारा नियुक्त जिला समितियों ने चुना था। बाकी 70 सीटें सीधे तौर पर अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा द्वारा भरी जाएंगी। इस प्रक्रिया से यह सवाल उठता है कि क्या यह चुनाव जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं या फिर यह केवल सत्ता परिवर्तन का औपचारिक चेहरा भर हैं?
क्या हैं आलोचनाएँ और समर्थन?
इस चुनाव के परिणामों को लेकर विभिन्न पक्षों के दृष्टिकोण हैं।
अल-शरा सरकार के विरोधी
हयात तहरीर अल-शाम (एचटीएस): यह समूह, जो उत्तर-पश्चिमी सीरिया में सक्रिय है, ने इन चुनावों को ‘दमिश्क की सत्ता का नाटक’ बताया है। एचटीएस का कहना है कि सरकार ने जनता को वोट देने का अधिकार ही नहीं दिया, जो कि लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
असद समर्थक गुट: बशर अल-असद की पार्टी ने इसे ‘कठपुतली चुनाव’ करार दिया है। उनका आरोप है कि अहमद अल-शरा पश्चिमी देशों के समर्थन से सत्ता में आए हैं और अब वह केवल इस प्रक्रिया को दिखाकर अपनी वैधता साबित करने की कोशिश कर रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन: यूरोप स्थित कई एनजीओ का कहना है कि यह चुनाव लोकतांत्रिक नहीं बल्कि प्रशासनिक चुनाव हैं। इनके मुताबिक, उम्मीदवारों की सूची पारदर्शी नहीं है और मतदाताओं की चयन प्रक्रिया पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में है।
समर्थक देशों का दृष्टिकोण
रूस और चीन: दोनों देशों ने इन चुनावों को सीरिया की स्थिरता की दिशा में आवश्यक कदम बताया है। उनका कहना है कि युद्धग्रस्त देश में तुरंत जनमत संग्रह कराना असंभव है, इसलिए अंतरिम संरचना ही व्यावहारिक विकल्प है।
ईरान: ईरान ने शरा सरकार को सीरिया के पुनर्निर्माण का केंद्र मानते हुए कहा कि चुनाव देश में राजनीतिक निरंतरता की गारंटी हैं और विपक्ष को समय के साथ शामिल किया जाएगा।
सीरिया की चुनावी प्रक्रिया
चुनाव में क्या होता है?
सीरिया की नई संसद में 210 सदस्य हैं, जिनमें से 140 सीटों पर मतदान 7,000 चुने हुए इलेक्टोरल कॉलेज सदस्य करेंगे। यह सदस्य सरकारी समिति द्वारा नियुक्त किए गए हैं, जो चुनावी प्रक्रिया पर पूरी तरह से नियंत्रण रखती है। बाकी 70 सीटें सीधे राष्ट्रपति अहमद अल-शरा द्वारा नियुक्त की जाएंगी।रिजर्व सीटों का महत्व:
इन रिजर्व सीटों के माध्यम से सरकार महिलाओं, अल्पसंख्यकों और सहयोगी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने का दावा करती है। हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह सीटें सरकार की स्थायी बहुमत सुनिश्चित करने के लिए हैं।जनता के मतदान में क्यों नहीं भाग ले रहे हैं?
सरकार का कहना है कि सीरिया में गृहयुद्ध और विस्थापन की स्थिति के कारण जनगणना और मतदाता सूची तैयार करना असंभव है। करोड़ों लोग बिना दस्तावेजों के हैं, जिसके कारण एक सीमित चुनावी प्रक्रिया अपनाई गई है।
नतीजे और भविष्य
चुनाव में शुरुआती नतीजे 6 अक्टूबर को जारी किए गए और अंतिम परिणाम 7 अक्टूबर को घोषित होंगे। परिणामों का अनुमान लगाया जा रहा है कि अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा की जीत तय है, क्योंकि 70 सीटें शरा द्वारा सीधे नियुक्त की जानी हैं।
यह चुनाव भले ही सीरिया के राजनीतिक भविष्य के लिए एक कदम हो, लेकिन जनता की निष्क्रियता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता के बिना इसे पूरी तरह से लोकतांत्रिक नहीं माना जा सकता। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक औपचारिक बदलाव से ज्यादा कुछ नहीं है और असली लोकतंत्र की शुरुआत अभी बाकी है।
अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा के नेतृत्व में सीरिया में चुनावों का यह दौर सत्ता परिवर्तन का संकेत है, लेकिन जनता की भागीदारी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अभाव में यह केवल एक औपचारिक चेहरा बनकर रह गया है।

