मिडिल ईस्ट में नई जंग की आहट: Yemen हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ खोला मोर्चा, रेड सी में बढ़े हमले से क्षेत्रीय तनाव चरम पर
पिछले कई वर्षों से अपेक्षाकृत शांत रहे Yemen-सऊदी संघर्ष ने अचानक नया मोड़ ले लिया है। पिछले एक सप्ताह में हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब और लाल सागर (रेड सी) में जहाजों को निशाना बनाते हुए कई मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। जवाब में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने भी हूती ठिकानों पर हवाई कार्रवाई तेज कर दी है।
करीब चार वर्षों से बड़े स्तर पर टली हुई यमन की जंग अब फिर से भड़कने की कगार पर पहुंचती नजर आ रही है। हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की घोषणा और दोनों पक्षों के बीच लगातार बढ़ते सैन्य हमलों ने पूरे मिडिल ईस्ट में सुरक्षा और व्यापार को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
कैसे शुरू हुआ ताजा टकराव?
ताजा तनाव की शुरुआत 13 जुलाई को हुई।
जानकारी के अनुसार, हूती संगठन के कुछ वरिष्ठ नेता ईरान की यात्रा के बाद यमन लौट रहे थे। बताया गया कि वे ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में शामिल होने के बाद वापस लौट रहे थे।
यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त और सऊदी समर्थित सरकार ने ईरानी विमान को राजधानी सना एयरपोर्ट पर उतरने की अनुमति नहीं दी।
सरकार का कहना था कि हूती अधिकारियों को यमन की राष्ट्रीय एयरलाइन से ही लौटना चाहिए, जबकि हूती ईरानी विमान को सीधे सना में उतारने पर अड़े रहे।
स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि सरकार समर्थित बलों ने सना एयरपोर्ट के रनवे को क्षतिग्रस्त कर दिया, जिससे विमान वहां उतर नहीं सका।
इसके बाद विमान को अपना मार्ग बदलकर हूदैदाह एयरपोर्ट पर उतरना पड़ा, जो हूती नियंत्रण वाले क्षेत्र में स्थित है।
समुद्री नाकेबंदी का ऐलान, रेड सी में बढ़ा खतरा
सना एयरपोर्ट विवाद के तुरंत बाद हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी की घोषणा कर दी।
इसके बाद रेड सी में कई जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों की घटनाएं सामने आईं।
रेड सी दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच बड़ी मात्रा में अंतरराष्ट्रीय व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में यहां बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए भी चिंता का विषय बन गया है।
अमेरिका-ईरान तनाव के बाद क्यों बदला हूतियों का रुख?
जब फरवरी में अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य तनाव बढ़ा था, तब माना जा रहा था कि ईरान समर्थित हूती विद्रोही भी इस संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि शुरुआती महीनों में हूतियों ने प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में प्रवेश करने से परहेज किया।
लेकिन बाद में अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम टूटने के बाद हूतियों का रुख अधिक आक्रामक होता दिखाई दिया।
कई क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते हालात में हूती नेतृत्व ने अपने राजनीतिक और सामरिक प्रभाव को मजबूत करने का अवसर भी देखा।
हालांकि इन आकलनों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और विभिन्न पक्ष इस घटनाक्रम को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।
चार साल पुराना युद्धविराम अब टूटने की कगार पर
साल 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से युद्धविराम लागू होने के बाद यमन में अपेक्षाकृत शांति का माहौल बना था।
युद्ध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था, लेकिन बड़े सैन्य अभियानों में उल्लेखनीय कमी आई थी।
इसी दौरान सऊदी अरब और हूती प्रतिनिधियों के बीच स्थायी शांति समझौते पर भी बातचीत शुरू हुई थी।
हालांकि अंतिम समझौता नहीं हो सका और कई महत्वपूर्ण मुद्दे अनसुलझे रह गए।
अब हालिया घटनाओं ने उस युद्धविराम को गंभीर चुनौती के सामने ला खड़ा किया है।
सऊदी अरब दोबारा युद्ध क्यों नहीं चाहता?
विश्लेषकों के अनुसार सऊदी अरब पिछले संघर्ष से कई महत्वपूर्ण सबक ले चुका है।
वर्ष 2015 में शुरू हुआ सैन्य अभियान कई वर्षों तक चला।
इस दौरान—
- भारी आर्थिक संसाधन खर्च हुए,
- सैन्य अभियान लंबा खिंच गया,
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई,
- मानवीय संकट गहराया।
यही कारण है कि सऊदी नेतृत्व सार्वजनिक रूप से अब भी स्थायी समाधान और वार्ता का समर्थन करता रहा है।
हूती विद्रोहियों की रणनीति क्या मानी जा रही है?
विशेषज्ञों का मानना है कि हूती संगठन वर्तमान परिस्थितियों का उपयोग यमन की राजनीति में अपनी स्थिति और मजबूत करने के प्रयास के रूप में भी देख रहा है।
उनकी प्रमुख मांगों में शामिल बताए जाते हैं—
- यमन के तेल राजस्व में अधिक हिस्सेदारी,
- राजनीतिक व्यवस्था में बड़ी भूमिका,
- हूती नियंत्रित क्षेत्रों के सरकारी कर्मचारियों के वेतन से जुड़े मुद्दों का समाधान।
हूती नेतृत्व का आरोप है कि शांति वार्ता के दौरान हुए कई आश्वासन अभी तक पूरे नहीं किए गए।
कैसे एक छोटे विद्रोही समूह से मजबूत ताकत बने हूती?
हूती आंदोलन की शुरुआत यमन के उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में सक्रिय एक शिया समूह के रूप में हुई थी।
वर्ष 2011 में अरब जगत में शुरू हुए राजनीतिक आंदोलनों का असर यमन पर भी पड़ा।
राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह के लंबे शासन का अंत हुआ और नई राजनीतिक व्यवस्था बनी।
लेकिन राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाते हुए हूती संगठन ने अपनी ताकत बढ़ाई और सितंबर 2014 में राजधानी सना पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।
इसके बाद स्थिति लगातार जटिल होती गई।
2015 में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन की एंट्री
जब यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार कमजोर पड़ने लगी और राष्ट्रपति अब्दरब्बू मंसूर हादी देश छोड़कर सऊदी अरब चले गए, तब सऊदी अरब ने क्षेत्रीय सहयोगी देशों के साथ सैन्य गठबंधन बनाया।
वर्ष 2015 में शुरू हुए इस अभियान का घोषित उद्देश्य यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार को दोबारा स्थापित करना था।
हालांकि कई वर्षों तक चले संघर्ष के बावजूद किसी भी पक्ष को निर्णायक सफलता नहीं मिली।
आज यमन किसके नियंत्रण में है?
वर्तमान स्थिति में यमन प्रभावी रूप से विभाजित माना जाता है।
- उत्तरी और पश्चिमी क्षेत्रों के बड़े हिस्से पर हूती संगठन का प्रभाव है।
- दक्षिणी और कुछ अन्य क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार का नियंत्रण है।
- सरकार को सैन्य और आर्थिक सहयोग मुख्य रूप से सऊदी अरब से मिलता रहा है।
यही विभाजित नियंत्रण लंबे समय से राजनीतिक समाधान को जटिल बनाए हुए है।
गाजा युद्ध ने कैसे बदल दी पूरी तस्वीर?
2022 के युद्धविराम के बाद उम्मीद की जा रही थी कि स्थायी शांति समझौता संभव हो सकता है।
लेकिन अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू होने के बाद क्षेत्रीय समीकरण तेजी से बदल गए।
हूतियों ने हमास के समर्थन में रेड सी से गुजरने वाले कुछ जहाजों को निशाना बनाना शुरू किया।
इसके जवाब में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने हूती ठिकानों पर कई सैन्य अभियान चलाए।
इस घटनाक्रम के बाद यमन शांति वार्ता की रफ्तार लगभग थम गई।
हूती और सऊदी एक-दूसरे पर क्या आरोप लगा रहे हैं?
हूती नेतृत्व का आरोप है कि सऊदी अरब ने शांति प्रक्रिया के दौरान किए गए कई वादे पूरे नहीं किए।
उनके अनुसार विशेष रूप से हूती नियंत्रण वाले क्षेत्रों के सरकारी कर्मचारियों के वेतन और आर्थिक व्यवस्थाओं पर सहमति लागू नहीं की गई।
दूसरी ओर सऊदी अरब इन आरोपों को खारिज करता रहा है।
यमन में सऊदी राजदूत मोहम्मद अल-जाबेर का कहना है कि उनका देश तनाव कम करने और स्थायी शांति का समर्थक है। उनका आरोप है कि हूती लगातार सैन्य कार्रवाई का रास्ता चुन रहे हैं, जिसका सबसे बड़ा नुकसान आम यमनी नागरिकों को उठाना पड़ रहा है।
रेड सी में बढ़ता तनाव क्यों पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है?
रेड सी वैश्विक समुद्री व्यापार का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है।
यूरोप और एशिया के बीच बड़ी मात्रा में तेल, गैस, कंटेनर और अन्य सामान इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।
यदि यहां लंबे समय तक सैन्य तनाव बना रहता है, तो संभावित प्रभावों में शामिल हो सकते हैं—
- वैश्विक शिपिंग लागत में वृद्धि,
- व्यापारिक मार्गों में बदलाव,
- ऊर्जा आपूर्ति पर दबाव,
- बीमा लागत में बढ़ोतरी,
- अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता।
इसी कारण दुनिया की कई सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस क्षेत्र की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।
आगे क्या हो सकता है?
वर्तमान घटनाक्रम ने मिडिल ईस्ट में पहले से मौजूद भू-राजनीतिक तनाव को और जटिल बना दिया है। यदि हूती विद्रोहियों और सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच सैन्य कार्रवाई लगातार बढ़ती है, तो यमन में वर्षों से चल रहे संघर्ष का एक नया और अधिक व्यापक चरण शुरू हो सकता है। वहीं यदि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक प्रयास तेज होते हैं, तो तनाव कम करने और युद्धविराम को पुनर्जीवित करने की संभावनाएं भी बनी रह सकती हैं। फिलहाल दोनों पक्षों के बयानों और जमीनी घटनाक्रम पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

