Akhilesh yadav की चुनाव आयोग से बड़ी मांग, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-काटने वाले Form-6 और Form-7 सार्वजनिक करने पर जोर; बोले- हर नाम की हो जांच
News-Desk
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अखिलेश यादव की ओर से सोमवार को लखनऊ में मुख्य निर्वाचन अधिकारी को एक ज्ञापन सौंपा गया। इसमें मांग की गई है कि मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और मौजूदा विवरण में संशोधन से संबंधित फॉर्मों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत सार्वजनिक किया जाए।
समाजवादी पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची में किसी भी तरह का बदलाव बेहद संवेदनशील विषय है। इसलिए नाम जोड़ने या हटाने से संबंधित प्रत्येक आवेदन की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि संबंधित मतदाताओं और राजनीतिक दलों को आवश्यक जानकारी मिल सके तथा यदि किसी प्रविष्टि पर आपत्ति हो तो निर्धारित अवधि में उसे दर्ज कराया जा सके।
Form-6, Form-7 और Form-8 को लेकर क्या है मांग?
ज्ञापन में मुख्य रूप से तीन तरह के फॉर्म का उल्लेख किया गया है।
Form-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में नया नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है।
Form-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जाता है।
वहीं Form-8 का इस्तेमाल मतदाता सूची में मौजूद विवरण में संशोधन या आवश्यक परिवर्तन के लिए किया जाता है।
सपा की मांग है कि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी ERO को प्राप्त होने वाले इन फॉर्मों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित किया जाए।
सात दिनों तक नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित करने की मांग
ज्ञापन में चुनाव आयोग के नियमों का हवाला देते हुए कहा गया है कि इन फॉर्मों की एक प्रति ERO कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर सात दिनों तक प्रदर्शित किया जाना चाहिए।
इस अवधि का उद्देश्य संबंधित व्यक्ति या अन्य पात्र पक्षों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना और किसी भी आपत्ति की स्थिति में उसे निर्धारित समय के भीतर दर्ज कराने का अवसर देना है।
सपा का तर्क है कि यदि यह प्रक्रिया प्रभावी ढंग से लागू होती है तो मतदाता सूची में होने वाले बदलावों पर निगरानी और पारदर्शिता दोनों बढ़ सकती हैं।
उत्तर प्रदेश के 403 विधानसभा क्षेत्रों का मुद्दा
ज्ञापन में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा क्षेत्रों के 1 लाख 77 हजार 516 मतदेय स्थलों पर मतदाता सूची से संबंधित आवेदन प्राप्त होते हैं।
इतने बड़े स्तर पर नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन की प्रक्रिया होने के कारण सपा ने प्रत्येक आवेदन की सत्यता की जांच को महत्वपूर्ण बताया है।
पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मूल आधार है। इसमें किसी भी तरह की त्रुटि या गलत प्रविष्टि चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकती है।
10 अप्रैल 2026 को हुआ था अंतिम प्रकाशन
ज्ञापन में बताया गया है कि मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन 10 अप्रैल 2026 को हुआ था।
इसके बाद 11 अप्रैल से मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन के लिए आवेदन जमा होने की प्रक्रिया जारी है।
सपा का दावा है कि इस अवधि में Form-6 और Form-7 बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं।
यही वजह है कि पार्टी अब इन आवेदनों की जांच और उनके सार्वजनिक प्रदर्शन को लेकर चुनाव आयोग से स्पष्ट कार्रवाई की मांग कर रही है।
नाम जोड़ने और काटने पर विशेष निगरानी की मांग
समाजवादी पार्टी ने विशेष रूप से नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया पर जोर दिया है।
पार्टी का कहना है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल होना उसके मतदान के अधिकार से जुड़ा विषय है। इसी तरह किसी मतदाता का नाम हटना भी गंभीर प्रशासनिक निर्णय है।
ऐसे में दोनों प्रक्रियाओं में पर्याप्त सत्यापन और पारदर्शिता होना आवश्यक है।
एक-एक नाम की सत्यता जांचना जरूरी: सपा
सपा का कहना है कि मतदाता सूची में शामिल होने वाले प्रत्येक नाम की सत्यता की जांच होनी चाहिए।
इसी तरह यदि किसी व्यक्ति का नाम हटाने के लिए Form-7 दिया गया है तो यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि आवेदन वास्तविक और नियमों के अनुरूप हो।
पार्टी के मुताबिक इससे मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने में मदद मिल सकती है।
ERO की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी ERO मतदाता सूची से जुड़े महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्यों के लिए जिम्मेदार होते हैं।
नाम जोड़ने, हटाने या विवरण में बदलाव से संबंधित आवेदनों की प्रक्रिया में ERO कार्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इसी कारण सपा ने अपने ज्ञापन में ERO कार्यालयों के नोटिस बोर्ड पर इन आवेदनों को प्रदर्शित किए जाने पर जोर दिया है।
सपा का आरोप- नियम के मुताबिक नहीं हो रहा प्रदर्शन
ज्ञापन में समाजवादी पार्टी ने आरोप लगाया है कि प्रदेश के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में ERO के पास Form-6, Form-7 और Form-8 लगातार प्राप्त हो रहे हैं, लेकिन इन आवेदनों को संबंधित नोटिस बोर्ड पर निर्धारित तरीके से प्रदर्शित नहीं किया जा रहा।
पार्टी का कहना है कि इससे मतदाता सूची की प्रक्रिया की निगरानी करने में कठिनाई हो सकती है।
सपा ने चुनाव आयोग से इस व्यवस्था को सुनिश्चित करने की मांग की है।
भारत निर्वाचन आयोग पर भी उठाया सवाल
समाजवादी पार्टी ने इस मुद्दे पर भारत निर्वाचन आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाया है।
ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि ERO स्तर पर इन फॉर्मों के प्रदर्शन की प्रक्रिया का पालन नहीं हो रहा, जबकि आयोग इस स्थिति पर प्रभावी हस्तक्षेप नहीं कर रहा।
सपा ने इसे लेकर आयोग के रवैये को लेकर नाराजगी जताई है।
हालांकि, इन आरोपों पर चुनाव आयोग की ओर से क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है, यह महत्वपूर्ण होगा।
मार्च 2023 के मैनुअल का दिया हवाला
सपा ने अपनी मांग के समर्थन में भारत निर्वाचन आयोग के Manual on Electoral Rolls, March-2023 का भी उल्लेख किया है।
ज्ञापन के अनुसार इस मैनुअल में मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रिया और आवेदनों को लेकर नियम निर्धारित किए गए हैं।
सपा का कहना है कि यदि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाता है तो मतदाता सूची में पारदर्शिता और जनता की निगरानी दोनों मजबूत हो सकती हैं।
मतदाता सूची को लेकर राजनीति क्यों गर्म?
मतदाता सूची किसी भी चुनाव की बुनियादी संरचना का हिस्सा होती है।
किसे मतदान का अधिकार है, किसका नाम सूची में है, किसका नाम हटाया गया है और किसके विवरण में बदलाव हुआ है—ये सभी विषय चुनाव की निष्पक्षता से सीधे जुड़े होते हैं।
इसी वजह से राजनीतिक दल मतदाता सूची के पुनरीक्षण और संशोधन की प्रक्रिया पर लगातार नजर रखते हैं।
नाम जुड़ने से लेकर नाम हटने तक हर प्रक्रिया महत्वपूर्ण
किसी नए मतदाता का नाम जोड़ना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन यह सीधे मतदान के अधिकार से जुड़ी होती है।
इसी तरह किसी मतदाता का नाम हटाना भी संवेदनशील प्रक्रिया है। गलत तरीके से नाम हटने पर पात्र व्यक्ति मतदान से वंचित हो सकता है।
इसलिए आवेदन, सत्यापन और अंतिम निर्णय की पूरी प्रक्रिया का सही रिकॉर्ड होना महत्वपूर्ण है।
Form-8 भी कम महत्वपूर्ण नहीं
अक्सर चर्चा केवल नाम जोड़ने और हटाने को लेकर होती है, लेकिन Form-8 भी मतदाता सूची के लिए महत्वपूर्ण है।
मतदाता के नाम, पते या अन्य विवरण में संशोधन की जरूरत होने पर संबंधित प्रक्रिया के जरिए रिकॉर्ड को अपडेट किया जाता है।
गलत जानकारी से बचने और मतदाता सूची को अद्यतन रखने के लिए ऐसे संशोधनों की भी सही जांच जरूरी होती है।
सपा ने पारदर्शिता को बनाया मुख्य मुद्दा
अखिलेश यादव की ओर से सौंपे गए ज्ञापन में मूल जोर पारदर्शिता पर है।
पार्टी चाहती है कि मतदाता सूची में होने वाले बदलावों की जानकारी संबंधित स्तर पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो और आपत्तियों के लिए निर्धारित अवसर प्रभावी ढंग से दिया जाए।
सपा का मानना है कि इससे राजनीतिक दलों, मतदाताओं और प्रशासन के बीच भरोसा बढ़ सकता है।
राजनीतिक दलों के लिए भी अहम मुद्दा
मतदाता सूची की प्रक्रिया केवल प्रशासनिक विषय नहीं है। चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दलों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा भी है।
हर दल यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके समर्थकों और पात्र मतदाताओं के नाम सूची में सही तरीके से दर्ज हों।
साथ ही किसी अपात्र व्यक्ति का नाम शामिल न हो और पात्र मतदाता का नाम गलती से हटे नहीं।
पारदर्शिता से विवादों को रोका जा सकता है
यदि मतदाता सूची से जुड़े आवेदन और बदलाव निर्धारित नियमों के तहत सार्वजनिक प्रक्रिया से गुजरते हैं, तो विवाद की संभावना कम हो सकती है।
किसी नाम को लेकर आपत्ति हो तो उसे समय रहते उठाया जा सकता है।
इसी वजह से सपा ने सात दिन तक नोटिस बोर्ड पर जानकारी प्रदर्शित किए जाने की मांग को महत्वपूर्ण बताया है।
डिजिटल दौर में सूचना उपलब्ध कराने की चुनौती
आज मतदाता सूची और निर्वाचन प्रक्रिया तेजी से डिजिटल होती जा रही है। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर नोटिस बोर्ड और सार्वजनिक सूचना की भूमिका खत्म नहीं हुई है।
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में ऐसे मतदाता हैं जिनके लिए स्थानीय स्तर पर सूचना उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है।
इसलिए प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए डिजिटल व्यवस्था के साथ-साथ निर्धारित सार्वजनिक सूचना प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में चुनौती और बड़ी
उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और यहां 403 विधानसभा क्षेत्र हैं।
इतने बड़े राज्य में मतदाता सूची में लगातार होने वाले बदलावों की निगरानी करना अपने आप में बड़ा प्रशासनिक कार्य है।
लाखों मतदाताओं और बड़ी संख्या में आवेदन के बीच हर रिकॉर्ड को सही तरीके से जांचना और अपडेट करना निर्वाचन अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
सपा का दावा- बड़ी संख्या में Form-6 और Form-7 जमा हुए
ज्ञापन में समाजवादी पार्टी ने दावा किया है कि 11 अप्रैल 2026 से नाम जोड़ने और नाम हटाने से संबंधित बड़ी संख्या में Form-6 और Form-7 जमा हुए हैं।
पार्टी का कहना है कि इन आवेदनों की जांच बेहद सावधानी से होनी चाहिए।
विशेष रूप से नाम हटाने वाले आवेदनों को लेकर सत्यापन महत्वपूर्ण है, ताकि किसी वास्तविक मतदाता का नाम गलती से सूची से बाहर न हो जाए।
आपत्ति दर्ज कराने की व्यवस्था क्यों जरूरी?
यदि किसी मतदाता को लगता है कि किसी व्यक्ति का नाम गलत तरीके से जोड़ा जा रहा है या किसी पात्र मतदाता का नाम हटाया जा रहा है, तो उसे आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए।
सपा इसी प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और सार्वजनिक बनाने की मांग कर रही है।
सात दिनों तक सूचना प्रदर्शित करने की व्यवस्था का उद्देश्य भी इसी तरह की आपत्तियों को सामने लाने से जुड़ा बताया गया है।
अखिलेश यादव के नाम से सौंपा गया ज्ञापन
यह ज्ञापन सोमवार को लखनऊ में मुख्य निर्वाचन अधिकारी को सौंपा गया।
अखिलेश यादव की ओर से ज्ञापन सौंपने वालों में प्रदेश सचिव और वरिष्ठ अधिवक्ता केके श्रीवास्तव, डॉ. हरिश्चंद्र सिंह यादव तथा राधेश्याम सिंह शामिल रहे।
इन नेताओं ने पार्टी की ओर से मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों को निर्वाचन अधिकारी के सामने रखा।
आगामी चुनावी राजनीति में बढ़ सकता है मुद्दा
मतदाता सूची से जुड़ा यह मुद्दा आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति में और ज्यादा चर्चा का विषय बन सकता है।
सपा पहले भी चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची से जुड़े सवाल उठाती रही है।
अब Form-6, Form-7 और Form-8 को सार्वजनिक करने की मांग के जरिए पार्टी ने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाने की कोशिश की है।
सपा की मांग पर चुनाव आयोग का जवाब अहम होगा
अब नजर इस बात पर रहेगी कि चुनाव आयोग और मुख्य निर्वाचन अधिकारी इस मांग पर क्या कदम उठाते हैं।
यदि आयोग नियमों के तहत ERO कार्यालयों को निर्देश जारी करता है या मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करता है तो इससे विवाद को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
वहीं यदि आयोग का कहना है कि निर्धारित प्रक्रिया पहले से लागू है, तो उसकी जानकारी भी राजनीतिक दलों और जनता के लिए महत्वपूर्ण होगी।
मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र की बुनियाद
मतदाता सूची केवल नामों की सूची नहीं होती। यह तय करती है कि कौन नागरिक चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकता है।
इसलिए इसमें नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने की प्रक्रिया जितनी पारदर्शी होगी, चुनावी व्यवस्था पर भरोसा उतना ही मजबूत होगा।
राजनीतिक दलों की शिकायतों और प्रशासनिक प्रक्रिया के बीच स्पष्ट संवाद इस भरोसे को बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकता है।
हर आवेदन की जांच, हर आपत्ति का समाधान जरूरी
Form-6, Form-7 और Form-8 से जुड़े मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि प्रत्येक आवेदन निर्धारित प्रक्रिया और सत्यापन के बाद ही निस्तारित हो।
किसी नए मतदाता को जोड़ना हो, किसी नाम को हटाना हो या किसी रिकॉर्ड में संशोधन करना हो, प्रत्येक बदलाव का आधार स्पष्ट होना चाहिए।
इसी तरह यदि कोई आपत्ति आती है तो उसका भी समयबद्ध और नियमसम्मत निपटारा होना जरूरी है।
अखिलेश यादव का संदेश साफ- पारदर्शिता पर कोई समझौता नहीं
अखिलेश यादव की ओर से मुख्य निर्वाचन अधिकारी को सौंपे गए ज्ञापन के जरिए समाजवादी पार्टी ने स्पष्ट किया है कि वह मतदाता सूची में होने वाले बदलावों की प्रक्रिया पर नजर रखना चाहती है।
पार्टी की मांग है कि नियमों के मुताबिक फॉर्म सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किए जाएं और लोगों को आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिले।
अब इस मांग पर निर्वाचन तंत्र की कार्रवाई और आधिकारिक प्रतिक्रिया आने के बाद ही तस्वीर और साफ होगी।
उत्तर प्रदेश में वोटर लिस्ट का मुद्दा फिर सुर्खियों में
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मतदाता सूची हमेशा संवेदनशील विषय रही है। 403 विधानसभा क्षेत्रों और 1 लाख 77 हजार 516 मतदेय स्थलों वाले राज्य में मतदाता रिकॉर्ड को अपडेट करना बड़ा प्रशासनिक अभियान है।
ऐसे में नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन की प्रक्रिया पर राजनीतिक दलों की निगरानी स्वाभाविक है।
समाजवादी पार्टी का ताजा ज्ञापन इसी निगरानी को अधिक पारदर्शी बनाने की मांग के रूप में सामने आया है।

