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China में विदेश जाकर पढ़ने का क्रेज हुआ कम! 7 लाख से घटकर 5.7 लाख हुए छात्र, 94% पढ़ाई पूरी कर लौटे; आखिर क्यों बदल रही है युवाओं की सोच?

China Overseas Education की तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। कभी चीन के मध्यम और उच्च वर्ग के परिवारों के बीच विदेश जाकर पढ़ाई करना बेहतर करियर और प्रतिष्ठा का रास्ता माना जाता था, लेकिन अब इस सोच में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।

विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए चीन से बाहर जाने वाले छात्रों की संख्या में गिरावट आई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2019 में करीब 7 लाख चीनी छात्र विदेश पढ़ने गए थे। 2025 में यह संख्या घटकर लगभग 5.7 लाख रह गई।

दूसरी तरफ तस्वीर का दूसरा पहलू और भी दिलचस्प है। विदेश जाकर पढ़ाई पूरी करने वाले चीनी छात्रों में बड़ी संख्या अब लंबे समय तक विदेश में रहने के बजाय वापस अपने देश लौट रही है। 2025 में करीब 94 प्रतिशत छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद चीन वापस लौट आए।

पिछले एक दशक में विदेशों से पढ़ाई पूरी करके चीन लौटने वाले ग्रेजुएट्स की कुल संख्या करीब 52 लाख तक पहुंच चुकी है।

यह बदलाव सिर्फ छात्रों की पसंद में परिवर्तन नहीं है। इसके पीछे चीन के विश्वविद्यालयों की बढ़ती गुणवत्ता, विदेश में शिक्षा की बढ़ती लागत, नौकरी के बदलते अवसर और विदेशी डिग्री को लेकर कंपनियों के बदलते नजरिए जैसे कई कारण बताए जा रहे हैं।

कभी विदेश की डिग्री थी करियर की बड़ी सीढ़ी

चीन में लंबे समय तक अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों के विश्वविद्यालयों में पढ़ना बेहतर करियर की गारंटी जैसा माना जाता था।

परिवार अपने बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए बड़ी रकम खर्च करते थे। कई माता-पिता का मानना था कि विदेशी विश्वविद्यालय की डिग्री से नौकरी के बेहतर अवसर मिलेंगे और युवा घरेलू प्रतियोगिता से आगे निकल सकेंगे।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परिस्थितियां बदलने लगी हैं।

अब परिवार यह सवाल ज्यादा गंभीरता से पूछ रहे हैं कि विदेश जाकर पढ़ाई करने पर जितना पैसा खर्च होगा, क्या उसके बदले मिलने वाला करियर लाभ वास्तव में उतना बड़ा है?

अगर चीन की अपनी यूनिवर्सिटीज में अच्छी शिक्षा कम खर्च में उपलब्ध है, तो विदेश जाने की जरूरत कितनी है—यह सवाल तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है।

2019 में 7 लाख, 2025 में करीब 5.7 लाख छात्र

विदेश जाने वाले चीनी छात्रों की संख्या में आया बदलाव इस बदलती सोच का सबसे स्पष्ट संकेत है।

2019 में करीब 7 लाख छात्र विदेश पढ़ाई के लिए गए थे। 2025 तक यह संख्या घटकर करीब 5.7 लाख रह गई।

यानी कुछ वर्षों के अंतर में विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है।

यह गिरावट केवल शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव नहीं बताती, बल्कि चीनी परिवारों के आर्थिक फैसलों और युवाओं की करियर प्राथमिकताओं में भी परिवर्तन का संकेत देती है।

विदेश गए तो वापस लौटने का ट्रेंड भी मजबूत

जहां विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या घट रही है, वहीं विदेश से चीन लौटने वालों की संख्या बढ़ रही है।

2025 में करीब 94 प्रतिशत चीनी छात्र विदेश में पढ़ाई पूरी करने के बाद चीन लौट आए।

यह आंकड़ा बताता है कि विदेश जाना अब बड़ी संख्या में युवाओं के लिए स्थायी प्रवास का रास्ता नहीं रह गया है।

वे विदेशी विश्वविद्यालयों से शिक्षा और अनुभव हासिल करने के बाद अपने देश में करियर बनाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

10 साल में 52 लाख ग्रेजुएट चीन लौटे

पिछले दशक में करीब 52 लाख चीनी ग्रेजुएट विदेशों से पढ़ाई पूरी करने के बाद वापस चीन लौट चुके हैं।

इतनी बड़ी संख्या में विदेश-शिक्षित युवाओं की वापसी चीन के श्रम बाजार के लिए भी महत्वपूर्ण है।

इन युवाओं के पास विदेशी शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और अलग-अलग देशों के कार्य वातावरण की समझ होती है।

चीन में इनकी वापसी से कंपनियों को ऐसे कर्मचारियों का बड़ा समूह मिल रहा है, जिनके पास घरेलू शिक्षा के साथ अंतरराष्ट्रीय exposure भी है।

विदेशी डिग्री से मिलने वाला फायदा अब पहले जैसा नहीं?

एक समय विदेशी डिग्री अपने आप में नौकरी के बाजार में बड़ा फायदा मानी जाती थी।

लेकिन अब कंपनियों का नजरिया बदल रहा है।

कई नियोक्ता केवल यह नहीं देखते कि उम्मीदवार ने किस देश से डिग्री ली है। वे यह भी देखते हैं कि उम्मीदवार ने वास्तव में क्या सीखा, उसकी तकनीकी क्षमता क्या है और वह कंपनी के लिए कितना उपयोगी साबित हो सकता है।

यानी विदेशी विश्वविद्यालय का नाम अब हर परिस्थिति में नौकरी की गारंटी नहीं माना जा रहा।

कंपनियों के HR के नजरिए में आया बदलाव

कुछ कंपनियां विदेशी डिग्री को लेकर पहले जैसी प्राथमिकता नहीं दे रही हैं।

इसके पीछे एक कारण विदेशी पाठ्यक्रमों की अवधि और गुणवत्ता को लेकर उठने वाले सवाल बताए जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर चीन में पोस्ट ग्रेजुएशन की कई डिग्रियों की अवधि तीन साल तक हो सकती है, जबकि ब्रिटेन और अमेरिका में कुछ मास्टर कार्यक्रम एक वर्ष में पूरे हो जाते हैं।

कम अवधि में डिग्री पूरी होने को लेकर कुछ HR विशेषज्ञ शिक्षा की गहराई और प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं।

एक साल की विदेशी मास्टर डिग्री पर सवाल क्यों?

ब्रिटेन और अमेरिका में कई मास्टर कार्यक्रम अपेक्षाकृत कम अवधि में पूरे किए जा सकते हैं।

दूसरी तरफ चीन में कुछ समान स्तर के कार्यक्रम ज्यादा लंबी अवधि के होते हैं।

इस अंतर के कारण कुछ नियोक्ता उम्मीदवार की डिग्री की अवधि, पाठ्यक्रम की गहराई और वास्तविक कौशल को अलग-अलग तरीके से देखते हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि हर विदेशी डिग्री कमजोर है, बल्कि कंपनियां अब केवल विदेशी डिग्री के नाम के आधार पर उम्मीदवार को प्राथमिकता देने के बजाय अधिक व्यापक मूल्यांकन करती हैं।

सरकारी नौकरियों में भी बढ़ी चुनौती

विदेश से पढ़ाई करके चीन लौटने वाले युवाओं के सामने सरकारी नौकरी का रास्ता भी पहले जितना आसान नहीं माना जा रहा।

सरकारी नौकरियों में कई पदों के लिए विशेष पात्रता, मान्यता और प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है।

विदेशी डिग्री होने मात्र से उम्मीदवार को अतिरिक्त लाभ मिलना जरूरी नहीं है।

इससे उन परिवारों के लिए विदेश में पढ़ाई का आकर्षण कम हो सकता है जो मुख्य रूप से सरकारी या स्थिर करियर को लक्ष्य बनाकर बच्चों को विदेश भेजते हैं।

विदेश में पढ़ाई अब बेहद महंगी हो रही है

विदेशी शिक्षा की घटती लोकप्रियता का एक बड़ा कारण आर्थिक भी है।

उपलब्ध सर्वेक्षण के मुताबिक 2025 में विदेश जाकर पढ़ाई करने का औसत खर्च बढ़कर करीब 85 लाख रुपये हो गया।

यह 2023 के मुकाबले लगभग 20 प्रतिशत ज्यादा बताया गया है।

जब शिक्षा के साथ रहने, खाने, यात्रा, स्वास्थ्य बीमा और अन्य खर्च जोड़ दिए जाते हैं, तो विदेश में पढ़ाई कई परिवारों के लिए बहुत बड़ा आर्थिक फैसला बन जाती है।

85 लाख का औसत खर्च परिवारों के लिए बड़ा सवाल

किसी छात्र की विदेशी शिक्षा पर लगभग 85 लाख रुपये खर्च होना एक बड़ी रकम है।

परिवार यह देखना चाहते हैं कि इतनी बड़ी रकम खर्च करने के बाद छात्र की आय कितनी होगी और निवेश की भरपाई कितने वर्षों में संभव होगी।

अगर विदेशी डिग्री के बाद मिलने वाली नौकरी चीन में उपलब्ध समान अवसरों से बहुत अलग नहीं है, तो विदेश जाने का आर्थिक तर्क कमजोर हो सकता है।

महंगाई ने भी बदला परिवारों का बजट

विदेश में पढ़ाई का खर्च केवल विश्वविद्यालय की फीस तक सीमित नहीं रहता।

रहने का किराया, भोजन, स्थानीय परिवहन, स्वास्थ्य बीमा, किताबें और अन्य खर्च कुल बजट को काफी बढ़ा देते हैं।

विदेशी मुद्रा की विनिमय दर में बदलाव भी परिवारों के खर्च को प्रभावित कर सकता है।

ऐसे में माता-पिता अब शिक्षा के फैसले को अधिक आर्थिक नजरिए से देखने लगे हैं।

अब छात्र ‘वैल्यू फॉर मनी’ वाले देश चुन रहे

जो चीनी छात्र अभी भी विदेश पढ़ने जा रहे हैं, वे भी पहले की तुलना में अधिक सोच-समझकर देश चुन रहे हैं।

उनका ध्यान केवल प्रतिष्ठित नामों पर नहीं, बल्कि फीस, पाठ्यक्रम की गुणवत्ता, रोजगार की संभावना और पढ़ाई के बाद करियर अवसरों पर भी है।

यानी विदेशी शिक्षा का बाजार अब केवल ‘कहां पढ़ना है’ के सवाल से आगे बढ़कर ‘कहां पढ़ने पर निवेश का बेहतर परिणाम मिलेगा’ तक पहुंच गया है।

चीन की यूनिवर्सिटीज लगातार मजबूत हुईं

विदेश जाने की जरूरत कम महसूस होने के पीछे चीन के घरेलू विश्वविद्यालयों की बढ़ती ताकत भी एक महत्वपूर्ण कारण है।

चीन ने पिछले कुछ दशकों में उच्च शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश किया है।

इसके परिणामस्वरूप चीन की कई यूनिवर्सिटीज वैश्विक रैंकिंग में तेजी से ऊपर आई हैं।

अब देश के शीर्ष विश्वविद्यालयों को दुनिया के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ प्रतिस्पर्धा करते देखा जा रहा है।

पेकिंग और त्सिंगहुआ की वैश्विक रैंकिंग में बड़ी छलांग

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पेकिंग यूनिवर्सिटी और त्सिंगहुआ यूनिवर्सिटी अब वैश्विक रैंकिंग में क्रमशः 13वें और 14वें स्थान पर हैं।

यह स्थिति चीनी छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है।

जब अपने ही देश में दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में शामिल संस्थान उपलब्ध हों, तो विदेश जाने का निर्णय पहले की तुलना में कम जरूरी लग सकता है।

‘985’ और ‘211’ यूनिवर्सिटीज की मजबूत स्थिति

चीन में ‘985’ और ‘211’ समूह से जुड़े विश्वविद्यालयों को लंबे समय से उच्च शिक्षा और अनुसंधान के महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

इन संस्थानों में मजबूत अकादमिक कार्यक्रम, अनुसंधान सुविधाएं और उद्योग से जुड़ाव विकसित किया गया है।

कई मामलों में इन विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा अब अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के बराबर या कुछ क्षेत्रों में उससे बेहतर मानी जा रही है।

कम फीस चीन की बड़ी ताकत

विदेशी विश्वविद्यालयों की तुलना में चीन की सरकारी यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई का खर्च काफी कम हो सकता है।

जब परिवार को समान स्तर की शिक्षा घरेलू विश्वविद्यालय में कम लागत पर मिलती है, तो विदेश जाने की आर्थिक उपयोगिता कम हो जाती है।

यही अंतर चीन के छात्रों और उनके माता-पिता के फैसले पर प्रभाव डाल रहा है।

विदेश से लौटने वालों की शुरुआती सैलरी कितनी?

न्यू ओरिएंटल के आंकड़ों के मुताबिक विदेश से पढ़ाई पूरी करके लौटने वाले छात्रों की शुरुआती औसत सैलरी करीब 1.80 लाख रुपये प्रति महीना बताई गई है।

इसके मुकाबले चीन में रहकर पढ़ाई करने वाले छात्रों की औसत शुरुआती सैलरी करीब 1 लाख रुपये प्रति महीना बताई गई है।

आंकड़ों के हिसाब से विदेशी शिक्षा प्राप्त युवाओं को औसतन शुरुआती स्तर पर कुछ आय लाभ मिलता दिखाई देता है।

लेकिन यही पूरी कहानी नहीं है।

विदेशी डिग्री के बावजूद हर किसी को ऊंची सैलरी नहीं

औसत आंकड़े हमेशा हर व्यक्ति की वास्तविक स्थिति नहीं बताते।

विदेश से लौटे कई युवाओं को अपेक्षित स्तर की नौकरी नहीं मिल रही है। कुछ मामलों में उनकी कमाई इतनी कम है कि उन्हें रोजमर्रा के खर्च पूरे करने के लिए डिलीवरी जैसे काम करने पड़ रहे हैं।

यह स्थिति विदेशी शिक्षा और नौकरी के बीच बढ़ते अंतर की ओर संकेत करती है।

डिग्री और नौकरी के बीच बढ़ता अंतर

किसी प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालय से डिग्री हासिल करना अपने आप में अच्छी नौकरी की गारंटी नहीं है।

नौकरी बाजार में मांग और आपूर्ति, उद्योग की स्थिति, उम्मीदवार की विशेषज्ञता, भाषा कौशल और व्यावहारिक अनुभव जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं।

अगर किसी क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम हैं, तो विदेशी डिग्री होने के बावजूद युवा संघर्ष कर सकते हैं।

डिलीवरी जैसे काम करने को मजबूर युवा

विदेश से पढ़ाई पूरी करके चीन लौटे कुछ युवाओं के सामने रोजगार की ऐसी स्थिति है कि उन्हें गुजारे के लिए डिलीवरी जैसे काम भी करने पड़ रहे हैं।

यह तस्वीर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाती है कि महंगी विदेशी शिक्षा और वास्तविक रोजगार के बीच हमेशा सीधा संबंध नहीं होता।

परिवारों के लिए यह एक बड़ा संकेत है कि विदेश भेजने से पहले करियर की संभावनाओं का आकलन करना जरूरी है।

विदेश लौटे युवाओं की संख्या क्यों बढ़ रही?

चीन लौटने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या के पीछे कई कारण हो सकते हैं।

पहला कारण घरेलू विश्वविद्यालयों और रोजगार बाजार की मजबूती है। दूसरा, चीन की अर्थव्यवस्था में उच्च कौशल वाले कर्मचारियों की मांग है। तीसरा, विदेशी देशों में शिक्षा और रहने की बढ़ती लागत है।

इसके अलावा विदेश में नौकरी हासिल करने और लंबे समय तक रहने की जटिलताएं भी युवाओं के फैसले को प्रभावित कर सकती हैं।

देश में ही करियर बनाने का विकल्प मजबूत

जब किसी युवा के सामने चीन में अच्छी यूनिवर्सिटी, कम फीस और घर के करीब रहने का विकल्प हो, तो विदेश जाने का फैसला पहले की तुलना में कठिन हो जाता है।

विशेष रूप से मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए घरेलू शिक्षा का विकल्प अधिक आकर्षक हो सकता है।

इससे विदेश शिक्षा की मांग में कमी आना स्वाभाविक है।

चीन का शिक्षा मॉडल भी बदल रहा है

चीन ने पिछले वर्षों में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता सुधार, अनुसंधान और तकनीकी शिक्षा पर काफी जोर दिया है।

इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, विज्ञान और अन्य क्षेत्रों में चीनी विश्वविद्यालयों की वैश्विक पहचान मजबूत हुई है।

इसका सीधा असर छात्रों की प्राथमिकताओं पर पड़ता है।

टेक्नोलॉजी और रिसर्च में घरेलू अवसर

चीन में टेक्नोलॉजी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इलेक्ट्रिक वाहन, मैन्युफैक्चरिंग, ऊर्जा और अन्य क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है।

इन क्षेत्रों में उच्च कौशल वाले युवाओं के लिए घरेलू अवसर बढ़े हैं।

इसलिए कई छात्र यह मान सकते हैं कि अपने देश में रहकर ही उन्हें अपने क्षेत्र में बेहतर करियर अवसर मिल सकते हैं।

विदेशी शिक्षा अब प्रतिष्ठा से ज्यादा निवेश का सवाल

पहले विदेश जाकर पढ़ना परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हो सकता था।

लेकिन बढ़ती लागत और नौकरी के बदलते बाजार ने इसे आर्थिक निवेश में बदल दिया है।

माता-पिता अब पूछते हैं—कुल खर्च कितना होगा, डिग्री कितने समय में पूरी होगी, नौकरी कितनी मिलेगी और खर्च की भरपाई कितने समय में होगी?

विदेश जाने वालों की संख्या में गिरावट का बड़ा संदेश

2019 के करीब 7 लाख से 2025 में लगभग 5.7 लाख छात्रों तक पहुंचना मामूली बदलाव नहीं है।

यह बताता है कि चीन में विदेश शिक्षा को लेकर पारंपरिक धारणा बदल रही है।

युवा अब वैश्विक शिक्षा चाहते जरूर हैं, लेकिन उसके लिए देश से बाहर जाना ही एकमात्र विकल्प नहीं मान रहे।

फिर भी विदेशी विश्वविद्यालयों की मांग खत्म नहीं हुई

यह कहना गलत होगा कि चीनी छात्र अब विदेश नहीं जाना चाहते।

अब भी बड़ी संख्या में छात्र विदेशों में उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं।

लेकिन उनकी संख्या में कमी और देशों के चयन में बदलाव यह दिखाता है कि फैसला अधिक चयनात्मक और आर्थिक आधार पर लिया जा रहा है।

जो विदेश जा रहे हैं, वे ज्यादा सोच-समझकर जा रहे

विदेश जाने वाले छात्रों का नया वर्ग केवल विश्वविद्यालय की रैंकिंग नहीं देख रहा।

वे फीस, पढ़ाई की अवधि, रहने की लागत, स्कॉलरशिप, नौकरी के अवसर और पढ़ाई के बाद देश में रहने की संभावनाओं पर भी विचार कर रहे हैं।

इस बदलाव से विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए चीनी छात्रों को आकर्षित करना भी अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

ब्रिटेन और अमेरिका पर भी पड़ सकता है असर

चीनी छात्र लंबे समय से ब्रिटेन, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के विश्वविद्यालयों के लिए महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय छात्र समूह रहे हैं।

यदि चीन से बाहर जाने वाले छात्रों की संख्या लंबे समय तक कम रहती है, तो विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने अंतरराष्ट्रीय छात्र बाजार में बदलाव के लिए तैयार रहना होगा।

यह बदलाव शिक्षा के साथ-साथ विश्वविद्यालयों की वित्तीय रणनीति को भी प्रभावित कर सकता है।

विदेशी विश्वविद्यालयों को देना होगा ज्यादा जवाब

चीनी परिवार अब विदेशी डिग्री की कीमत और गुणवत्ता को अधिक बारीकी से परख रहे हैं।

केवल प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का नाम पर्याप्त नहीं होगा।

विश्वविद्यालयों को यह दिखाना होगा कि उनके पाठ्यक्रम से छात्रों को वास्तविक कौशल, अनुसंधान अवसर और रोजगार की बेहतर संभावनाएं मिलती हैं।

चीन लौटे 52 लाख ग्रेजुएट बन सकते हैं बड़ी ताकत

एक दशक में करीब 52 लाख विदेश-शिक्षित युवाओं का चीन लौटना देश के लिए बड़ा मानव संसाधन है।

इन युवाओं के पास अंतरराष्ट्रीय exposure, विदेशी भाषाओं का ज्ञान, अलग-अलग शिक्षा प्रणालियों का अनुभव और वैश्विक नेटवर्क हो सकता है।

यदि चीन इन युवाओं की विशेषज्ञता का प्रभावी इस्तेमाल करता है तो यह उसकी अर्थव्यवस्था और अनुसंधान क्षमता के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

विदेश से लौटे युवाओं को भी नौकरी की चुनौती

हालांकि विदेश से लौटना अपने आप में सफलता की गारंटी नहीं है।

यदि घरेलू श्रम बाजार में नौकरियां कम हैं या उम्मीदवार की विशेषज्ञता की मांग नहीं है, तो विदेशी डिग्री वाला युवा भी बेरोजगारी या कम वेतन का सामना कर सकता है।

डिलीवरी जैसे काम करने वाले कुछ विदेश-शिक्षित युवाओं की स्थिति इसी चुनौती की ओर संकेत करती है।

औसत सैलरी का आंकड़ा पूरी तस्वीर नहीं बताता

1.80 लाख रुपये की औसत शुरुआती सैलरी और घरेलू छात्रों के लिए 1 लाख रुपये की औसत सैलरी के बीच अंतर आकर्षक दिखाई देता है।

लेकिन औसत में अलग-अलग क्षेत्रों, शहरों, विश्वविद्यालयों और उम्मीदवारों की परिस्थितियां शामिल होती हैं।

किसी व्यक्ति की वास्तविक आय उसके विषय, कौशल, अनुभव और नौकरी के क्षेत्र पर निर्भर कर सकती है।

परिवारों की सोच में आया व्यावहारिक बदलाव

चीनी माता-पिता अब केवल डिग्री नहीं, बल्कि शिक्षा के परिणाम पर ध्यान दे रहे हैं।

अगर घरेलू विश्वविद्यालय कम लागत में अच्छी शिक्षा और नौकरी के बेहतर अवसर दे रहा है तो विदेश जाना जरूरी नहीं लगता।

यही व्यावहारिक सोच विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में गिरावट के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है।

चीन के विश्वविद्यालयों की बढ़ती वैश्विक छवि

पेकिंग और त्सिंगहुआ जैसे संस्थानों की ऊंची वैश्विक रैंकिंग चीन के लिए बड़ी उपलब्धि है।

इससे घरेलू विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा मजबूत होती है और छात्रों को देश में ही उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा का विकल्प मिलता है।

चीन के लिए यह शिक्षा नीति के लंबे समय के निवेश का परिणाम भी माना जा सकता है।

विदेशी शिक्षा का भविष्य कैसा होगा?

चीन में विदेश जाकर पढ़ने का चलन पूरी तरह खत्म होने वाला नहीं है।

लेकिन अब यह पहले की तरह mass trend भी नहीं रह सकता।

भविष्य में छात्र अधिक चुनिंदा विश्वविद्यालय, विषय और देश चुन सकते हैं। आर्थिक लाभ, रोजगार और शिक्षा की गुणवत्ता निर्णय के सबसे महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

अब ‘विदेश जाना’ नहीं, ‘सही जगह जाना’ प्राथमिकता

चीनी छात्रों की नई सोच को एक लाइन में समझें तो सवाल बदल गया है।

पहले सवाल था—विदेश में कहां पढ़ें?

अब सवाल ज्यादा व्यावहारिक हो गया है—कहां पढ़ने से भविष्य बेहतर होगा?

अगर जवाब चीन की किसी शीर्ष यूनिवर्सिटी में मिलता है तो छात्र विदेश जाने के बजाय घरेलू विकल्प चुन सकता है।

चीन के लिए यह बदलाव दोधारी तलवार

विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में गिरावट चीन के लिए सकारात्मक भी हो सकती है और चुनौतीपूर्ण भी।

सकारात्मक इसलिए कि अधिक प्रतिभाशाली युवा देश में रह सकते हैं और घरेलू विश्वविद्यालयों तथा उद्योग को फायदा पहुंचा सकते हैं।

चुनौती इसलिए कि अंतरराष्ट्रीय exposure और वैश्विक नेटवर्क से मिलने वाले लाभ कम हो सकते हैं।

विदेश से लौटने वालों का अनुभव देश के काम आ सकता है

दूसरी तरफ 52 लाख विदेश-शिक्षित युवाओं की वापसी चीन के लिए एक बड़ी ताकत है।

यदि इन युवाओं को अनुसंधान, उद्योग, शिक्षा और स्टार्टअप क्षेत्र में सही अवसर मिलते हैं तो वे विदेश में हासिल अनुभव को घरेलू अर्थव्यवस्था में इस्तेमाल कर सकते हैं।

चीन में उच्च शिक्षा का नया समीकरण

आज चीन के सामने एक ऐसी स्थिति है जहां घरेलू विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता बढ़ रही है, विदेशी शिक्षा महंगी हो रही है और विदेश से पढ़कर लौटने वालों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है।

इन तीनों घटनाओं को एक साथ देखें तो स्पष्ट होता है कि चीन की शिक्षा व्यवस्था और छात्रों की सोच दोनों संक्रमण के दौर से गुजर रही हैं।

विदेशी डिग्री का आकर्षण घटा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय शिक्षा की जरूरत नहीं

विदेशी शिक्षा का महत्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। वैश्विक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई अभी भी शोध, अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और विशेष क्षेत्रों में विशेषज्ञता का अवसर देती है।

लेकिन अब विदेशी डिग्री अपने आप में नौकरी का टिकट नहीं मानी जा रही।

छात्र और परिवार पहले से ज्यादा सवाल पूछ रहे हैं और लागत तथा लाभ का हिसाब लगा रहे हैं।

आने वाले वर्षों में और बदल सकती है तस्वीर

यदि चीन के विश्वविद्यालय वैश्विक रैंकिंग में अपनी स्थिति और मजबूत करते हैं, घरेलू उद्योग उच्च कौशल वाली नौकरियां पैदा करता है और विदेशी शिक्षा की लागत ऊंची बनी रहती है, तो विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में आगे भी बदलाव संभव है।

दूसरी ओर यदि विदेशी विश्वविद्यालय बेहतर रोजगार अवसर और आकर्षक फीस मॉडल उपलब्ध कराते हैं तो चीनी छात्रों की मांग फिर बढ़ सकती है।

चीन की शिक्षा यात्रा में बदलता हुआ मोड़

2019 में करीब 7 लाख छात्रों का विदेश जाना और 2025 में यह संख्या करीब 5.7 लाख रह जाना एक महत्वपूर्ण बदलाव है। इसी दौरान करीब 94 प्रतिशत विदेश-शिक्षित छात्रों का वापस चीन लौटना और एक दशक में 52 लाख ग्रेजुएट्स की वापसी एक दूसरी बड़ी कहानी बताती है।

यह कहानी केवल विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या कम होने की नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है जिसमें चीन के परिवार अब शिक्षा को प्रतिष्ठा से ज्यादा निवेश, कौशल और रोजगार के नजरिए से देख रहे हैं।

घरेलू विश्वविद्यालयों की बढ़ती गुणवत्ता, कम फीस, विदेशी शिक्षा की बढ़ती लागत और कंपनियों द्वारा विदेशी डिग्री को लेकर अधिक व्यावहारिक रवैया—इन सभी ने मिलकर China Overseas Education की पुरानी तस्वीर बदल दी है।

चीन में विदेश जाकर पढ़ाई करने की पारंपरिक दौड़ अब धीमी पड़ती दिखाई दे रही है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2019 में करीब 7 लाख चीनी छात्र विदेश पढ़ने गए थे, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर लगभग 5.7 लाख रह गई। दूसरी ओर विदेश से पढ़ाई पूरी करके चीन लौटने वालों की संख्या बढ़ी है और 2025 में करीब 94 प्रतिशत छात्र वापस लौटे। पिछले एक दशक में लगभग 52 लाख ग्रेजुएट चीन लौट चुके हैं। विदेश में शिक्षा की बढ़ती लागत, जिसका औसत खर्च 2025 में करीब 85 लाख रुपये बताया गया है, और चीन की पेकिंग तथा त्सिंगहुआ जैसी यूनिवर्सिटीज की मजबूत वैश्विक स्थिति ने घरेलू शिक्षा को अधिक आकर्षक बनाया है। विदेशी डिग्री अभी भी कुछ क्षेत्रों में फायदा दे सकती है, लेकिन कंपनियां अब केवल डिग्री के देश को देखकर नियुक्ति नहीं करतीं। ऐसे में चीन के छात्रों और परिवारों की प्राथमिकता तेजी से बदल रही है—विदेश जाना अब प्रतिष्ठा से ज्यादा लागत, गुणवत्ता, कौशल और रोजगार के वास्तविक लाभ का सवाल बनता जा रहा है।

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