ईरान पर Trump की रणनीति से खाड़ी में बढ़ी बेचैनी! अमेरिका-तेहरान समझौता क्यों अटका, होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा पेच
News-Desk
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स्थिति की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि ईरान के साथ किसी भी समझौते का सीधा असर खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा, तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार और होर्मुज स्ट्रेट पर पड़ सकता है। यही समुद्री मार्ग दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
रिपोर्टों के मुताबिक खाड़ी के अमेरिकी सहयोगियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि यदि अमेरिका ईरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव डाल रहा है तो बातचीत का अंतिम परिणाम अभी तक सामने क्यों नहीं आया। दूसरी तरफ व्हाइट हाउस ने इस धारणा को खारिज किया है कि खाड़ी देश राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से नाराज हैं।
अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ट्रंप के खाड़ी देशों के नेताओं के साथ अच्छे संबंध हैं और युद्ध शुरू होने के बाद से वॉशिंगटन लगातार क्षेत्रीय सहयोगियों के संपर्क में है।
Trump ने फिलहाल ईरान पर नए हमले की तैयारी से किया इनकार
ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की संभावना लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति का सबसे बड़ा सवाल बनी हुई है। लेकिन हालिया संकेतों में राष्ट्रपति डोनाल्ड Trump ने फिलहाल ईरान पर नए हमले की तैयारी से इनकार किया है।
रिपोर्टों के मुताबिक ट्रंप ने पिछले सप्ताह कहा कि अमेरिका ईरान के साथ बातचीत कर रहा है, हालांकि उन्होंने इसे पूरी तरह निर्णायक बातचीत के रूप में पेश नहीं किया।
ट्रंप ने ईरान की खराब आर्थिक स्थिति का भी उल्लेख किया और संकेत दिया कि अमेरिका तेहरान पर आर्थिक दबाव के असर को देख रहा है।
इससे पहले भी ट्रंप ने ईरान पर संभावित हमले को रोकने का फैसला किया था। उनका तर्क था कि यदि बातचीत के जरिए जल्द समझौता हो सकता है तो सैन्य कार्रवाई की जरूरत नहीं पड़ेगी।
अमेरिकी रणनीति में ‘दबाव और बातचीत’ दोनों साथ-साथ
ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति को केवल सैन्य दबाव या केवल कूटनीति के रूप में देखना आसान नहीं है।
एक तरफ अमेरिका ईरान पर दबाव बनाए रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ बातचीत का रास्ता खुला रखने की कोशिश भी जारी है।
यही दोहरी रणनीति खाड़ी सहयोगियों के लिए भी सवाल पैदा कर रही है। कुछ देश चाहते हैं कि अमेरिका ईरान पर ज्यादा कठोर सैन्य दबाव बनाए, जबकि कुछ का मानना है कि सीधा सैन्य टकराव पूरे क्षेत्र को लंबे संघर्ष में धकेल सकता है।
इस अंतर ने अमेरिका के प्रमुख अरब सहयोगियों के बीच ईरान को लेकर अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं को उजागर किया है।
UAE चाहता है ईरान पर और ज्यादा सैन्य दबाव
संयुक्त अरब अमीरात का रुख ईरान के मामले में अपेक्षाकृत कठोर बताया जा रहा है।
UAE का मानना है कि ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड को पीछे हटाने और तेहरान पर वास्तविक दबाव बनाने के लिए अमेरिका को अपनी सैन्य शक्ति का अधिक प्रभावी इस्तेमाल करना चाहिए।
होर्मुज स्ट्रेट का मुद्दा भी UAE के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। UAE चाहता है कि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर आवाजाही सुरक्षित और निर्बाध हो तथा किसी भी तरह की नाकाबंदी को समाप्त किया जाए।
अबू धाबी के लिए यह केवल समुद्री व्यापार का सवाल नहीं है। होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर किसी भी प्रकार का गंभीर संकट पूरी खाड़ी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
सऊदी अरब का रास्ता अलग—बातचीत और तनाव कम करने पर जोर
दूसरी तरफ सऊदी अरब का दृष्टिकोण अधिक सावधानी भरा बताया जा रहा है।
रियाद बातचीत और तनाव कम करने के पक्ष में है। सऊदी नेतृत्व का मानना है कि ईरान के साथ सीधा सैन्य टकराव खाड़ी क्षेत्र के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ट्रंप से फोन पर बातचीत के दौरान सैन्य कार्रवाई नहीं करने की अपील भी की थी।
सऊदी अरब और ईरान के बीच पिछले वर्षों में संबंध सुधारने की कोशिशें हुई हैं। ऐसे में रियाद के लिए अमेरिका और ईरान के बीच खुला युद्ध उसके अपने क्षेत्रीय कूटनीतिक हितों के खिलाफ जा सकता है।
सऊदी क्यों नहीं चाहता बड़ा सैन्य टकराव?
सऊदी अरब की चिंता केवल ईरान के परमाणु या सैन्य कार्यक्रम तक सीमित नहीं है।
यदि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ता है तो खाड़ी क्षेत्र में तेल प्रतिष्ठान, बंदरगाह, हवाई अड्डे और समुद्री परिवहन भी खतरे में आ सकते हैं।
सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादकों में से एक है। किसी भी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष से तेल की कीमतों, वैश्विक आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर व्यापक असर पड़ सकता है।
इसके अलावा खाड़ी में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी संभावित प्रतिक्रिया का लक्ष्य बन सकते हैं।
इसलिए रियाद के लिए तनाव को सीमित रखना रणनीतिक प्राथमिकता बन सकता है।
कतर ने संभाली मध्यस्थ की भूमिका
कतर ने इस पूरे घटनाक्रम में अलग भूमिका निभाई है। उसने ईरान, अमेरिका और ओमान के बीच बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश की है।
कतर लंबे समय से मध्य पूर्व के जटिल विवादों में बैक-चैनल डिप्लोमेसी के लिए जाना जाता है।
रिपोर्टों के मुताबिक कतर के अधिकारियों ने ट्रंप को यह जानकारी भी दी थी कि ईरान ने होर्मुज को लेकर एक प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है।
यदि यह प्रस्ताव वास्तविक समझौते की दिशा में आगे बढ़ता है तो कतर की मध्यस्थ भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है।
होर्मुज स्ट्रेट बना पूरी बातचीत का सबसे बड़ा अड़ंगा
अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में सबसे जटिल मुद्दों में होर्मुज स्ट्रेट शामिल है।
होर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।
दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के लिए इसकी रणनीतिक अहमियत इतनी ज्यादा है कि यहां थोड़े समय के लिए भी गंभीर व्यवधान पैदा होने पर वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल हो सकती है।
इसी वजह से अमेरिका चाहता है कि समुद्री मार्ग को पूरी तरह और तुरंत खोला जाए।
ईरान की स्थिति इससे बिल्कुल अलग है।
अमेरिका की मांग—होर्मुज तुरंत और पूरी तरह खुले
अमेरिकी पक्ष की प्राथमिकता होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की सुरक्षित और निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करना है।
वॉशिंगटन के लिए यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा का प्रश्न भी है।
यदि किसी समय ईरान होर्मुज के रास्ते पर नियंत्रण सीमित करता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो इसका असर खाड़ी से निकलने वाले तेल और गैस पर पड़ सकता है।
यही कारण है कि ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे पर स्पष्ट और तत्काल समाधान चाहता है।
ईरान की शर्त—पहले अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटे
ईरान इस मामले में अलग शर्त रख रहा है।
तेहरान चाहता है कि अमेरिका पहले अपनी नौसैनिक नाकाबंदी हटाए और ईरान के आसपास तैनात अमेरिकी सैनिकों को पीछे करे।
ईरान के अनुसार जब तक अमेरिकी सैन्य दबाव कम नहीं होता, तब तक होर्मुज को पूरी तरह खोलने की स्थिति पर सहमति बनाना कठिन होगा।
यहीं से बातचीत का सबसे बड़ा गतिरोध पैदा होता है।
अमेरिका चाहता है कि पहले समुद्री मार्ग खुले, जबकि ईरान चाहता है कि पहले सैन्य दबाव हटे।
दोनों मांगें एक-दूसरे के ठीक विपरीत हैं।
ईरान और ओमान के बीच भी हो रही है बातचीत
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के अनुसार होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान और ओमान के बीच बातचीत जारी है।
इस बातचीत में समुद्र में जहाजों की आवाजाही और उनके लिए सुरक्षित रास्ते तय करने जैसे तकनीकी मुद्दों पर चर्चा हो रही है।
अराघची ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान और ओमान के बीच हो रही बातचीत को अमेरिका के साथ चल रही बातचीत से अलग समझा जाना चाहिए।
इसका मतलब यह है कि तेहरान एक साथ अलग-अलग चैनलों के जरिए संकट को संभालने की कोशिश कर रहा है।
ओमान क्यों बन सकता है अहम कड़ी?
ओमान की भौगोलिक स्थिति उसे होर्मुज और खाड़ी की राजनीति में विशेष महत्व देती है।
मस्कट लंबे समय से क्षेत्रीय विवादों में अपेक्षाकृत संतुलित और मध्यस्थ भूमिका निभाता रहा है।
ईरान और अरब देशों के बीच संवाद के लिए ओमान के चैनल पहले भी उपयोगी रहे हैं।
इस बार भी यदि होर्मुज को लेकर कोई तकनीकी या समुद्री व्यवस्था बनती है तो ओमान उसके लिए महत्वपूर्ण मंच बन सकता है।
ईरानी राष्ट्रपति ने अमेरिका और इजराइल पर लगाया बड़ा आरोप
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने आरोप लगाया है कि अमेरिका और इजराइल खाड़ी देशों को ईरान के खिलाफ करने की कोशिश कर रहे हैं।
ईरानी सरकारी टीवी से बातचीत में पजशकियान ने कहा कि दोनों देश ईरान की आंतरिक समस्याओं का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने पड़ोसी खाड़ी देशों के साथ ईरान के रिश्तों को मजबूत करने पर भी जोर दिया।
पजशकियान का यह बयान ऐसे समय आया है जब खाड़ी देशों के भीतर ईरान को लेकर रणनीति में अंतर खुलकर सामने आ रहा है।
तेहरान को डर है कि खाड़ी देश अमेरिकी रणनीति का हिस्सा बन सकते हैं
ईरान की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक यह है कि अमेरिका खाड़ी देशों को अपने साथ लेकर तेहरान पर दबाव बढ़ा सकता है।
यदि UAE, सऊदी अरब, कतर और दूसरे खाड़ी देश अमेरिकी रणनीति में अलग-अलग स्तर पर शामिल होते हैं तो ईरान की क्षेत्रीय स्थिति प्रभावित हो सकती है।
इसीलिए पजशकियान ने पड़ोसी देशों के साथ संबंध मजबूत करने पर जोर दिया।
तेहरान के लिए यह कूटनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है कि अरब पड़ोसी पूरी तरह अमेरिका के साथ खड़े न हों।
खाड़ी देशों में एकमत नहीं, यही अमेरिका के लिए भी चुनौती
अमेरिका के लिए समस्या यह है कि उसके खाड़ी सहयोगी एक ही रणनीति पर सहमत नहीं हैं।
UAE अधिक सैन्य दबाव चाहता है। सऊदी अरब तनाव कम करने और बातचीत की तरफ देख रहा है। कतर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।
इससे वॉशिंगटन के लिए एक समान क्षेत्रीय रणनीति बनाना कठिन हो सकता है।
अमेरिका को एक तरफ इजराइल और अपने सुरक्षा हितों का ध्यान रखना है, दूसरी तरफ अरब सहयोगियों की अलग-अलग चिंताओं को भी समझना है।
होर्मुज बंद हुआ तो सिर्फ खाड़ी नहीं, पूरी दुनिया प्रभावित होगी
होर्मुज स्ट्रेट को लेकर चिंता का सबसे बड़ा कारण इसका वैश्विक ऊर्जा बाजार से संबंध है।
फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से होकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है।
यदि जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित होती है तो तेल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है।
इसका असर केवल अमेरिका या मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। एशिया और यूरोप के ऊर्जा आयातक देशों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन और औद्योगिक ऊर्जा की लागत बढ़ सकती है।
भारत के लिए भी होर्मुज संकट बेहद महत्वपूर्ण
भारत दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है और मध्य पूर्व से आने वाला तेल उसके लिए महत्वपूर्ण है।
इसलिए होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी लंबे व्यवधान का असर भारत की ऊर्जा लागत पर पड़ सकता है।
तेल महंगा होने पर आयात बिल बढ़ सकता है और इसका असर रुपये, महंगाई तथा परिवहन लागत पर भी पड़ सकता है।
भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र में शांति और समुद्री व्यापार की सुरक्षा इसलिए रणनीतिक प्राथमिकता है।
दुनिया की अर्थव्यवस्था की नजर होर्मुज पर
वैश्विक बाजारों में भू-राजनीतिक जोखिम पहले से ही तेल की कीमतों पर असर डालते हैं।
होर्मुज स्ट्रेट को लेकर कोई भी बड़ा संकट बाजार में तुरंत जोखिम प्रीमियम बढ़ा सकता है।
बीमा कंपनियां जहाजों के लिए अधिक प्रीमियम मांग सकती हैं। शिपिंग कंपनियां वैकल्पिक रास्तों पर विचार कर सकती हैं। इससे माल ढुलाई का खर्च बढ़ सकता है।
यदि संकट लंबा चलता है तो इसका प्रभाव वैश्विक महंगाई पर भी पड़ सकता है।
ट्रंप की ‘बातचीत या सैन्य कार्रवाई’ वाली नीति
राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को लेकर बातचीत का विकल्प खुला रखा है, लेकिन साथ ही सैन्य विकल्प को पूरी तरह समाप्त नहीं किया है।
यही रणनीति ईरान और खाड़ी देशों दोनों के लिए अनिश्चितता पैदा करती है।
यदि बातचीत सफल होती है तो क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है। यदि बातचीत विफल होती है तो सैन्य कार्रवाई की संभावना फिर बढ़ सकती है।
इसलिए आने वाले दिनों में ट्रंप प्रशासन के बयान और ईरान के जवाब पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।
ईरान की आर्थिक स्थिति भी बनी अहम फैक्टर
ट्रंप ने ईरान की खराब आर्थिक स्थिति का उल्लेख किया है।
अमेरिकी प्रतिबंधों और लंबे समय से चले आ रहे आर्थिक दबाव ने ईरान की अर्थव्यवस्था को चुनौती दी है।
अमेरिका का मानना है कि आर्थिक दबाव ईरान को बातचीत की मेज पर अधिक गंभीरता से आने के लिए मजबूर कर सकता है।
लेकिन तेहरान के लिए अत्यधिक दबाव के सामने झुकना घरेलू राजनीतिक रूप से भी आसान नहीं होगा।
ईरान के लिए भी समझौता करना आसान नहीं
ईरान यदि अमेरिका के साथ समझौता करता है तो उसे अपने सैन्य और रणनीतिक हितों पर कुछ समझौते करने पड़ सकते हैं।
दूसरी तरफ यदि वह समझौते से पूरी तरह पीछे हटता है तो अमेरिकी सैन्य और आर्थिक दबाव बढ़ने का खतरा रहेगा।
इसलिए तेहरान भी बातचीत को एक रणनीतिक संतुलन के रूप में देख रहा है।
होर्मुज इसी बड़े सौदे का सबसे संवेदनशील हिस्सा बन गया है।
सवाल सिर्फ स्ट्रेट खोलने का नहीं, नियंत्रण का भी है
होर्मुज को लेकर विवाद को केवल जहाजों के रास्ते खोलने की समस्या समझना पर्याप्त नहीं होगा।
असल सवाल यह भी है कि संकट की स्थिति में समुद्री सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी और किस देश की नौसेना किस सीमा तक वहां मौजूद रहेगी।
ईरान अमेरिकी नौसैनिक उपस्थिति को अपने खिलाफ सैन्य दबाव के रूप में देखता है।
अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री आवाजाही की सुरक्षा के लिए जरूरी बताता है।
यही रणनीतिक मतभेद समझौते को कठिन बना रहा है।
अमेरिका-ईरान बातचीत में ‘विश्वास की कमी’ सबसे बड़ी समस्या
किसी भी समझौते के लिए दोनों पक्षों को यह भरोसा होना जरूरी है कि दूसरा पक्ष अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन करेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच पिछले वर्षों में कई समझौते और तनाव के दौर रहे हैं।
इस इतिहास ने दोनों पक्षों के बीच भरोसे को कमजोर किया है।
ईरान को आशंका है कि आज कोई समझौता हो और भविष्य में अमेरिकी प्रशासन बदलने के बाद नीति फिर बदल जाए।
अमेरिका को दूसरी ओर ईरान की प्रतिबद्धताओं और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर चिंता रहती है।
खाड़ी देश अब अपने हितों के हिसाब से रणनीति बना रहे
अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी होने के बावजूद खाड़ी देशों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे हर मुद्दे पर वॉशिंगटन की नीति की हूबहू नकल नहीं करेंगे।
सऊदी अरब ईरान के साथ तनाव घटाने में अपना हित देखता है।
UAE कठोर रुख के जरिए ईरानी प्रभाव को सीमित करना चाहता है।
कतर संवाद और मध्यस्थता के जरिए क्षेत्रीय स्थिरता में भूमिका निभाना चाहता है।
यह अंतर खाड़ी की बदलती भू-राजनीति का महत्वपूर्ण संकेत है।
इजराइल का फैक्टर भी पूरे समीकरण में मौजूद
ईरान-अमेरिका तनाव को इजराइल से अलग करके देखना भी मुश्किल है।
इजराइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सैन्य नेटवर्क को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा मानता रहा है।
ईरान का आरोप है कि अमेरिका और इजराइल मिलकर उसके खिलाफ दबाव बना रहे हैं।
इसलिए तेहरान किसी भी अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को केवल द्विपक्षीय विवाद के रूप में नहीं देखता।
कतर की मध्यस्थता क्या रास्ता निकाल पाएगी?
यदि कतर और ओमान जैसे देश संवाद को आगे बढ़ाते हैं तो दोनों पक्षों के बीच सीधे टकराव को रोकने का अवसर बन सकता है।
विशेष रूप से समुद्री सुरक्षा जैसे तकनीकी मुद्दों पर पहले सीमित समझौता संभव हो सकता है।
इसके बाद व्यापक राजनीतिक समझौते की दिशा में आगे बढ़ना आसान हो सकता है।
लेकिन यह तभी संभव है जब अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे की कुछ शुरुआती शर्तें स्वीकार करने को तैयार हों।
आने वाले दिनों में तीन सवाल सबसे अहम
पहला—क्या अमेरिका और ईरान होर्मुज स्ट्रेट को लेकर कोई व्यावहारिक व्यवस्था बना पाएंगे?
दूसरा—क्या खाड़ी के अलग-अलग रुख के बावजूद अमेरिका अपने सहयोगियों को एक साझा रणनीति पर ला पाएगा?
तीसरा—क्या बातचीत आगे बढ़ेगी या सैन्य विकल्प फिर मेज पर आएगा?
इन तीनों सवालों के जवाब मध्य पूर्व की अगली दिशा तय कर सकते हैं।
ट्रंप के सामने बड़ा कूटनीतिक इम्तिहान
ट्रंप के लिए चुनौती यह है कि वह ईरान पर दबाव बनाए रखते हुए युद्ध को टालें और साथ ही खाड़ी सहयोगियों का भरोसा भी बनाए रखें।
यदि वह बातचीत से समझौता हासिल करते हैं तो इसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश किया जा सकता है।
लेकिन यदि बातचीत लंबे समय तक चलती रही और कोई परिणाम नहीं निकला तो खाड़ी सहयोगियों का धैर्य और कम हो सकता है।
ईरान के सामने भी बड़ा फैसला
ईरान को तय करना होगा कि वह आर्थिक दबाव के बीच बातचीत में कितनी दूर तक जाने को तैयार है।
होर्मुज को लेकर कठोर रुख बनाए रखना उसे रणनीतिक दबाव का साधन देता है, लेकिन इससे खाड़ी देशों में उसके खिलाफ चिंता भी बढ़ सकती है।
दूसरी ओर, सीमित समझौता क्षेत्रीय तनाव कम कर सकता है और आर्थिक दबाव में राहत का रास्ता खोल सकता है।
खाड़ी की राजनीति अब केवल अमेरिका बनाम ईरान नहीं
पूरे घटनाक्रम से यह साफ है कि मध्य पूर्व की राजनीति अब केवल दो पक्षों—अमेरिका और ईरान—के बीच का मामला नहीं रह गई है।
सऊदी अरब, UAE, कतर और ओमान सभी अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग रणनीति अपना रहे हैं।
यही कारण है कि किसी भी बड़े समझौते के लिए केवल वॉशिंगटन और तेहरान की सहमति पर्याप्त नहीं होगी। क्षेत्रीय देशों के हितों को भी ध्यान में रखना होगा।
होर्मुज पर समाधान निकला तो तनाव घट सकता है
यदि अमेरिका और ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर जहाजों की सुरक्षित आवाजाही को लेकर कोई व्यावहारिक व्यवस्था बना लेते हैं तो यह व्यापक समझौते की शुरुआत बन सकती है।
पहले समुद्री मार्ग को स्थिर किया जा सकता है, फिर सैन्य तैनाती, प्रतिबंध और अन्य विवादित मुद्दों पर बातचीत आगे बढ़ सकती है।
यही कारण है कि अब दुनिया की नजर होर्मुज पर टिकी है।
लेकिन अगर बातचीत विफल हुई तो जोखिम बहुत बड़ा
यदि अमेरिका और ईरान किसी समझौते पर नहीं पहुंचते और होर्मुज में तनाव बना रहता है तो इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा।
तेल बाजार, शिपिंग, बीमा, ऊर्जा आयात और वैश्विक महंगाई पर असर पड़ सकता है।
खाड़ी देशों के लिए भी यह गंभीर चुनौती होगी क्योंकि वे खुद संभावित सैन्य टकराव के केंद्र में हैं।
इसीलिए सऊदी अरब जैसे देश बातचीत को प्राथमिकता दे रहे हैं।
अब असली परीक्षा कूटनीति की है
ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत लंबे समय से चल रही है, लेकिन अभी तक कोई अंतिम समझौता सामने नहीं आया है।
ट्रंप प्रशासन सैन्य विकल्प को पूरी तरह छोड़ने को तैयार नहीं दिखता, जबकि तेहरान अमेरिकी सैन्य दबाव को कम किए बिना बड़े समझौते के लिए तैयार नहीं है।
इस बीच खाड़ी देश भी अपने-अपने हितों के अनुसार रास्ता चुन रहे हैं।
UAE कठोर दबाव की तरफ है, सऊदी अरब तनाव घटाने की तरफ और कतर मध्यस्थता की तरफ।
यही तीन अलग रास्ते इस समय खाड़ी की राजनीति की सबसे बड़ी तस्वीर बनाते हैं।
मध्य पूर्व की अगली चाल तय करेगा होर्मुज का रास्ता
अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की सबसे बड़ी परीक्षा अब होर्मुज स्ट्रेट पर दिखाई दे रही है। वॉशिंगटन तत्काल और पूर्ण समुद्री आवाजाही चाहता है, जबकि तेहरान अमेरिकी नौसैनिक दबाव हटाने और अपनी सुरक्षा चिंताओं के समाधान को प्राथमिकता दे रहा है।
खाड़ी के भीतर भी अमेरिका के सहयोगी एक सुर में नहीं हैं। सऊदी अरब बातचीत चाहता है, UAE अधिक दबाव का समर्थन कर रहा है और कतर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।
ऐसे में Trump Iran Deal सिर्फ अमेरिका और ईरान के बीच कोई सामान्य कूटनीतिक समझौता नहीं रह गया है। इसके साथ खाड़ी की सुरक्षा, वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और पूरे मध्य पूर्व की रणनीतिक स्थिरता जुड़ चुकी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ट्रंप प्रशासन दबाव और बातचीत के बीच ऐसा संतुलन बना पाता है जिससे होर्मुज खुला रहे, खाड़ी सहयोगियों का भरोसा कायम रहे और ईरान के साथ कोई टिकाऊ समझौता संभव हो सके।

