जिस Belgium के पास हॉकी स्टेडियम तक नहीं था, वही अब वर्ल्ड कप का मेजबान; 12 साल में बदली पूरी तस्वीर, भारत के भुवनेश्वर से वावरे तक पहुंची ‘रेड लायंस’ की कहानी
एक समय Belgium के लिए हॉकी सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि ऐसा सपना था जिसे पूरा करने के लिए उसके पास जरूरी सुविधाएं तक नहीं थीं। हालात इतने अलग थे कि जिस देश की हॉकी टीम आज दुनिया की शीर्ष टीमों में गिनी जाती है, उसके पास कभी अपना एक समर्पित राष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम तक नहीं था।
लेकिन खेल की दुनिया में कहानियां हमेशा संसाधनों से नहीं लिखी जातीं। कई बार जुनून, मेहनत, सही दिशा और लगातार बेहतर होने की भूख किसी देश की पूरी खेल संस्कृति बदल देती है। बेल्जियम की हॉकी कहानी भी कुछ ऐसी ही है।
जिस टीम को कभी बड़े टूर्नामेंटों में भाग लेने वाला एक मजबूत लेकिन गैर-दावेदार देश माना जाता था, वही टीम आगे चलकर विश्व चैंपियन बनी, ओलिंपिक चैंपियन बनी और अब अपने ही देश में दुनिया के सबसे बड़े हॉकी टूर्नामेंट की मेजबानी कर रही है।
2026 का हॉकी वर्ल्ड कप बेल्जियम के लिए केवल एक खेल आयोजन नहीं है। यह उस लंबी यात्रा का प्रतीक है, जिसमें एक समय सुविधाओं के अभाव से जूझने वाली टीम ने दुनिया की हॉकी ताकतों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।
और इस कहानी का सबसे शानदार अध्याय अब वावरे में लिखा जाना है।
कभी अपने घर में वर्ल्ड कप खेलने का सपना भी मुश्किल था
बेल्जियम के मौजूदा दौर के सबसे बेहतरीन ड्रैग-फ्लिकर में शामिल अलेक्जेंडर हेंड्रिक्स ने इस बदलाव को बेहद करीब से देखा है।
जब उन्होंने और उनकी पीढ़ी के खिलाड़ियों ने हॉकी खेलना शुरू किया था, तब अपने देश में वर्ल्ड कप खेलने की कल्पना करना भी आसान नहीं था।
हेंड्रिक्स के मुताबिक उस समय बेल्जियम के पास न कोई बड़ा हॉकी स्टेडियम था और न ही ऐसी बुनियादी सुविधाएं, जिनके सहारे कोई देश विश्व हॉकी की शीर्ष कतार में पहुंचने का सपना देख सके।
आज वही खिलाड़ी अपने देश में वर्ल्ड कप का हिस्सा हैं।
इस बदलाव की तस्वीर इससे ज्यादा दिलचस्प शायद ही हो सकती है कि 2026 वर्ल्ड कप का पुरुष फाइनल बेल्जियम के नवनिर्मित राष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम बेलफियस हॉकी एरिना में खेला जाएगा।
वावरे का बेलफियस हॉकी एरिना बना नई पहचान
बेल्जियम के वावरे में तैयार किया गया बेलफियस हॉकी एरिना अब देश की हॉकी महत्वाकांक्षा का नया प्रतीक बन चुका है।
इस स्टेडियम का उद्घाटन अप्रैल 2026 में हुआ। खास बात यह है कि यह निर्माण उस समय हुआ जब बेल्जियम पहले ही दुनिया की सबसे बड़ी हॉकी उपलब्धियां हासिल कर चुका था।
यानी जिस सफलता ने कभी केवल पदक दिलाए थे, उसने धीरे-धीरे अपने देश में बेहतर सुविधाओं की जरूरत भी पैदा कर दी।
ओलिंपिक चैंपियन बनने के पांच साल बाद और विश्व कप जीतने के आठ साल बाद बेल्जियम के पास ऐसा राष्ट्रीय हॉकी मैदान है, जहां दुनिया की निगाहें टिकने वाली हैं।
यह बदलाव अपने आप में बेल्जियम हॉकी की यात्रा को बयां करता है।
एक दशक में बदल गया बेल्जियम का हॉकी चेहरा
बेल्जियम की कहानी किसी एक टूर्नामेंट की सफलता नहीं है। यह कई वर्षों की निरंतर मेहनत का परिणाम है।
2014 के वर्ल्ड कप में बेल्जियम पांचवें स्थान पर रहा था। यह खराब प्रदर्शन नहीं था, लेकिन टीम को उस समय विश्व खिताब का स्वाभाविक दावेदार नहीं माना जाता था।
इसके बाद तस्वीर तेजी से बदली।
2016 के रियो ओलिंपिक में बेल्जियम ने सिल्वर मेडल जीतकर दुनिया को संकेत दिया कि टीम अब केवल टूर्नामेंट में हिस्सा लेने नहीं आई है।
इसके दो साल बाद 2018 में बेल्जियम पहली बार वर्ल्ड चैंपियन बना।
फिर 2021 में टोक्यो ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतकर उसने अपनी स्वर्णिम पीढ़ी की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक और अध्याय जोड़ दिया।
महज कुछ वर्षों के भीतर विश्व चैंपियन और ओलिंपिक चैंपियन बनने का यह सफर बेल्जियम हॉकी के परिवर्तन की सबसे बड़ी तस्वीर है।
2014 से 2021 तक ऐसे बदली कहानी
अगर बेल्जियम के इस सफर को वर्षों के हिसाब से देखें तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है।
2014 में वर्ल्ड कप में पांचवां स्थान।
2016 में रियो ओलिंपिक का सिल्वर मेडल।
2018 में पहली बार हॉकी वर्ल्ड कप का खिताब।
2021 में टोक्यो ओलिंपिक का गोल्ड मेडल।
यानी जिस टीम को कभी बड़े खिताब का दावेदार नहीं माना जाता था, उसने सात साल के भीतर विश्व चैंपियन और ओलिंपिक चैंपियन दोनों बनने का कारनामा कर दिखाया।
‘रेड लायंस’ ने फुटबॉल से अलग लिखी अपनी कहानी
बेल्जियम की फुटबॉल टीम को दुनिया की बेहतरीन टीमों में गिना जाता रहा है। लेकिन एक दिलचस्प तथ्य यह है कि बेल्जियम की हॉकी टीम ने अपनी स्वर्णिम पीढ़ी में ऐसी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर लीं, जिन्हें देश की चर्चित फुटबॉल टीम भी हासिल नहीं कर सकी।
‘रेड लायंस’ के नाम से मशहूर बेल्जियम की हॉकी टीम ने विश्व खिताब और ओलिंपिक गोल्ड दोनों अपने नाम किए।
इस सफलता ने बेल्जियम में हॉकी को एक अलग स्तर की पहचान दी।
जो खेल कभी देश के बड़े खेल विमर्श में फुटबॉल की छाया में दिखाई देता था, वही धीरे-धीरे राष्ट्रीय गौरव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
आर्थर वैन डोरेन को याद है वह पुराना बेल्जियम
दो बार के एफआईएच वर्ल्ड प्लेयर ऑफ द ईयर आर्थर वैन डोरेन भी बेल्जियम हॉकी के पुराने दौर को याद करते हैं।
उनके बचपन के समय बेल्जियम को हॉकी में ऐसा देश नहीं माना जाता था, जिससे दुनिया की बड़ी टीमें खौफ खाएं।
टीम ओलिंपिक और वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंटों के लिए क्वालिफाई कर लेती थी, लेकिन उसे खिताब का प्रमुख दावेदार नहीं माना जाता था।
वैन डोरेन के लिए हॉकी चुनना भी उस समय सामान्य फैसला नहीं था।
वे बचपन में टेनिस भी खेलते थे। जब उन्होंने टेनिस के बजाय हॉकी को अपना रास्ता चुना, तो कुछ लोगों ने उन्हें पागल तक कहा।
आज वही फैसला उनके करियर की पहचान बन चुका है।
जब हॉकी के लिए टीवी कवरेज भी मुश्किल थी
बेल्जियम हॉकी के पुराने दौर की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2009 के आसपास एक समय ऐसा भी आया जब बेल्जियम के खिलाड़ियों और प्रशंसकों को अपनी टीम की टीवी कवरेज हासिल करने के लिए ऑनलाइन याचिका तक दायर करनी पड़ी।
आज जहां बेल्जियम की हॉकी टीम बड़े टूर्नामेंटों में आकर्षण का केंद्र बनती है, वहीं कभी उसके मैचों को टीवी पर पर्याप्त जगह दिलाने के लिए प्रशंसकों को आवाज उठानी पड़ती थी।
यही अंतर बताता है कि एक दशक से कुछ ज्यादा समय में इस खेल ने बेल्जियम में कितनी लंबी छलांग लगाई है।
जब नतीजे आने लगे तो बदल गई सोच
खेलों में सफलता का असर केवल पदकों तक सीमित नहीं रहता।
जब कोई टीम लगातार अच्छा प्रदर्शन करने लगती है, तो उसके आसपास का पूरा माहौल बदलने लगता है।
बेल्जियम के साथ भी यही हुआ।
शुरुआत में हॉकी को लेकर सीमित संसाधन और सीमित सार्वजनिक ध्यान था। लेकिन जैसे-जैसे टीम अंतरराष्ट्रीय मंच पर परिणाम देने लगी, वैसे-वैसे खिलाड़ियों, प्रशंसकों और पूरे खेल ढांचे का आत्मविश्वास बढ़ता गया।
पहले पदक आए, फिर विश्व खिताब आया और उसके बाद ओलिंपिक गोल्ड।
इसके साथ ही देश में हॉकी के लिए बेहतर बुनियादी ढांचे की मांग और महत्व भी बढ़ता गया।
भारत के भुवनेश्वर से जुड़ी है बेल्जियम की खास कहानी
बेल्जियम की हॉकी यात्रा में भारत का भुवनेश्वर भी एक खास अध्याय रखता है।
दिलचस्प बात यह बताई जाती है कि बेल्जियम के खिलाड़ियों ने अपने देश की तुलना में भारत के भुवनेश्वर में ज्यादा मुकाबले खेले हैं।
भुवनेश्वर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय हॉकी के बड़े केंद्रों में रहा है और दुनिया की शीर्ष टीमों ने यहां कई महत्वपूर्ण मुकाबले खेले हैं।
बेल्जियम के खिलाड़ियों के लिए भी भारत का यह शहर अंतरराष्ट्रीय हॉकी के बड़े अनुभवों से जुड़ा रहा है।
और अब कहानी का दूसरा सिरा बेल्जियम के वावरे में दिखाई देगा, जहां उसी स्तर के विश्व स्तरीय मुकाबले उसके अपने घर में खेले जाएंगे।
भुवनेश्वर से वावरे तक का सफर
बेल्जियम की कहानी में भुवनेश्वर और वावरे दो अलग-अलग दौरों के प्रतीक जैसे दिखाई देते हैं।
एक समय बेल्जियम की टीम को बड़े अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने के लिए दूसरे देशों की सुविधाओं पर निर्भर रहना पड़ता था।
अब वही देश अपने राष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम में दुनिया की शीर्ष टीमों का स्वागत करेगा।
यह सिर्फ स्टेडियम का बदलाव नहीं है। यह खेल व्यवस्था में आए व्यापक परिवर्तन की तस्वीर है।
नया स्टेडियम पुराने संघर्ष की याद भी दिलाता है
वावरे का नया बेलफियस हॉकी एरिना भले ही आधुनिक सुविधाओं और भव्य आयोजन का केंद्र बनने जा रहा हो, लेकिन इसके पीछे बेल्जियम हॉकी के पुराने संघर्ष की कहानी भी छिपी है।
हेंड्रिक्स ने मजाकिया अंदाज में यह भी कहा कि पेरिस ओलिंपिक के बाद रिटायर हुए कुछ खिलाड़ी शायद नए स्टेडियम और घरेलू वर्ल्ड कप को देखकर थोड़ा जलते होंगे।
क्योंकि जिस शानदार घरेलू माहौल का सपना एक पीढ़ी ने देखा, उसका पूरा लाभ अगली पीढ़ी को मिल रहा है।
पेरिस के बाद रिटायर हुए खिलाड़ियों के लिए ‘थोड़ी जलन’
हेंड्रिक्स का यह मजाक वास्तव में बेल्जियम हॉकी के बदलाव की गहराई को दिखाता है।
जिन खिलाड़ियों ने अपना करियर ऐसे दौर में बिताया, जब देश में पर्याप्त हॉकी सुविधाएं नहीं थीं, वे अब देखते हैं कि नई पीढ़ी को एक शानदार राष्ट्रीय स्टेडियम, घरेलू वर्ल्ड कप और दुनिया के सामने अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिल रहा है।
लेकिन यही खेल की खूबसूरती है।
एक पीढ़ी संघर्ष करती है, अगली पीढ़ी उसका लाभ उठाती है।
मेहनत ने पहले सफलता दी, सुविधाएं बाद में आईं
बेल्जियम की कहानी में सबसे खास बात यह है कि वहां पहले विश्वस्तरीय नतीजे आए और उसके बाद सुविधाओं का विस्तार हुआ।
आमतौर पर यह माना जाता है कि बड़े स्टेडियम, शानदार अकादमियां और मजबूत ढांचा खिलाड़ियों को सफलता तक पहुंचाते हैं।
लेकिन बेल्जियम ने एक अलग रास्ता दिखाया।
खिलाड़ियों ने सीमित परिस्थितियों में मेहनत की, टीम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार परिणाम दिए और जब सफलता ने अपनी जगह बना ली, तो बुनियादी ढांचे में भी बड़ा निवेश सामने आया।
ओलिंपिक गोल्ड ने बदल दिया हॉकी का दर्जा
2021 का टोक्यो ओलिंपिक बेल्जियम हॉकी के लिए ऐतिहासिक रहा।
ओलिंपिक गोल्ड जीतना किसी भी टीम के लिए असाधारण उपलब्धि होती है। बेल्जियम ने यह उपलब्धि उस समय हासिल की, जब वह पहले ही विश्व चैंपियन बन चुका था।
इस जीत ने यह साबित कर दिया कि 2018 का वर्ल्ड कप खिताब कोई अचानक मिली सफलता नहीं था।
बेल्जियम अब विश्व हॉकी की स्थायी ताकत बन चुका था।
2018 का वर्ल्ड कप खिताब बना टर्निंग पॉइंट
2018 में पहली बार विश्व चैंपियन बनने के बाद बेल्जियम की हॉकी को नई पहचान मिली।
विश्व खिताब जीतने का मतलब था कि टीम ने केवल एक टूर्नामेंट में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया, बल्कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों को पीछे छोड़कर शीर्ष स्थान हासिल किया।
इस सफलता ने खिलाड़ियों की नई पीढ़ी को भी विश्वास दिया कि बेल्जियम से निकलकर विश्व स्तर पर हॉकी में शीर्ष तक पहुंचना संभव है।
खेल संस्कृति में बदलाव की शुरुआत
जब किसी देश की राष्ट्रीय टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार सफल होती है, तो उसका असर नीचे की पूरी खेल व्यवस्था पर पड़ता है।
बच्चों के लिए खेल चुनने की प्रेरणा बढ़ती है। क्लबों की भूमिका बढ़ती है। प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण का अवसर मिलता है।
बेल्जियम की हॉकी में भी सफलता ने इस तरह का सकारात्मक चक्र पैदा किया।
जिस खेल को कभी टीवी कवरेज के लिए संघर्ष करना पड़ा था, वह अब अपने देश में वर्ल्ड कप फाइनल की मेजबानी कर रहा है।
बेलफियस एरिना सिर्फ मैदान नहीं, एक संदेश है
वावरे का बेलफियस हॉकी एरिना आने वाले वर्ल्ड कप में सिर्फ मुकाबलों की मेजबानी नहीं करेगा।
यह स्टेडियम बेल्जियम हॉकी की पूरी यात्रा का प्रतीक बनेगा।
एक तरफ पुराना दौर है, जब देश में राष्ट्रीय स्तर की हॉकी सुविधाएं सीमित थीं।
दूसरी तरफ वर्तमान है, जहां उसी देश के पास ऐसा स्टेडियम है जिसमें विश्व कप का पुरुष फाइनल खेला जाएगा।
यानी मैदान खुद बेल्जियम के हॉकी परिवर्तन की कहानी सुनाएगा।
दुनिया की नजरें अब बेल्जियम पर
2026 हॉकी वर्ल्ड कप की मेजबानी बेल्जियम के लिए एक बड़ी जिम्मेदारी भी है।
जब कोई देश विश्व कप का मेजबान बनता है, तो उससे केवल शानदार आयोजन की उम्मीद नहीं होती। उससे उम्मीद होती है कि वह अपने खेल की संस्कृति, सुविधाओं और जुनून को दुनिया के सामने प्रस्तुत करेगा।
बेल्जियम के पास इस लिहाज से दिखाने के लिए एक खास कहानी है।
वह कहानी संघर्ष से शुरू होती है और विश्व चैंपियन बनने के बाद अब घरेलू वर्ल्ड कप तक पहुंच चुकी है।
‘रेड लायंस’ के सामने अब घर में इतिहास दोहराने की चुनौती
बेल्जियम की टीम ने विश्व चैंपियन बनने और ओलिंपिक गोल्ड जीतने का स्वाद चख लिया है।
लेकिन घरेलू वर्ल्ड कप हमेशा अलग दबाव लेकर आता है।
अपने देश के दर्शकों के सामने खेलने का फायदा भी होता है और उम्मीदों का दबाव भी।
वावरे का स्टेडियम बेल्जियम के खिलाड़ियों को समर्थन देगा, लेकिन साथ ही हर मुकाबला उनसे अपेक्षाएं भी लेकर आएगा।
घरेलू मैदान पर फाइनल का सपना
पुरुष वर्ल्ड कप का फाइनल बेलफियस हॉकी एरिना में होना अपने आप में ऐतिहासिक अवसर है।
बेल्जियम के लिए यह सिर्फ टूर्नामेंट का आखिरी मुकाबला नहीं होगा, बल्कि उस यात्रा का चरम क्षण होगा जिसने देश की हॉकी को विश्व स्तर तक पहुंचाया।
अगर ‘रेड लायंस’ खुद फाइनल तक पहुंचती है, तो यह कहानी और भी रोमांचक हो सकती है।
लेकिन उससे पहले पूरी प्रतियोगिता में टीम को दुनिया की मजबूत टीमों से मुकाबला करना होगा।
अलेक्जेंडर हेंड्रिक्स जैसे खिलाड़ी बने बदलाव का चेहरा
अलेक्जेंडर हेंड्रिक्स बेल्जियम की उस पीढ़ी का हिस्सा हैं जिसने देश की हॉकी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचते देखा है।
ड्रैग-फ्लिक के लिए पहचाने जाने वाले हेंड्रिक्स जैसे खिलाड़ियों ने बेल्जियम को दुनिया की शीर्ष टीमों में बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई है।
उनके लिए घरेलू वर्ल्ड कप सिर्फ एक टूर्नामेंट नहीं होगा। यह उस सफर की वापसी जैसा होगा, जिसकी शुरुआत उन्होंने ऐसे समय में की थी जब देश में बड़े हॉकी स्टेडियम की कल्पना भी कठिन थी।
आर्थर वैन डोरेन की पीढ़ी ने बदली धारणा
आर्थर वैन डोरेन जैसे खिलाड़ियों ने भी बेल्जियम की छवि बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।
जिस समय वे बच्चे थे, बेल्जियम को ओलिंपिक और वर्ल्ड कप में भाग लेने वाला देश माना जाता था, लेकिन शीर्ष दावेदार के रूप में नहीं देखा जाता था।
आज बेल्जियम को किसी भी बड़े टूर्नामेंट में नजरअंदाज करना मुश्किल है।
यह बदलाव एक खिलाड़ी या एक कोच का परिणाम नहीं, बल्कि पूरी पीढ़ी की मेहनत का नतीजा है।
बेल्जियम की कहानी दूसरे खेल देशों के लिए भी सबक
बेल्जियम का उदाहरण यह बताता है कि खेल की ताकत केवल मौजूदा सुविधाओं से तय नहीं होती।
यदि खिलाड़ियों को सही प्रशिक्षण, निरंतर प्रतिस्पर्धा, स्पष्ट लक्ष्य और लंबे समय तक समर्थन मिले तो अपेक्षाकृत छोटे खेल ढांचे वाला देश भी दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों को चुनौती दे सकता है।
हालांकि सफलता को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए मजबूत बुनियादी ढांचा भी जरूरी है।
बेल्जियम ने अब इस दूसरे चरण में भी कदम रख दिया है।
अब चुनौती है सफलता को स्थायी बनाना
एक विश्व कप जीतना कठिन है। ओलिंपिक गोल्ड जीतना उससे भी कठिन है।
लेकिन लगातार कई वर्षों तक शीर्ष पर बने रहना उससे भी बड़ी चुनौती है।
बेल्जियम के सामने अब यही लक्ष्य है।
नई पीढ़ी को तैयार करना, मौजूदा स्तर को बनाए रखना और विश्व हॉकी में अपनी जगह स्थायी करना—ये वे चुनौतियां हैं जो घरेलू वर्ल्ड कप के बाद भी उसके सामने रहेंगी।
हॉकी के लिए नया अध्याय लिखने को तैयार बेल्जियम
बेल्जियम की कहानी आज उस मुकाम पर है जहां कभी पहुंचने की कल्पना भी मुश्किल थी।
कभी अपना राष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम नहीं था।
कभी खिलाड़ियों और प्रशंसकों को टीवी कवरेज के लिए ऑनलाइन याचिका करनी पड़ी।
कभी टीम टूर्नामेंट में हिस्सा लेने वाली मजबूत टीम थी, लेकिन खिताब की दावेदार नहीं।
फिर 2016 में ओलिंपिक सिल्वर आया।
2018 में पहला वर्ल्ड कप खिताब आया।
2021 में ओलिंपिक गोल्ड आया।
और अब 2026 में उसी देश में दुनिया का सबसे बड़ा हॉकी टूर्नामेंट खेला जा रहा है।
भुवनेश्वर में खेलने वाली टीम अब अपने घर में दुनिया को बुलाएगी
बेल्जियम के खिलाड़ियों ने भारत के भुवनेश्वर में अपने देश से ज्यादा मुकाबले खेले हैं—यह तथ्य उसकी यात्रा की विडंबना और खूबसूरती दोनों को दिखाता है।
कभी अंतरराष्ट्रीय हॉकी अनुभव के लिए दूसरे देशों के मैदानों पर उतरने वाली टीम अब दुनिया की टीमों को अपने देश बुला रही है।
वावरे का बेलफियस हॉकी एरिना इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक है।
बेल्जियम की हॉकी कहानी का सबसे चमकदार अध्याय अभी बाकी है
बेल्जियम ने साबित किया है कि संसाधनों की कमी हमेशा सपनों की सीमा नहीं बनती।
एक पीढ़ी ने सीमित सुविधाओं में मेहनत की। दूसरी पीढ़ी ने विश्व खिताब और ओलिंपिक गोल्ड जीता। अब नई पीढ़ी को अपने ही देश में वर्ल्ड कप खेलने और दुनिया के सामने बेल्जियम की हॉकी विरासत को आगे बढ़ाने का मौका मिल रहा है।
बेलफियस हॉकी एरिना की रोशनी में जब 2026 वर्ल्ड कप का पुरुष फाइनल खेला जाएगा, तब मैदान पर केवल दो टीमें नहीं होंगी। उस मुकाबले के पीछे बेल्जियम हॉकी के संघर्ष, इंतजार, मेहनत और सफलता की पूरी कहानी भी मौजूद होगी।
कभी जिस देश के पास अपना हॉकी स्टेडियम तक नहीं था, वही अब दुनिया को अपने घर बुलाकर हॉकी का सबसे बड़ा मंच सजा रहा है। यही बेल्जियम की हॉकी क्रांति की असली ताकत है।

