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US Immigration गेम बदला! EB-5 में चीन से आगे निकले भारतीय, करोड़ों के निवेश से ग्रीन कार्ड की होड़; Gold Card से लेकर 19 भारतवंशी अरबपतियों तक पूरी कहानी

US Immigration  में एक बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। EB-5 Visa के लिए आवेदन करने वाले भारतीयों की संख्या अब चीन से आगे निकल गई है। पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों के मुताबिक करीब 12,900 भारतीयों ने EB-5 कार्यक्रम के तहत आवेदन किया, जबकि इसी अवधि में चीन से लगभग 9,875 आवेदन आए।

यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक चीन EB-5 कार्यक्रम में सबसे ज्यादा आवेदकों वाले देशों में रहा है। अब भारतीय आवेदकों की संख्या का आगे निकलना यह संकेत देता है कि अमेरिका में स्थायी निवास हासिल करने के लिए भारतीय निवेशकों और परिवारों के बीच निवेश आधारित इमिग्रेशन विकल्पों की दिलचस्पी बढ़ रही है।

इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। H-1B वीजा से जुड़ी अनिश्चितताओं और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच कुछ भारतीय परिवार ऐसे रास्ते तलाश रहे हैं, जिनके जरिए अमेरिका में लंबे समय तक रहने और अंततः ग्रीन कार्ड हासिल करने की संभावना बन सके।

हालांकि, EB-5 Visa में पैसा निवेश करना ग्रीन कार्ड की तत्काल गारंटी नहीं है। आवेदक को कार्यक्रम की पात्रता, निवेश और रोजगार सृजन से जुड़ी निर्धारित शर्तों को पूरा करना होता है तथा अमेरिकी इमिग्रेशन प्रक्रिया के तहत आवेदन स्वीकृत होना आवश्यक है।

EB-5 Visa आखिर है क्या और भारतीयों की दिलचस्पी क्यों बढ़ी?

EB-5 अमेरिका का निवेश आधारित इमिग्रेशन कार्यक्रम है। इसका मूल विचार यह है कि पात्र विदेशी निवेशक अमेरिका में निर्धारित राशि का निवेश करते हैं और निर्धारित रोजगार सृजन संबंधी शर्तें पूरी होने पर उन्हें स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिलता है।

वर्तमान चर्चा में EB-5 के लिए करीब 7.5 करोड़ रुपये के निवेश का उल्लेख किया जा रहा है। रुपये में वास्तविक राशि डॉलर-रुपया विनिमय दर के अनुसार बदल सकती है और निवेश की पात्रता कार्यक्रम के लागू नियमों पर निर्भर करती है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि EB-5 को केवल ‘पैसा लगाओ और ग्रीन कार्ड पाओ’ जैसी सीधी व्यवस्था समझना सही नहीं होगा। निवेश के साथ कई कानूनी और नियामकीय शर्तें जुड़ी होती हैं।

निवेशक को यह सुनिश्चित करना होता है कि उसका निवेश कार्यक्रम के नियमों के अनुरूप हो और आवश्यक रोजगार सृजन की शर्तें भी पूरी हों। इसके अलावा इमिग्रेशन आवेदन की जांच और मंजूरी अलग प्रक्रिया है।

भारतीय आवेदक चीन से आगे क्यों निकले?

भारतीयों का चीन से आगे निकलना अमेरिकी इमिग्रेशन के बदलते पैटर्न का एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

भारत से बड़ी संख्या में छात्र, तकनीकी विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, उद्यमी और पेशेवर लंबे समय से अमेरिका जाते रहे हैं। इनमें से कई लोग वर्षों तक वहां काम करने के बाद स्थायी निवास की तलाश करते हैं।

खास तौर पर अमेरिकी तकनीकी और पेशेवर क्षेत्रों में बड़ी संख्या में भारतीय H-1B वीजा पर काम करते हैं। लेकिन रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड की लंबी प्रक्रिया और वीजा नियमों में संभावित बदलावों के बीच कुछ संपन्न भारतीय परिवार वैकल्पिक रास्तों पर भी विचार कर रहे हैं।

इसी संदर्भ में EB-5 निवेश आधारित विकल्प के तौर पर आकर्षक दिखाई देता है।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि हर भारतीय आवेदक H-1B धारक हो या हर EB-5 निवेशक अमेरिका में पहले से रह रहा हो, ऐसा मानना सही नहीं होगा। EB-5 अलग श्रेणी है और इसमें दुनिया के विभिन्न देशों के निवेशक आवेदन कर सकते हैं।

ग्रीन कार्ड का रास्ता है, लेकिन सीधे नागरिकता नहीं

EB-5 को लेकर सबसे आम गलतफहमियों में से एक यह है कि निवेश करते ही व्यक्ति अमेरिकी नागरिक बन जाता है। ऐसा नहीं है।

EB-5 कार्यक्रम के माध्यम से पात्र निवेशक और उनके योग्य परिवार के सदस्य स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन स्थायी निवास और अमेरिकी नागरिकता दो अलग-अलग चीजें हैं।

अमेरिकी नागरिकता के लिए अलग पात्रता और प्राकृतिककरण प्रक्रिया होती है। इसलिए EB-5 को अमेरिकी नागरिकता खरीदने की योजना के रूप में देखना गलत होगा।

निवेश, पात्रता, आवेदन, इमिग्रेशन जांच और स्थायी निवास की प्रक्रिया के बाद ही आगे के विकल्प खुलते हैं।

H-1B की सख्ती के बीच EB-5 पर बढ़ी नजर

भारतीय पेशेवरों के लिए H-1B लंबे समय से अमेरिका में काम करने का प्रमुख रास्ता रहा है। खासकर टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, रिसर्च और अन्य उच्च-कौशल वाले क्षेत्रों में बड़ी संख्या में भारतीय इस प्रणाली पर निर्भर रहे हैं।

लेकिन H-1B को लेकर नियमों, लागत, प्रतिस्पर्धा और भविष्य की नीतियों पर लगातार बहस होती रही है।

ऐसे माहौल में आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों के लिए निवेश आधारित इमिग्रेशन एक अलग विकल्प के रूप में सामने आता है।

यही कारण है कि EB-5 के भारतीय आवेदकों के आंकड़े केवल निवेश से जुड़े आंकड़े नहीं हैं। इनके पीछे अमेरिका में लंबे समय तक रहने, बच्चों की शिक्षा, परिवार के भविष्य और स्थायी निवास की इच्छा जैसे कई कारण भी हो सकते हैं।

EB-1 Visa की मांग ने भी खींचा ध्यान

अमेरिका में केवल निवेश आधारित इमिग्रेशन ही चर्चा में नहीं है। रोजगार आधारित EB-1 Visa कैटेगरी की मांग भी इस साल काफी अधिक दिखाई दी।

दिए गए आंकड़ों के अनुसार, EB-1 का वार्षिक कोटा इस साल निर्धारित समय से करीब एक महीने पहले ही पूरा हो गया। यह कैटेगरी 1 सितंबर को ही उपलब्ध सीमा तक पहुंच गई, जबकि सामान्य तौर पर वित्तीय वर्ष के अंत यानी 30 सितंबर तक इसका इस्तेमाल जारी रहने की उम्मीद थी।

EB-1 श्रेणी में असाधारण क्षमता वाले पेशेवरों के अलावा कुछ प्रमुख अकादमिक और शोध पृष्ठभूमि वाले लोगों के लिए भी रास्ते उपलब्ध होते हैं। प्रोफेसर, वैज्ञानिक और रिसर्च से जुड़े उच्च उपलब्धि वाले उम्मीदवार इस श्रेणी के लिए पात्र हो सकते हैं, हालांकि प्रत्येक उपश्रेणी की अपनी अलग पात्रता शर्तें होती हैं।

कोटा समय से पहले खत्म होने की खबर ने यह संकेत दिया कि इस श्रेणी की मांग भी मजबूत रही।

प्रोफेसर, वैज्ञानिक और रिसर्च स्कॉलर के लिए क्यों महत्वपूर्ण है EB-1?

भारत से अमेरिका जाने वाले कई उच्च शिक्षित पेशेवरों के लिए EB-1 विशेष महत्व रखता है।

अमेरिका में शोध, विज्ञान और अकादमिक क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के वैज्ञानिक और प्रोफेसर काम कर रहे हैं। जिन लोगों ने अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, उनके लिए रोजगार आधारित स्थायी निवास की कुछ श्रेणियां महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती हैं।

EB-1 की मांग में वृद्धि को इसी व्यापक प्रवृत्ति के संदर्भ में भी देखा जा सकता है।

हालांकि, केवल प्रोफेसर या वैज्ञानिक होना अपने आप में EB-1 की पात्रता की गारंटी नहीं देता। आवेदक को संबंधित श्रेणी की निर्धारित शर्तों को पूरा करना पड़ता है।

Trump Gold Card: बड़ी घोषणा, लेकिन अब तक सीमित आवेदन

अमेरिका के निवेश आधारित इमिग्रेशन परिदृश्य में एक और नाम सामने आया है—Trump Gold Card

2025 में डोनाल्ड ट्रंप की ओर से पेश की गई इस योजना को EB-5 के एक विकल्प के रूप में प्रचारित किया गया था। इसका उद्देश्य आर्थिक रूप से सक्षम विदेशी नागरिकों को बड़े वित्तीय योगदान के बदले अमेरिका में स्थायी निवास का रास्ता उपलब्ध कराने की दिशा में था।

लेकिन उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, योजना को अब तक अपेक्षित स्तर पर आवेदन नहीं मिले हैं।

अप्रैल 2026 में वित्त मंत्री लटनिक के हवाले से सामने आए आंकड़ों में बताया गया था कि 338 लोगों ने गोल्ड कार्ड में रुचि दिखाई, 165 लोगों ने आवेदन शुल्क जमा किया, जबकि अब तक केवल एक व्यक्ति को गोल्ड कार्ड जारी किया गया।

ये आंकड़े EB-5 की तुलना में काफी अलग तस्वीर पेश करते हैं।

करीब 9.5 करोड़ रुपये का निवेश, फिर भी Gold Card की रफ्तार धीमी

Gold Card के लिए करीब 9.5 करोड़ रुपये के निवेश का आंकड़ा चर्चा में है। यह राशि भी डॉलर-रुपया विनिमय दर के साथ बदल सकती है।

यानी निवेश की दृष्टि से यह कार्यक्रम EB-5 से अधिक महंगा विकल्प दिखाई देता है।

यही वजह है कि कुछ विश्लेषणों में सवाल उठ रहा है कि जब निवेशक अपेक्षाकृत कम राशि वाले स्थापित EB-5 रास्ते पर विचार कर सकते हैं तो वे नए और अधिक महंगे Gold Card विकल्प को क्यों चुनेंगे।

हालांकि दोनों कार्यक्रमों की कानूनी संरचना और पात्रता नियमों की सीधी तुलना केवल निवेश राशि के आधार पर नहीं की जा सकती।

Gold Card पर सबसे बड़ा सवाल—कानूनी भविष्य क्या होगा?

Trump Gold Card को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल भी उठता है। योजना को राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों के आधार पर आगे बढ़ाने की कोशिश की गई है।

ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि भविष्य में राष्ट्रपति बदलने पर इस योजना का क्या होगा।

यदि कोई नया प्रशासन इसकी नीति, कानूनी आधार या कार्यान्वयन को बदलना चाहता है तो कार्यक्रम के भविष्य पर असर पड़ सकता है। यही अनिश्चितता संभावित आवेदकों के लिए महत्वपूर्ण विचार बन सकती है।

दूसरी तरफ EB-5 लंबे समय से अमेरिकी इमिग्रेशन कानून का हिस्सा रहा है और इसकी अपनी वैधानिक संरचना है।

यही अंतर कुछ निवेशकों को नए Gold Card की तुलना में स्थापित EB-5 की ओर देखने के लिए प्रेरित कर सकता है।

भारतीयों के लिए अमेरिका सिर्फ नौकरी नहीं, अब निवेश और स्थायी निवास का भी बड़ा केंद्र

अमेरिका में भारतीय समुदाय की आर्थिक और पेशेवर उपस्थिति पिछले कई दशकों में तेजी से बढ़ी है।

टेक्नोलॉजी कंपनियों से लेकर मेडिकल सेक्टर, रिसर्च संस्थानों, वित्तीय सेवाओं और स्टार्टअप इकोसिस्टम तक भारतीय मूल के पेशेवरों की मौजूदगी मजबूत है।

इसके साथ भारतीय मूल के उद्यमियों और निवेशकों की संख्या भी बढ़ी है।

EB-5 में भारतीय आवेदन संख्या का चीन से आगे निकलना इसी व्यापक बदलाव की एक झलक माना जा सकता है।

अब अमेरिका जाने का सपना केवल नौकरी या पढ़ाई तक सीमित नहीं है। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार निवेश, व्यवसाय, स्थायी निवास और बच्चों के भविष्य को एक साथ देखते हैं।

अमेरिका के 144 अप्रवासी अरबपतियों में 19 भारत में जन्मे

अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों की आर्थिक सफलता की चर्चा केवल वीजा तक सीमित नहीं है।

2026 की फोर्ब्स सूची के अनुसार, अमेरिका में रहने वाले 144 अप्रवासी अरबपतियों में 19 भारत में जन्मे अरबपति शामिल हैं। यह संख्या अब तक के उच्च स्तर पर बताई गई है।

इन अरबपतियों की कुल संपत्ति करीब 207 लाख करोड़ रुपये बताई गई है।

यह आंकड़ा अमेरिका और भारत के बीच मानव पूंजी तथा उद्यमिता के रिश्ते की एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करता है।

भारत से अमेरिका पहुंचे कई लोगों ने तकनीक, निवेश, सॉफ्टवेयर, हेल्थकेयर और अन्य क्षेत्रों में बड़े कारोबारी साम्राज्य खड़े किए हैं।

विनोद खोसला भारतीय मूल के अरबपतियों में सबसे ऊपर

भारतीय मूल के अरबपतियों में विनोद खोसला का नाम सबसे ऊपर बताया गया है। उनकी संपत्ति करीब 13.9 अरब डॉलर आंकी गई है और वह अमेरिका के सबसे अमीर अप्रवासियों की सूची में 13वें स्थान पर हैं।

विनोद खोसला तकनीकी और निवेश जगत में जाना-पहचाना नाम हैं। उनका उदाहरण यह बताता है कि भारतीय मूल के उद्यमियों ने अमेरिकी टेक्नोलॉजी और निवेश इकोसिस्टम में कितना मजबूत स्थान बनाया है।

भारतीय मूल के सफल अरबपतियों की यह सूची अमेरिका में भारतीय समुदाय की आर्थिक ताकत को भी रेखांकित करती है।

जय चौधरी भी अरबपति सूची में मजबूत स्थान पर

भारतीय मूल के अरबपतियों में जय चौधरी का नाम भी प्रमुख है। उनकी संपत्ति करीब 8.2 अरब डॉलर बताई गई है और वह अमेरिका के सबसे अमीर अप्रवासियों की सूची में 25वें स्थान पर हैं।

टेक्नोलॉजी और साइबर सिक्योरिटी के क्षेत्र में उनकी सफलता भारतीय मूल के उद्यमियों की उस पीढ़ी का उदाहरण है जिसने अमेरिका की तकनीकी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान बनाया।

इस तरह एक तरफ भारतीय निवेशक EB-5 जैसे कार्यक्रमों की ओर बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ पहले से अमेरिका पहुंचे भारतीय मूल के उद्यमी अरबपति स्तर की संपत्ति बना रहे हैं।

एक साल में जुड़े 7 नए भारतवंशी अरबपति

2025 की तुलना में 2026 की सूची में भारत में जन्मे अरबपतियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई गई है।

पिछले साल सूची में 12 भारतवंशी अरबपति थे, जबकि इस साल यह संख्या बढ़कर 19 हो गई। यानी एक साल में सात नए भारत में जन्मे नाम इस सूची में शामिल हुए।

इन नए नामों में हेमंत तनेजा, संजय गजेंद्र, जितेंद्र मोहन और श्याम शंकर शामिल हैं।

इन नामों का जुड़ना यह दिखाता है कि अमेरिका में भारतीय मूल के उद्यमियों और बिजनेस लीडर्स की आर्थिक ताकत लगातार व्यापक हो रही है।

अमेरिका के सबसे अमीर लोगों में एलन मस्क सबसे आगे

अमेरिका के सबसे अमीर लोगों की सूची में एलन मस्क पहले स्थान पर बताए गए हैं। उनके बाद सर्गेई ब्रिन और जेनसन हुआंग का स्थान है।

भारतीय मूल के सफल कारोबारी और टेक्नोलॉजी लीडर्स की मौजूदगी इस सूची में अलग से ध्यान खींचती है।

सत्य नडेला और सुंदर पिचाई जैसे भारतीय मूल के शीर्ष टेक्नोलॉजी नेतृत्वकर्ता भी अमेरिका के कॉर्पोरेट और तकनीकी परिदृश्य में भारतीय प्रतिभा की मजबूत मौजूदगी को दर्शाते हैं।

हालांकि, अरबपति सूची और वीजा कार्यक्रमों को सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा। अरबपति बनने की कहानी वर्षों की उद्यमिता, निवेश, कंपनी निर्माण और आर्थिक सफलता से जुड़ी है, जबकि EB-5 एक विशेष इमिग्रेशन कार्यक्रम है।

EB-5 Visa का बढ़ना भारतीय परिवारों के लिए क्या संकेत देता है?

भारतीय आवेदकों की संख्या चीन से अधिक होना अमेरिकी इमिग्रेशन बाजार में मांग के बदलते स्वरूप की ओर इशारा करता है।

भारतीय परिवारों में अमेरिका की शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय और स्थायी निवास की मांग पहले से मजबूत है। यदि H-1B जैसे पारंपरिक रास्तों में अनिश्चितता बढ़ती है, तो आर्थिक रूप से सक्षम परिवार वैकल्पिक विकल्पों की तलाश कर सकते हैं।

EB-5 इसी विकल्पों में एक है।

लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि निवेश आधारित इमिग्रेशन में बड़ी राशि दांव पर होती है। निवेशकों को किसी भी परियोजना में पैसा लगाने से पहले उसके कानूनी ढांचे, जोखिम, पात्रता, रोजगार सृजन और संभावित रिटर्न को अच्छी तरह समझना चाहिए।

क्या EB-5 में निवेश करना सुरक्षित है?

EB-5 को लेकर एक आम धारणा है कि यह निवेश के साथ ग्रीन कार्ड की गारंटी देता है। यह धारणा सही नहीं है।

इमिग्रेशन पात्रता और निवेश जोखिम दो अलग-अलग मुद्दे हैं। किसी निवेश कार्यक्रम में शामिल होने से पहले यह समझना जरूरी है कि निवेश का मूल्य बाजार और परियोजना के प्रदर्शन से प्रभावित हो सकता है।

इसके अलावा इमिग्रेशन आवेदन की स्वीकृति अलग कानूनी प्रक्रिया है।

इसलिए करोड़ों रुपये निवेश करने वाले व्यक्ति के लिए केवल एजेंट या मार्केटिंग सामग्री पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है। संबंधित अमेरिकी नियमों और योग्य पेशेवर सलाह के आधार पर निर्णय लेना अधिक सुरक्षित होता है।

भारतीय निवेशकों के सामने अवसर के साथ जोखिम भी

EB-5 में बढ़ती भारतीय दिलचस्पी अवसर का संकेत जरूर है, लेकिन इसके साथ जोखिम भी जुड़े हैं।

निवेश राशि बड़ी है। परियोजना की संरचना, दस्तावेज, रोजगार सृजन की स्थिति, इमिग्रेशन प्रक्रिया और आवेदन की समयसीमा जैसे कई पहलुओं को समझना पड़ता है।

यदि कोई निवेशक केवल ‘ग्रीन कार्ड पक्का’ जैसे दावे के आधार पर निर्णय लेता है तो वह जोखिम में पड़ सकता है।

इसीलिए EB-5 को निवेश और इमिग्रेशन—दोनों दृष्टिकोणों से समझना जरूरी है।

अमेरिका की इमिग्रेशन नीति में पैसा और प्रतिभा दोनों महत्वपूर्ण

अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम में अलग-अलग रास्ते अलग प्रकार की प्रतिभा और पूंजी को आकर्षित करते हैं।

EB-1 उच्च उपलब्धि वाले पेशेवरों और असाधारण क्षमता वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण है। H-1B अस्थायी रोजगार के लिए जाना जाता है। EB-5 निवेश आधारित रास्ता है।

इन तीनों की प्रकृति अलग है, लेकिन भारतीयों की मौजूदगी सभी में महत्वपूर्ण रही है।

एक ओर भारतीय वैज्ञानिक और टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ उच्च-कौशल वाली श्रेणियों में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, तो दूसरी ओर संपन्न भारतीय परिवार निवेश आधारित स्थायी निवास विकल्पों को देख रहे हैं।

चीन से आगे निकलने का मतलब क्या वास्तव में बड़ा बदलाव है?

12,900 भारतीय आवेदन बनाम 9,875 चीनी आवेदन का आंकड़ा निश्चित रूप से ध्यान खींचता है। लेकिन इसे अमेरिकी इमिग्रेशन में भारत की पूर्ण बढ़त के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।

EB-5 केवल एक इमिग्रेशन श्रेणी है। अमेरिका में भारतीय और चीनी नागरिकों की मौजूदगी को समझने के लिए छात्र वीजा, H-1B, रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड, पारिवारिक इमिग्रेशन और अन्य श्रेणियों के आंकड़े भी देखने पड़ेंगे।

फिर भी EB-5 में भारतीयों का चीन से आगे निकलना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह निवेश आधारित स्थायी निवास की मांग में बदलाव का संकेत देता है।

एक तरफ करोड़ों का निवेश, दूसरी तरफ अरबों डॉलर की संपत्ति

इस पूरी तस्वीर का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि अमेरिका में भारतीय समुदाय की कहानी कई स्तरों पर एक साथ आगे बढ़ रही है।

कुछ भारतीय युवा पढ़ाई के लिए अमेरिका जा रहे हैं। बड़ी संख्या में पेशेवर H-1B जैसे रोजगार वीजा पर काम कर रहे हैं। उच्च उपलब्धि वाले वैज्ञानिक और प्रोफेसर EB-1 जैसी श्रेणियों की ओर देखते हैं। आर्थिक रूप से सक्षम परिवार EB-5 जैसे निवेश आधारित रास्तों पर विचार कर रहे हैं।

और दूसरी तरफ भारतीय मूल के उद्यमियों की एक पीढ़ी अरबपति सूची तक पहुंच चुकी है।

यानी अमेरिका में भारतीय उपस्थिति अब केवल ‘इमिग्रेंट वर्कफोर्स’ की कहानी नहीं रह गई है। यह प्रतिभा, उद्यमिता, निवेश और संपत्ति निर्माण की भी कहानी बन चुकी है।

अगले कुछ सालों में EB-5 की मांग और बढ़ सकती है?

यदि अमेरिकी रोजगार आधारित इमिग्रेशन में अनिश्चितता बनी रहती है और भारतीय पेशेवरों के लिए ग्रीन कार्ड का इंतजार लंबा रहता है, तो आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों के बीच EB-5 जैसे विकल्पों की मांग बनी रह सकती है।

लेकिन मांग बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि हर आवेदक को मंजूरी मिलेगी या हर निवेश सफल होगा।

अमेरिकी इमिग्रेशन नियमों में बदलाव, उपलब्ध वीजा संख्या, आवेदन प्रक्रिया, निवेश की पात्रता और सरकारी नीतियां भविष्य की तस्वीर को प्रभावित कर सकती हैं।

भारतीयों के लिए अमेरिका का सपना अब कई रास्तों वाला हो गया है

एक समय अमेरिका जाने के लिए नौकरी और छात्र वीजा सबसे चर्चित रास्ते थे। आज तस्वीर कहीं ज्यादा जटिल और विविध है।

कोई पढ़ाई के जरिए जाता है, कोई नौकरी के जरिए, कोई असाधारण उपलब्धियों के आधार पर स्थायी निवास की कोशिश करता है और कोई निवेश आधारित रास्ता चुनता है।

EB-5 में भारतीय आवेदकों का चीन से आगे निकलना इसी बदलती तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

साथ ही, EB-1 की मजबूत मांग और अमेरिका में भारत में जन्मे अरबपतियों की बढ़ती संख्या यह भी दिखाती है कि भारतीय प्रतिभा और पूंजी अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अलग-अलग स्तरों पर अपनी जगह बना चुकी है।

अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम में भारतीयों की बढ़ती मौजूदगी अब केवल H-1B या नौकरी तक सीमित नहीं दिखाई देती। EB-5 Visa के लिए पिछले तीन वर्षों में करीब 12,900 भारतीय आवेदन और चीन से 9,875 आवेदन का आंकड़ा निवेश आधारित इमिग्रेशन में बदलती प्राथमिकताओं की ओर संकेत करता है। दूसरी तरफ EB-1 की मांग, Trump Gold Card को मिले सीमित आवेदन और अमेरिका में भारत में जन्मे 19 अरबपतियों की मौजूदगी इस पूरी तस्वीर को और व्यापक बनाती है। हालांकि EB-5 में निवेश ग्रीन कार्ड या नागरिकता की सीधी गारंटी नहीं है और Gold Card से जुड़े कानूनी भविष्य पर भी सवाल हैं। इसलिए करोड़ों रुपये के निवेश या इमिग्रेशन से जुड़ा कोई भी फैसला आधिकारिक नियमों और योग्य कानूनी एवं वित्तीय सलाह को समझने के बाद ही लिया जाना चाहिए।

 

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