Muzaffarnagar में फर्जी वेबसाइट बनाकर करोड़ों की ठगी का खुलासा, विदेशी खरीदार और बड़े ऑर्डर का झांसा देकर व्यापारियों को फंसाता था गिरोह; 3 गिरफ्तार
Muzaffarnagar में साइबर ठगी के एक बड़े मामले का पुलिस ने खुलासा करने का दावा किया है। Muzaffarnagar Cyber Fraud Gang के खिलाफ कार्रवाई करते हुए साइबर क्राइम पुलिस टीम ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार आरोपी एक फर्जी वेबसाइट बनाकर देश-विदेश में व्यापारिक ऑर्डर और ग्राहक उपलब्ध कराने का झांसा देते थे और कृषि उत्पाद, कपड़े, ऑटोमोबाइल तथा इलेक्ट्रॉनिक्स समेत अलग-अलग क्षेत्रों के थोक व्यापारियों से रकम वसूलते थे।
पुलिस जांच में सामने आया कि कथित गिरोह व्यापारियों को विदेशी खरीदारों से संपर्क कराने और बड़े व्यापारिक ऑर्डर दिलाने का लालच देता था। शुरुआत में व्यापारियों से वेबसाइट की सदस्यता या सब्सक्रिप्शन के नाम पर रकम ली जाती थी। इसके बाद कथित तौर पर अलग-अलग प्रकार के फर्जी प्रमाण-पत्र उपलब्ध कराने और अन्य औपचारिकताओं के नाम पर अतिरिक्त रकम मांगी जाती थी।
पुलिस के अनुसार रकम प्राप्त होने के बाद आरोपी संबंधित व्यापारियों के फोन और मैसेज का जवाब देना बंद कर देते थे। जांच के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से जुड़ी 30 से अधिक शिकायतों में करीब 1.50 करोड़ रुपये से अधिक की कथित धोखाधड़ी का पता चला है।
मामले की जांच अभी जारी है और पुलिस अन्य बैंक खातों तथा मोबाइल नंबरों की भी गहन जांच कर रही है। ऐसे में कथित ठगी की रकम और इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों के बारे में आगे और जानकारी सामने आने की संभावना बनी हुई है।
‘विजन ट्रेड इंडिया’ नाम से बनाई गई थी कथित फर्जी वेबसाइट
पुलिस के अनुसार गिरोह ने ‘विजन ट्रेड इंडिया’ नाम से एक फर्जी वेबसाइट तैयार की थी। वेबसाइट के जरिए व्यापारियों को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया जाता था कि उन्हें देश-विदेश में नए ग्राहक और बड़े व्यापारिक ऑर्डर मिल सकते हैं।
थोक कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए नए बाजार और विदेशी खरीदार तलाशना व्यापार का सामान्य हिस्सा है। इसी जरूरत को कथित ठगी गिरोह ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया।
पुलिस का दावा है कि आरोपी संभावित ग्राहकों को आकर्षक व्यापारिक अवसरों की जानकारी देते थे और फिर उनसे सदस्यता या सब्सक्रिप्शन शुल्क के नाम पर पैसे लेते थे।
इसके बाद व्यापारियों को कथित रूप से कुछ ऐसे प्रमाण-पत्र उपलब्ध कराने की बात कही जाती थी, जिनके जरिए यह विश्वास पैदा किया जाता था कि कारोबार या ऑर्डर की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
जब पीड़ितों से अतिरिक्त रकम भी वसूल ली जाती थी, तब आरोपी कथित तौर पर संपर्क बंद कर देते थे।
विदेशी खरीदार और बड़े ऑर्डर का दिखाया जाता था सपना
इस कथित साइबर ठगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा विदेशी खरीदारों और बड़े व्यापारिक ऑर्डर का लालच था। व्यापारियों को यह विश्वास दिलाया जाता था कि वेबसाइट के जरिए उन्हें विदेशों में खरीदार मिल सकते हैं और बड़े स्तर पर व्यापारिक सौदे किए जा सकते हैं।
कृषि उत्पादों से लेकर कपड़ों तक और ऑटोमोबाइल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक विभिन्न कारोबारों को कथित तौर पर निशाना बनाया गया।
बड़े ऑर्डर का अवसर किसी भी थोक व्यापारी के लिए आकर्षक हो सकता है। इसी कारोबारी जरूरत का फायदा उठाकर आरोपियों ने कथित तौर पर व्यापारियों को सदस्यता लेने और अलग-अलग शुल्क जमा करने के लिए तैयार किया।
पुलिस के अनुसार रकम जमा होने के बाद न तो वादा किया गया व्यापारिक अवसर उपलब्ध कराया जाता था और न ही आरोपी आगे संपर्क में रहते थे।
सब्सक्रिप्शन के बाद बढ़ती जाती थी पैसों की मांग
पुलिस जांच के अनुसार कथित ठगी का तरीका केवल एक बार सदस्यता शुल्क लेने तक सीमित नहीं था। व्यापारियों से शुरुआत में सब्सक्रिप्शन या सदस्यता शुल्क लेने के बाद आगे अन्य प्रक्रियाओं के नाम पर अतिरिक्त रकम मांगी जाती थी।
जांच में कथित रूप से सामने आया कि आरोपियों ने अलग-अलग प्रमाण-पत्र जारी करने के नाम पर भी रकम वसूली। पुलिस के मुताबिक इसके बाद जब व्यापारियों को वास्तविक ऑर्डर या ग्राहक उपलब्ध नहीं हुए और उन्होंने संपर्क करना चाहा तो आरोपी फोन तथा संदेशों का जवाब देना बंद कर देते थे।
इस तरह एक व्यापारी से कई चरणों में रकम वसूले जाने का आरोप है।
फर्जी प्रमाण-पत्रों के जरिए बनाया जाता था भरोसा
पुलिस के अनुसार कथित गिरोह द्वारा व्यापारियों को कुछ फर्जी प्रमाण-पत्र भी उपलब्ध कराए जाते थे। बरामद सामग्री में कंपनी से संबंधित दस्तावेज और कथित फर्जी प्रमाण-पत्र शामिल बताए गए हैं।
किसी कारोबारी के लिए प्रमाण-पत्र और दस्तावेज अक्सर कंपनी की विश्वसनीयता जांचने का महत्वपूर्ण आधार होते हैं। यदि कोई वेबसाइट या संस्था आधिकारिक दिखने वाले दस्तावेज उपलब्ध कराती है तो कारोबारी के लिए उसके वास्तविक होने की पुष्टि करना जरूरी हो जाता है।
इसी भरोसे का कथित तौर पर इस्तेमाल करते हुए आरोपियों ने व्यापारियों से रकम वसूलने का तरीका अपनाया।
पुलिस अब बरामद दस्तावेजों की जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उनका इस्तेमाल किन-किन पीड़ितों के साथ किया गया था।
गृह मंत्रालय के ‘प्रतिबिम्ब’ पोर्टल की शिकायतों से मिला सुराग
इस मामले की जांच का महत्वपूर्ण बिंदु गृह मंत्रालय के ऑनलाइन पोर्टल ‘प्रतिबिम्ब’ पर दर्ज शिकायतें रहीं। पुलिस के अनुसार शिकायतों के तकनीकी विश्लेषण के दौरान यह जानकारी सामने आई कि मुजफ्फरनगर के कुछ ATM से ठगी की रकम निकाली जा रही थी।
यहीं से जांच मुजफ्फरनगर तक पहुंची और पुलिस ने पैसों की निकासी से जुड़े बैंकिंग तथा तकनीकी सुरागों को खंगालना शुरू किया।
इसके बाद जांच आगे बढ़ने पर कथित ‘विजन ट्रेड इंडिया’ वेबसाइट और उससे जुड़े नेटवर्क के बारे में जानकारी सामने आई।
साइबर अपराध के मामलों में डिजिटल लेनदेन, मोबाइल नंबर, बैंक खाते और ATM से संबंधित गतिविधियां जांचकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण सुराग बन सकती हैं। इस मामले में भी पुलिस ने तकनीकी विश्लेषण के जरिए कथित नेटवर्क तक पहुंचने का प्रयास किया।
30 से अधिक शिकायतों में 1.50 करोड़ से ज्यादा की धोखाधड़ी का खुलासा
पुलिस के अनुसार जांच के दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से जुड़ी 30 से अधिक शिकायतें सामने आई हैं। इन शिकायतों में करीब 1.50 करोड़ रुपये से अधिक की कथित धोखाधड़ी का पता चला है।
यह आंकड़ा फिलहाल पुलिस जांच में सामने आए मामलों से संबंधित है। जांच आगे बढ़ने पर शिकायतों और कथित रकम की संख्या में बदलाव संभव है, खासकर तब जब अन्य बैंक खातों, मोबाइल नंबरों या पीड़ितों की जानकारी सामने आती है।
पुलिस ने इसी वजह से जांच का दायरा बढ़ाते हुए अन्य बैंक खातों और मोबाइल नंबरों की भी सघन जांच शुरू कर दी है।
यदि इन खातों और नंबरों का संबंध इसी नेटवर्क से मिलता है तो मामले में कथित ठगी की पूरी संरचना और अधिक स्पष्ट हो सकती है।
मुजफ्फरनगर के ATM से निकाली जा रही थी ठगी की रकम
पुलिस जांच में सामने आए तकनीकी सुरागों के अनुसार कथित ठगी की रकम मुजफ्फरनगर के ATM से निकाली जा रही थी। यह जानकारी जांच को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित हुई।
पुलिस ने इसके बाद रकम निकालने वाले लोगों, बैंकिंग गतिविधियों और संबंधित मोबाइल नंबरों पर ध्यान केंद्रित किया।
साइबर ठगी के मामलों में आरोपी कई बार अलग-अलग खातों और माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे मामलों में धनराशि किस खाते में पहुंची, वहां से कहां ट्रांसफर हुई और अंत में किस माध्यम से निकाली गई—इन सभी कड़ियों की जांच की जाती है।
मुजफ्फरनगर के इस मामले में भी पुलिस कथित धन प्रवाह की पूरी जानकारी जुटाने में लगी है।
तीन आरोपी गिरफ्तार, पुलिस ने कई सामान किए बरामद
साइबर क्राइम पुलिस ने इस मामले में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों की पहचान इस प्रकार हुई है—
विशाल सैनी पुत्र राजेन्द्र सैनी, निवासी पारासौली, थाना बुढ़ाना, मुजफ्फरनगर।
गौरव कुमार पुत्र बच्चा बाबू शाह, निवासी पालमगांव, नई दिल्ली, मूल निवासी दरभंगा, बिहार।
शिवम कुमार पुत्र गिरजानन्द कुमार, निवासी द्वारिका, नई दिल्ली, मूल निवासी दरभंगा, बिहार।
पुलिस के अनुसार आरोपियों के कब्जे से तीन मोबाइल फोन, कंपनी से संबंधित एक पैन कार्ड, कंपनी के दस्तावेज और कथित फर्जी प्रमाण-पत्र बरामद किए गए हैं।
बरामद मोबाइल फोन जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकते हैं। पुलिस इनके माध्यम से कथित ग्राहकों, बैंकिंग गतिविधियों, संपर्कों और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच कर सकती है।
मोबाइल फोन से खुल सकती हैं ठगी के नेटवर्क की और परतें
साइबर अपराध की जांच में मोबाइल फोन अक्सर महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य साबित होते हैं। कॉल हिस्ट्री, मैसेज, संपर्क नंबर और अन्य उपलब्ध डिजिटल सामग्री से जांचकर्ताओं को नेटवर्क की कड़ियों को समझने में मदद मिल सकती है।
इस मामले में भी बरामद तीन मोबाइल फोन की जांच पुलिस के लिए महत्वपूर्ण चरण हो सकती है। इनसे यह पता लगाने की कोशिश की जा सकती है कि आरोपी किन व्यापारियों के संपर्क में थे और किन नंबरों से संभावित पीड़ितों से बातचीत की गई।
यदि अन्य बैंक खातों और मोबाइल नंबरों का संबंध भी इस नेटवर्क से मिलता है तो पुलिस के सामने मामले की तस्वीर और विस्तृत हो सकती है।
कृषि से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबारियों तक को निशाना बनाने का आरोप
पुलिस के अनुसार कथित गिरोह ने किसी एक कारोबार को ही निशाना नहीं बनाया। कृषि उत्पाद, कपड़े, ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में थोक कारोबार करने वाले व्यापारियों को विदेशी खरीदारों और बड़े ऑर्डर का झांसा देने की बात सामने आई है।
यह तरीका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अलग-अलग उद्योगों में कारोबार करने वाले व्यापारी नए खरीदार और बाजार तलाशते रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय कारोबार से जुड़े नए अवसरों की तलाश में व्यापारी अक्सर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, ट्रेड पोर्टल और व्यावसायिक संपर्कों का सहारा लेते हैं।
यही कारोबारी जरूरत कथित तौर पर इस गिरोह के निशाने पर थी।
फर्जी वेबसाइट देखकर कारोबारियों को सतर्क रहने की जरूरत
ऑनलाइन व्यापार के विस्तार के साथ फर्जी वेबसाइटों और नकली व्यावसायिक प्रोफाइल के जरिए ठगी का खतरा भी बढ़ा है। किसी वेबसाइट का पेशेवर डिजाइन, कंपनी का नाम, प्रमाण-पत्र या विदेशी ग्राहकों का दावा अपने आप में उसकी वास्तविकता की गारंटी नहीं देता।
किसी भी व्यापारिक वेबसाइट से जुड़ने से पहले कंपनी का वास्तविक पंजीकरण, आधिकारिक संपर्क, कार्यालय का पता, GST संबंधी जानकारी, बैंक खाते का नाम और अन्य स्वतंत्र कारोबारी विवरण सत्यापित करना जरूरी है।
विशेष रूप से यदि कोई संस्था बिना पर्याप्त व्यापारिक प्रक्रिया के विदेशी खरीदार और करोड़ों के ऑर्डर का दावा कर रही हो तथा शुरुआत में ही सदस्यता या प्रमाण-पत्र के नाम पर लगातार पैसे मांग रही हो, तो कारोबारी को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
बड़े ऑर्डर के लालच में जल्दबाजी पड़ सकती है भारी
व्यापारियों के लिए विदेशी बाजार और बड़े ऑर्डर महत्वपूर्ण कारोबारी अवसर हो सकते हैं। लेकिन ऐसे अवसरों की पुष्टि किए बिना फीस, सदस्यता या प्रमाण-पत्र के नाम पर रकम भेजना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
किसी भी विदेशी खरीदार की पहचान स्वतंत्र रूप से सत्यापित की जा सकती है। खरीदार की कंपनी, वेबसाइट, पंजीकृत पता, आधिकारिक ईमेल डोमेन और पिछले कारोबारी रिकॉर्ड जैसी जानकारी की जांच करना उपयोगी होता है।
यदि कोई कंपनी केवल फोन या व्हाट्सऐप पर बड़े ऑर्डर की जानकारी दे और उसके बदले पहले कई प्रकार के शुल्क मांगती जाए, तो भुगतान से पहले दस्तावेजों और संस्था की स्वतंत्र जांच करना जरूरी है।
फर्जी दस्तावेजों की जांच भी होगी
पुलिस ने कंपनी से जुड़े दस्तावेज और कथित फर्जी प्रमाण-पत्र बरामद किए हैं। अब जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह पता लगाना होगा कि ये दस्तावेज किसने तैयार किए और उनका इस्तेमाल कितने लोगों के साथ किया गया।
यदि जांच में यह साबित होता है कि दस्तावेज जानबूझकर व्यापारियों को भ्रमित करने के लिए तैयार किए गए थे, तो संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई का दायरा बढ़ सकता है।
फिलहाल पुलिस बरामद सामग्री को जांच का हिस्सा बनाकर मामले की कड़ियां जोड़ रही है।
अन्य बैंक खातों और मोबाइल नंबरों की भी जांच
पुलिस ने साफ किया है कि जांच केवल गिरफ्तार किए गए तीन आरोपियों तक सीमित नहीं है। अन्य बैंक खातों और मोबाइल नंबरों की भी सघन जांच की जा रही है।
इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कथित तौर पर ठगी की रकम कहां-कहां पहुंची और क्या आरोपियों के अलावा अन्य लोग भी इस नेटवर्क में शामिल थे।
बैंक खातों के लेनदेन और मोबाइल नंबरों के तकनीकी विश्लेषण से कथित नेटवर्क की संरचना सामने आने की उम्मीद की जा रही है।
साइबर अपराध में शिकायत दर्ज कराना क्यों जरूरी
यदि किसी व्यापारी के साथ ऑनलाइन व्यापार, फर्जी वेबसाइट, नकली खरीदार या डिजिटल भुगतान के नाम पर ठगी होती है तो समय पर शिकायत करना महत्वपूर्ण होता है। देरी होने पर रकम को विभिन्न खातों में ट्रांसफर किया जा सकता है और डिजिटल साक्ष्यों का पता लगाना अधिक कठिन हो सकता है।
ऐसे मामलों में पीड़ित को भुगतान की रसीद, बैंक स्टेटमेंट, वेबसाइट के स्क्रीनशॉट, ईमेल, मोबाइल नंबर, चैट और अन्य संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए।
मुजफ्फरनगर के इस मामले में भी विभिन्न राज्यों से शिकायतें सामने आने की बात पुलिस ने कही है। इन्हीं शिकायतों के तकनीकी विश्लेषण से कथित नेटवर्क की जानकारी सामने आई।
पुलिस टीम ने तकनीकी जांच के आधार पर बढ़ाया कदम
इस कार्रवाई को अंजाम देने वाली पुलिस टीम में प्रभारी निरीक्षक कर्मवीर सिंह, उप-निरीक्षक जय शर्मा, मुख्य आरक्षी बालकिशन, आकाश चौधरी, सुनील कुमार, आरक्षी रोबिन कसाना, राहुल कुमार तथा महिला आरक्षी मोनिका शामिल रहे।
टीम ने तकनीकी जानकारी, बैंकिंग गतिविधियों और उपलब्ध शिकायतों को जोड़ते हुए जांच आगे बढ़ाई। इसके बाद तीन आरोपियों की गिरफ्तारी की गई।
पुलिस की ओर से बताया गया है कि आरोपियों के खिलाफ थाना साइबर क्राइम में संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर विधिक कार्रवाई की जा रही है।
जांच आगे बढ़ी तो और नाम सामने आने की संभावना
मामले की जांच अभी समाप्त नहीं हुई है। अन्य बैंक खातों और मोबाइल नंबरों की जांच के चलते पुलिस कथित नेटवर्क के बारे में अतिरिक्त जानकारी जुटा रही है।
यदि जांच के दौरान किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो उसके संबंध में भी कानूनी प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इसी तरह यदि अन्य राज्यों से जुड़े पीड़ितों या लेनदेन की जानकारी मिलती है तो जांच का दायरा बढ़ सकता है।
फिलहाल पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया है और उनके कब्जे से डिजिटल तथा दस्तावेजी सामग्री बरामद किए जाने की जानकारी दी है।
व्यापारियों के लिए क्या सबक सामने आया
इस मामले से ऑनलाइन व्यापारिक अवसरों की जांच को लेकर महत्वपूर्ण सावधानी सामने आती है। विदेशी खरीदार, बड़े ऑर्डर या अंतरराष्ट्रीय व्यापार का दावा करने वाली किसी भी वेबसाइट की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
व्यापारी को किसी भी प्रकार का भुगतान करने से पहले यह देखना चाहिए कि सामने वाली कंपनी वास्तव में अस्तित्व में है या नहीं। कंपनी का पंजीकरण, कार्यालय, बैंक खाता और संपर्क विवरण एक-दूसरे से मेल खाते हैं या नहीं, इसकी जांच की जा सकती है।
किसी कंपनी की ओर से दिए गए प्रमाण-पत्रों पर आंख बंद करके भरोसा करने के बजाय उन्हें जारी करने वाली संस्था से स्वतंत्र रूप से सत्यापन करना अधिक सुरक्षित तरीका है।
मुजफ्फरनगर साइबर क्राइम पुलिस की कार्रवाई के बाद बढ़ी जांच
मुजफ्फरनगर साइबर क्राइम पुलिस की इस कार्रवाई में सबसे अहम पहलू यह है कि मामला केवल एक स्थानीय शिकायत से आगे बढ़कर अलग-अलग राज्यों की शिकायतों तक पहुंचा। पुलिस के अनुसार 30 से अधिक शिकायतों में 1.50 करोड़ रुपये से ज्यादा की कथित धोखाधड़ी सामने आई है।
‘प्रतिबिम्ब’ पोर्टल पर उपलब्ध शिकायतों के तकनीकी विश्लेषण के दौरान मुजफ्फरनगर के ATM से धन निकासी का सुराग मिलने के बाद जांच को आगे बढ़ाया गया।
अब पुलिस कथित नेटवर्क की अन्य कड़ियों को जोड़ने में जुटी है। गिरफ्तार आरोपियों के मोबाइल फोन, कंपनी दस्तावेज, बैंक खातों और अन्य नंबरों की जांच इस मामले में आगे की दिशा तय कर सकती है।
आगे की कानूनी प्रक्रिया पर रहेगी नजर
गिरफ्तार किए गए तीनों आरोपियों के खिलाफ थाना साइबर क्राइम में संबंधित धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किए जाने की जानकारी पुलिस ने दी है। अब मामले में जांच, साक्ष्य संकलन और न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों और जांच में सामने आए तथ्यों की अंतिम कानूनी स्थिति अदालत की प्रक्रिया के बाद तय होगी। अभी जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह निर्धारित करना है कि कथित फर्जी वेबसाइट, बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और बरामद दस्तावेजों के बीच किस तरह का संबंध था।

