Banda Child Abuse Case: 34 मासूमों के यौन शोषण में जेई रामभवन और पत्नी दुर्गावती को फांसी, अदालत में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य निर्णायक साबित
Banda Child Abuse Case ने पूरे प्रदेश को झकझोर देने वाले उस जघन्य अपराध की परतें खोल दीं, जिसमें 34 नाबालिग बच्चों के यौन शोषण और उनकी अश्लील तस्वीरें व वीडियो बनाकर उन्हें देश-विदेश में बेचने का आरोप सिद्ध हुआ। उत्तर प्रदेश के बांदा की विशेष पॉक्सो अदालत ने इस बहुचर्चित मामले में सिंचाई विभाग के निलंबित जेई रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को फांसी की सजा सुनाई है। अदालत ने अपने 163 पन्नों के विस्तृत फैसले में इस अपराध को “जघन्यतम और असाधारण रूप से घिनौना” करार दिया।
अदालत में पेश हुई इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की पेन ड्राइव
Banda Child Abuse Case की सुनवाई के दौरान केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने एम्स में कराए गए मेडिकल परीक्षणों की रिपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में गंदे वीडियो की पेन ड्राइव अदालत को सौंपी। अदालत ने जब इन वीडियो का अवलोकन किया, तो उन्हें अपराध की पुष्टि के लिए पर्याप्त और निर्णायक माना।
सीबीआई ने जांच के दौरान पेन ड्राइव, लैपटॉप, मोबाइल फोन और अन्य डिजिटल उपकरण बरामद किए थे, जिनमें वर्षों पुराने वीडियो फुटेज सुरक्षित पाए गए। करीब 12 वर्ष पुराने इन वीडियो के आधार पर पीड़ित बच्चों की पहचान संभव हो सकी।
34 पीड़ितों की पहचान, संगठित नेटवर्क की पुष्टि
जांच में सामने आया कि Banda Child Abuse Case में कुल 34 बच्चों की पहचान हुई, जो आरोपी की हैवानियत का शिकार बने। सीबीआई ने विस्तृत डिजिटल फॉरेंसिक विश्लेषण के जरिए यह स्थापित किया कि आरोपी बच्चों को पांच से 16 वर्ष की आयु के बीच निशाना बनाता था।
पूछताछ में आरोपी रामभवन ने स्वीकार किया कि वह बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और अन्य प्रलोभनों का लालच देकर जाल में फंसाता था। सोशल मीडिया के माध्यम से भी वह आपत्तिजनक सामग्री साझा करता था और पीड़ित परिवारों को तस्वीरें दिखाकर ब्लैकमेल कर धन वसूलता था।
एम्स मेडिकल रिपोर्ट बनी अहम आधार
Banda Child Abuse Case में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के साथ-साथ पीड़ित बच्चों के मेडिकल परीक्षण भी निर्णायक साबित हुए। दिल्ली के एम्स में आरोपी का मेडिकल परीक्षण कराया गया, क्योंकि जांच एजेंसियों को उसके स्वास्थ्य संबंधी गंभीर आशंकाएं थीं।
इसके अतिरिक्त, जिन बच्चों का शोषण हुआ था, उनके मेडिकल परीक्षण के लिए एम्स की पांच सदस्यीय विशेष टीम बांदा पहुंची। महिला और पुरुष डॉक्टरों की इस टीम ने मेडिकल परीक्षण कर रिपोर्ट तैयार की, जिसने अदालत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सीबीआई सूत्रों के अनुसार, मेडिकल जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि आरोपी ने कुछ बच्चों के साथ कई बार दुष्कर्म किया था।
पत्नी की भूमिका और गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश
जांच के दौरान यह भी उजागर हुआ कि Banda Child Abuse Case में आरोपी की पत्नी दुर्गावती की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। आरोप है कि वह बच्चों को आरोपी तक पहुंचाने में सहायक थी।
सीबीआई जब गवाहों की सूची तैयार कर रही थी, उसी दौरान दुर्गावती ने कथित रूप से पीड़ित बच्चों और उनके अभिभावकों को प्रभावित करने के प्रयास किए। सूत्रों के मुताबिक, आरोपी द्वारा अवैध तरीके से अर्जित धन का इस्तेमाल गवाहों को तोड़ने के लिए किया गया।
विशेष पॉक्सो अदालत का ऐतिहासिक फैसला
इस मामले की सुनवाई विशेष पॉक्सो अदालत में हुई। न्यायाधीश प्रदीप कुमार मिश्रा ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि यह अपराध कई जिलों में फैला हुआ था और सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दोषियों का नैतिक स्तर अत्यंत निम्न रहा है और उनमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है।
अदालत ने दोनों मुख्य आरोपियों को फांसी की सजा सुनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को प्रत्येक पीड़ित बच्चे को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया। तीसरे आरोपी की फाइल अलग कर दी गई है, जिस पर ई-मेल के माध्यम से जानकारी साझा करने का आरोप है। उसे जमानत मिल चुकी है।
मोहल्ले में सन्नाटा, तीन साल तक खाली रहा कमरा
Banda Child Abuse Case के उजागर होने के बाद आरोपी का एसडीएम कॉलोनी स्थित कमरा तीन वर्षों तक खाली पड़ा रहा। वर्ष 2023 में आरोपी का भाई सामान लेने पहुंचा, लेकिन तीन वर्ष का किराया चुकाया नहीं गया। घटना के बाद क्षेत्र में भय और अविश्वास का माहौल बना रहा। कई मकान मालिक लंबे समय तक किरायेदार रखने से हिचकिचाते रहे।
CBI जांच की लंबी प्रक्रिया और न्याय की दिशा
Banda Child Abuse Case में सीबीआई की लंबी और जटिल जांच ने डिजिटल साक्ष्यों को संरक्षित रखने और वर्षों पुराने फुटेज के आधार पर पहचान स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह मामला दर्शाता है कि तकनीकी साक्ष्य और मेडिकल परीक्षण किस प्रकार न्यायिक प्रक्रिया में निर्णायक बन सकते हैं।
यह फैसला न केवल अपराध की गंभीरता को दर्शाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि नाबालिगों के विरुद्ध अपराधों के मामलों में न्यायपालिका सख्त दृष्टिकोण अपनाने को प्रतिबद्ध है।

