उत्तर प्रदेश

Hardoi पॉक्सो केस में बड़ा फैसला: नाबालिग से दुष्कर्म पर 10 साल की सजा, कोर्ट बोला- शादी से अपराध खत्म नहीं होता

Hardoi POCSO Case में अदालत ने एक महत्वपूर्ण और सख्त संदेश देने वाला फैसला सुनाया है। 13 वर्षीय किशोरी से दुष्कर्म के दोषी को विशेष न्यायाधीश पॉक्सो एक्ट ने 10 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि नाबालिग से संबंध में सहमति का कोई महत्व नहीं होता, और शादी या पारिवारिक संबंध बनने से अपराध समाप्त नहीं होता।

यह फैसला न केवल इस मामले के लिए अहम है, बल्कि समाज और कानून के बीच स्पष्ट सीमाएं भी तय करता है।


शादी और बच्चों के बावजूद नहीं मिली राहत

Hardoi POCSO Case में आरोपी ने अपने बचाव में यह दलील दी थी कि उसने पीड़िता से शादी कर ली है और उनके दो बच्चे भी हैं। लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि—

👉 शादी करना अपराध को कम या समाप्त नहीं करता
👉 नाबालिग की सहमति कानूनन मान्य नहीं होती

कोर्ट ने आरोपी पर 5 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया और जुर्माना न देने की स्थिति में एक माह की अतिरिक्त कैद का आदेश दिया।


क्या था पूरा मामला

यह मामला माधौगंज थाना क्षेत्र का है, जहां पीड़िता ने 14 जनवरी 2017 की रात की घटना को लेकर शिकायत दर्ज कराई थी।

पीड़िता के अनुसार—

  • वह अपने घर में सो रही थी

  • आरोपी राजेश सक्सेना दीवार फांदकर घर में घुस आया

  • उसने छेड़छाड़ की और दुष्कर्म का प्रयास किया

  • शोर मचाने पर परिजन पहुंचे, जिसके बाद आरोपी फरार हो गया


जांच के दौरान बढ़ी धाराएं

शुरुआत में पुलिस ने छेड़छाड़ और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। लेकिन बाद में मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान में दुष्कर्म की बात सामने आने पर मामले में दुष्कर्म की धारा भी जोड़ दी गई।

Hardoi POCSO Case में अभियोजन पक्ष ने अदालत में—

  • 4 गवाह

  • 9 दस्तावेजी साक्ष्य

पेश किए, जिनके आधार पर कोर्ट ने आरोपी को दोषी पाया।


नाबालिग की सहमति को कोर्ट ने माना ‘शून्य’

फैसले के दौरान अदालत ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि—

👉 “नाबालिग की सहमति कानून की नजर में शून्य होती है”

यह टिप्पणी इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण रही, क्योंकि सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी और पीड़िता के बीच प्रेम संबंध था।


पीड़िता की उम्र बनी सबसे बड़ा आधार

Hardoi POCSO Case में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 13 साल 4 महीने थी।

यही तथ्य इस मामले में सबसे निर्णायक साबित हुआ, क्योंकि पॉक्सो कानून के तहत 18 वर्ष से कम आयु की सहमति मान्य नहीं होती।


प्रेम प्रसंग और परिवार का दबाव भी आया सामने

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि पीड़िता ने बयान दिया था कि परिवार के कहने पर उसने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। बाद में दोनों ने शादी कर ली और उनके दो बच्चे भी हुए।

इसके बावजूद अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाते हुए कानून को सर्वोपरि माना।


कानूनी संदेश: नाबालिग के मामलों में सख्ती जरूरी

Hardoi POCSO Case का यह फैसला एक स्पष्ट संदेश देता है कि—

  • नाबालिग के साथ किसी भी प्रकार का यौन संबंध अपराध है

  • सहमति, शादी या संबंध—किसी भी आधार पर अपराध को उचित नहीं ठहराया जा सकता


समाज और कानून के बीच संतुलन का उदाहरण

यह मामला सामाजिक और कानूनी दोनों दृष्टिकोण से जटिल रहा, जहां एक ओर पारिवारिक परिस्थितियां थीं, वहीं दूसरी ओर कानून की सख्ती भी सामने आई।


हरदोई पॉक्सो केस में आया यह फैसला यह दर्शाता है कि कानून नाबालिगों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, नाबालिग के अधिकारों और सुरक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। अदालत का यह निर्णय आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जाएगा।

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