चीन की गोद में बैठकर भारत से पंगा लेना महंगा पड़ा: Maldives के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की सैलरी में 50% कटौती
Maldives के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू को भारत से पंगा लेना अब भारी पड़ने लगा है। देश की आर्थिक हालत इतनी पतली हो गई है कि अब सरकार के पास अपने कर्मचारियों की सैलरी तक देने के पैसे नहीं हैं। इस हालात से निपटने के लिए राष्ट्रपति मुइज्जू ने अपनी खुद की सैलरी में 50% की कटौती का ऐलान किया है। मालदीव, जो कभी अपने पर्यटन उद्योग से आर्थिक समृद्धि का प्रतीक माना जाता था, अब नकदी संकट से जूझ रहा है।
भारत से टकराव और चीन की गोद में बैठने का असर
मोहम्मद मुइज्जू ने जब से भारत के खिलाफ मोर्चा खोला और चीन की ओर झुकाव दिखाया, तब से मालदीव की आर्थिक हालत में गिरावट आने लगी। भारत और मालदीव के बीच तनाव का सीधा असर देश के सबसे बड़े रेवेन्यू सोर्स—पर्यटन उद्योग पर पड़ा। भारत से आने वाले पर्यटकों की संख्या में भारी गिरावट आई, जिससे होटल, रेस्टोरेंट और पर्यटन आधारित बिजनेस को बड़ा झटका लगा। यह स्थिति तब और गंभीर हो गई जब मुइज्जू ने चीन के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित करने के चलते भारत से दूरी बना ली।
मालदीव का पर्यटन उद्योग हमेशा से ही देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहा है, और भारत इस उद्योग का प्रमुख साझेदार था। जब से मुइज्जू ने चीन का दामन थामा, तब से भारतीय पर्यटकों की संख्या में बड़ी गिरावट देखी गई। भारतीय पर्यटक मालदीव के प्रमुख उपभोक्ता थे, और उनकी कमी ने देश की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रभाव डाला है। चीन से आए पर्यटकों की संख्या अब भी भारत जितनी नहीं है, और जो हैं भी, वे इतने बड़े आर्थिक लाभ की गारंटी नहीं देते जितना भारतीय पर्यटक देते थे।
सरकारी खर्चों में कटौती का बड़ा फैसला
मालदीव की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए मुइज्जू ने कई कठोर कदम उठाए हैं। सबसे बड़ा फैसला उनकी खुद की सैलरी में 50% की कटौती का है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, मुइज्जू की सैलरी अब 1.2 मिलियन रुफिया से घटकर 600,000 रुफिया हो जाएगी। इससे पहले उनकी सैलरी करीब 65,68,233 रुपए थी, जो अब घटकर लगभग 32,86,176 रुपए हो जाएगी। मालदीव में यह फैसला बड़ा कदम माना जा रहा है, क्योंकि वहां की औसत घरेलू आय 316,740 रुफिया (लगभग 17,33,685 रुपए) के आसपास है।
इसके साथ ही, मुइज्जू सरकार ने बाकी सरकारी नौकरियों की सैलरी में भी 10% की कटौती का फैसला किया है। हालांकि, यह कटौती अभी तक सांसदों और जजों पर लागू नहीं की गई है। सरकार का कहना है कि वे स्वेच्छा से इस कटौती के लिए आगे आ सकते हैं। इससे यह साफ है कि मुइज्जू ने देश के बाकी बड़े पदों पर बैठे लोगों से भी आर्थिक संकट से निपटने के लिए अपनी ओर से योगदान देने का अनुरोध किया है।
मंत्रियों और सरकारी अधिकारियों की बर्खास्तगी
सैलरी कटौती के अलावा, मुइज्जू ने एक और बड़ा कदम उठाया है। कुछ समय पहले उन्होंने खर्चों में कमी लाने के लिए 225 से ज्यादा राजनीतिक नियुक्तियों को रद्द कर दिया था। इसमें 7 राज्य मंत्री, 43 उप मंत्री और 178 राजनीतिक निदेशक शामिल थे। इस कदम से हर महीने लगभग 370,000 डॉलर की बचत होने का अनुमान है। यह फैसला न केवल मुइज्जू की सरकार की आर्थिक तंगी को दिखाता है, बल्कि उनके द्वारा लिए जा रहे सख्त फैसलों का भी प्रमाण है।
हालांकि, इस फैसले से देश के कई अधिकारियों और कर्मचारियों में असंतोष फैल गया है। राजनीतिक नियुक्तियों की बर्खास्तगी ने कई लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा, जिससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ा है। लेकिन मुइज्जू के मुताबिक, यह कदम देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए जरूरी था।
आईएमएफ से मदद न लेने का फैसला
सितंबर में मालदीव सरकार ने यह ऐलान किया था कि वे आईएमएफ (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष) से कोई मदद नहीं लेंगे। मुइज्जू ने यह दावा किया कि देश की वित्तीय परेशानियां केवल अस्थाई हैं और वे जल्द ही स्थिति को नियंत्रण में ले आएंगे। हालाँकि, कई आर्थिक विशेषज्ञ इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं। मालदीव की तंगी के संकेत लंबे समय से दिख रहे थे, और यह कहना कि ये समस्याएँ अस्थाई हैं, कई लोगों के लिए चिंता का विषय है।
आईएमएफ से मदद न लेने का फैसला भी मुइज्जू की उस नीति का हिस्सा माना जा रहा है, जहां वे अपने देश को अंतरराष्ट्रीय मदद पर निर्भर नहीं करना चाहते। लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि मालदीव की मौजूदा हालत में अंतरराष्ट्रीय मदद से ही उन्हें राहत मिल सकती थी। भारत जैसे मित्र देश से दूरी बनाकर चीन का समर्थन लेने के बावजूद, मालदीव को आर्थिक सहायता की आवश्यकता अब भी बनी हुई है।
चीन पर निर्भरता से उठते सवाल
मालदीव ने चीन से नजदीकियां बढ़ाकर जिस तरह भारत से दूरी बनाई, उस पर भी कई सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने मालदीव को सिर्फ अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किया है। चीन का ‘ड्रैगन’ झुकाव मालदीव के लिए कितनी मददगार साबित होगी, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल देश की हालत यह दर्शाती है कि मुइज्जू की रणनीति में कुछ कमी जरूर है।
चीन से मालदीव को अब तक जितनी मदद मिली है, वह पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा, चीन की मदद के साथ आने वाली शर्तें मालदीव के लिए और अधिक बोझिल हो सकती हैं। चीन का “डेब्ट ट्रैप” कूटनीति वाला रवैया पहले ही कई छोटे देशों को भारी पड़ा है। मालदीव की जनता अब इस बात को समझने लगी है कि चीन के साथ नजदीकियां बढ़ाने का मतलब सिर्फ आर्थिक सहयोग नहीं है, बल्कि इसमें उनके देश की स्वतंत्रता और स्वायत्तता का भी हनन हो सकता है।
मालदीव का भविष्य: भारत से फिर दोस्ती की उम्मीद?
मालदीव की मौजूदा स्थिति ने अब कई विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या मुइज्जू फिर से भारत से संबंध सुधारने की कोशिश करेंगे। भारत और मालदीव का संबंध ऐतिहासिक रूप से काफी घनिष्ठ रहा है, और दोनों देशों ने एक-दूसरे का कई बार आर्थिक और सामरिक रूप से सहयोग किया है। अगर मुइज्जू अपने वर्तमान कूटनीतिक रुख पर पुनर्विचार करते हैं और भारत से फिर से नजदीकियां बढ़ाते हैं, तो यह मालदीव के लिए फायदेमंद हो सकता है।
भारत और मालदीव का पर्यटन और व्यापारिक संबंध फिर से बहाल करने पर देश की अर्थव्यवस्था में सुधार आ सकता है। इसके अलावा, भारतीय पर्यटकों और निवेशकों की वापसी से देश में मुद्रा का संकट भी कम हो सकता है। मालदीव के भविष्य की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि मुइज्जू अपनी वर्तमान नीतियों में कितना बदलाव करते हैं।
चीन से दोस्ती और भारत से दूरी—कितना सही फैसला?
मोहम्मद मुइज्जू का भारत से पंगा लेकर चीन के करीब जाना कितना सही फैसला था, इसका जवाब आने वाले समय में मिल पाएगा। फिलहाल, मालदीव की बिगड़ती आर्थिक स्थिति ने मुइज्जू की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सैलरी कटौती, राजनीतिक नियुक्तियों की बर्खास्तगी और आईएमएफ से मदद न लेने का फैसला—ये सभी कदम मालदीव को आर्थिक संकट से निकाल पाएंगे या नहीं, यह देखना बाकी है।
लेकिन इतना जरूर है कि अगर मालदीव भारत से फिर से संबंध सुधारता है, तो उसके पर्यटन उद्योग और अर्थव्यवस्था को नई ताकत मिल सकती है। इस आर्थिक संकट में मुइज्जू की अगुवाई में देश की दिशा किस ओर जाएगी, यह देखने वाली बात होगी।

