Mehbooba Mufti का विवादित बयान: क्या 30 साल से भारत में बसी पाकिस्तानी महिलाओं को भेजना इंसाफ है?
जम्मू-कश्मीर की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री Mehbooba Mufti ने एक बार फिर ऐसा बयान दे दिया है, जिससे सियासी हलकों में खलबली मच गई है। पाकिस्तान से वर्षों पहले आई महिलाओं और उनके परिवारों को भारत से निष्कासित करने के फैसले पर उन्होंने केंद्र सरकार से पुनर्विचार करने की गुजारिश की है।
महबूबा की सोशल मीडिया पर भावुक अपील
महबूबा मुफ्ती ने मंगलवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा,
“हाल ही में भारत से सभी पाकिस्तानी नागरिकों को वापस भेजने के सरकारी निर्देश ने गंभीर मानवीय चिंताएं पैदा की हैं, खास तौर पर जम्मू-कश्मीर में। इससे प्रभावित होने वाली कई महिलाएं हैं, जो 30 से 40 साल पहले भारत आई थीं, भारतीय नागरिकों से विवाह किया, यहां परिवार बसाया और लंबे समय से हमारे समाज का हिस्सा रही हैं।”
उन्होंने सरकार से एक सहानुभूतिपूर्ण नजरिए से इन नागरिकों के भविष्य को देखने की अपील की।
कश्मीर की ‘रिहैबिलिटेशन पॉलिसी’ का जिक्र
Mehbooba Mufti के बयान का एक बड़ा संदर्भ 2010 में लागू की गई उमर अब्दुल्ला की ‘रिहैबिलिटेशन पॉलिसी’ है, जिसके तहत कई पूर्व आतंकवादियों को वापस लाने की योजना बनाई गई थी। इस नीति के अंतर्गत कई पाकिस्तानी महिलाएं, जिन्होंने उन आतंकवादियों से शादी की थी, कश्मीर लौटी थीं। ये महिलाएं अब दशकों से घाटी में रह रही हैं, बच्चों की परवरिश कर रही हैं और पूरी तरह भारतीय समाज में घुलमिल चुकी हैं।
महबूबा ने तर्क दिया कि अब उन्हें अचानक निर्वासित करना न केवल अमानवीय है, बल्कि इससे सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित होगा।
बीजेपी ने दिया तीखा जवाब, देशविरोधी करार दिया बयान
महबूबा मुफ्ती के बयान के बाद भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी के जम्मू-कश्मीर प्रवक्ता गौरव गुप्ता ने कहा:
“महबूबा मुफ्ती का यह बयान आज एक बार फिर उनके दोहरे चरित्र को उजागर करता है। जब पूरा देश आतंकवादियों के खिलाफ सख्ती से खड़ा है, तो ऐसे समय में इस तरह के बयान देना शर्मनाक है। देश आज शोक में है। पहलगाम हमले में हमारे मासूम नागरिक मारे गए, और महबूबा आज उन लोगों की पैरवी कर रही हैं जो पाकिस्तान से आए हैं?”
उन्होंने इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता’ करने के बराबर करार दिया और पूछा कि क्या भारत में अब मानवीयता के नाम पर आतंकवादियों के रिश्तेदारों को शरण दी जाएगी?
पहललगाम हमला: सरकार की सख्ती का कारण
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए भयानक आतंकवादी हमले ने देश को हिला कर रख दिया था। इस हमले में कुल 26 लोग मारे गए थे, जिनमें अधिकांश पर्यटक थे। इसके बाद केंद्र सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ कई सख्त कदम उठाए—
सिंधु जल संधि निलंबित की गई
पाकिस्तानी नागरिकों के लिए सभी वीजा सेवाएं रद्द कर दी गईं
भारत में रह रहे पाकिस्तानी नागरिकों की जांच और निर्वासन की प्रक्रिया शुरू हुई
केंद्र सरकार का तर्क है कि यह कदम सुरक्षा के लिहाज से जरूरी हैं, खासकर जब बार-बार पाकिस्तान की जमीन से भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा हो।
मानवता बनाम राष्ट्रहित: एक पेचीदा बहस
महबूबा मुफ्ती की अपील ने एक बार फिर उस पुरानी बहस को हवा दे दी है, जिसमें मानवाधिकार बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा को तौलने की कोशिश होती है। एक ओर वे महिलाएं हैं जिन्होंने भारतीय पुरुषों से शादी की, यहां के रीति-रिवाज अपनाए, भारतीय बच्चों को जन्म दिया, और दूसरी ओर देश की सुरक्षा का मुद्दा है, जिसमें किसी भी पाकिस्तानी रिश्तेदार पर शंका उठना लाजिमी है।
कश्मीर घाटी में अब तक सैकड़ों ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जहां इन महिलाओं को पहचान के संकट का सामना करना पड़ा है। उनके पास भारतीय नागरिकता नहीं है, न ही पाकिस्तान उन्हें वापिस लेना चाहता है। ऐसे में सरकार के फैसले पर कई मानवाधिकार संगठन भी सवाल उठा रहे हैं।
क्या कहता है कानून?
वर्तमान में इन पाकिस्तानी नागरिकों के पास भारत में स्थायी नागरिकता नहीं है। उन्होंने लंबे समय तक रहने के बावजूद नागरिकता के लिए आवेदन नहीं किया, या किया भी तो कई मामलों में वह स्वीकृत नहीं हुई। गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार, ऐसे सभी विदेशी नागरिक जो भारत में अवैध रूप से रह रहे हैं, उन्हें निर्वासित किया जा सकता है।
परंतु इन मामलों में मानवीय आधार पर निर्णय लेना आसान नहीं है, क्योंकि यहां परिवार, बच्चे, सामाजिक रिश्ता, और दशकों पुरानी ज़िंदगी दांव पर लग जाती है।
राजनीति की नई दिशा या पुराना एजेंडा?
महबूबा मुफ्ती का यह बयान सियासी हलकों में कई तरह के संदेश दे रहा है। क्या यह कश्मीर में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की कोशिश है? या वाकई वह मानवीय दृष्टिकोण से यह मुद्दा उठा रही हैं?
बीजेपी इसे एक साजिश की तरह देख रही है, जबकि पीडीपी इसे ‘इंसानियत का मामला’ बता रही है। आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह मुद्दा घाटी की सियासत को गर्मा सकता है।
निष्कासन की प्रक्रिया शुरू – लोग डरे, सहमे
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक दर्जनों परिवारों को नोटिस भेजे जा चुके हैं। श्रीनगर, बारामुला और पुलवामा जिलों में ऐसे परिवारों की पहचान की जा रही है जो पाकिस्तानी नागरिकता से जुड़े हैं। इन लोगों को 15 से 30 दिन का समय दिया जा रहा है, जिसके बाद निष्कासन की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
मानवता या सुरक्षा – सरकार के सामने असली परीक्षा
महबूबा मुफ्ती का बयान भले ही सियासी हो, लेकिन इसके पीछे छिपा मानवीय पक्ष भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत की छवि एक लोकतांत्रिक और संवेदनशील देश की रही है, परंतु क्या इस बार सुरक्षा का पलड़ा भारी पड़ेगा?
राजनीति, इंसानियत और देशभक्ति की त्रिकोणीय टकराव में उलझा कश्मीर
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि जब राजनीति, मानवता और राष्ट्रभक्ति एक साथ टकराते हैं, तो किसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए? महबूबा मुफ्ती का बयान, भाजपा की निंदा, और केंद्र की सख्ती—ये तीनों एक साथ देश के मानस को प्रभावित कर रहे हैं।
जम्मू-कश्मीर में जहां स्थायित्व की कोशिशें चल रही हैं, वहां ऐसे मुद्दे बार-बार जनता के बीच डर और असमंजस पैदा करते हैं।
क्या आने वाले दिनों में सरकार अपने फैसले में कुछ नरमी लाएगी या सख्ती और बढ़ेगी—यह देखना बाकी है।

