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Nepal Kidney Trafficking Racket: ‘किडनी वाला गांव’ होक्शे से दिल्ली तक फैला अंतरराष्ट्रीय किडनी तस्करी नेटवर्क, सैकड़ों जिंदगियों की कीमत

Nepal kidney trafficking racket की कहानी नेपाल की राजधानी से कुछ किलोमीटर दूर बसे एक छोटे से गांव से शुरू होकर भारत के बड़े महानगरों तक जाती है। यह कहानी सिर्फ अपराध की नहीं, बल्कि गरीबी, धोखे, लालच और सिस्टम की कमजोरियों की है। नेपाल की राजधानी काठमांडू से लगभग 40 किलोमीटर दूर, थाना पांचखाल से महज 3 किलोमीटर की दूरी पर और सैन्य छावनी से सटे एक गांव का नाम है होक्शे। बाहर से यह गांव सामान्य लगता है, लेकिन पूरे नेपाल में इसकी पहचान ‘किडनी वाले गांव’ के रूप में बन चुकी है।


🔴 होक्शे: जहां अंगों की कीमत जान से कम

होक्शे गांव में अब तक 100 से ज्यादा नौजवान अपनी किडनी गंवा चुके हैं। इन युवाओं की किडनी भारत में अवैध रूप से बेची गई। हैरानी की बात यह है कि नेपाली पुलिस ने इस रैकेट के कई सरगनाओं को जेल भेजा, फिर भी यह नेटवर्क खत्म होने के बजाय और फैलता चला गया।

अब यह रैकेट केवल होक्शे तक सीमित नहीं है, बल्कि सिंधुपाल चौक, काभ्रे, सिंधूली, स्यांजा और खुद काठमांडू तक फैल चुका है। जांच एजेंसियों के अनुसार, अब इस रैकेट को सीधे भारतीय तस्कर ऑपरेट कर रहे हैं।


🔴 भारत तक फैला जाल: दिल्ली से चेन्नई तक ऑपरेशन

Nepal kidney trafficking racket के तहत एजेंट्स सीधे गांवों में पहुंचते हैं, गरीबी से जूझ रहे युवाओं को निशाना बनाते हैं और उन्हें नौकरी या बेहतर जिंदगी का सपना दिखाते हैं। फिर इन्हें नई दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता जैसे शहरों में लाया जाता है।

यहां 4 से 5 लाख रुपये में किडनी का सौदा किया जाता है, जबकि पूरा रैकेट 35 से 40 लाख रुपये तक की कमाई करता है। पीड़ित को मामूली रकम थमाकर उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी जाती है।


🔴 जांच में क्या सामने आया: चार्जशीट से खुलासे

भास्कर टीम द्वारा की गई पड़ताल में काठमांडू कोर्ट में दाखिल पहली चार्जशीट का अध्ययन किया गया। इससे पता चला कि इस अंतरराष्ट्रीय किडनी रैकेट के तार सीधे नई दिल्ली से जुड़े हैं। नेपाल के मानव तस्करी रोकथाम ब्यूरो के प्रमुख कृष्णा प्रसाद पांजेनी के मुताबिक हर साल करीब 200 नेपाली नागरिकों की किडनी भारत में तस्करी के जरिए निकाली जा रही है।

नेपाल में किडनी का लेन-देन अपराध है, इसलिए लंबे समय तक न तो तस्करों की सही जानकारी सामने आ पाई और न ही पीड़ित खुलकर बोल सके।


🔴 5 अगस्त 2025: एक पोस्ट जिसने भंडाफोड़ कर दिया

इस रैकेट का पर्दाफाश 5 अगस्त 2025 को हुआ, जब सिंधूली जिले के एक पीड़ित की कहानी एक स्थानीय ब्लॉगर ने सार्वजनिक की। पीड़ित ने बताया कि कैसे उसे दिल्ली ले जाकर उसकी किडनी निकाल ली गई।

इस खुलासे के बाद इंस्पेक्टर रुद्र भट्ट के नेतृत्व में एक विशेष टीम भारत भेजी गई। तीन महीने की जांच के बाद रैकेट का भंडाफोड़ हुआ और मास्टरमाइंड श्याम भंडारी और सूजन गिरी समेत 6 लोगों को गिरफ्तार किया गया।


🔴 तस्करों के चौंकाने वाले कबूलनामे

गिरफ्तार तस्करों ने स्वीकार किया कि वे दिल्ली में रहने वाले रुम्मन कासिम, अरविंद बंगाली और आनंद यादव के संपर्क में थे। अब यही लोग भारत, नेपाल और बांग्लादेश में इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को चला रहे हैं।

चार्जशीट के अनुसार, श्याम भंडारी की रुम्मन और आनंद से मुलाकात 2023 में नोएडा के यथार्थ हॉस्पिटल में हुई थी। यहीं से नेटवर्क को नई मजबूती मिली।


🔴 अस्पताल, लैब और किराए के मकान: पूरा सिस्टम शामिल

चार्जशीट में दिल्ली और कोलकाता के कई मेडिकल संस्थानों के नाम सामने आए हैं, जिनमें क्वाड्रा मेडिकल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड और रवींद्रनाथ टैगोर इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट शामिल हैं। मेडिकल जांच दिल्ली के तिलक नगर की एक लैब में होती थी।

श्याम भंडारी ने लाजपत नगर में कई मकान किराए पर ले रखे थे, जबकि वह खुद पहाड़गंज के एक गेस्ट हाउस में रहता था। पीड़ितों को ऑपरेशन से पहले और बाद में अलग-अलग जगहों पर रखा जाता था ताकि किसी को शक न हो।


🔴 पीड़ित ही बने आरोपी और शिकार

नेपाल पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार 6 तस्करों में से 5 की अपनी किडनी भी पहले इसी तरह निकाली जा चुकी थी। इस केस के सभी पीड़ित दलित समुदाय से हैं। अकेले सूजन गिरी अब तक 25 नेपाली नागरिकों को भारत लाया, जिनमें से 16 की किडनी बेची जा चुकी है।


🔴 किडनी की ‘रेट लिस्ट’: इंसान की कीमत तय

इस रैकेट में हर चीज का दाम तय था:

  • कुल खर्च: 35 से 40 लाख रुपये

  • गांव में रेकी: 5 से 7 हजार

  • बॉर्डर से नई दिल्ली तक लाने का खर्च: 1 से 1.5 लाख

  • 6 महीने का खर्च: 2 लाख

  • किडनी देने वाले को मिलते थे सिर्फ 4 से 5 लाख

  • रैकेट चलाने वालों की कमाई: 25 लाख रुपये तक

यह आंकड़े दिखाते हैं कि कैसे इंसानी शरीर को महज एक सौदे में बदल दिया गया।


Nepal kidney trafficking racket सिर्फ अपराध की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस कड़वी सच्चाई का आईना है, जहां गरीबी सबसे बड़ा हथियार बन जाती है। होक्शे से दिल्ली तक फैला यह नेटवर्क बताता है कि जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त निगरानी और मानवीय संवेदनशीलता नहीं दिखाई जाएगी, तब तक ‘किडनी वाले गांव’ जैसी त्रासदियां जन्म लेती रहेंगी।

 

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