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Nepal बना भारत के भगोड़े अपराधियों का ‘स्वर्ग’: खुली सीमा, ढीली प्रत्यर्पण संधि और कानूनी जटिलताएं देती हैं नया जीवन!

भारत और Nepal के बीच खुली सीमा और कमजोर प्रत्यर्पण संधि ने अपराधियों को एक ऐसा मौका दिया है जिसका दुरुपयोग दशकों से किया जा रहा है। लॉरेंस बिश्नोई गैंग का शूटर जयप्रकाश, अतीक अहमद का बेटा असद, जोगिंदर उर्फ जोगा डॉन जैसे नामचीन अपराधी नेपाल में छिपे पाए गए हैं। ललित उर्फ नेपाली और टमाटर जैसे गैंगस्टर भी नेपाल में पनाह ले चुके हैं।

🔶 भारत-नेपाल खुली सीमा: अपराधियों के लिए सोने की खान

नेपाल और भारत के बीच लगभग 1,751 किलोमीटर की सीमा फैली हुई है। यह उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और सिक्किम से जुड़ी है। उत्तर प्रदेश और बिहार से होकर नेपाल में घुसना इतना आसान है कि अपराधियों को एक चुटकी में फरार होने का रास्ता मिल जाता है। बिना पासपोर्ट और वीजा के आने-जाने की आज़ादी उन्हें वहां पहचान बदलकर रहने की पूरी छूट देती है।

🔶 अपराधी कैसे छुपते हैं नेपाल में?

भारतीय अपराधी नेपाल में वैध व्यवसायी या निवेशक बनकर रहते हैं। वहां के अपराध नेटवर्क उन्हें फर्जी दस्तावेज, ठिकाना, कानूनी सहायता और स्थानीय सहयोग उपलब्ध कराते हैं। नेपाल की जनता और अफसरों से घुलमिलकर ये अपराधी अपने पुराने गुनाहों से एक पर्दा डाल देते हैं और नया नेटवर्क खड़ा कर लेते हैं।

🔶 तकनीकी और रणनीतिक चुनौतियां भारतीय एजेंसियों के सामने

बिहार पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्वीकार किया कि नेपाल भेजी गई पुलिस टीमें हथियार नहीं ले जा सकतीं। साथ ही तकनीकी निगरानी की भी सीमाएं हैं क्योंकि मोबाइल नेटवर्क दोनों देशों में अलग-अलग हैं। जिससे अपराधी तकनीक का फायदा उठाकर पकड़ से दूर रहते हैं।

🔶 प्रत्यर्पण संधि: एक ढीली और पुरानी व्यवस्था

भारत और नेपाल के बीच बनी प्रत्यर्पण संधि 1950 के दशक की है और यह आज के अपराधों की जटिलताओं के सामने बेहद कमजोर साबित होती है। संधि में स्पष्ट दिशा-निर्देश और पारदर्शिता की कमी है। इसके चलते कई बार नेपाल सरकार भारतीय अपराधियों को सौंपने से इनकार कर देती है या प्रक्रिया लंबी खींच जाती है।

🔶 प्रत्यर्पण की लंबी और मुश्किल प्रक्रिया

नेपाल से अपराधी को भारत लाना एक जटिल कानूनी प्रक्रिया से गुजरने जैसा है। पहले इंटरपोल का रेड कॉर्नर नोटिस, फिर नेपाल सरकार से संवाद, फिर वहां की न्यायपालिका की अनुमति – ये सारी प्रक्रिया महीनों खींचती है। और जब तक प्रत्यर्पण होता है, अपराधी या तो फरार हो जाते हैं या पहचान बदल लेते हैं।

🔶 नेपाल में सक्रिय आपराधिक नेटवर्क और उनकी भूमिका

नेपाल में पहले से ही कई अंडरवर्ल्ड नेटवर्क सक्रिय हैं। ये नेटवर्क भारत से भागे अपराधियों को पैसा, सुरक्षा और कानूनी सलाह देते हैं। वहां के छोटे कस्बों, सीमावर्ती गांवों में अपराधियों को कोई शक की निगाह से नहीं देखा जाता। यही कारण है कि वे आराम से वहां की ज़मीन पर पैर जमाकर भारत में अपराध जारी रखते हैं।

🔶 भारत के लिए बढ़ती खतरे की घंटी

नेपाल में अपराधियों की गतिविधियां न केवल भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं, बल्कि ये सीमावर्ती क्षेत्रों में नक्सलवाद, हथियार तस्करी और मानव तस्करी जैसे अन्य अपराधों को भी बढ़ावा दे रही हैं। कई आतंकी संगठन भी अब इसी मॉडल को अपनाकर नेपाल में बेस बनाते हैं।

🔶 नेपाल की उदासीनता और राजनीतिक समीकरण

हाल के वर्षों में भारत-नेपाल संबंधों में तनाव के चलते प्रत्यर्पण मामलों में सहयोग की कमी साफ दिखाई देती है। नेपाली प्रशासन राजनीतिक दबाव या भारत से खटास के कारण कई बार सहयोग नहीं करता। इससे अपराधियों का मनोबल और भी बढ़ जाता है।

🔶 क्या है समाधान?

  • नई प्रत्यर्पण संधि: भारत को नेपाल के साथ एक आधुनिक, तेज़ और प्रभावी प्रत्यर्पण संधि करनी होगी जो आज के डिजिटल और सीमा पार अपराधों को ध्यान में रखते हुए बनाई जाए।

  • सीमा नियंत्रण: खुली सीमा के बावजूद सीमाई क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई जाए। ड्रोन, फेस रिकग्निशन और बायोमेट्रिक सिस्टम लगाए जाएं।

  • सीमावर्ती अपराध नेटवर्क पर सख्ती: नेपाल में पनप रहे इन नेटवर्कों की जानकारी जुटाकर भारत-नेपाल के साझा प्रयासों से उन्हें ध्वस्त किया जाए।

🔶 नेपाल से भागकर आए या पकड़े गए कुछ चर्चित अपराधी

  • अतीक अहमद का बेटा असद: उत्तर प्रदेश के इस माफिया परिवार का सदस्य एनकाउंटर में मारा गया, लेकिन उससे पहले नेपाल में छिपने की पूरी योजना थी।

  • जयप्रकाश (लॉरेंस बिश्नोई गैंग का शूटर): कई बड़े केसों में नाम शामिल और नेपाल में पनाह लेने की कोशिश।

  • ललित उर्फ नेपाली: जिसका नाम कई गैंगवार में आया और नेपाल को अपनी शरणस्थली बना रखा था।

  • मनोज साहनी उर्फ टमाटर: बिहार के कुख्यात गैंगस्टर ने नेपाल में कई बार शरण ली।

🔶 भारत-नेपाल सीमा पर सुरक्षा की वर्तमान स्थिति

सीमा पर कुल 26 मुख्य और अंतर-जिला चेक पोस्ट हैं। सुनौली और रुपैडिहा जैसे एकीकृत चेक पोस्ट भी हैं। फिर भी ये नियंत्रण पर्याप्त नहीं साबित हो रहे हैं क्योंकि ज़मीनी हकीकत यह है कि बहुत से चेक पोस्ट केवल नाम के लिए हैं और वहां निगरानी बेहद कमजोर है।


नेपाल भारतीय अपराधियों के लिए महज़ एक ‘सेफ हाउस’ नहीं, बल्कि एक ऑपरेशनल बेस बन चुका है। यह गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि जब तक भारत और नेपाल इस पर सामूहिक, ठोस और पारदर्शी नीति नहीं बनाते, तब तक यह समस्या और गहराती जाएगी। अपराधियों को अब केवल जेल की नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पकड़ की ज़रूरत है – ताकि वे किसी भी सीमा के पार जाकर कानून से न बच सकें।

 

News-Desk

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