Pakistan मदरसों में AI पर ‘फतवा’: जैश-लश्कर को ChatGPT से डर, 12 लाख छात्रों को टेक्नोलॉजी से दूर रखने का आदेश
Pakistan madrasas AI ban की खबर ने कट्टरपंथी संगठनों और आधुनिक तकनीक के बीच टकराव को एक बार फिर उजागर कर दिया है। पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा ने अपने नेटवर्क से जुड़े करीब पांच हजार मदरसों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स के उपयोग पर फतवा जारी कर दिया है। इन मदरसों में लगभग 12 लाख छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, जिन पर अब डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल पर सख्त पाबंदी लगा दी गई है।
🔴 AI टूल्स से क्यों घबराए आतंकी संगठन
सूत्रों के अनुसार, ChatGPT, Gemini, Grok और अन्य AI आधारित प्लेटफॉर्म्स मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे। छात्र इन टूल्स के माध्यम से इस्लाम और धार्मिक विषयों से जुड़े सवाल पूछ रहे थे। समस्या तब खड़ी हुई जब इन AI टूल्स ने धर्म से जुड़े कई सवालों के ऐसे उत्तर दिए, जिन्हें जैश और लश्कर के कट्टरपंथी मौलवी “उदारवादी” और “असुविधाजनक” मान रहे थे।
AI टूल्स डेटा-आधारित व्याख्या करते हैं, जो कई बार मदरसों में पढ़ाई जा रही कट्टर व्याख्याओं से मेल नहीं खाती। यही कारण है कि Pakistan madrasas AI ban को कट्टरपंथी विचारधारा की रक्षा के तौर पर देखा जा रहा है।
🔴 नया फरमान: मोबाइल पर AI पूरी तरह प्रतिबंधित
जैश और लश्कर द्वारा जारी आदेश में छात्रों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे धर्म से जुड़े सवाल केवल कक्षा में मौलवियों से व्यक्तिगत रूप से पूछें। मोबाइल फोन पर किसी भी प्रकार के AI टूल का उपयोग प्रतिबंधित कर दिया गया है। आदेश में यह भी कहा गया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स “धार्मिक मूल्यों को भ्रमित” कर रहे हैं।
यह फरमान मदरसों में पढ़ने वाले लाखों छात्रों की सोच और सीखने की प्रक्रिया को एक बार फिर सीमित दायरे में बांधने की कोशिश माना जा रहा है।
🔴 पाकिस्तान में मदरसों की भूमिका और ढांचा
Pakistan madrasas AI ban की पृष्ठभूमि समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि पाकिस्तान में प्राथमिक और धार्मिक शिक्षा का बड़ा हिस्सा मदरसों पर निर्भर है। देवबंदी सिलसिले से जुड़े जैश-लश्कर के ये मदरसे आसपास की मस्जिदों और विदेशी चंदे से मिलने वाले फंड से संचालित होते हैं।
औपचारिक रूप से पाकिस्तान में मदरसा बोर्ड और वक्फ बोर्ड मौजूद हैं, लेकिन वास्तविक नियंत्रण कहीं और है।
🔴 नियंत्रण की असली कमान किसके हाथ में
हालांकि कागजों में मदरसों की निगरानी बोर्डों के पास बताई जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन संस्थानों की असल कमान पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के हाथों में रहती है। पाठ्यक्रम, शिक्षकों की नियुक्ति और छात्रों की गतिविधियों पर अप्रत्यक्ष निगरानी की जाती है।
यही कारण है कि कई मदरसों को वैचारिक प्रशिक्षण केंद्र के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
🔴 ब्रेनवॉश और आतंकी रंगरूट तैयार करने का आरोप
खुफिया सूत्रों के अनुसार, कुछ मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को धीरे-धीरे कट्टरपंथी विचारधारा की ओर मोड़ा जाता है। बाद में इन्हीं छात्रों में से कुछ को भारत विरोधी आतंकी गतिविधियों के लिए तैयार किया जाता है।
विशेष रूप से मुज़फ्फराबाद और नीलम घाटी जैसे क्षेत्रों से जैश इन छात्रों को प्रशिक्षण देकर सीमा पार लॉन्च करता रहा है।
🔴 खाड़ी देशों में उलट तस्वीर
Pakistan madrasas AI ban के ठीक विपरीत, सऊदी अरब और खाड़ी के अन्य इस्लामी देशों में धार्मिक शिक्षा के लिए AI टूल्स का सक्रिय उपयोग किया जा रहा है। वहां इस्लामिक यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों ने अपने स्तर पर ऐसे सॉफ्टवेयर विकसित किए हैं, जो कुरान और हदीस की प्रमाणिक, संतुलित और आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत करते हैं।
यह अंतर बताता है कि समस्या तकनीक नहीं, बल्कि विचारधारा है।
🔴 ऑपरेशन सिंदूर और बहावलपुर मदरसे की कहानी
सूत्रों के मुताबिक, भारतीय सैन्य कार्रवाई ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जैश के बहावलपुर स्थित मुख्यालय मदरसे को भारी नुकसान पहुंचा था। जनवरी में मरम्मत पूरी होने के बाद वहां छात्रों की वापसी हो चुकी है और नियमित कक्षाएं फिर से शुरू कर दी गई हैं।
इस मदरसे के पुनर्निर्माण के लिए पाक सरकार और सेना द्वारा फंड जारी किए जाने की भी जानकारी सामने आई है।
🔴 मसूद अजहर की गतिविधियां फिर सुर्खियों में
खुफिया सूत्रों का दावा है कि जैश का सरगना मसूद अजहर इन दिनों रावलपिंडी स्थित आईएसआई के एक सुरक्षित ठिकाने से निकलकर बहावलपुर मदरसे में रह रहा है। यह जानकारी एक बार फिर पाकिस्तान के आतंकी ढांचे और राज्य संरचनाओं के बीच कथित संबंधों पर सवाल खड़े करती है।
🔴 तकनीक बनाम कट्टरता की खुली जंग
Pakistan madrasas AI ban केवल एक तकनीकी प्रतिबंध नहीं, बल्कि विचारों की जंग का प्रतीक है। एक ओर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथ्य, डेटा और संतुलित व्याख्या पर आधारित ज्ञान दे रहा है, वहीं दूसरी ओर कट्टरपंथी संगठन अपने नैरेटिव को बनाए रखने के लिए तकनीक से दूरी बना रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रतिबंध लंबे समय तक युवाओं को आधुनिक सोच से दूर रखने की एक रणनीति है।

