आम बजट पर Rakesh Tikait का तीखा वार: ‘कागजों में चमक, ज़मीन पर सन्नाटा’, किसानों ने बताया उद्योगपतियों का बजट
News-Desk
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Bharatiya Kisan Union, farmers protest, MSP law, Muzaffarnagar News, PM Kisan, rakesh tikait, Rural Economy, Union Budget IndiaRakesh Tikait budget reaction ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान बहुल इलाकों में एक बार फिर बहस और नाराज़गी की लहर तेज कर दी है। मुजफ्फरनगर में भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने आम बजट पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे “किसान विरोधी” करार दिया और कहा कि यह बजट बड़े उद्योगपतियों और व्यापारियों के लिए राहत भरा है, जबकि गांव और खेतों में इसकी गूंज बहुत कमजोर दिखाई देती है।
बजट पेश होने के बाद मुजफ्फरनगर और आसपास के ग्रामीण इलाकों में किसानों के बीच चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। टिकैत के बयान ने उन उम्मीदों को आवाज दी, जो गांवों में बजट से जुड़ी थीं—कर्ज, फसल समर्थन मूल्य, पशु चारा और शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों को लेकर।
🔴 ‘उम्मीद बहुत थी, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं’
राकेश टिकैत ने कहा कि गांव के लोग इस बजट से बड़ी आस लगाए बैठे थे। किसानों को उम्मीद थी कि इस बार कर्ज राहत, फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी और किसान सम्मान निधि में बढ़ोतरी जैसे मुद्दों पर ठोस कदम उठाए जाएंगे।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा,
“दिल्ली के कागजों में यह बजट अच्छा लगेगा, लेकिन धरातल पर कितना उतरेगा, यह देखने वाली बात है।”
🔴 MSP गारंटी कानून पर चुप्पी का आरोप
किसान नेता ने सबसे बड़ा सवाल MSP गारंटी कानून को लेकर उठाया। उन्होंने कहा कि फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप देने की मांग लंबे समय से उठाई जा रही है, लेकिन बजट में इस पर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की गई।
टिकैत के मुताबिक, MSP सिर्फ एक आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि किसानों की सुरक्षा कवच है। बिना कानूनी गारंटी के बाजार में किसानों की स्थिति कमजोर बनी रहती है।
🔴 किसान सम्मान निधि: ‘12,000 होनी चाहिए थी’
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत मिलने वाली राशि पर भी टिकैत ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मौजूदा महंगाई और खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए यह राशि बढ़ाकर कम से कम 12,000 रुपये सालाना की जानी चाहिए थी।
उनका कहना था कि बीज, खाद, डीजल और कीटनाशकों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, ऐसे में मौजूदा सहायता किसानों के लिए नाकाफी साबित हो रही है।
🔴 हिल स्टेट फसलों पर शंका
बजट में पहाड़ी राज्यों की फसलों जैसे अखरोट और चंदन का जिक्र होने पर टिकैत ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि अब देखना होगा कि इससे वास्तव में किसानों को कितना लाभ मिलता है। उनका कहना था कि घोषणाएं तो बहुत होती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पहुंचते-पहुंचते उनका असर अक्सर फीका पड़ जाता है।
🔴 शिक्षा पर चिंता: सरकारी स्कूलों का भविष्य
टिकैत ने बजट में प्राइवेट स्कूलों से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि अगर निजी शिक्षा को बढ़ावा दिया जाएगा, तो सरकारी स्कूलों का क्या होगा?
उनके मुताबिक, गांवों में रहने वाले गरीब परिवारों के बच्चे मुख्य रूप से सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। अगर इन स्कूलों की स्थिति कमजोर होती है, तो इसका सीधा नुकसान ग्रामीण समाज को होगा।
🔴 पशु चारे की कीमतों पर नाराजगी
पशुपालन किसानों की आय का एक बड़ा हिस्सा है। टिकैत ने कहा कि बजट में पशु चारे की कीमतें कम करने को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
उन्होंने कहा कि दूध उत्पादन, गोपालन और खेती से जुड़े किसानों के लिए चारा सस्ता होना बेहद जरूरी है, ताकि उनकी लागत कम हो सके और आमदनी बढ़े।
🔴 ‘यह बजट किसानों का नहीं, उद्योगपतियों का है’
अपने बयान के सबसे तीखे हिस्से में टिकैत ने कहा कि यह बजट किसानों का नहीं, बल्कि बड़े उद्योगपतियों और व्यापारियों का बजट है। उनका आरोप है कि आर्थिक नीतियां गांव और खेत की बजाय शहरों और कारखानों के इर्द-गिर्द घूम रही हैं।
उनका कहना था कि अगर देश की आधी से ज्यादा आबादी खेती पर निर्भर है, तो बजट का केंद्र भी किसान ही होना चाहिए।
🔴 किसानों की जमीनी प्रतिक्रिया
मुजफ्फरनगर और आसपास के गांवों में किसानों से बातचीत करने पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ किसानों ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि इस बार कर्ज माफी या ब्याज में राहत जैसे कदम उठाए जाएंगे।
वहीं, कुछ किसानों ने बजट को “घोषणाओं का पुलिंदा” बताते हुए कहा कि असली परीक्षा तब होगी, जब योजनाएं गांवों तक पहुंचेंगी।
🔴 सरकार का पक्ष और आर्थिक दृष्टिकोण
सरकार की ओर से बजट को विकासोन्मुख और समावेशी बताया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि इंफ्रास्ट्रक्चर, उद्योग और निवेश पर जोर देकर रोजगार के नए अवसर पैदा किए जाएंगे, जिससे अंततः ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिलेगा।
हालांकि, किसान संगठनों का कहना है कि जब तक सीधा और त्वरित लाभ खेतों तक नहीं पहुंचेगा, तब तक ऐसे दावे अधूरे रहेंगे।
🔴 किसान संगठनों की अगली रणनीति
भारतीय किसान यूनियन और अन्य किसान संगठनों ने संकेत दिए हैं कि वे बजट के प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद आगे की रणनीति तय करेंगे। जरूरत पड़ी तो आंदोलन और प्रदर्शन का रास्ता भी अपनाया जा सकता है।
टिकैत ने कहा कि किसानों की मांगें किसी एक बजट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह उनकी आजीविका और भविष्य से जुड़ा सवाल है।
🔴 ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि बजट का असर धीरे-धीरे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखाई देगा। सड़क, बिजली, डिजिटल कनेक्टिविटी और कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश से दीर्घकाल में फायदा हो सकता है, लेकिन तात्कालिक राहत की कमी किसानों की नाराजगी का कारण बन रही है।
🔴 राजनीतिक हलचल और विपक्ष की प्रतिक्रिया
टिकैत के बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में भी हलचल तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने बजट को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं और किसान संगठनों की मांगों का समर्थन किया है।
आने वाले दिनों में संसद से लेकर सड़कों तक बजट पर बहस और विरोध का सिलसिला जारी रहने की संभावना है।

