‘शरबत जिहाद’ से मचा बवाल! Baba Ramdev की टिप्पणी पर दिल्ली हाईकोर्ट का सख्त रुख – हमदर्द की याचिका से गरमाया मामला
नई दिल्ली – Baba Ramdev एक बार फिर अपने विवादित बयान को लेकर सुर्खियों में हैं। इस बार मामला उनके द्वारा दिए गए उस बयान से जुड़ा है जिसमें उन्होंने रूह अफजा जैसे पारंपरिक पेय को ‘शरबत जिहाद’ कहकर निशाने पर लिया। यह बयान तब आया जब उन्होंने पतंजलि का नया गुलाब शरबत लॉन्च किया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को इस बयान पर कड़ी आपत्ति जताई और साफ शब्दों में कहा कि “ऐसी टिप्पणी स्वीकार नहीं की जा सकती।” हाईकोर्ट का यह बयान उस याचिका के तहत आया जो प्रसिद्ध यूनानी कंपनी हमदर्द लैबोरेट्रीज (इंडिया) ने दायर की थी।
🧨 रामदेव की टिप्पणी: निशाने पर ‘शरबत’, गूंजा ‘जिहाद’ का जिक्र
Baba Ramdev ने कहा था, “एक कंपनी है जो आपको शरबत देती है, लेकिन उससे कमाई गई रकम मदरसे और मस्जिद बनाने में लगाई जाती है।” उन्होंने भले ही हमदर्द या रूह अफजा का नाम नहीं लिया, लेकिन संदर्भ और समय को देखते हुए सभी की नजरें सीधे उसी कंपनी की ओर गईं।
उन्होंने आगे कहा, “यदि आप वो शरबत पीते हैं, तो मदरसे और मस्जिदें बनेंगी, लेकिन यदि आप पतंजलि का शरबत पीते हैं, तो गुरुकुल बनेंगे, आचार्यकुलम का विकास होगा, पतंजलि यूनिवर्सिटी आगे बढ़ेगी और भारतीय शिक्षा पद्धति को मजबूती मिलेगी।”
इसी बयान को लेकर हमदर्द ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
⚖️ कोर्ट की सख्ती और मुकुल रोहतगी का तर्क
मंगलवार को जब इस याचिका पर सुनवाई हुई, तो हमदर्द की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि यह मामला सिर्फ बदनामी का नहीं है, बल्कि सामाजिक विभाजन और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने वाला है।
उनका कहना था, “यह टिप्पणी केवल मानहानि नहीं है, यह हेट स्पीच के दायरे में आती है। यह सांप्रदायिक आधार पर लोगों को भड़काने की कोशिश है।”
हाईकोर्ट ने भी इस पर सहमति जताते हुए कहा कि धार्मिक आधार पर इस तरह की टिप्पणियां निंदनीय हैं और समाज में जहर घोलने का काम करती हैं।
🔥 ‘शरबत जिहाद’ – क्या है यह शब्द और क्यों है खतरनाक?
बाबा रामदेव ने इस संदर्भ में जो सबसे विवादास्पद शब्द कहा, वह था – “शरबत जिहाद”। यह शब्द ‘लव जिहाद’ की तर्ज पर गढ़ा गया प्रतीत होता है, जो पहले से ही देश में विवाद का विषय रहा है।
उनका कहना था, “जैसे लव जिहाद होता है, वैसे ही यह शरबत जिहाद है। इस शरबत जिहाद से बचने के लिए लोगों को जागरूक होना होगा।”
यह शब्दावली कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के गले नहीं उतरी और इसे भारत की सांप्रदायिक एकता के लिए खतरनाक बताया गया।
🧪 हमदर्द की विरासत और रूह अफजा का इतिहास
हमदर्द एक प्रतिष्ठित यूनानी चिकित्सा उत्पादक कंपनी है जिसकी स्थापना 1906 में हुई थी। इसका मुख्य उत्पाद रूह अफजा दशकों से भारतीय घरों की रसोई का अभिन्न हिस्सा रहा है। चाहे रमजान का समय हो या गर्मियों की दोपहर – यह पेय घर-घर में लोकप्रिय है।
हमदर्द ट्रस्ट के माध्यम से कंपनी सामाजिक और स्वास्थ्य सेवाओं में भी सक्रिय रही है। ऐसे में बाबा रामदेव का यह दावा कि उनके शरबत का पैसा “गुरुकुल और आचार्यकुलम” में लगेगा जबकि अन्य शरबत से “मदरसों और मस्जिदों” को सहायता मिलती है – एक सीधा धार्मिक विभाजन दर्शाने वाला बयान माना जा रहा है।
🕵️♂️ राजनीतिक रंग और सोशल मीडिया पर बवाल
रामदेव की टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया दो धड़ों में बंट गया। एक ओर उनके समर्थक इसे ‘सच्चाई की आवाज’ बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विरोधियों ने इसे ‘घृणा फैलाने की कोशिश’ करार दिया है।
ट्विटर (अब X) पर #SharbatJihad ट्रेंड करने लगा। कई यूजर्स ने बाबा रामदेव से सार्वजनिक माफी की मांग की, जबकि कुछ ने यह मुद्दा चुनावी साजिश से जोड़ दिया।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया भी सामने आने लगी है। कुछ दलों ने इस बयान की जांच कराने की मांग की है, जबकि अन्य ने कहा कि बाबा रामदेव को अपने ‘योगगुरु’ की छवि से बाहर निकलकर ‘राजनीतिक एजेंडा’ से बचना चाहिए।
🧑⚖️ अगला कदम: कानूनी लड़ाई लंबी चलेगी?
कानूनविदों का मानना है कि यह केस अब मानहानि, साम्प्रदायिकता फैलाने और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में दुर्भावना फैलाने जैसे कई कानूनी आयामों को छूता है। यदि कोर्ट रामदेव को नोटिस जारी करता है और ट्रायल आगे बढ़ता है, तो यह केस आने वाले महीनों में एक बड़ी कानूनी मिसाल बन सकता है।
उधर, पतंजलि की ओर से अभी तक इस विवाद पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। रामदेव खुद मीडिया से दूर नजर आ रहे हैं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि वह अपने बयान पर अडिग हैं।
📢 निष्पक्षता बनाम बयानबाज़ी – भारतीय समाज के लिए एक सवाल
बाबा रामदेव जैसे सार्वजनिक और प्रभावशाली व्यक्तित्व से ऐसी भाषा और बयानबाज़ी की उम्मीद कम ही की जाती है। योग और आयुर्वेद को दुनियाभर में फैलाने वाले इस व्यक्ति के जुबानी तेवर जब सामाजिक समरसता को ठेस पहुंचाएं, तो बहस स्वाभाविक है।
यह विवाद केवल एक शरबत तक सीमित नहीं है। यह उस मानसिकता और बयानबाज़ी पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है, जिसमें धार्मिक पहचान को बाज़ार और ब्रांड की राजनीति से जोड़ा जाने लगा है।
👉 यह मामला अब सिर्फ कोर्ट की चारदीवारी तक सीमित नहीं, बल्कि देश की सांप्रदायिक चेतना, भाषाई मर्यादा और बाज़ार की नैतिकता का परीक्षण भी है।

