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टैरिफ बनाम कोर्ट: Trump का पलटवार, 10% से 15% ग्लोबल टैरिफ, सुप्रीम कोर्ट से टकराव के बाद अमेरिका में सियासी उबाल

Trump global tariff एक बार फिर दुनिया की अर्थव्यवस्था और अमेरिकी लोकतंत्र—दोनों के केंद्र में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को बड़ा ऐलान करते हुए कहा कि अब दुनियाभर के देशों पर 10% नहीं बल्कि 15% ग्लोबल टैरिफ लगाया जाएगा। यह फैसला ऐसे वक्त में आया है, जब अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने उनके पुराने टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था।

इस फैसले ने न केवल वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है, बल्कि अमेरिका के भीतर यह बहस भी तेज कर दी है कि क्या राष्ट्रपति अदालतों से ऊपर खुद को मानने लगे हैं।


🔴 सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ट्रम्प का सीधा जवाब

शुक्रवार को US Supreme Court ने 6–3 के बहुमत से ट्रम्प प्रशासन द्वारा लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने साफ कहा कि इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का इस्तेमाल कर टैरिफ लगाना राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। टैक्स और टैरिफ तय करना कांग्रेस का विशेषाधिकार है।

इस फैसले के महज तीन घंटे बाद ट्रम्प ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नाराजगी जाहिर की और जजों पर तीखा हमला बोला। इसके अगले ही दिन उन्होंने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट कर 15% ग्लोबल टैरिफ का ऐलान कर दिया।


🔴 सेक्शन 122: कानून का सहारा या कानूनी चतुराई?

ट्रम्प ने नया टैरिफ लगाने के लिए ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 122 का इस्तेमाल किया है। यह कानून राष्ट्रपति को अस्थायी रूप से आयात पर टैरिफ लगाने की इजाजत देता है, लेकिन सिर्फ 150 दिनों के लिए। इसके बाद कांग्रेस की मंजूरी जरूरी होती है।

इस कानून के तहत अधिकतम 15% तक ही टैरिफ लगाया जा सकता है—और ट्रम्प ने सीधे उसी सीमा को छू लिया। 24 फरवरी से यह टैरिफ लागू हो जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला ट्रम्प की आर्थिक नीति से ज्यादा उनकी राजनीतिक मानसिकता को दर्शाता है—जहां वे अदालत की हार को स्वीकार करने के बजाय सिस्टम के भीतर दूसरा रास्ता खोज लेते हैं।


🔴 ट्रम्प का गुस्सा: “कुछ जज देश के लिए शर्म हैं”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आहत ट्रम्प ने खुलेआम जजों की आलोचना करते हुए कहा कि उन्हें कुछ जजों पर शर्म आती है। उनके मुताबिक अदालतें देश के लिए जरूरी फैसले लेने की हिम्मत नहीं दिखा रहीं।

यह बयान अमेरिका की संवैधानिक परंपराओं में असामान्य माना जा रहा है, क्योंकि यहां न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का मजबूत स्तंभ माना जाता है।


🔴 भारत के साथ ट्रेड डील पर ट्रम्प का संदेश

ग्लोबल टैरिफ के बीच ट्रम्प ने भारत को लेकर अलग रुख दिखाया। उन्होंने कहा कि भारत के साथ ट्रेड डील में कोई बदलाव नहीं होगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना अच्छा दोस्त बताया।

हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि 15% ग्लोबल टैरिफ का अप्रत्यक्ष असर भारत सहित सभी व्यापारिक साझेदारों पर पड़ेगा।


🔴 किन प्रोडक्ट्स को मिली राहत

ट्रम्प प्रशासन ने यह भी साफ किया कि कुछ जरूरी वस्तुओं को टैरिफ से छूट दी गई है। इनमें चुनिंदा कृषि उत्पाद, महत्वपूर्ण खनिज, दवाइयां, कुछ इलेक्ट्रॉनिक आइटम और पैसेंजर वाहन शामिल हैं।

NBC News के मुताबिक, एक समान 15% टैरिफ लागू होने से उन देशों पर बोझ कुछ हद तक कम होगा, जिन पर पहले ज्यादा टैरिफ लगाए गए थे।


🔴 इतिहास की गूंज: निक्सन का 1971 वाला फैसला

यह पहला मौका नहीं है जब अमेरिका ने ग्लोबल टैरिफ लगाया हो। 1971 में तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 10% ग्लोबल टैरिफ लगाया था। उसी अनुभव के बाद 1974 में ट्रेड एक्ट पास किया गया था, ताकि भविष्य में आर्थिक आपात स्थिति से निपटने के लिए राष्ट्रपति को सीमित अधिकार मिल सकें।

New York Times के मुताबिक सेक्शन 122 का यह पहला बड़ा इस्तेमाल है, इसलिए अदालतें आगे इसकी व्याख्या कैसे करेंगी, यह साफ नहीं है।


🔴 कोर्ट की फटकार: “हर देश से युद्ध की स्थिति नहीं”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि अमेरिका दुनिया के हर देश के साथ युद्ध जैसी स्थिति में नहीं है। कोर्ट ने माना कि टैरिफ टैक्स की तरह हैं और इन्हें लगाने का अधिकार संसद के पास है।

हालांकि तीन जज—सैमुअल एलिटो, क्लेरेंस थॉमस और ब्रेट कैवनॉ—ने असहमति जताई। कैवनॉ ने अपने नोट में भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर लगाए गए टैरिफ का जिक्र करते हुए कहा कि ये फैसले राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे।


🔴 200 अरब डॉलर का सवाल: रिफंड होगा या नहीं?

रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रम्प प्रशासन ने अब तक टैरिफ के जरिए 200 अरब डॉलर से ज्यादा वसूले हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह पैसा कंपनियों को लौटाया जाएगा।

ट्रम्प सरकार पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि रिफंड की स्थिति में अमेरिकी खजाने को बड़ा झटका लग सकता है।


🔴 अमेरिका में क्या चल रहा है? ट्रम्प पागल हो रहे हैं या सिस्टम को चुनौती दे रहे हैं?

अमेरिका में इस वक्त असली बहस टैरिफ से ज्यादा सत्ता संतुलन को लेकर है। आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि क्या ट्रम्प खुद को अदालतों और कांग्रेस से ऊपर मानने लगे हैं, जबकि समर्थक इसे “मजबूत नेतृत्व” और “अमेरिका फर्स्ट” नीति का हिस्सा बता रहे हैं।

ट्रम्प का हर कदम यह संकेत देता है कि आने वाले दिनों में अमेरिका में न्यायपालिका, संसद और राष्ट्रपति—तीनों के बीच टकराव और गहरा हो सकता है।


ट्रम्प का 15% ग्लोबल टैरिफ केवल आर्थिक फैसला नहीं, बल्कि अमेरिकी लोकतंत्र की सीमाओं की परीक्षा बन चुका है। अदालत बनाम राष्ट्रपति की इस जंग का असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा—इसकी गूंज दुनिया के हर बाजार और हर देश की राजनीति में सुनाई देगी।

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