उत्तर प्रदेश

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में High Court Bench की मांग फिर गरमाई: संसद में बिजनौर के सांसद चंदन चौहान ने 1981 से लंबित मुद्दे को जोरदार अंदाज़ में उठाया

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में High Court bench की स्थापना को लेकर वर्षों से चल रही बहस एक बार फिर तेज़ हो गई है। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान बिजनौर से सांसद चंदन चौहान ने यह पुराना और बेहद संवेदनशील मुद्दा फिर से मजबूती के साथ उठाया। उन्होंने सदन में स्पष्ट कहा कि “1981 से अधिवक्ता लगातार संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन आज तक पश्चिम उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की स्थापना नहीं हो पाई है, जिससे लाखों लोगों को न्याय पाने में अनावश्यक देरी और परेशानी का सामना करना पड़ता है।”

यह बयान आते ही इस लंबे समय से लंबित मांग ने राजनीतिक और विधिक गलियारों में फिर से गर्माहट पैदा कर दी।


अधिवक्ताओं का 26 नवंबर का घेराव—सांसदों पर दबाव बढ़ाने की रणनीति

सांसद चंदन चौहान ने सदन में यह भी बताया कि 26 नवंबर को बार एसोसिएशन के अधिवक्ताओं ने सभी सांसदों का घेराव किया था, जिसमें उन्होंने हाई कोर्ट बेंच की मांग को तत्काल लागू करने का दबाव बनाया।
अधिवक्ताओं का कहना है कि—

  • न्याय की पहुँच इतनी कठिन नहीं होनी चाहिए

  • 1981 से लगातार अनशन, मार्च, ज्ञापन और विरोध होते आ रहे हैं

  • पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 14 से अधिक ज़िलों को मात्र एक हाई कोर्ट से सेवा मिलना अव्यवहारिक है

घेराव के बाद अधिवक्ताओं ने स्पष्ट किया कि जब तक हाई कोर्ट बेंच के गठन की औपचारिक घोषणा नहीं होती, उनका आंदोलन और अधिक तेज़ होगा।


पश्चिमी यूपी की भौगोलिक चुनौती—700 किमी दूर प्रयागराज हाई कोर्ट, लोगों के लिए भारी परेशानी

सांसद चंदन चौहान ने संसद में एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य रखा—
प्रयागराज हाई कोर्ट यहाँ से लगभग 700 किमी दूर स्थित है, और इतने लंबे सफर के बाद किसी साधारण व्यक्ति के लिए न्याय प्राप्त करना अत्यंत मुश्किल हो जाता है।

उन्होंने कहा कि हैरानी की बात यह है कि—

  • लाहौर हाई कोर्ट (जो अब भारत की सीमा में नहीं है) भी यहाँ से ज्यादा निकट पड़ता है

  • दिल्ली हाई कोर्ट भी कई जिलों से प्रयागराज की तुलना में अधिक नज़दीक है

  • न्याय तक पहुँच संविधान का मौलिक अधिकार है, और दूरी इस अधिकार में बाधा नहीं बननी चाहिए

पश्चिम उत्तर प्रदेश के ज़िलों—बिजनौर, मेरठ, मुज़फ्फरनगर, सहारनपुर, बागपत, शामली, मुरादाबाद आदि—के लाखों लोगों को हर साल हजारों मामलों में प्रयागराज तक जाना पड़ता है।
यही कारण है कि High Court bench West UP का मुद्दा सिर्फ वकीलों का नहीं, बल्कि पूरे समाज की न्यायिक सुविधा से जुड़ा हुआ है।


1981 से अब तक: संघर्ष का लंबा सफ़र, विरोध–प्रदर्शन की अनगिनत कड़ियाँ

सांसद द्वारा उठाया गया यह मुद्दा अचानक नहीं आया, बल्कि इसका इतिहास 40 से भी अधिक वर्ष पुराना है।
1981 में पहली बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिवक्ताओं ने हाई कोर्ट बेंच की मांग को लेकर औपचारिक आंदोलन शुरू किया था।
तब से—

  • मेरठ, मुज़फ्फरनगर और बिजनौर बार एसोसिएशन ने कई संयुक्त आंदोलन चलाए

  • समय-समय पर दिल्ली में भी विरोध दर्ज कराए गए

  • कई बार सांसदों और विधायकों को ज्ञापन सौंपे गए

  • सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार से भी विभिन्न स्तरों पर माँग रखी गई

लेकिन अब जब संसद के भीतर यह मुद्दा फिर से प्रमुखता के साथ उठाया गया है, अधिवक्ताओं को उम्मीद है कि यह संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच सकता है।


कानूनी विशेषज्ञों की राय—हाई कोर्ट बेंच पश्चिम यूपी की न्यायिक बोझ को कम करेगी

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिमी यूपी में जनसंख्या और मुकदमों का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
यहाँ के जिलों से हर साल बड़ी संख्या में मामले प्रयागराज भेजे जाते हैं।
यदि High Court bench West UP की स्थापना होती है, तो—

  • मुकदमों के निस्तारण की गति बढ़ जाएगी

  • वकीलों और आम नागरिकों का आर्थिक बोझ बेहद कम होगा

  • न्याय तक पहुँच तेजी से और सहज रूप में संभव होगी

  • न्यायिक सुविधा विकेंद्रित होगी

  • स्थानीय स्तर पर कानूनी ढांचे की मजबूती बढ़ेगी

वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी कहा कि पश्चिम यूपी देश के सबसे आर्थिक और औद्योगिक रूप से सक्रिय क्षेत्रों में से एक है, ऐसे में एक हाई कोर्ट बेंच का होना तार्किक और आवश्यक दोनों है।


सांसद चंदन चौहान की दृढ़ता—सरकार को दी स्पष्ट सलाह

सदन में अपनी बात रखते हुए सांसद चंदन चौहान ने यह भी कहा कि सरकार को इस मुद्दे पर जल्द ही ठोस फैसला लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि—

  • “सिर्फ वकीलों के लिए नहीं, बल्कि क्षेत्र के नागरिकों की न्यायिक सुविधा के लिए यह बेंच आवश्यक है।”

  • “दूरी, समय, पैसा और परेशानी—इन चारों कारणों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।”

  • “यह समय है कि सरकार इस 40 साल पुराने मुद्दे पर न्यायसंगत निर्णय ले।”

उनके इस वक्तव्य की वीडियो और अंश सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं, जहाँ लोग सांसद की इस पहल की सराहना कर रहे हैं।


पश्चिम यूपी की जनता की प्रतिक्रिया—उम्मीद और सवाल दोनों बढ़े

सांसद द्वारा संसद में आवाज उठाने के बाद जनता और अधिवक्ताओं में नई ऊर्जा दिख रही है।
लोगों का कहना है कि—

  • “अब जब मुद्दा संसद में गूँज चुका है, तो कार्रवाई भी होनी चाहिए।”

  • “40 साल से मांग कर रहे हैं, अब निर्णायक कदम होना चाहिए।”

  • “पश्चिम यूपी की आबादी इतनी बड़ी है कि एक हाई कोर्ट बेंच का गठन परिस्थितियों के अनुसार बिल्कुल आवश्यक है।”

कई अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि यदि सरकार जल्द घोषणा नहीं करती, तो आने वाले दिनों में आंदोलन और तेज होगा।


पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट बेंच की स्थापना को लेकर चल रहा संघर्ष अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुँच चुका है। संसद में बिजनौर के सांसद चंदन चौहान द्वारा इस मुद्दे को फिर से जोरदार ढंग से उठाए जाने के बाद अधिवक्ताओं और नागरिकों दोनों को उम्मीद है कि 1981 से चली आ रही न्यायिक सुविधा की यह मांग जल्द ही हकीकत बन सकती है। अब नज़र इस बात पर है कि सरकार इस संवेदनशील और व्यापक जनहित से जुड़े मुद्दे पर कब और किस दिशा में निर्णायक कदम उठाती है।

 

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