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Ayushman Bharat योजना में अस्पतालों की भागीदारी घटी: देरी से भुगतान और कम रेट बने बड़ी वजह!

Ayushman Bharat प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY), जो भारत सरकार की एक महत्त्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना है, इन दिनों संकट के दौर से गुजर रही है। देशभर में लाखों गरीब और जरूरतमंद परिवारों को मुफ्त इलाज की सुविधा देने वाली इस योजना के साथ सूचीबद्ध होने वाले अस्पतालों की संख्या में 2025 में भारी गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2024 की तुलना में इस साल नए अस्पतालों के जुड़ने की रफ्तार तीन गुना से भी कम हो गई है।

2025 में अस्पतालों की भागीदारी में बड़ी गिरावट

नेशनल हेल्थ अथॉरिटी (NHA) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2025 से अप्रैल 2025 तक केवल 443 नए अस्पताल आयुष्मान भारत योजना में शामिल हुए हैं। इन आंकड़ों को और बारीकी से देखें तो जनवरी में 161, फरवरी में 187, मार्च में मात्र 40 और अप्रैल में केवल 55 अस्पताल जुड़े हैं। मई की शुरुआत में तो सिर्फ 20 अस्पताल ही इस योजना से जुड़े।

इसके विपरीत, वर्ष 2024 में हर महीने औसतन 316 अस्पताल योजना का हिस्सा बनते थे। इस तुलना से स्पष्ट है कि 2025 में यह औसत घटकर मात्र 111 रह गया है, जो कि चिंताजनक संकेत है।

निजी अस्पतालों का मोहभंग: वजह क्या है?

निजी क्षेत्र के अस्पतालों की योजना में भागीदारी कम होने के पीछे मुख्य वजह कम पैकेज रेट और भुगतान में होने वाली देरी बताई जा रही है। सूत्रों की मानें तो अस्पतालों को इलाज के बदले समय पर भुगतान नहीं मिल रहा, जिससे उनका संचालन प्रभावित हो रहा है।

IMA ने जताई नाराजगी, मांगी CGHS के बराबर दरें

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के एक पदाधिकारी ने बताया कि निजी अस्पतालों की नाराजगी वाजिब है। उन्होंने कहा, “सरकार को चाहिए कि आयुष्मान भारत के पैकेज रेट्स को CGHS (Central Government Health Scheme) के स्तर तक बढ़ाया जाए, ताकि अस्पतालों को भी प्रोत्साहन मिले।”

IMA के मुताबिक, वर्तमान दरें बहुत कम हैं, और मरीजों के इलाज पर आने वाला वास्तविक खर्च इन दरों से पूरा नहीं होता।

609 प्राइवेट अस्पताल योजना से हुए अलग: एक बड़ा झटका

2018 से लेकर अब तक 609 निजी अस्पताल आयुष्मान भारत योजना से अलग हो चुके हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि लंबे समय से अस्पतालों में योजना को लेकर असंतोष चला आ रहा है। हालांकि सरकार की ओर से इस पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया अब तक सामने नहीं आई है, जिससे स्थिति और अधिक असमंजसपूर्ण हो गई है।

NHA का दावा: नए सिस्टम की वजह से आंकड़े अपडेट नहीं

नेशनल हेल्थ अथॉरिटी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि हो सकता है कि अस्पतालों का जुड़ाव जारी हो, लेकिन नई प्रणाली में ट्रांसफर होने की वजह से आंकड़े अभी तक अपडेट न हुए हों। फिर भी, जमीनी हकीकत यही है कि अस्पतालों की दिलचस्पी घट रही है।

क्या है अस्पतालों की असली परेशानी?

जानकारों के मुताबिक, अस्पतालों को इलाज के लिए दिए जाने वाले पैकेज न सिर्फ कम हैं बल्कि उनमें कई जरूरी सेवाएं शामिल नहीं होतीं। ऐसे में अस्पतालों को घाटा उठाना पड़ता है, जिसका असर उनके रोजमर्रा के संचालन पर पड़ता है।

  • भुगतान में देरी: अस्पतालों का कहना है कि क्लेम पास होने के बाद भी कई महीनों तक भुगतान नहीं होता।

  • कम टैरिफ: अधिकांश प्रक्रियाओं का पैकेज इतना कम है कि उच्च गुणवत्ता वाली चिकित्सा सेवाएं देना संभव नहीं।

  • प्रक्रियाओं की जटिलता: कागजी कार्यवाही और पोर्टल की तकनीकी खामियां भी बड़ी समस्या बनी हुई हैं।

स्वास्थ्य मंत्रालय की चुप्पी बनी रहस्य

इस पूरे घटनाक्रम पर स्वास्थ्य मंत्रालय की चुप्पी चिंता का विषय है। जब योजना की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हों, तब सरकार की ओर से पारदर्शिता बेहद जरूरी है।

क्या आयुष्मान भारत योजना की विश्वसनीयता खतरे में है?

अगर यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब और भी निजी अस्पताल योजना से दूरी बना लेंगे। इससे गरीब मरीजों को मुफ्त इलाज के लिए अस्पताल खोजना मुश्किल हो जाएगा, और योजना अपने उद्देश्य से भटक सकती है।

राह की तलाश: समाधान क्या है?

सरकार को जल्द से जल्द निम्न कदम उठाने की आवश्यकता है:

  • भुगतान प्रक्रिया को पारदर्शी और तेज बनाना

  • पैकेज रेट्स की पुनर्समीक्षा करना

  • निजी अस्पतालों के सुझावों को गंभीरता से सुनना

  • टेक्नोलॉजी अपग्रेड कर पोर्टल की समस्याओं को हल करना


आयुष्मान भारत योजना से अस्पतालों की दूरी केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की स्वास्थ्य नीति की दिशा पर सवाल है। जब तक अस्पतालों को उचित दर, समय पर भुगतान और संचालन में सहूलियत नहीं मिलेगी, तब तक योजना का सपना अधूरा ही रहेगा। यह जरूरी है कि सरकार अब इस पर ठोस निर्णय ले और योजना को फिर से सशक्त बनाए।

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