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India Russia relations पर बड़ा अपडेट: जयशंकर बोले- चीन सबसे बड़ा खरीदार, भारत पर अमेरिकी दबाव के बावजूद रूसी तेल खरीद जारी रहेगा

नई दिल्ली/मॉस्को। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने मॉस्को में अपने समकक्ष सर्गेई लावरोव के साथ मुलाकात कर India Russia relations पर बड़ा बयान दिया। जयशंकर ने साफ कहा कि भारत रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार नहीं है, बल्कि यह स्थान चीन को हासिल है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों और राष्ट्रीय हितों के आधार पर ही निर्णय लेगा

यह मुलाकात ऐसे समय पर हुई है जब अमेरिका ने भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने का ऐलान किया है, जो 27 अगस्त से लागू होगा। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का आरोप है कि भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने से रूस को यूक्रेन युद्ध लड़ने में मदद मिल रही है


भारत-रूस के बीच ऊर्जा सहयोग पर बातचीत

जयशंकर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि रूस भारत के लिए एक भरोसेमंद साझेदार है और सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद से दोनों देशों का रिश्ता बेहद स्थिर और मजबूत रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत को रूसी कच्चे तेल पर औसतन 5% छूट मिल रही है, जिससे देश को भारी आर्थिक लाभ हो रहा है।

रूसी राजनयिक रोमन बाबुश्किन ने भी बुधवार को बयान देते हुए कहा था कि रूसी तेल का कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि यह वैश्विक बाजार में अन्य सप्लायर्स की तुलना में बेहद सस्ता और भरोसेमंद है।


भारत-रूस व्यापार में संतुलन की कोशिश

दोनों देशों ने ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) को कम करने के लिए कई अहम कदम उठाने पर सहमति जताई। रूस ने संकेत दिया है कि वह भारत से कृषि उत्पाद, दवाइयां और वस्त्र का आयात बढ़ाएगा। साथ ही दोनों देशों ने यह भी तय किया कि नॉन-टैरिफ बाधाओं और रेगुलेटरी समस्याओं को दूर करने पर जल्द ही काम किया जाएगा।

जयशंकर ने कहा कि भारत और रूस मिलकर ऐसा रास्ता खोजेंगे जिससे भारत का निर्यात बढ़े और व्यापार संतुलन मजबूत हो।


भारत पर अमेरिकी दबाव और रूसी भरोसा

अमेरिका लगातार दबाव बना रहा है कि भारत रूसी तेल की खरीद कम करे। लेकिन रूस का कहना है कि भारत दबाव में नहीं आएगा और अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा

बाबुश्किन ने यहां तक कहा कि अगर अमेरिकी बाजार भारतीय सामान के लिए बंद हो जाता है तो भारत अपने उत्पादों को रूस और यूरोएशियाई बाजारों की तरफ भेज सकता है।


भारत-रूस तेल व्यापार के आंकड़े

  • यूक्रेन युद्ध से पहले: भारत रूस से सिर्फ 0.2% (68 हजार बैरल प्रतिदिन) तेल खरीदता था।

  • 2023 मई तक: यह बढ़कर 45% (20 लाख बैरल प्रतिदिन) हो गया।

  • 2025 जनवरी-जुलाई: भारत रोजाना औसतन 17.8 लाख बैरल रूसी तेल आयात कर रहा है।

  • पिछले दो वर्षों में भारत ने 130 अरब डॉलर से ज्यादा (करीब 11.33 लाख करोड़ रुपये) का तेल रूस से खरीदा है।

इन आंकड़ों से साफ है कि भारत और रूस के बीच ऊर्जा साझेदारी पहले से कहीं ज्यादा गहरी हो चुकी है।


रूसी सेना में काम कर रहे भारतीयों का मुद्दा

बैठक के दौरान जयशंकर ने रूसी सेना में शामिल भारतीयों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि कई भारतीयों को रिहा किया जा चुका है, लेकिन कुछ मामले अभी भी लंबित हैं। रूस ने आश्वासन दिया है कि इस विषय पर सकारात्मक कार्रवाई होगी।


भारत की कूटनीतिक भूमिका: शांति की अपील

जयशंकर और लावरोव की बातचीत में सिर्फ तेल और व्यापार ही नहीं, बल्कि यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया और अफगानिस्तान की स्थिति पर भी चर्चा हुई। भारत ने दोहराया कि वह युद्ध का समाधान बातचीत और कूटनीति से चाहता है।

भारत हमेशा से वैश्विक स्तर पर शांति, संवाद और स्थिरता का पक्षधर रहा है और इस मुलाकात में भी यही संदेश दोहराया गया।


भारत-रूस साझेदारी पर वैश्विक नजर

यह साफ है कि आने वाले समय में भारत और रूस के रिश्ते और गहरे होंगे। जहां एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देश रूस पर प्रतिबंध लगाने में लगे हैं, वहीं भारत अपने हितों को ध्यान में रखते हुए तेल आयात और व्यापार जारी रखेगा।

भारत की यह रणनीति न केवल ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम है, बल्कि यह भूराजनीतिक (Geo-political) संतुलन की दिशा में भी बड़ा कदम है।


निष्कर्षतः मॉस्को में हुई इस अहम मुलाकात ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारत और रूस का रिश्ता सिर्फ तेल और व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक साझेदारी, भरोसे और वैश्विक शांति के प्रति साझा दृष्टिकोण पर आधारित है। अमेरिकी दबाव और वैश्विक राजनीति के बावजूद भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी ऊर्जा ज़रूरतें और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं, और यही आने वाले वर्षों में भारत-रूस संबंधों की असली मजबूती साबित होंगे।

 

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