Nepal में Gen-Z की बग़ावत: सोशल मीडिया बैन हटने के बाद भी क्यों सुलग रहा है गुस्सा?🔥
Nepal सरकार ने युवाओं के उग्र विरोध और लगातार बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद सोमवार देर रात सोशल मीडिया बैन हटा लिया। संचार मंत्री पृथ्वी गुरुंग ने कैबिनेट बैठक के बाद ऐलान किया – “सरकार ने युवाओं की बात मान ली है, सोशल मीडिया अब ओपन कर दिया गया है, अब युवाओं से अपील है कि विरोध बंद करें।”
लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ बैन हटाना ही इस आग को ठंडा करने के लिए काफी है? या फिर नेपाल की सड़कों पर उतरी Gen-Z की बग़ावत अब किसी बड़े बदलाव का संकेत है?
नेपाल सरकार का U-turn: ओली का बयान और रातों-रात फैसला
सोमवार दोपहर तक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का रुख सख्त था। उन्होंने सोशल मीडिया पर लगे बैन को सही ठहराते हुए कहा था कि “फर्जी अकाउंट और अफवाहों से समाज में ज़हर घुल रहा है, सरकार पीछे नहीं हटेगी।”
लेकिन जैसे-जैसे सड़कों पर भीड़ बढ़ती गई और काठमांडू सहित पोखरा, बिराटनगर जैसे शहरों में लाखों युवा सड़कों पर उतर आए, सरकार की मुश्किलें बढ़ गईं।
प्रदर्शन इतना हिंसक हो गया कि सिर्फ 24 घंटे में 20 लोगों की मौत और 400 से ज्यादा घायल होने की खबर सामने आई। इसके बाद देर रात मंत्रिमंडल की आपात बैठक हुई और सरकार ने सोशल मीडिया बैन हटाने का आदेश जारी कर दिया।
🇳🇵 Nepal Alert: सेना तैनात
नेपाल में संसद परिसर के बाहर सेना तैनात कर दी गई है।
•कल हुई भयावह झड़पों में 19 लोगों की मौत और 350+ लोग घायल हुए थे।
•सेना को शांति बनाए रखने और हिंसा रोकने के लिए लगाया गया है।#Nepal #ArmyDeployment #Protests #Safety pic.twitter.com/ZnvGTucr7N— News & Features Network | World & Local News (@newsnetmzn) September 9, 2025
Gen-Z आंदोलन: क्यों भड़की नई पीढ़ी?
नेपाल में 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी को Gen-Z कहा जाता है। यही वह पीढ़ी है जिसने इंटरनेट और सोशल मीडिया के सहारे खुद की पहचान बनाई है।
स्कूल-कॉलेज के छात्र-छात्राएं यूनिफॉर्म पहनकर प्रदर्शन में उतरे।
बैनर, पोस्टर और नारों से माहौल गूंज उठा।
किसी राजनीतिक पार्टी के झंडे नहीं, बल्कि युवाओं की खुद की आवाज़ थी।
यही वजह है कि इसे किसी राजनीतिक आंदोलन की बजाय “नई पीढ़ी की बग़ावत” कहा जा रहा है।
सोशल मीडिया बैन की कहानी: 3 सितंबर से 9 सितंबर तक
28 अगस्त: नेपाल सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को आदेश दिया कि वे 7 दिन में रजिस्ट्रेशन कराएं।
2 सितंबर: डेडलाइन खत्म हो गई, लेकिन कंपनियों ने नियम नहीं माने।
3 सितंबर: सरकार ने Facebook, Instagram, YouTube, WhatsApp, X समेत 26 प्लेटफॉर्म पर बैन लगा दिया।
4-8 सितंबर: देशभर में विरोध बढ़ता गया।
9 सितंबर: भारी दबाव के बाद सरकार ने बैन हटा लिया।
TikTok क्यों बचा, Facebook-YouTube क्यों फंसे?
नेपाल सरकार ने साफ कहा कि जिन कंपनियों ने समय पर लोकल ऑफिस, शिकायत निवारण अधिकारी और डेटा शेयरिंग नियम पूरे किए, उन्हें छूट मिली।
TikTok, Viber और WeTalk ने तुरंत रजिस्ट्रेशन कराया, इसलिए वे बच गए।
वहीं, Meta (Facebook, Instagram, WhatsApp) और YouTube जैसी अमेरिकी कंपनियों ने इन शर्तों को बेहद खर्चीला और कठोर बताया।
युवाओं को यह दोहरा रवैया और भी चुभ गया। आलोचकों का कहना है कि सरकार ने चीनी निवेश को खुश करने के लिए TikTok को बचा लिया।
Nepokid ट्रेंड और नेताओं के खिलाफ गुस्सा
पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया पर ‘Nepo Kid’ या ‘Nepo Baby’ ट्रेंड छाया हुआ था। इसमें नेताओं के बच्चों की आलीशान ज़िंदगी, विदेशी शिक्षा और महंगी गाड़ियों की तस्वीरें वायरल हो रही थीं।
पीएम केपी शर्मा ओली, पूर्व पीएम शेर बहादुर देउबा और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के परिवारों के वीडियो सबसे ज्यादा शेयर हुए।
आम युवाओं को यह भेदभाव चुभने लगा, क्योंकि नेपाल में औसतन प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 1300 डॉलर सालाना है।
युवाओं का कहना है कि जब नेता और उनके बच्चे ऐशो-आराम में जी सकते हैं, तो आम जनता से सोशल मीडिया पर भी आवाज़ उठाने का अधिकार क्यों छीना जाए?
अंतरराष्ट्रीय दबाव और UN की प्रतिक्रिया
नेपाल में हिंसा और मौतों पर UN मानवाधिकार आयोग ने गहरी चिंता जताई और निष्पक्ष जांच की मांग की।
दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने भी सोशल मीडिया पर लगे बैन को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया।
नेपाल की राजनीति पर चीन और भारत के प्रभाव की वजह से अंतरराष्ट्रीय नजरें पहले से ही यहां गड़ी हुई हैं। ऐसे में बैन हटाना सरकार के लिए मजबूरी बन गया।
आगे का रास्ता: युवाओं की मांगें अभी बाकी
हालांकि बैन हटा दिया गया है, लेकिन प्रदर्शनकारी युवा अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं हैं। वे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक परिवारवाद के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर सरकार ने अब भी युवाओं की असली समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया, तो यह आंदोलन नेपाल की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत कर सकता है।

