वैश्विक

पुतिन की भारत यात्रा पर दुनिया की नज़र: Jaishankar का बड़ा बयान—अमेरिका संग रिश्तों पर नहीं पड़ेगा कोई असर, भारत अपने फैसले खुद करेगा

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की 4–5 दिसंबर की भारत यात्रा के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल देखने को मिल रही है। यात्रा के बाद से यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में रहा कि क्या यह मुलाकात भारत-अमेरिका संबंधों पर असर डालेगी? इस पर विदेश मंत्री S.Jaishankar ने दिल्ली में हुए HT लीडरशिप समिट 2025 में बेहद स्पष्ट और कड़े शब्दों में जवाब दिया।

उन्होंने दो टूक कहा कि “भारत किससे दोस्ती करेगा और किससे नहीं, इसका फैसला केवल भारत करेगा। ऐसा सोचना कि कोई और हमें बताएगा कि दुनिया से हमारे रिश्ते कैसे हों, यह बिल्कुल अव्यावहारिक है।”

Putin India visit के बाद उठे कई सवालों को विदेश मंत्री ने एक-एक करके खारिज किया और यह संदेश दिया कि भारत की विदेश नीति किसी दबाव में नहीं चलती।


भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर असर की अटकलें गलत—जयशंकर का सख्त संदेश

भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (BTA) को लेकर यह दावा किया जा रहा था कि पुतिन की यात्रा से वार्ता धीमी पड़ सकती है।
जयशंकर ने इस दावे पर हँसते हुए जवाब दिया—
“भारत अपने किसानों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों और मध्यम वर्ग के हितों की रक्षा के साथ समझौता नहीं करेगा। व्यापार समझौतों का भारत-रूस रिश्ते से कोई टकराव नहीं है।”

विदेश मंत्री ने साफ किया कि दुनिया के सभी बड़े देशों—अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान—के साथ भारत के रिश्ते अलग-अलग आयामों पर आधार‍ित हैं। कोई एक रिश्ता दूसरे पर निर्भर नहीं करता।

यह बयान ऐसे समय आया है जब Putin India visit ने भारत की वैश्विक कूटनीति को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।


भारत-रूस संबंध दुनिया के सबसे ‘स्थिर और भरोसेमंद’ रिश्तों में—जयशंकर

HT समिट में एस. जयशंकर ने रूस-भारत संबंधों पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने जोर देकर कहा—
“भारत-रूस रिश्ता दशकों से स्थिर रहा है। जब रूस का अमेरिका, यूरोप या चीन के साथ रिश्ता ऊपर-नीचे होता रहा, तब भी भारत-रूस संबंध डगमगाए नहीं।”

विदेश मंत्री के अनुसार:

  • रक्षा

  • ऊर्जा

  • अंतरिक्ष
    ये वो क्षेत्र हैं जहाँ भारत-रूस साझेदारी वैश्विक रूप से मिसाल मानी जाती है।
    हालाँकि व्यापार और आर्थिक सहयोग उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ा, इसलिए पुतिन की यात्रा उसी असंतुलन को दुरुस्त करने पर केंद्रित थी।

Putin India visit के पीछे रणनीतिक उद्देश्य बहुत स्पष्ट था—दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को एक नई रफ्तार देना।


दो दिन की यात्रा, लेकिन संदेश गहरा—23वें भारत-रूस समिट की बड़ी बातें

रूसी राष्ट्रपति 4 दिसंबर की शाम भारत पहुंचे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रोटोकॉल तोड़कर खुद एयरपोर्ट पर जाकर पुतिन का स्वागत किया। यह एक राजनयिक संकेत था कि भारत रूस को विशेष महत्व देता है।

एयरपोर्ट पर:

  • मोदी ने पुतिन को गले लगाकर स्वागत किया

  • दोनों नेता पुतिन की लग्जरी “ऑरस सीनेट” के बजाय टोयोटा फॉर्च्यूनर से पीएम आवास पहुंचे

  • यात्रा के अंत में विशेष निजी डिनर आयोजित किया गया

इस मुलाकात में हुई खास घोषणाएँ—

  • 2030 तक आर्थिक साझेदारी बढ़ाने के लिए विशेष संयुक्त कार्यक्रम

  • रूसियों के लिए 30 दिनों का मुफ्त ई-टूरिस्ट वीज़ा

  • समूह में आने वाले रूसी पर्यटकों को भी मुफ्त वीज़ा

  • व्यापार, ऊर्जा व सुरक्षा सहयोग पर नए करार

यह यात्रा राजनीतिक से ज्यादा “आर्थिक पुनर्संतुलन” यात्रा कही जा रही है।


क्या पुतिन भारत आए ताकि पश्चिम को संदेश जाए?—जयशंकर ने किया स्पष्ट खंडन

इस सवाल पर जयशंकर ने बिना घुमाए जवाब दिया—
“यह यात्रा किसी को संदेश देने के लिए नहीं थी। असली सवाल यह है कि भारत और रूस के हित क्या हैं और हम अपने सहयोग को कैसे मजबूत करते हैं।”

विदेश मंत्री के अनुसार—

  • भारत न तो पश्चिम के “दबाव” में चलता है

  • न ही रूस के साथ अपने संबंध किसी तीसरे देश को संदेश देने के लिए बनाता है

  • भारत के सारे फैसले “भारत-हित” में होते हैं

Putin India visit को लेकर पश्चिमी विश्लेषकों की कई टिप्पणियों पर भारत ने एक स्पष्ट पोज़िशन रखी—
भारत अपने फैसले खुद करता है और अपनी कूटनीति किसी तीसरे देश को खुश करने के लिए नहीं चलाता।


भारत-रूस संबंध: रक्षा से ऊर्जा तक, साझेदारी लगातार मजबूत

विदेश मंत्री ने कहा कि किसी भी लंबे रिश्ते में कुछ सेक्टर तेज़ चलते हैं और कुछ पीछे रह जाते हैं।
भारत-रूस रिश्ता परंपरागत रूप से रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष क्षेत्रों में बेहद मजबूत रहा है।
परन्तु व्यापार और आर्थिक सहयोग उतना तेज़ नहीं बढ़ पाया।

इसके विपरीत भारत-अमेरिका व भारत-यूरोप के आर्थिक रिश्ते 90 के दशक के बाद बहुत तेज़ी से बढ़े, लेकिन रक्षा सहयोग कमज़ोर रहा।

पुतिन की इस यात्रा का मूल उद्देश्य था—
व्यापार, निवेश, टेक्नोलॉजी और उद्योग क्षेत्रों में रूस-भारत संबंध को नई दिशा देना।


विदेश नीति पर जयशंकर का गूंजता बयान—“मित्र चुनने की आज़ादी ही हमारी विदेश नीति है”

जयशंकर ने इंडिया की विदेश नीति के मुख्य सिद्धांत पर बेहद साफ़ राय रखी। उन्होंने कहा—“भारत जैसा बड़ा और उभरता देश अपने मित्र खुद चुनेगा। हमें सबके साथ अच्छे संबंध चाहिए, लेकिन अपने हितों के साथ समझौता नहीं करेंगे। यही विदेश नीति का मूल है।”

यह बयान सीधे उस वैश्विक बहस को जवाब देता है जिसमें अक्सर कहा जाता है कि भारत दो महाशक्तियों—अमेरिका और रूस—के बीच संतुलन साध रहा है।

लेकिन विदेश मंत्री ने स्पष्ट कर दिया—
भारत किसी के लिए झुककर नहीं चलता, बल्कि समानता और स्वायत्तता पर आधारित रिश्ते बनाता है।


ट्रम्प के अतिरिक्त टैरिफ और भारत-अमेरिका व्यापार समझौता—क्या है ताज़ा स्थिति

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाया था, ताकि कुल टैरिफ 50% तक पहुँच गया। अमेरिका ने इसका कारण बताया कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है।

इसके बावजूद—
भारत और अमेरिका के बीच 191 अरब डॉलर का सालाना व्यापार
जारी है और
2030 तक इसे 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य तय किया गया है।

वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने नवंबर में कहा था कि साल खत्म होने से पहले पहला चरण पूरा हो जाएगा।

जून 2025 में पीएम मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान जो आधार तैयार हुआ था, उस पर लगातार प्रगति हो रही है।

इसलिए Putin India visit और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता—
दोनों अपने-अपने ट्रैक पर बिना टकराव के आगे बढ़ रहे हैं।


भारत-रूस साझेदारी का भविष्य—2030 के प्लान पर हुई गहरी बातचीत

23वें भारत-रूस समिट में दोनों देशों ने 2030 की रणनीतिक रोडमैप पर भी चर्चा की।
इसमें शामिल हैं—

  • हाई-टेक टेक्नोलॉजी में साझेदारी

  • ऊर्जा गलियारे का विस्तार

  • रक्षा उत्पादन में संयुक्त निर्माण

  • साइंस-टेक्नोलॉजी रिसर्च पार्टनरशिप

  • आर्कटिक और फार-ईस्ट क्षेत्रों में निवेश

भारत के लिए रूस एशिया-यूरोप कनेक्टिविटी का एक बड़ा द्वार भी माना जा रहा है।

इस बार की Putin India visit ने संकेत दिया कि भविष्य में भारत-रूस संबंध केवल रक्षा तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि “आर्थिक महाशक्ति साझेदारी” की दिशा में आगे बढ़ेंगे।


पुतिन की इस भारत यात्रा और जयशंकर के स्पष्ट बयानों ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि भारत किसी दबाव या समीकरण से नहीं चलता, बल्कि अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च रखता है। रूस के साथ नई आर्थिक साझेदारी, अमेरिका के साथ बढ़ती व्यापार वार्ता, और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका—ये सभी संकेत बताते हैं कि आने वाले वर्षों में भारत विश्व राजनीति के केंद्र में और मजबूत होकर उभरेगा।

 

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