Allahabad High Court Maintenance Law Ruling: बहू पर सास-ससुर का भरण-पोषण अनिवार्य नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
News-Desk
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इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला, उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा, कानूनी समाचार भारत, धारा 125 CrPC फैसला, प्रयागराज हाईकोर्ट न्यूज, फैमिली कोर्ट आगरा, बहू सास ससुर भरण पोषण केस, भरण पोषण कानून भारत, भारतीय न्यायपालिका खबर, हाईकोर्ट निर्णयAllahabad High Court ने पारिवारिक कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर स्पष्टता देते हुए कहा है कि बहू अपने सास-ससुर के भरण-पोषण के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। प्रयागराज स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए आगरा फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और सास-ससुर द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि नैतिक दायित्व और कानूनी दायित्व अलग-अलग अवधारणाएं हैं और केवल नैतिक आधार पर किसी व्यक्ति पर भरण-पोषण की वैधानिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
बेटे की मृत्यु के बाद बहू से गुजारा भत्ता मांगने पहुंचे थे सास-ससुर
मामले में याचिकाकर्ता सास-ससुर ने अपने पुत्र प्रवेश कुमार की मृत्यु के बाद अपनी बहू से भरण-पोषण भत्ता की मांग की थी। उन्होंने आगरा परिवार न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की थी।
प्रवेश कुमार का विवाह 26 अप्रैल 2016 को हुआ था और उनकी 31 मार्च 2021 को मृत्यु हो गई थी। इसके बाद मृतक कर्मचारी के रूप में देय सभी सेवा लाभ उनकी पत्नी को प्राप्त हुए। बहू उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल पद पर कार्यरत हैं।
जस्टिस मदन पाल सिंह की पीठ ने दिया अहम फैसला
Allahabad High Court maintenance law ruling में जस्टिस मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत सास-ससुर को बहू से भरण-पोषण पाने का वैधानिक अधिकार नहीं दिया गया है।
अदालत ने कहा कि यदि विधायिका चाहती तो इस प्रावधान में सास-ससुर को भी शामिल किया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि बहू पर ऐसा दायित्व डालने की मंशा कानून बनाने वालों की नहीं थी।
नैतिक जिम्मेदारी और कानूनी जिम्मेदारी में अंतर पर अदालत की टिप्पणी
अदालत ने अपने निर्णय में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि नैतिक जिम्मेदारी की अवधारणा चाहे कितनी भी मजबूत क्यों न हो, लेकिन जब तक किसी कानून में स्पष्ट प्रावधान न हो, उसे कानूनी जिम्मेदारी के रूप में लागू नहीं किया जा सकता।
यह टिप्पणी पारिवारिक विवादों से जुड़े कई मामलों के लिए मार्गदर्शक मानी जा रही है, जहां रिश्तों के आधार पर भरण-पोषण की मांग की जाती रही है।
धारा 125 CrPC के दायरे को लेकर अदालत का स्पष्ट रुख
Allahabad High Court maintenance law ruling में अदालत ने कहा कि धारा 125 CrPC के अंतर्गत भरण-पोषण का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है और यह केवल उन्हीं व्यक्तियों तक सीमित है जिनका उसमें स्पष्ट उल्लेख किया गया है।
अदालत के अनुसार इस प्रावधान में पत्नी, बच्चे और माता-पिता को शामिल किया गया है, लेकिन सास-ससुर को इसमें शामिल नहीं किया गया है। इसलिए इस धारा के तहत बहू पर भरण-पोषण का दायित्व नहीं डाला जा सकता।
अनुकंपा नियुक्ति से जुड़ी दलील भी नहीं मानी गई
सुनवाई के दौरान यह भी तर्क दिया गया कि बहू को नौकरी अनुकंपा के आधार पर मिली थी, इसलिए उस पर सास-ससुर की जिम्मेदारी बनती है। हालांकि अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है जिससे यह सिद्ध हो सके कि नौकरी अनुकंपा के आधार पर दी गई थी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की दलीलें धारा 125 के तहत चलने वाली संक्षिप्त भरण-पोषण कार्यवाही के दायरे से बाहर हैं।
संपत्ति उत्तराधिकार से जुड़ी दलीलें भी खारिज
Allahabad High Court maintenance law ruling में अदालत ने यह भी कहा कि मृतक की संपत्ति के उत्तराधिकार से संबंधित प्रश्न इस प्रकार की कार्यवाही में विचारणीय नहीं हैं।
अदालत के अनुसार उत्तराधिकार से जुड़े विवाद अलग विधिक प्रक्रियाओं के तहत तय किए जाते हैं और इन्हें भरण-पोषण याचिका के साथ नहीं जोड़ा जा सकता।
फैमिली कोर्ट के फैसले में नहीं पाई गई कोई त्रुटि
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आगरा के प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय द्वारा 21 अगस्त 2025 को पारित आदेश में कोई अवैधता, त्रुटि या विकृति नहीं पाई गई है।
इस आधार पर सास-ससुर की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई और निचली अदालत का निर्णय बरकरार रखा गया।
पारिवारिक कानून से जुड़े मामलों में मिसाल बन सकता है फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि Allahabad High Court maintenance law ruling भविष्य में आने वाले ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखा जाएगा, जहां सास-ससुर द्वारा बहू से भरण-पोषण की मांग की जाती है।
इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश गया है कि पारिवारिक रिश्तों के आधार पर नैतिक अपेक्षाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन कानूनी दायित्व केवल विधिक प्रावधानों के अनुसार ही तय किए जाएंगे।
धारा 125 के तहत भरण-पोषण के अधिकार की सीमाएं हुईं स्पष्ट
अदालत के इस निर्णय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि भरण-पोषण से जुड़े मामलों में केवल वही पक्ष दावा कर सकते हैं जिन्हें कानून में स्पष्ट रूप से अधिकार दिया गया है।
इससे भविष्य में ऐसे मामलों में अनावश्यक मुकदमों की संख्या कम होने की संभावना जताई जा रही है और न्यायिक प्रक्रिया को भी स्पष्ट दिशा मिलेगी।

