Allahabad High Court का भावुक फैसला: माता-पिता के विवाद में बिछड़े मासूम भाई-बहन, बच्चों के हित में तय हुई संयुक्त अभिरक्षा
Allahabad High Court Child Custody से जुड़े एक भावुक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसा निर्णय सुनाया, जिसने अदालत में मौजूद कई लोगों की आंखें नम कर दीं। मेरठ निवासी एक दंपति के वैवाहिक विवाद के बीच दो छोटे बच्चों की अभिरक्षा (कस्टडी) को लेकर चली सुनवाई में अदालत को बच्चों के सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए संयुक्त अभिरक्षा (Shared Custody) की व्यवस्था तय करनी पड़ी।
न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान माता-पिता को दोबारा साथ रहने की संभावना पर भी विचार करने के लिए प्रेरित किया, लेकिन दोनों पक्ष अपने-अपने निर्णय पर अडिग रहे। इसके बाद अदालत ने उपलब्ध परिस्थितियों, बच्चों की भावनाओं और उनके भविष्य को ध्यान में रखते हुए विस्तृत आदेश पारित किया।
करीब दो घंटे चली सुनवाई, अदालत में भावुक हुआ माहौल
मामला मेरठ निवासी एक सरकारी शिक्षिका द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से संबंधित था। सुनवाई के दौरान दोनों पक्ष अदालत में उपस्थित रहे।
न्यायालय ने केवल पक्षकारों की दलीलों पर ही नहीं, बल्कि दोनों बच्चों से भी व्यक्तिगत रूप से बातचीत की, ताकि उनकी मानसिक स्थिति, भावनात्मक जुड़ाव और आवश्यकताओं को समझा जा सके।
सुनवाई के दौरान कई अवसर ऐसे आए जब अदालत का माहौल अत्यंत भावुक हो गया और मौजूद लोगों की आंखें नम हो गईं।
संयुक्त अभिरक्षा का आदेश, दोनों बच्चों के लिए अलग व्यवस्था
अदालत ने बच्चों के सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) को सर्वोपरि मानते हुए संयुक्त अभिरक्षा की व्यवस्था निर्धारित की।
आदेश के अनुसार—
- लगभग ढाई वर्ष की बेटी सप्ताह के सोमवार, मंगलवार और बुधवार अपने पिता के साथ रहेगी।
- छह वर्षीय पुत्र को शनिवार, रविवार और विद्यालय की छुट्टियों के दौरान मां के साथ रहने का अवसर मिलेगा।
अदालत ने यह व्यवस्था बच्चों को दोनों माता-पिता का स्नेह मिलता रहे, इस उद्देश्य से तय की।
बेटे से अदालत ने की बातचीत
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने छह वर्षीय बच्चे से भी बातचीत की।
अदालत के समक्ष बच्चे ने पहले अपने पिता के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की। हालांकि, जब उसकी मां उसके सामने आईं तो उसने दोनों के साथ रहने की बात कही। उसने यह भी कहा कि मां खेलने के लिए कम समय देती हैं, इसलिए वह पिता के साथ रहना चाहता है।
न्यायालय ने अपने आदेश में बच्चे की मानसिक स्थिति का भी उल्लेख किया और उपलब्ध परिस्थितियों का समग्र मूल्यांकन किया।
मां को देखकर फूट-फूटकर रोई मासूम बेटी
सुनवाई के दौरान लगभग ढाई वर्ष की बच्ची, जो पिछले कुछ समय से पिता के साथ रह रही थी, अदालत में प्रस्तुत की गई।
जैसे ही उसने अपनी मां को देखा, वह दौड़कर उनके गले लग गई। उसने अपने छोटे-छोटे हाथों से मां के आंसू पोंछे और दोनों एक-दूसरे से लिपटकर भावुक हो गए।
बताया गया कि जब दादी उसे वहां से ले जाने लगीं तो बच्ची लगातार अपनी मां को पुकारती रही। इस भावुक दृश्य को देखते हुए अदालत ने बच्ची को तत्काल मां के सुपुर्द करने का निर्देश दिया।
पिता ने बेहतर भविष्य का दिया तर्क
सुनवाई के दौरान बच्चों के पिता, जो पेशे से बिल्डर बताए गए, ने अदालत के समक्ष कहा कि उनकी आय अधिक है और वे बच्चों को बेहतर शिक्षा, जीवनशैली तथा अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करा सकते हैं।
उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि बच्चों की अभिरक्षा उन्हें दी जाए ताकि वे उनके भविष्य को बेहतर ढंग से सुरक्षित कर सकें।
मां ने कहा- बच्चों को मुझसे अलग न किया जाए
वहीं, सरकारी शिक्षिका मां ने अदालत से कहा कि वह भी बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा की पूरी क्षमता रखती हैं।
उन्होंने भावुक होकर कहा कि एक मां से उसके बच्चों को अलग नहीं किया जाना चाहिए और बच्चों की कस्टडी उन्हें ही दी जाए।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और बच्चों की परिस्थितियों का विस्तृत मूल्यांकन किया।
बेटे की पढ़ाई को लेकर अदालत की टिप्पणी
अपने आदेश में अदालत ने यह भी माना कि बातचीत के दौरान बेटा कुछ मानसिक दबाव में दिखाई दिया और उसके कुछ बयान पूर्व तैयारी वाले प्रतीत हुए।
हालांकि न्यायालय ने यह भी पाया कि बच्चा जिस विद्यालय में पढ़ रहा है, वह उसके पिता के निवास के निकट स्थित है, जबकि मां का निवास अपेक्षाकृत अधिक दूरी पर है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने बच्चे की शिक्षा में निरंतरता बनाए रखने को भी महत्वपूर्ण माना और इसी आधार पर उसके संबंध में अलग व्यवस्था निर्धारित की।
बच्चों के सर्वोत्तम हित को सर्वोच्च प्राथमिकता
भारतीय न्यायालयों ने विभिन्न मामलों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि बच्चों की अभिरक्षा से जुड़े मामलों में माता-पिता के अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण बच्चों का सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) होता है।
इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में भी ऐसा समाधान तलाशने का प्रयास किया, जिससे दोनों बच्चों को यथासंभव माता और पिता दोनों का स्नेह एवं संरक्षण मिलता रहे।

