उत्तर प्रदेश

उमाकांत यादव को Allahabad High Court से जमानत, 6 साल से जेल में बंद पूर्व सांसद को मिली बड़ी राहत

Allahabad High Court ने जौनपुर के लाइन बाजार थाने में दर्ज धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेज से जुड़े एक मामले में पूर्व सांसद उमाकांत यादव को जमानत दे दी है। न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आरोपी करीब छह साल से जेल में है, जबकि अभी तक मुकदमे में आरोप तक तय नहीं किए गए हैं।

अदालत ने माना कि जब मुकदमे की प्रक्रिया लंबे समय से आगे नहीं बढ़ रही है और आरोपी लगातार हिरासत में है, तो उसे अनिश्चित अवधि तक जेल में रखना उसके स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा गंभीर सवाल खड़ा करता है। हालांकि, जमानत मिलने के बावजूद उमाकांत यादव फिलहाल जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे। उनके खिलाफ चल रहे अन्य मामलों के कारण उनकी रिहाई तत्काल संभव नहीं होगी।

2017 में दर्ज हुई थी एफआईआर

मामला जौनपुर के लाइन बाजार थाने में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। शिकायतकर्ता संजीव जायसवाल ने वर्ष 2017 में मुकदमा दर्ज कराया था।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि संजीव जायसवाल ने वर्ष 2015 में रजिस्टर्ड बिक्री विलेख के माध्यम से जमीन खरीदी थी। आरोप के अनुसार, बाद में जमीन से संबंधित राजस्व अभिलेखों में हेरफेर कर उमाकांत यादव का नाम दर्ज करा दिया गया।

इसी मामले में उमाकांत यादव ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए जमानत की मांग की थी।

अधिवक्ता ने बताया- मामला मूल रूप से जमीन का दीवानी विवाद

उमाकांत यादव की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि विवाद की मूल प्रकृति जमीन के मालिकाना हक से जुड़ी हुई है और इसे मुख्य रूप से दीवानी विवाद के तौर पर देखा जाना चाहिए।

अधिवक्ता ने यह भी अदालत को बताया कि उमाकांत यादव की उम्र करीब 74 वर्ष है और वह बीमारी से पीड़ित हैं। उनकी ओर से यह तर्क भी रखा गया कि उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों में अधिकांश मामले पुराने हैं और कई मामलों में उन्हें राहत मिल चुकी है।

इन परिस्थितियों को भी जमानत पर विचार करते समय अदालत के सामने रखा गया।

सरकार ऐसा ठोस तथ्य नहीं दिखा सकी, जिससे अभिलेख में हेरफेर साबित हो

हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार किया। अदालत ने कहा कि राज्य की ओर से ऐसा कोई ठोस तथ्य सामने नहीं रखा जा सका, जिससे प्रथम दृष्टया यह साबित हो कि उमाकांत यादव ने स्वयं राजस्व अभिलेखों में हेरफेर किया था।

अदालत के सामने यह भी महत्वपूर्ण तथ्य था कि मामले में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं।

चार्जशीट में कुल 10 गवाहों का उल्लेख किया गया है। ऐसे में मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में अभी और समय लगने की संभावना को भी अदालत ने ध्यान में रखा।

छह साल जेल में, फिर भी आरोप तय नहीं हुए

जमानत देने के पीछे हाईकोर्ट के आदेश में सबसे महत्वपूर्ण पहलू उमाकांत यादव की लंबी हिरासत रहा।

अदालत ने गौर किया कि वह लगभग छह वर्षों से जेल में हैं, लेकिन मुकदमे में अभी आरोप तक तय नहीं हुए हैं। यानी इतने लंबे समय के बाद भी ट्रायल उस चरण तक नहीं पहुंच सका है, जहां आरोपी के खिलाफ औपचारिक आरोप तय किए जाएं।

हाईकोर्ट ने माना कि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखने और मुकदमे की कार्यवाही के आगे न बढ़ने की स्थिति को उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के संदर्भ में देखा जाना जरूरी है।

सह-आरोपियों के मामले में आदेश से भी रुकी थी कार्यवाही

मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि सह-आरोपियों से संबंधित आपराधिक पुनरीक्षण मामले में हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के कारण मुख्य मुकदमे की कार्यवाही लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सकी।

इस वजह से ट्रायल की प्रक्रिया में देरी हुई। अदालत ने इस पहलू को भी ध्यान में रखा कि देरी केवल आरोपी की वजह से नहीं हुई थी और मुकदमे की प्रगति लंबे समय तक प्रभावित रही।

इसी आधार पर अदालत ने लंबे समय से जेल में बंद आरोपी को आगे भी हिरासत में रखने को उचित नहीं माना।

हाईकोर्ट ने स्वीकार की जमानत अर्जी

सभी परिस्थितियों पर विचार करने के बाद न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकल पीठ ने उमाकांत यादव की जमानत अर्जी स्वीकार कर ली।

अदालत ने माना कि मुकदमा लंबे समय से आगे नहीं बढ़ा है और आरोपी पहले ही लगभग छह वर्ष हिरासत में बिता चुका है। ऐसे में आगे भी उसे जेल में रखना स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत होगा।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया।

जमानत के बाद भी तुरंत जेल से बाहर नहीं आएंगे

हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बावजूद उमाकांत यादव को फिलहाल जेल से बाहर आने का रास्ता साफ नहीं हुआ है। उनके खिलाफ अन्य मामलों के लंबित होने के कारण वह अभी भी हिरासत में रहेंगे।

इसका मतलब यह है कि इस विशेष मामले में हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दी है, लेकिन अन्य मामलों में यदि उनकी हिरासत जारी है तो इस आदेश के आधार पर उनकी तत्काल रिहाई नहीं होगी।

क्या है पूरे मामले का सबसे अहम पहलू?

इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू लंबी न्यायिक हिरासत और मुकदमे की धीमी प्रगति है। अदालत ने यह नहीं कहा कि आरोप सही हैं या गलत साबित हो चुके हैं। जमानत का आदेश मुकदमे के अंतिम परिणाम का फैसला नहीं है।

अदालत ने मुख्य रूप से इस बात पर विचार किया कि आरोपी करीब छह साल से जेल में है, चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद आरोप तय नहीं हुए हैं और कार्यवाही में देरी के पीछे सह-आरोपियों से संबंधित हाईकोर्ट की कार्यवाही भी एक कारण रही है।

अब इस मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगी। उमाकांत यादव को इस मामले में जमानत मिलना आरोपों से अंतिम रूप से बरी होना नहीं माना जाएगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व सांसद उमाकांत यादव को जौनपुर के लाइन बाजार थाने में दर्ज धोखाधड़ी और कूटरचित दस्तावेज के मामले में जमानत दी है। अदालत ने खास तौर पर उनकी करीब छह साल की हिरासत और अब तक आरोप तय नहीं होने को महत्वपूर्ण माना। हालांकि, अन्य मामलों में हिरासत के कारण उन्हें फिलहाल जेल से बाहर आने का लाभ नहीं मिल सकेगा।

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