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सऊदी पर हमले हों तो मदद करेंगे, लेकिन हूतियों से नहीं लड़ेंगे! Turkey का दोटूक रुख

सऊदी अरब की सुरक्षा मजबूत करनी है, हमले रोकने हैं और जरूरत पड़ने पर मदद भी करनी है, लेकिन हूती विद्रोहियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरना फिलहाल Turkey की प्राथमिकता नहीं है। तुर्किये के रक्षा मंत्री यासर गुलर के बयान से कुछ ऐसा ही संदेश सामने आया है। दिलचस्प बात यह है कि तुर्किये ने सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन समझौते का मतलब यह नहीं कि वह हर मोर्चे पर लड़ने के लिए तैयार बैठा है।

गुलर ने कहा है कि तुर्किये हूती विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में शामिल नहीं होगा। उनका कहना है कि तुर्किये का उद्देश्य सऊदी अरब की सुरक्षा मजबूत करना और उसके दुश्मनों को हमला करने से रोकना होगा। यानी सुरक्षा में सहयोग की बात है, लेकिन सीधे युद्ध में उतरने का फैसला अपने आप नहीं हो जाएगा।

रक्षा समझौता हुआ, लेकिन युद्ध में उतरने की शर्तें अभी बाकी

यह बयान ऐसे समय आया है, जब अगस्त में तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने मक्का रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते की मूल भावना यह है कि किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमले के रूप में देखा जाएगा। लेकिन कागज पर साझा सुरक्षा का वादा करना और किसी दूसरे देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में उतरना दो अलग-अलग बातें हैं।

यासर गुलर के मुताबिक, सऊदी अरब की मांग पर तुर्किये सैन्य मदद देने पर विचार कर सकता है। मदद किस तरह की होगी और उसका दायरा कितना होगा, यह सऊदी अरब की जरूरतों और औपचारिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आगे बढ़ने से पहले तुर्किये की संसद से समझौते को मंजूरी मिलना जरूरी है। इसके बाद कानूनी प्रक्रियाओं और संसदीय अनुमति के मुताबिक फैसला लिया जाएगा।

रिपोर्ट के अनुसार, समझौते को 21 अक्टूबर को तुर्किये की संसद में पेश किया गया था, लेकिन उस पर मंजूरी का फैसला अभी बाकी है। ऐसे में समझौते पर हस्ताक्षर होने के बावजूद सैन्य सहयोग की वास्तविक सीमा अभी स्पष्ट नहीं है।

पाकिस्तान और अमेरिका भी सीधे युद्ध से पीछे

सऊदी अरब को हूती हमलों से निपटने के लिए जिस तरह के सहयोग की जरूरत है, उसे लेकर उसके सहयोगी देशों के रुख में भी सावधानी दिखाई दे रही है। रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तान ने कहा था कि उसकी सेना किसी दूसरे देश की जमीन पर युद्ध में शामिल नहीं होगी। यानी रक्षा सहयोग अपनी जगह है, लेकिन दूसरे देश की धरती पर लड़ाई लड़ने का फैसला अलग मामला है।

अमेरिका को लेकर भी ऐसी ही स्थिति सामने आई। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब ने सीधे अमेरिकी सैन्य हमले की मांग की थी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इससे इनकार कर दिया। इससे रियाद के सामने यह चुनौती बनी हुई है कि क्षेत्रीय सहयोगियों से सुरक्षा सहायता लेते हुए भी उसे अपने स्तर पर रक्षा व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

कुल मिलाकर, सऊदी अरब के साथ सुरक्षा साझेदारी की बात करने वाले देशों के लिए असली सवाल यह है कि सहयोग किस स्तर तक जाएगा। हथियार, खुफिया जानकारी, एयर डिफेंस या दूसरी सैन्य सहायता देना एक बात है; हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरना दूसरी। फिलहाल तुर्किये ने इसी अंतर को साफ करने की कोशिश की है।

अमेरिका और हूतियों के बीच कथित गुप्त समझौते की चर्चा

इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिका और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच कथित गुप्त समझौते की खबर भी चर्चा में रही। एक्सिओस की पिछले महीने की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों पक्षों के बीच ऐसा समझौता हुआ था, जिसके तहत हूतियों ने लाल सागर में अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाने का भरोसा दिया। रिपोर्ट में कहा गया था कि बातचीत ओमान की राजधानी मस्कट में अमेरिकी दूतावास में हुई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, हूती प्रतिनिधियों ने यह भरोसा भी दिया था कि वे सऊदी अरब के अलावा दूसरे जहाजों को बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुजरने देंगे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी कहा था कि अमेरिका हूतियों के साथ सीधे बातचीत कर रहा है। हालांकि, किसी औपचारिक गुप्त समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई थी। इसलिए इस खबर को पुष्ट और आधिकारिक समझौते के बजाय मीडिया रिपोर्ट के दावे के रूप में ही देखना जरूरी है।

अगर अमेरिका और हूतियों के बीच सीमित समझ बनी भी है, तो उससे यह संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय संघर्ष में हर पक्ष अपने हितों के हिसाब से रास्ता तलाश रहा है। एक तरफ सऊदी अरब सुरक्षा सहायता चाहता है, दूसरी तरफ उसके सहयोगी सीधे युद्ध में उतरने को लेकर शर्तें रख रहे हैं।

सऊदी अरब पर हमलों का दावा, एयरपोर्ट और तेल ठिकाने निशाने पर

दी गई रिपोर्ट के मुताबिक, अक्टूबर में हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के एयरपोर्ट और अन्य महत्वपूर्ण ठिकानों को निशाना बनाकर मिसाइलों तथा दूसरे हथियारों से हमले किए। रिपोर्ट में इन घटनाओं में कम से कम 23 लोगों की मौत और 370 लोगों के घायल होने का दावा किया गया है। हालांकि, इन सभी आंकड़ों और हमलों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्रोतों से करना जरूरी है।

रिपोर्ट में दर्ज घटनाओं का ब्योरा इस प्रकार दिया गया है:

  • 6 अक्टूबर: जजान और नजरान के एयरपोर्ट को निशाना बनाए जाने की खबर सामने आई। सऊदी एयर डिफेंस ने एक बैलिस्टिक मिसाइल को रोकने का दावा किया।
  • 7 अक्टूबर: रियाद और अभा एयरपोर्ट पर हमलों की सूचना दी गई। सऊदी अधिकारियों के मुताबिक, तीन विदेशी नागरिकों की मौत हुई और 36 लोग घायल हुए।
  • 8 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट पर एक और हमले की खबर आई। अधिकारियों के अनुसार, तीन सऊदी नागरिकों की मौत हुई। सरकारी एयरलाइन सऊदिया का एक विमान भी क्षतिग्रस्त हुआ।
  • 10 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट पर मिसाइल हमले में एक भारतीय नागरिक समेत 13 लोगों की मौत और 300 से अधिक लोगों के घायल होने का दावा किया गया। इसके बाद एयरपोर्ट पर उड़ानें रोकनी पड़ीं।
  • 11 अक्टूबर: रियाद एयरपोर्ट पर मिसाइल या ड्रोन गिरने की खबर आई। रिपोर्ट के मुताबिक, एक पाकिस्तानी नागरिक की मौत हुई और 11 लोग घायल हुए।
  • 22 अक्टूबर: दम्माम एयरपोर्ट पर हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत और आठ लोगों के घायल होने की जानकारी दी गई। इसी रिपोर्ट में अरामको के तेल ठिकाने पर ड्रोन हमले में दो लोगों की मौत और एक भारतीय समेत दो लोगों के घायल होने का भी दावा है।

इन घटनाओं के दावे सही पाए जाने पर सऊदी अरब के लिए चुनौती केवल सीमावर्ती सुरक्षा तक सीमित नहीं रहती। एयरपोर्ट, नागरिक विमानन और तेल प्रतिष्ठानों जैसे महत्वपूर्ण ठिकानों की रक्षा भी उतनी ही अहम हो जाती है। हालांकि, हमलों के बारे में अलग-अलग दावों, हताहतों के आंकड़ों और जिम्मेदारी तय करने के लिए विश्वसनीय आधिकारिक जानकारी जरूरी है।

2015 से जारी है सऊदी अरब और हूतियों का संघर्ष

यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच संघर्ष की जड़ें कई साल पुरानी हैं। वर्ष 2015 से इस संघर्ष ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लगातार प्रभावित किया है। ईरान और हूतियों के बीच लंबे समय से संबंध रहे हैं। सऊदी अरब और अमेरिका का आरोप है कि ईरान हूतियों को हथियार, प्रशिक्षण और तकनीकी मदद देता है, जिससे वे ड्रोन और मिसाइलों के जरिए हमले करने में सक्षम हुए हैं।

हालांकि, हूतियों को केवल ईरान के इशारे पर चलने वाला संगठन मानना भी पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। उनका अपना नेतृत्व है और यमन के भीतर उनके राजनीतिक तथा क्षेत्रीय हित भी हैं। इसलिए इस संघर्ष को केवल दो देशों के बीच टकराव के रूप में नहीं, बल्कि यमन की आंतरिक राजनीति और व्यापक मध्य पूर्वीय प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में भी समझना जरूरी है।

ईरान और अमेरिका के बीच जारी तनाव तथा लाल सागर में जहाजों की सुरक्षा से जुड़े विवादों ने इस संघर्ष को और जटिल बनाया है। सऊदी अरब को अब अपने एयरपोर्ट, तेल प्रतिष्ठानों और अन्य अहम ठिकानों की सुरक्षा पर भी अतिरिक्त ध्यान देना पड़ रहा है।

तुर्किये के बयान का असली संदेश क्या है?

तुर्किये के रक्षा मंत्री का बयान बताता है कि रक्षा समझौते और वास्तविक सैन्य कार्रवाई के बीच अंतर बना हुआ है। अंकारा सऊदी अरब की सुरक्षा मजबूत करने और संभावित हमलों को रोकने में मदद की बात कर रहा है, लेकिन हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में शामिल होने से इनकार कर रहा है। आगे कितनी मदद दी जाएगी, यह सऊदी अरब की मांग, तुर्किये की संसद की मंजूरी और कानूनी प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगा।

सऊदी अरब के लिए मुश्किल यह है कि सुरक्षा सहयोग के वादे करने वाले देश भी अपने सैनिकों को सीधे संघर्ष में झोंकने से पहले राजनीतिक और कानूनी शर्तें देख रहे हैं। ऐसे में मक्का रक्षा समझौते की वास्तविक उपयोगिता केवल हस्ताक्षर से नहीं, बल्कि संकट की स्थिति में मिलने वाली ठोस सहायता से तय होगी।

रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करना आसान है, लेकिन युद्ध में उतरने की बारी आए तो हर देश अपनी शर्तें गिनाने लगता है। तुर्किये फिलहाल सऊदी अरब की सुरक्षा में मदद की बात कर रहा है, हूतियों से सीधे लड़ने की नहीं। अब देखना होगा कि जरूरत पड़ने पर यह रक्षा साझेदारी कितनी ठोस साबित होती है।

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