Bangladesh में ‘जय श्रीराम’ के नारों के बीच हिंदुओं का विशाल मशाल मार्च: राम प्रतिमा प्रोजेक्ट रुकने पर फूटा गुस्सा, सरकार को 72 घंटे का अल्टीमेटम
Bangladesh Hindu Protest ने बांग्लादेश की राजधानी ढाका में बड़ा रूप ले लिया, जब हजारों हिंदू समुदाय के लोग हाथों में मशाल लेकर सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने भगवान राम की प्रस्तावित विशाल प्रतिमा के निर्माण कार्य को रोके जाने और कथित तौर पर धार्मिक भावनाओं को आहत करने की घटना के खिलाफ जोरदार विरोध दर्ज कराया।
राजधानी के शाहबाग चौराहे से शुरू हुआ यह मशाल मार्च नेशनल प्रेस क्लब तक पहुंचा। पूरे रास्ते “जय श्रीराम” और धार्मिक एकता से जुड़े नारों की गूंज सुनाई देती रही। प्रदर्शन में विभिन्न हिंदू संगठनों, सामाजिक समूहों, छात्रों और नागरिकों ने भाग लिया।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उत्तरी बांग्लादेश के गैबांधा जिले के पलाशबाड़ी क्षेत्र में चल रहे एक मंदिर परिसर निर्माण प्रोजेक्ट को कट्टरपंथी विरोध के चलते रोक दिया गया और इस दौरान भगवान राम की तस्वीर को भी कथित रूप से अपमानित किया गया। इसी घटना ने पूरे मामले को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है।
राम प्रतिमा प्रोजेक्ट को लेकर बढ़ा विवाद, धार्मिक संगठनों में नाराजगी
विवाद का केंद्र गैबांधा जिले का पलाशबाड़ी इलाका है, जहां एक भव्य धार्मिक परिसर विकसित किया जा रहा था। इस परियोजना में भगवान राम की लगभग 81 फुट ऊंची प्रतिमा के साथ भगवान कृष्ण और भगवान शिव की प्रतिमाओं का निर्माण भी प्रस्तावित था।
मंदिर समिति के अनुसार यह परियोजना निजी सहयोग और दानदाताओं की मदद से शुरू की गई थी। निर्माण कार्य 2025 की शुरुआत में प्रारंभ हुआ था और इसे क्षेत्र के सबसे बड़े धार्मिक-सांस्कृतिक प्रोजेक्ट्स में से एक माना जा रहा था।
हालांकि निर्माण कार्य आगे बढ़ने के साथ ही कुछ समूहों ने इसका विरोध शुरू कर दिया। समिति का आरोप है कि बढ़ते तनाव और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण निर्माण कार्य अस्थायी रूप से रोकना पड़ा।
इसी दौरान भगवान राम की तस्वीर के साथ कथित अभद्रता की खबरें सामने आने के बाद हिंदू संगठनों में नाराजगी और अधिक बढ़ गई।
ढाका से लेकर रंगपुर तक विरोध की लहर, गिरफ्तारी की मांग तेज
ढाका में आयोजित विशाल मशाल मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि मामले में शामिल लोगों की तत्काल गिरफ्तारी की जाए और धार्मिक स्थलों तथा अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि घटना को लेकर शिकायत और मामला दर्ज होने के बावजूद अभी तक प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई है। इसी वजह से समुदाय में असंतोष बढ़ रहा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार रंगपुर क्षेत्र में एक छोटे विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हल्की झड़प की सूचना भी सामने आई है। हालांकि स्थिति बाद में नियंत्रण में आ गई।
हिंदू महाजोत ने सरकार को दिया 72 घंटे का अल्टीमेटम
हिंदू महाजोत के बैनर तले आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में नेताओं ने सरकार को 72 घंटे का अल्टीमेटम दिया। उनका कहना है कि यदि निर्धारित समय के भीतर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो देशव्यापी आंदोलन शुरू किया जाएगा।
संगठन के नेताओं ने कहा कि धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली घटनाओं को हल्के में नहीं लिया जा सकता। उन्होंने सरकार से मांग की कि अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं और ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
प्रदर्शनकारियों ने यह भी घोषणा की कि धार्मिक मामलों के मंत्रालय को औपचारिक ज्ञापन सौंपा जाएगा और उच्च स्तर पर इस मुद्दे को उठाया जाएगा।
22 करोड़ टका की परियोजना बनी राष्ट्रीय चर्चा का विषय
जिस परियोजना को लेकर विवाद खड़ा हुआ है, उसकी अनुमानित लागत करीब 22 करोड़ बांग्लादेशी टका बताई जा रही है। भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत लगभग 16 से 17 करोड़ रुपए के आसपास मानी जा रही है।
परियोजना के अंतर्गत भगवान राम की 81 फुट ऊंची प्रतिमा, भगवान कृष्ण की लगभग 53 फुट ऊंची प्रतिमा और भगवान शिव की 30 फुट ऊंची प्रतिमा प्रस्तावित थी। स्थानीय स्तर पर इसे धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान को बढ़ावा देने वाला प्रोजेक्ट माना जा रहा था।
समर्थकों का कहना है कि यह केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन विकास का भी केंद्र बन सकता था।
कट्टरपंथी संगठनों ने फंडिंग की जांच की उठाई मांग
दूसरी ओर कुछ धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने परियोजना की फंडिंग को लेकर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि इस निर्माण कार्य के लिए धन कहां से आया, इसकी जांच होनी चाहिए।
कुछ संगठनों ने खुफिया एजेंसियों द्वारा वित्तीय जांच कराने और परियोजना से जुड़े खातों की समीक्षा की मांग की है। विरोध करने वाले समूहों का दावा है कि इतनी बड़ी परियोजना के पीछे आर्थिक स्रोतों की पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
हालांकि मंदिर समिति का कहना है कि निर्माण कार्य वैध और निजी सहयोग से चलाया जा रहा था तथा सभी प्रक्रियाएं कानूनी दायरे में थीं।
दो वर्षों में धार्मिक परियोजनाओं पर विवाद के कई मामले सामने आए
बांग्लादेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान धार्मिक स्थलों और मूर्ति स्थापना से जुड़े कई विवाद सामने आए हैं। विभिन्न संगठनों का दावा है कि कुछ परियोजनाओं को विरोध के चलते रोका गया या उनमें बदलाव करना पड़ा।
इसी वजह से अल्पसंख्यक समुदायों के बीच धार्मिक स्वतंत्रता और सुरक्षा को लेकर चर्चा लगातार तेज हुई है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक समाज में सभी समुदायों को अपनी आस्था के अनुसार धार्मिक गतिविधियां संचालित करने का अधिकार मिलना चाहिए।
अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा पर फिर उठे सवाल
प्रदर्शन के दौरान कई वक्ताओं ने अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना था कि धार्मिक स्थलों, मंदिरों और सांस्कृतिक प्रतीकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं की गई तो सामाजिक तनाव बढ़ सकता है। इसलिए प्रशासन को निष्पक्ष जांच और कानून के तहत आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
साथ ही उन्होंने धार्मिक सौहार्द बनाए रखने और सभी समुदायों के अधिकारों की रक्षा की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
देशभर में बड़े आंदोलन की तैयारी, 64 जिलों में अभियान की घोषणा
हिंदू संगठनों ने संकेत दिए हैं कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं होती तो आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित किया जाएगा। कई संगठनों ने देश के विभिन्न जिलों में जागरूकता अभियान, रैलियां और जनसभाएं आयोजित करने की योजना बनाई है।
कुछ संगठनों ने 64 जिलों में धार्मिक और सांस्कृतिक जागरूकता कार्यक्रम शुरू करने की भी घोषणा की है। इसके साथ ही धार्मिक अधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर व्यापक अभियान चलाने की तैयारी की जा रही है।
राजनीतिक और सामाजिक हलकों में बढ़ी चर्चा
ढाका में हुए इस बड़े प्रदर्शन के बाद बांग्लादेश के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है। एक ओर धार्मिक संगठनों की मांगें हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार और प्रशासन पर निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित करने का दबाव बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में संवेदनशीलता, संवाद और कानून के दायरे में समाधान ही स्थायी रास्ता हो सकता है। धार्मिक आस्था और सामाजिक सौहार्द दोनों को संतुलित रखते हुए प्रशासन के सामने स्थिति को संभालने की चुनौती बनी हुई है।

