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Caste Census/जातिगत जनगणना पर मचा घमासान: सियासत गरमाई, NDA का मास्टरस्ट्रोक बनाम विपक्ष की जीत

देश की राजनीति एक बार फिर जातिगत जनगणना (Caste Census) के मुद्दे पर धधक उठी है। केंद्र सरकार के इस फैसले ने ना सिर्फ विपक्ष को चौंका दिया है बल्कि सत्ताधारी NDA के लिए यह एक बड़ा सियासी मास्टरस्ट्रोक बनकर उभरा है। विपक्ष इसे अपनी जीत बताकर जश्न मना रहा है तो वहीं NDA के घटक दल इसे सामाजिक न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम मान रहे हैं।

राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष और NDA के प्रमुख नेता उपेंद्र कुशवाहा ने खुलकर आरोप लगाया है कि दक्षिण भारत के कुछ राजनीतिक दल “परिसीमन” (Delimitation) के बहाने जातिगत जनगणना को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि यह साजिश इसलिए रची जा रही है क्योंकि अगर जनसंख्या के आधार पर संसद में सीटों का निर्धारण हुआ तो दक्षिण भारत की राजनीतिक ताकत प्रभावित हो सकती है।


राजनीतिक लाभ बनाम जनसंख्या का न्याय: केंद्र सरकार का बड़ा दांव

जातिगत जनगणना का मुद्दा सालों से राजनीतिक चर्चा का विषय रहा है, लेकिन पहली बार केंद्र ने इस पर स्पष्ट रुख अपनाया है। केंद्र के इस कदम के पीछे NDA की रणनीति साफ नजर आ रही है—ओबीसी, एससी, एसटी और कमजोर वर्गों को सीधे जोड़ने की कोशिश। जातिगत आंकड़ों के आधार पर नीतियां बनाना अब सिर्फ मांग नहीं, बल्कि जरूरत बन गई है।

उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बयान में साफ कहा कि यह जनगणना सिर्फ संख्या के आधार पर नहीं, बल्कि समानता और संविधान के मूलभूत सिद्धांत ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ की भावना को सशक्त बनाने के लिए जरूरी है।


परिसीमन का राजनीतिक गणित: किसे मिलेगा फायदा?

वर्तमान में दक्षिण भारत के राज्यों की सीटें आबादी के अनुपात में ज्यादा हैं। जहां दक्षिण भारत में औसतन 21 लाख लोग एक सांसद चुनते हैं, वहीं हिंदी बेल्ट के राज्यों में यह आंकड़ा 31 लाख से ऊपर है। यह असमानता संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध है।

उपेंद्र कुशवाहा के अनुसार, यदि मौजूदा जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ तो बिहार में लोकसभा सीटों की संख्या 40 से बढ़कर 60 हो सकती है। इससे ना केवल सामान्य वर्ग, बल्कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग को भी अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा।

दक्षिण भारत का डर: सियासत या हकीकत?

दक्षिण भारत के कुछ राजनीतिक दल यह तर्क दे रहे हैं कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए सज़ा के रूप में उनकी सीटें घटेंगी, जबकि सच्चाई इससे अलग है। उपेंद्र कुशवाहा ने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश काल में उत्तर भारत की जनसंख्या में भारी गिरावट आई थी, जबकि दक्षिण भारत में यह बढ़ती रही। शुरुआती परिसीमन में दक्षिण के राज्यों को इस बढ़ी हुई आबादी का फायदा मिला, लेकिन अब जब उत्तर भारत में जनसंख्या अधिक हो गई है, तो परिसीमन पर रोक लगाकर उत्तर भारत को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।


आंकड़े जो कहानी कहते हैं

  • 1951, 1961, 1971 की जनगणना के आधार पर परिसीमन हुआ।

  • आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन के जरिए परिसीमन को 25 वर्षों के लिए स्थगित किया गया।

  • 2001 में इस अवधि को फिर 2026 तक के लिए बढ़ा दिया गया।

  • अब 2026 के बाद परिसीमन की प्रक्रिया दोबारा शुरू होगी।

उपेंद्र कुशवाहा ने चेतावनी दी कि कुछ ताकतें “गलत तथ्यों” के आधार पर परिसीमन रोकने की साजिश कर रही हैं, जो न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि सामाजिक न्याय के साथ भी खिलवाड़ है।


एक नई सामाजिक संरचना की ओर

जातिगत जनगणना के बाद नीति निर्धारण में क्रांतिकारी बदलाव आ सकते हैं। सरकारी नौकरियों, शैक्षणिक संस्थानों और कल्याणकारी योजनाओं में वास्तविक ज़रूरतमंदों तक सुविधाएं पहुँच सकेंगी। इसके अलावा OBC की अलग-अलग श्रेणियों की पहचान कर उन्हें समान रूप से लाभ पहुंचाया जा सकेगा।

जातिगत जनगणना न सिर्फ राजनैतिक संतुलन को प्रभावित करेगी, बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूती भी देगी। इस निर्णय से यह संदेश स्पष्ट है कि अब सरकार गरीब, पिछड़े और वंचित तबकों को मुख्यधारा में लाने के लिए प्रतिबद्ध है।


भविष्य की राजनीति: क्या बदलेगा समीकरण?

जातिगत जनगणना से चुनावी समीकरणों में भारी फेरबदल की संभावना जताई जा रही है। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में जहां जातीय आधार पर राजनीति की जड़ें गहरी हैं, वहां इसका असर सबसे अधिक होगा। वहीं दक्षिण भारत के राज्य, जो खुद को ‘प्रगतिशील और आधुनिक’ मानते हैं, उनके लिए यह फैसला अप्रत्याशित झटका साबित हो सकता है।

विपक्ष की ओर से इसे अपनी सफलता बताकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश हो रही है, जबकि NDA इसे अपने ‘समावेशी विकास’ के एजेंडे के तहत मास्टरस्ट्रोक मान रही है।


निष्पक्ष प्रतिनिधित्व की जरूरत

Caste Census केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और राजनीतिक समानता की नींव है। यदि जनसंख्या के अनुसार संसदीय प्रतिनिधित्व नहीं होता तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है। अब जब 2026 नजदीक है, सरकार के पास अवसर है कि वह परिसीमन की प्रक्रिया को निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ लागू करे।

दक्षिण और उत्तर भारत के राजनीतिक दलों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र में किसी क्षेत्र या जाति की अनदेखी न हो। हर नागरिक को उसका संवैधानिक अधिकार मिलना ही चाहिए।

News-Desk

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