अमेरिका का ड्रोन पर ‘टैरिफ बम’: Trump ने अनमैन्ड ड्रोन और कंपोनेंट्स पर लगाया 100% तक शुल्क, चीन की 70% बाजार हिस्सेदारी पर सीधा वार
Trump Drone Tariff के ऐलान के साथ अमेरिका ने ड्रोन टेक्नोलॉजी के वैश्विक कारोबार में एक बड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड Trump ने अनमैन्ड ड्रोन यानी बिना पायलट वाले विमान और उनके कंपोनेंट्स के आयात पर 100% तक टैरिफ लगाने की घोषणा की है। अमेरिकी प्रशासन ने इस फैसले को राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करना और अमेरिका के भीतर ड्रोन निर्माण को बढ़ावा देना है।
यह फैसला खास तौर पर चीन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वैश्विक कॉमर्शियल ड्रोन बाजार में चीनी कंपनियों का लंबे समय से मजबूत दबदबा रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल तक अमेरिकी कॉमर्शियल ड्रोन बाजार में चीन की प्रमुख कंपनी DJI की हिस्सेदारी करीब 70% तक बताई गई थी।
ऐसे में अमेरिका की नई टैरिफ नीति केवल सामान्य व्यापार शुल्क बढ़ाने का फैसला नहीं है। इसे ड्रोन टेक्नोलॉजी, राष्ट्रीय सुरक्षा, सप्लाई चेन और अमेरिका-चीन तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बड़े परिदृश्य में देखा जा रहा है।
ड्रोन पर 100% तक टैरिफ क्यों लगाया गया?
व्हाइट हाउस की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, अमेरिका ने अनमैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम को अपनी राष्ट्रीय और आर्थिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना है।
अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि ड्रोन अब केवल कैमरा लगाने या वीडियो बनाने वाले छोटे विमान नहीं रह गए हैं। आधुनिक समय में इनका इस्तेमाल निगरानी, सुरक्षा, लॉजिस्टिक्स, औद्योगिक निरीक्षण, कृषि, आपदा प्रबंधन और सैन्य अभियानों तक में हो रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने ड्रोन की सैन्य उपयोगिता को और स्पष्ट कर दिया है। युद्ध के मैदान में छोटे और बड़े ड्रोन निगरानी से लेकर हमले तक के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
ऐसे में अमेरिका चाहता है कि इस रणनीतिक तकनीक और उससे जुड़े महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स की आपूर्ति पर उसका अधिक नियंत्रण हो।
चीन पर निर्भरता घटाने की कोशिश
अमेरिकी नीति का सबसे बड़ा संकेत चीन की ओर जाता है।
अमेरिकी बाजार में चीनी ड्रोन कंपनियों की मजबूत मौजूदगी लंबे समय से अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों के लिए चिंता का विषय रही है। खासकर उन ड्रोन को लेकर सवाल उठते रहे हैं जो संवेदनशील डेटा एकत्र कर सकते हैं या जिनके सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर विदेशी सप्लाई चेन पर निर्भर हैं।
टैरिफ बढ़ाकर अमेरिका घरेलू कंपनियों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देना चाहता है।
इसके पीछे सोच यह है कि अगर विदेशी ड्रोन महंगे हो जाएंगे तो अमेरिकी सरकारी एजेंसियां, कंपनियां और दूसरे खरीदार घरेलू या मित्र देशों के निर्माताओं की ओर रुख कर सकते हैं।
DJI की करीब 70% हिस्सेदारी क्यों महत्वपूर्ण है?
शेनझेन स्थित DJI Technologies वैश्विक ड्रोन उद्योग की सबसे प्रमुख कंपनियों में से एक है।
अमेरिकी कॉमर्शियल ड्रोन बाजार में पिछले साल तक DJI की करीब 70% हिस्सेदारी बताई गई थी।
इतनी बड़ी हिस्सेदारी का मतलब है कि अमेरिकी बाजार में किसी भी ऐसी नीति का असर व्यापक हो सकता है जो चीनी ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स को महंगा या सीमित कर दे।
नई टैरिफ नीति के बाद अमेरिकी खरीदारों को वैकल्पिक कंपनियों की तलाश करनी पड़ सकती है।
यही वह बदलाव है जिसे विशेषज्ञ अमेरिकी ड्रोन बाजार के संभावित पुनर्गठन के रूप में देख रहे हैं।
सिर्फ चीन नहीं, सहयोगी देशों पर भी असर
ट्रंप प्रशासन का फैसला केवल चीन को लक्ष्य बनाकर नहीं बनाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने ब्रिटेन और यूरोप सहित सात सहयोगी देशों से आने वाले ड्रोन पर भी टैरिफ का प्रावधान किया है।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे साफ होता है कि अमेरिकी नीति का उद्देश्य केवल चीन पर आर्थिक दबाव बनाना नहीं, बल्कि पूरे ड्रोन सप्लाई नेटवर्क को नए सिरे से व्यवस्थित करना भी हो सकता है।
अमेरिका चाहता है कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स की सप्लाई अधिक भरोसेमंद स्रोतों से हो।
टैरिफ का ढांचा ड्रोन की क्षमता के आधार पर
व्हाइट हाउस की जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील माने जाने वाले ड्रोन पर 100% तक टैरिफ लगाया जाएगा।
टैरिफ स्ट्रक्चर अलग-अलग समय-सीमा में लागू किए जाने की व्यवस्था के साथ सामने आया है।
इसका अर्थ यह है कि सभी उत्पादों पर एक समान तरीके से तुरंत शुल्क लागू करने के बजाय कुछ श्रेणियों और छूट प्राप्त उत्पादों के लिए अलग समय-सीमा निर्धारित की गई है।
इस व्यवस्था से अमेरिकी प्रशासन को संवेदनशील ड्रोन और सामान्य व्यावसायिक उत्पादों के बीच अंतर करने का अवसर मिल सकता है।
180 दिन बाद कुछ छूट वाले उत्पादों पर भी असर
नई व्यवस्था में विशेष छूट से जुड़े प्रावधान भी रखे गए हैं।
बताया गया है कि हस्ताक्षर के 20 दिनों के भीतर अमेरिकी युद्ध विभाग द्वारा FCC की Covered List से छूट प्राप्त कुछ उत्पादों और कंपोनेंट्स पर टैरिफ 180 दिन बाद प्रभावी होगा।
इससे संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन संक्रमण के लिए कुछ समय देना चाहता है, ताकि कंपनियां नई व्यवस्था के अनुरूप अपनी सप्लाई चेन और खरीद नीति को बदल सकें।
अमेरिका में ड्रोन निर्माण बढ़ाने की बड़ी योजना
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि नए टैरिफ से अमेरिका में ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स का घरेलू उत्पादन बढ़ेगा।
अमेरिका लंबे समय से चीन पर निर्भरता कम करने के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों में स्थानीय उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
सेमीकंडक्टर से लेकर बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और अब ड्रोन तक—रणनीतिक तकनीकों में सप्लाई चेन को घरेलू या सहयोगी देशों की ओर मोड़ना अमेरिकी आर्थिक नीति का बड़ा हिस्सा बनता जा रहा है।
ड्रोन क्षेत्र भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा बन सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा से क्यों जोड़ा गया ड्रोन?
ड्रोन को लेकर सबसे बड़ी चिंता उनकी निगरानी और डेटा संग्रह क्षमता से जुड़ी है।
आधुनिक ड्रोन कैमरा, सेंसर, GPS और दूसरे संचार उपकरणों से लैस होते हैं। कुछ सिस्टम बड़ी मात्रा में डेटा एकत्र और ट्रांसमिट कर सकते हैं।
अगर ऐसे उपकरण संवेदनशील सरकारी या सैन्य क्षेत्रों के आसपास इस्तेमाल किए जाते हैं, तो डेटा सुरक्षा का सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है।
इसी वजह से अमेरिका ड्रोन तकनीक को केवल व्यापारिक उत्पाद के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी देख रहा है।
FCC की कार्रवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी
ड्रोन क्षेत्र में अमेरिकी प्रतिबंधों की यह पहल अचानक शुरू नहीं हुई है।
पिछले साल दिसंबर में अमेरिकी Federal Communications Commission यानी FCC ने चीनी ड्रोन से जुड़ी तकनीक पर कार्रवाई की थी।
अमेरिकी प्रशासन पहले ही कुछ विदेशी कंपनियों के उपकरणों को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं व्यक्त करता रहा है।
नई टैरिफ नीति उसी व्यापक अभियान का अगला चरण मानी जा रही है।
चीनी ड्रोन कंपनियों पर बढ़ रहा अमेरिकी दबाव
अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा पिछले कई वर्षों से लगातार बढ़ रही है।
सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, दूरसंचार, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी और अब ड्रोन टेक्नोलॉजी—कई क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है।
अमेरिका चीनी कंपनियों पर सुरक्षा संबंधी चिंताओं के आधार पर कई तरह की पाबंदियां लगा चुका है।
ड्रोन उद्योग में भी यही रुझान दिखाई दे रहा है।
चीन ने भी अमेरिका के खिलाफ उठाया था कदम
अमेरिका के इस फैसले से पहले चीन की ओर से भी अमेरिकी कंपनियों पर कार्रवाई की गई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने अमेरिकी व्यापारिक प्रतिबंधों के जवाब में अमेरिका को ड्रोन निर्यात पर रोक लगाई थी और छह अमेरिकी कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया था।
अगर दोनों देश ड्रोन टेक्नोलॉजी के कारोबार में एक-दूसरे पर प्रतिबंध बढ़ाते हैं तो इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रह सकता।
वैश्विक सप्लाई चेन में कई कंपनियां और देश किसी न किसी रूप में दोनों बाजारों से जुड़े हुए हैं।
अमेरिका-चीन टेक वॉर में ड्रोन नया मोर्चा
अब ड्रोन तकनीक अमेरिका और चीन की तकनीकी प्रतिस्पर्धा का नया मोर्चा बनती दिखाई दे रही है।
ड्रोन की खासियत यह है कि इनका उपयोग नागरिक और सैन्य दोनों क्षेत्रों में होता है।
एक ही तकनीक कृषि सर्वेक्षण, फिल्म शूटिंग और पैकेज डिलीवरी में इस्तेमाल हो सकती है, जबकि वही तकनीक युद्ध के मैदान में निगरानी और हमले के लिए भी उपयोग की जा सकती है।
इसी दोहरे उपयोग के कारण ड्रोन तकनीक पर नियंत्रण रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।
रूस-यूक्रेन युद्ध ने बदल दिया ड्रोन का महत्व
रूस-यूक्रेन युद्ध ने ड्रोन की उपयोगिता को अभूतपूर्व स्तर पर सामने ला दिया है।
दोनों पक्षों ने विभिन्न प्रकार के ड्रोन का इस्तेमाल निगरानी, लक्ष्य की पहचान, तोपखाने को दिशा देने और हमले के लिए किया है।
कम लागत वाले ड्रोन भी युद्धक्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रभाव पैदा कर सकते हैं।
यही कारण है कि दुनिया की बड़ी सैन्य शक्तियां अब ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक दोनों में निवेश बढ़ा रही हैं।
हाइब्रिड वॉर में ड्रोन की भूमिका
आधुनिक युद्ध अब केवल टैंक, लड़ाकू विमान और सैनिकों तक सीमित नहीं है।
साइबर हमले, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, ड्रोन, सैटेलाइट निगरानी और सूचना युद्ध मिलकर एक नया युद्ध मॉडल बना रहे हैं।
इसे अक्सर हाइब्रिड वॉर के व्यापक संदर्भ में देखा जाता है।
ड्रोन इस बदलते युद्ध मॉडल में अपेक्षाकृत कम लागत पर निगरानी और सटीक कार्रवाई की क्षमता देते हैं।
यही कारण है कि अमेरिका अपने ड्रोन उद्योग को राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से मजबूत करना चाहता है।
अमेरिकी खरीदारों को अब बदलना पड़ सकता है सप्लायर
अमेरिका की नई टैरिफ व्यवस्था का सबसे तत्काल प्रभाव ड्रोन खरीदने वाली कंपनियों पर पड़ सकता है।
अगर आयातित ड्रोन और उनके कंपोनेंट्स काफी महंगे हो जाते हैं तो सरकारी एजेंसियों और कॉमर्शियल कंपनियों को वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश करनी होगी।
इसका मतलब अमेरिकी या मित्र देशों की कंपनियों के लिए नए बाजार खुल सकते हैं।
लेकिन इस बदलाव की कीमत भी चुकानी पड़ सकती है।
ड्रोन महंगे हुए तो लागत बढ़ेगी
चीन की कंपनियां लंबे समय से लागत और बड़े पैमाने पर उत्पादन के कारण प्रतिस्पर्धी रही हैं।
यदि अमेरिकी बाजार में चीनी ड्रोन की कीमतों पर 100% तक अतिरिक्त शुल्क लगता है, तो आयातित उपकरण काफी महंगे हो सकते हैं।
इसके बाद कंपनियों को या तो अतिरिक्त लागत खुद वहन करनी होगी या फिर इसका असर ग्राहकों तक पहुंच सकता है।
सरकारी संस्थानों के लिए भी खरीद बजट को नए सिरे से तय करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञ ने बताया—बाजार का ढांचा बदल सकता है
अमेरिका-चीन टेक्नोलॉजी प्रतिस्पर्धा के विशेषज्ञ क्रेग सिंगलेटन ने Financial Times से बातचीत में इस फैसले को कॉमर्शियल ड्रोन बाजार के लिए बड़ा बदलाव बताया।
उनके अनुसार अमेरिकी कॉमर्शियल और सरकारी खरीदारों को तत्काल बड़े पूंजीगत बदलाव की जरूरत पड़ सकती है।
उन्हें अमेरिका या सहयोगी देशों के सप्लायर्स की ओर जाना पड़ सकता है, भले ही उनके उत्पाद महंगे हों।
इसका सीधा अर्थ है कि अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा का पूरा समीकरण बदल सकता है।
अमेरिकी कंपनियों के लिए बड़ा मौका
अगर चीन की कंपनियों की हिस्सेदारी कम होती है तो अमेरिकी कंपनियों के लिए बड़ा अवसर पैदा होगा।
घरेलू कंपनियां ड्रोन निर्माण, मोटर, बैटरी, सेंसर, कैमरा, संचार प्रणाली और सॉफ्टवेयर जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ा सकती हैं।
इसके साथ ही नए स्टार्टअप भी बाजार में प्रवेश कर सकते हैं।
सरकार की खरीद नीतियां अगर घरेलू कंपनियों के पक्ष में जाती हैं तो अमेरिकी ड्रोन उद्योग को लंबे समय में बड़ा प्रोत्साहन मिल सकता है।
लेकिन घरेलू उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं
घरेलू ड्रोन उद्योग को मजबूत करना केवल टैरिफ लगाने से संभव नहीं होगा।
ड्रोन बनाने के लिए मोटर, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, कैमरा, चिप, संचार मॉड्यूल और सॉफ्टवेयर जैसी कई तकनीकों की जरूरत होती है।
अगर इनमें से महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स अभी भी विदेशों से आते हैं तो केवल अंतिम उत्पाद पर टैरिफ लगाने से निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
इसलिए अमेरिका को पूरी सप्लाई चेन विकसित करनी होगी।
ड्रोन के साथ कंपोनेंट्स पर भी फोकस
नई नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि केवल तैयार ड्रोन ही नहीं, बल्कि उनके कंपोनेंट्स को भी ध्यान में रखा गया है।
यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि किसी देश में ड्रोन असेंबल करना और पूरी तकनीकी सप्लाई चेन का स्वदेशी होना दो अलग बातें हैं।
यदि मोटर, बैटरी, सेंसर या संचार प्रणाली बाहर से आती है तो सप्लाई चेन की निर्भरता बनी रह सकती है।
अमेरिका अब इस निर्भरता को व्यापक स्तर पर कम करना चाहता है।
सहयोगी देशों पर टैरिफ से पैदा हो सकती है चुनौती
ब्रिटेन और यूरोप जैसे सहयोगी देशों से आने वाले ड्रोन पर भी शुल्क लगाने का फैसला अमेरिकी व्यापार नीति के लिए महत्वपूर्ण है।
अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाना चाहता है, लेकिन रणनीतिक तकनीक में घरेलू उत्पादन को प्राथमिकता देने की कोशिश भी कर रहा है।
इससे सहयोगी देशों की ड्रोन कंपनियों पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बढ़ सकता है।
साथ ही इन देशों की कंपनियों को अमेरिकी बाजार में बने रहने के लिए स्थानीय उत्पादन या साझेदारी की ओर जाना पड़ सकता है।
टैरिफ से चीन की ड्रोन इंडस्ट्री पर दबाव
चीन के लिए अमेरिका एक बड़ा बाजार है।
अगर अमेरिकी बाजार में चीनी ड्रोन पर भारी शुल्क लगता है तो कंपनियों को अपनी बिक्री रणनीति बदलनी पड़ सकती है।
वे दूसरे देशों में बाजार बढ़ाने की कोशिश कर सकती हैं या अमेरिका में स्थानीय साझेदारी के जरिए कारोबार जारी रखने का रास्ता तलाश सकती हैं।
लेकिन सुरक्षा संबंधी अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण केवल कीमत कम करना पर्याप्त नहीं हो सकता।
ट्रम्प और शी जिनपिंग की बैठक से पहले बढ़ा तनाव
यह फैसला ऐसे समय में सामने आया है जब ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच आगामी बैठक को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा है।
ऐसे में ड्रोन पर 100% तक टैरिफ का ऐलान अमेरिका-चीन व्यापार संबंधों में एक और तनावपूर्ण मुद्दा बन सकता है।
दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर पहले से ही कई विवाद मौजूद हैं।
ड्रोन उद्योग अब इस सूची में एक और महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है।
क्या यह सिर्फ व्यापार नीति है या सुरक्षा रणनीति भी?
अमेरिकी प्रशासन इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ रहा है। इसलिए इस फैसले को केवल राजस्व बढ़ाने वाले टैरिफ के रूप में देखना अधूरा होगा।
ड्रोन ऐसी तकनीक है जिसका इस्तेमाल नागरिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए हो सकता है।
इस दोहरे उपयोग की वजह से अमेरिका इसे रणनीतिक तकनीक के रूप में देख रहा है।
यही कारण है कि घरेलू उत्पादन और विश्वसनीय सप्लाई चेन को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
UAS क्या होता है?
Unmanned Aircraft System यानी UAS को सामान्य भाषा में ड्रोन कहा जाता है।
ये ऐसे विमान होते हैं जिनमें इंसानी पायलट विमान के अंदर मौजूद नहीं होता। इन्हें रिमोट कंट्रोल के जरिए संचालित किया जा सकता है या कुछ परिस्थितियों में स्वचालित सॉफ्टवेयर और सेंसर की मदद से उड़ाया जा सकता है।
UAS में केवल उड़ने वाला ड्रोन ही शामिल नहीं होता। इसके साथ नियंत्रण प्रणाली, संचार उपकरण, सॉफ्टवेयर और अन्य आवश्यक तकनीकी हिस्से भी हो सकते हैं।
इसीलिए अमेरिकी नीति में कंपोनेंट्स पर भी ध्यान दिया गया है।
ड्रोन का इस्तेमाल कहां-कहां होता है?
ड्रोन का इस्तेमाल अब कई क्षेत्रों में हो रहा है।
फोटोग्राफी और वीडियो शूटिंग से लेकर कृषि सर्वेक्षण, बिजली लाइनों और पुलों का निरीक्षण, आपदा प्रबंधन, सामान की डिलीवरी, मैपिंग और सुरक्षा निगरानी तक में ड्रोन इस्तेमाल किए जाते हैं।
इसके अलावा सैन्य क्षेत्र में इनकी भूमिका लगातार बढ़ी है।
युद्धक्षेत्र में ड्रोन निगरानी, लक्ष्य पहचान और हमले जैसी भूमिकाओं में इस्तेमाल किए जा सकते हैं।
कॉमर्शियल ड्रोन बाजार के लिए बड़ा मोड़
अमेरिकी बाजार में भारी टैरिफ लागू होने के बाद कंपनियों को अपने खरीद मॉडल पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
कुछ कंपनियां घरेलू निर्माताओं की ओर जाएंगी। कुछ सहयोगी देशों के निर्माताओं को चुन सकती हैं। वहीं कुछ कंपनियां अपने ड्रोन खुद विकसित करने में निवेश कर सकती हैं।
इस तरह टैरिफ अमेरिकी ड्रोन बाजार में एक बड़े पुनर्गठन की शुरुआत कर सकता है।
क्या अमेरिका चीन से पूरी तरह अलग हो पाएगा?
यह सबसे बड़ा सवाल है।
अमेरिका तकनीकी रूप से मजबूत है, लेकिन ड्रोन की पूरी सप्लाई चेन को चीन से अलग करना आसान नहीं होगा।
चीन ने वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, मोटर, मैन्युफैक्चरिंग और ड्रोन असेंबली के क्षेत्र में बड़ा औद्योगिक आधार तैयार किया है।
इसलिए अमेरिका को वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार करने में समय और बड़े निवेश की जरूरत पड़ सकती है।
टैरिफ के बाद बढ़ सकता है अमेरिकी ड्रोन उद्योग में निवेश
अगर नई नीति लंबे समय तक जारी रहती है तो अमेरिका में ड्रोन निर्माण को लेकर निवेश बढ़ने की संभावना है।
नए कारखाने, रिसर्च सेंटर, कंपोनेंट उत्पादन इकाइयां और सॉफ्टवेयर कंपनियां इस क्षेत्र में आगे आ सकती हैं।
सरकारी खरीद में घरेलू कंपनियों को प्राथमिकता मिलने पर इस क्षेत्र को और गति मिल सकती है।
ड्रोन तकनीक अब सिर्फ खिलौना नहीं रही
एक समय ड्रोन को मुख्य रूप से कैमरा उड़ाने वाले छोटे उपकरण के रूप में देखा जाता था।
आज इसकी तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है।
आधुनिक ड्रोन सेंसर, कैमरा, AI आधारित सिस्टम, GPS, संचार तकनीक और स्वचालित नेविगेशन से लैस हो सकते हैं।
इसी वजह से अमेरिका और चीन जैसी बड़ी शक्तियां ड्रोन तकनीक पर नियंत्रण को रणनीतिक प्राथमिकता दे रही हैं।
अमेरिका-चीन तकनीकी टकराव का अगला चरण
ट्रंप का नया टैरिफ अमेरिकी-चीन तकनीकी प्रतिस्पर्धा को और तेज कर सकता है।
यदि चीन जवाबी कार्रवाई करता है तो ड्रोन के साथ दूसरे तकनीकी क्षेत्रों में भी व्यापारिक तनाव बढ़ सकता है।
इसका असर वैश्विक बाजार पर पड़ सकता है, क्योंकि दोनों देश वैश्विक तकनीकी सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका रखते हैं।
दुनिया के दूसरे देशों पर भी पड़ेगा असर
अमेरिका और चीन के बीच ड्रोन व्यापार का विवाद बाकी देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
जिन देशों की कंपनियां चीन से ड्रोन या कंपोनेंट्स खरीदती हैं, उन्हें अमेरिकी नियमों के अनुरूप अपनी सप्लाई चेन की समीक्षा करनी पड़ सकती है।
वहीं अमेरिकी या सहयोगी देशों के निर्माताओं के लिए नए बाजार खुल सकते हैं।
इस तरह ड्रोन उद्योग का वैश्विक व्यापारिक नक्शा भी धीरे-धीरे बदल सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम सस्ती तकनीक की चुनौती
अमेरिकी नीति के सामने एक बड़ा संतुलन है।
एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भरोसेमंद ड्रोन सप्लाई चेन जरूरी है, दूसरी ओर कंपनियां लागत कम रखना चाहती हैं।
यदि घरेलू या मित्र देशों के ड्रोन महंगे हैं तो कंपनियों की परिचालन लागत बढ़ सकती है।
आने वाले समय में अमेरिकी बाजार में इसी संतुलन की सबसे ज्यादा परीक्षा होगी।
ट्रंप का ड्रोन टैरिफ कितना बड़ा बदलाव साबित होगा?
अगर अमेरिकी नीति लंबे समय तक कायम रहती है तो इसका प्रभाव केवल ड्रोन की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा।
इससे अमेरिकी विनिर्माण, रक्षा उद्योग, सरकारी खरीद, कृषि तकनीक, लॉजिस्टिक्स और सुरक्षा क्षेत्र में भी बदलाव आ सकता है।
चीन की कंपनियों को अमेरिकी बाजार में अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है।
और अमेरिकी कंपनियों को पहली बार बड़े पैमाने पर वैश्विक ड्रोन बाजार में चीन के मुकाबले अपनी क्षमता साबित करने का मौका मिल सकता है।
आने वाले महीनों में नजर रहेगी तीन मोर्चों पर
नई नीति के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल होंगे—टैरिफ वास्तव में किस-किस उत्पाद पर कितना लागू होता है, किन कंपनियों और उत्पादों को छूट मिलती है और चीन की ओर से इसका जवाब क्या आता है।
इसके अलावा अमेरिकी कंपनियां किस तेजी से घरेलू उत्पादन बढ़ाती हैं, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
यदि उत्पादन तेजी से बढ़ता है तो ट्रंप प्रशासन का लक्ष्य मजबूत हो सकता है। यदि लागत बहुत बढ़ती है तो अमेरिकी खरीदारों पर दबाव भी बढ़ सकता है।

