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इजराइल के साथ अब्राहम समझौते में Kazakhstan का भी हुआ शामिल, ट्रम्प ने दी घोषणा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार को Kazakhstan  के अब्राहम समझौते में शामिल होने की घोषणा की। यह समझौता इजराइल और मुस्लिम देशों के बीच रिश्ते सामान्य बनाने का प्रयास करता है। ट्रम्प ने इस समझौते के तहत कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम जोमार्ट टोकायेव के साथ बातचीत के बाद यह जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि जल्द ही साइनिंग सेरेमनी की तारीख की घोषणा की जाएगी और कई अन्य देशों ने भी इस समझौते में शामिल होने की इच्छा जताई है।

इस निर्णय ने यह स्पष्ट किया कि अमेरिका मध्य एशिया में अपने प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। खासकर, रूस और चीन की बढ़ती उपस्थिति के बीच यह एक अहम कदम साबित हो सकता है।

अब्राहम समझौता क्या है?

अब्राहम समझौते की शुरुआत 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल के दौरान हुई थी। इस समझौते का उद्देश्य इजराइल और कुछ मुस्लिम देशों के बीच दोस्ताना रिश्ते स्थापित करना था। इसका नाम अब्राहम रखा गया था, जो तीन प्रमुख धर्मों, यहूदी, ईसाई और इस्लाम के पैगंबर माने जाते हैं। समझौते में शामिल होने वाले देशों में UAE (संयुक्त अरब अमीरात), बहरीन, और मोरक्को शामिल थे। इन देशों ने इजराइल के साथ कूटनीतिक रिश्ते स्थापित किए, जिसमें दूतावास खोलने, व्यापार करने और सैन्य और तकनीकी साझेदारी बढ़ाने पर सहमति जताई थी।

यह समझौता फिलिस्तीन विवाद के बाद इजराइल और मुस्लिम देशों के बीच तनावपूर्ण रिश्तों को सामान्य करने का प्रयास था। इस समझौते ने पहली बार मुस्लिम देशों को इजराइल के साथ खुलकर रिश्ते स्थापित करने का रास्ता दिया। हालांकि, कई मुस्लिम देशों और फिलिस्तीन समर्थकों ने इस समझौते को फिलिस्तीन के साथ अन्याय मानते हुए आलोचना की। उनका कहना है कि इजराइल से रिश्ते तभी सामान्य होने चाहिए जब फिलिस्तीन को उसका अधिकार मिल जाए।

ट्रम्प का दावा – अब्राहम समझौते का विस्तार

डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार को व्हाइट हाउस में कजाकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान के नेताओं से मुलाकात की। ट्रम्प ने कहा, “इनमें से कई देश अब्राहम समझौते में शामिल होने के इच्छुक हैं और जल्द ही हम इसका ऐलान करेंगे।” उनका दावा है कि उन्होंने अपने कार्यकाल में इस समझौते को और बड़ा बनाने की योजना बनाई है।

यह मुलाकात इसलिए भी अहम थी, क्योंकि रूस और चीन की मजबूत मौजूदगी के बावजूद अमेरिका सेंट्रल एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इन देशों के साथ रिश्तों को सुधारना अमेरिका के लिए रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

गाजा युद्ध का असर

2021 में शुरू हुआ गाजा युद्ध अब्राहम समझौते के विस्तार में रुकावट डालने वाला प्रमुख कारण बन गया। गाजा में इजराइल और हमास के बीच युद्ध के कारण कई मुस्लिम देशों में इजराइल के खिलाफ गुस्सा बढ़ गया था। इसके परिणामस्वरूप, सऊदी अरब जैसे प्रमुख देशों का अब्राहम समझौते में शामिल होना फिलहाल ठप हो गया है।

सऊदी अरब ने साफ कहा है कि फिलिस्तीन के अधिकारों को स्वीकार किए बिना कोई समझौता नहीं किया जाएगा। यह बयान इस बात का संकेत था कि फिलिस्तीन मुद्दा तब तक सुलझाना होगा, जब तक सऊदी अरब इस समझौते में शामिल होने पर विचार करेगा।

कजाकिस्तान-इजराइल के बीच पहले से राजनयिक संबंध

कजाकिस्तान ने इजराइल के साथ पहले ही राजनयिक और आर्थिक संबंध स्थापित किए हुए थे। इसलिए कजाकिस्तान का अब्राहम समझौते में शामिल होना एक औपचारिक कदम ही माना जा रहा है। कजाकिस्तान के सरकारी बयान में कहा गया, “अब्राहम समझौते में शामिल होना हमारी विदेश नीति के स्वाभाविक विस्तार की तरह है। यह बातचीत, आपसी सम्मान और क्षेत्रीय स्थिरता पर आधारित है।”

कजाकिस्तान के शामिल होने से अब्राहम समझौते को मिलेगी रफ्तार

अमेरिका को उम्मीद है कि कजाकिस्तान के इस समझौते में शामिल होने से अब्राहम समझौता एक बार फिर रफ्तार पकड़ सकेगा, क्योंकि पिछले कई महीनों से गाजा युद्ध के कारण इसे ठप कर दिया गया था। कजाकिस्तान की उपस्थिति इस समझौते के विस्तार के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है, जिससे अन्य मुस्लिम देशों को भी इजराइल से रिश्ते स्थापित करने में मदद मिल सकती है।

अब्राहम समझौते का भविष्य

अब्राहम समझौते के बढ़ने के साथ यह सवाल उठता है कि भविष्य में कितने और मुस्लिम देश इस समझौते में शामिल हो सकते हैं। सऊदी अरब का इस समझौते में शामिल होना इस समझौते की सफलता के लिए एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। यदि सऊदी अरब इस समझौते में शामिल होता है, तो यह मध्य-पूर्व में इजराइल और मुस्लिम देशों के रिश्तों को एक नई दिशा दे सकता है।

ट्रम्प और मध्य एशिया का रणनीतिक महत्व

अमेरिका के लिए अब्राहम समझौते का विस्तार केवल एक कूटनीतिक पहल नहीं है, बल्कि यह सेंट्रल एशिया में उसके रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने का भी एक तरीका है। रूस और चीन की बढ़ती उपस्थिति के कारण अमेरिका को इस क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत करनी है। कजाकिस्तान का अब्राहम समझौते में शामिल होना इस दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इससे पहले, यूएई, बहरीन, और मोरक्को ने इस समझौते में शामिल होने का फैसला लिया था, जो इजराइल के साथ खुलकर कूटनीतिक संबंध स्थापित करने वाले पहले मुस्लिम देश बने। इन देशों का मानना है कि क्षेत्रीय स्थिरता और समृद्धि के लिए इजराइल के साथ अच्छे संबंध जरूरी हैं।

अंतिम विचार

अब्राहम समझौते का विस्तार और कजाकिस्तान का इसमें शामिल होना एक बड़ा कदम है। हालांकि, फिलिस्तीन मुद्दा और गाजा युद्ध की स्थिति इस समझौते के भविष्य को प्रभावित कर सकती है। इसके बावजूद, ट्रम्प और उनके प्रशासन के लिए यह कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में कितने और देश इस समझौते में शामिल होते हैं और यह मध्य पूर्व में शांति और स्थिरता लाने में कितना सफल हो पाता है।

अब्राहम समझौते में कजाकिस्तान का शामिल होना यह संकेत देता है कि इजराइल और मुस्लिम देशों के रिश्तों में सामान्यीकरण की प्रक्रिया जारी रहेगी। यह समझौता फिलिस्तीन विवाद के समाधान के बिना भी क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में एक अहम कदम है। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में और कौन से देशों को इसमें शामिल किया जाता है और इसका प्रभाव पूरे मध्य-पूर्व क्षेत्र पर कैसे पड़ता है।

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