संघ जैसा कोई संगठन नहीं है: मेरठ में बोले Mohan Bhagwat, RSS को बताया व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला
Mohan Bhagwat RSS speech के दौरान मेरठ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर फैली कई भ्रांतियों पर खुलकर बात हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संघ की तुलना किसी भी अन्य संगठन से नहीं की जा सकती, क्योंकि संघ जैसा दूसरा कोई संगठन अस्तित्व में ही नहीं है। उन्होंने कहा कि शाखा और संचलन को देखकर कुछ लोग संघ को “पैरा-मिलिट्री संगठन” समझ लेते हैं, जबकि संघ का मूल उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है।
डॉ. भागवत मेरठ में आयोजित मेरठ एवं ब्रज प्रांत की प्रमुख जन संवाद गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।
🔴 पैरा-मिलिट्री नहीं, व्यक्ति निर्माण की कार्यशाला
डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ की दैनिक शाखाओं में होने वाला अनुशासन, शारीरिक गतिविधियां और सामूहिक अभ्यास लोगों को भ्रमित कर देते हैं, लेकिन संघ का स्वरूप सैन्य नहीं है।
उन्होंने कहा कि संघ एक ऐसी कार्यशाला है, जहां व्यक्ति के शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक विकास की प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया जाता है।
उनके शब्दों में, संघ समाज के लिए ऐसे नागरिक तैयार करता है जो राष्ट्र, समाज और मानवता के प्रति उत्तरदायी हों।
🔴 संघ की स्थापना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अपने संबोधन में मोहन भागवत ने संघ की स्थापना की पृष्ठभूमि को विस्तार से रखा। उन्होंने कहा कि जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई, तब भारत पराधीन था और समाज अनेक कुरीतियों, भेदभाव और असमानताओं से जूझ रहा था।
संघ संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार उस दौर के कई प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों के संपर्क में थे, जिनमें
बाल गंगाधर तिलक,
मदन मोहन मालवीय,
सुभाषचंद्र बोस,
विनायक दामोदर सावरकर,
भगत सिंह
और चंद्रशेखर आजाद शामिल थे।
🔴 भारत बार-बार पराधीन क्यों हुआ: मूल प्रश्न
डॉ. भागवत ने कहा कि उस समय सभी विचारकों के सामने एक मूल प्रश्न था—भारत बार-बार पराधीन क्यों हो जाता है।
उन्होंने बताया कि चिंतन का निष्कर्ष यही निकला कि समाज अपने ‘स्व’ को भूल गया था। इसी विस्मृति के कारण समाज में विखंडन बढ़ा, कुरीतियां जन्मीं और असमानताएं गहरी होती चली गईं।
इसी विचारधारा के आधार पर डॉ. हेडगेवार ने समरस, संगठित और अनुशासित समाज के निर्माण का मार्ग चुना, जिसे संघ के माध्यम से आगे बढ़ाया गया।
🔴 ‘हिन्दू’ का अर्थ और सांस्कृतिक एकता
डॉ. मोहन भागवत ने ‘हिन्दू’ शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि भारत में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दू किसी मत या पंथ विशेष का नाम नहीं, बल्कि वह जीवन दृष्टि है जो सबको जोड़ने, सबके हित में सोचने और समस्त सृष्टि के कल्याण की भावना से प्रेरित करती है।
उन्होंने कहा कि मत, पंथ और पूजा पद्धतियां अलग हो सकती हैं, लेकिन सांस्कृतिक पहचान एक है और यही भारत की आत्मा है।
🔴 सौ वर्षों की यात्रा: प्रतिबंध, आरोप और बलिदान
संघ के सौ वर्ष पूरे होने का उल्लेख करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि इस यात्रा में संगठन ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।
संघ ने प्रतिबंध झेले, झूठे आरोपों का सामना किया, राजनीतिक विरोध सहा और स्वयंसेवकों ने बलिदान भी दिए।
उन्होंने कहा कि इन सबके बावजूद दृढ़ संकल्प और असीम इच्छाशक्ति के बल पर संघ निरंतर आगे बढ़ता रहा।
🔴 शताब्दी वर्ष में समाज से संवाद
डॉ. भागवत ने कहा कि शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ समाज के बीच जाकर अपने कार्यों की जानकारी दे रहा है।
संघ समाज की सज्जन शक्ति से राष्ट्र उत्थान में सहयोग का आह्वान कर रहा है और समाज को साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है।
🔴 जिज्ञासा समाधान सत्र: शिक्षा, स्वास्थ्य और ओटीटी पर सवाल
कार्यक्रम के जिज्ञासा समाधान सत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता, मूल्य आधारित शिक्षा और ओटीटी मंचों की सामग्री जैसे विषयों पर सवाल पूछे गए।
शिक्षा बजट को लेकर पूछे गए प्रश्न पर उन्होंने कहा कि बजट बढ़ाना सरकार का कार्य है, लेकिन शिक्षा सभी के लिए सुलभ होनी चाहिए।
‘एक राष्ट्र-एक शिक्षा’ और ‘एक राष्ट्र-एक स्वास्थ्य नीति’ पर उन्होंने कहा कि नीतियां बनी हैं, लेकिन क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार लचीलापन जरूरी है और क्रियान्वयन राज्यों का विषय है।
🔴 गणमान्य लोगों की उपस्थिति
इस जन संवाद गोष्ठी में पद्मश्री भारत भूषण त्यागी, डॉ. सुमेधा आचार्य, विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

