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मुंबई यूनिवर्सिटी विवाद: Naseeruddin Shah को कार्यक्रम से हटाने पर बवाल, ‘देशद्रोह’ के आरोपों पर अभिनेता की खुली चुनौती

Naseeruddin Shah controversy एक बार फिर देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विश्वविद्यालयों की भूमिका और असहमति की आवाज़ों के प्रति बढ़ती असहिष्णुता पर तीखी बहस को जन्म दे रही है। वरिष्ठ अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने खुलासा किया है कि उन्हें मुंबई यूनिवर्सिटी के एक शैक्षणिक कार्यक्रम से बिना किसी ठोस कारण और बिना माफी मांगे, आखिरी क्षणों में हटा दिया गया। इस अनुभव को उन्होंने अपमानजनक, निराशाजनक और चिंताजनक बताया है।


🔴 मुंबई यूनिवर्सिटी कार्यक्रम से अचानक नाम हटाने का आरोप

नसीरुद्दीन शाह के अनुसार, वे 1 फरवरी को आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में छात्रों से बातचीत करने को लेकर बेहद उत्साहित थे। यह कार्यक्रम मुंबई यूनिवर्सिटी के उर्दू विभाग द्वारा आयोजित किया गया था। लेकिन 31 जनवरी की देर रात उन्हें सूचित किया गया कि अब उनकी उपस्थिति की आवश्यकता नहीं है।

अभिनेता का कहना है कि न तो उन्हें किसी कारण की जानकारी दी गई और न ही किसी स्तर पर औपचारिक माफी दी गई। यह व्यवहार न केवल व्यक्तिगत तौर पर आहत करने वाला था, बल्कि एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय की गरिमा पर भी सवाल खड़ा करता है।


🔴 ‘आपने खुद मना किया’ — आरोप और प्रत्यारोप

Naseeruddin Shah controversy उस समय और गहरा गई जब अभिनेता ने आरोप लगाया कि बाद में विश्वविद्यालय की ओर से दर्शकों और छात्रों से यह कहा गया कि उन्होंने स्वयं कार्यक्रम में आने से इनकार कर दिया था। शाह के मुताबिक, यह पूरी तरह असत्य था।

उन्होंने साफ कहा कि यदि विश्वविद्यालय को उनकी उपस्थिति से समस्या थी, तो उसे सच्चाई बताने का साहस दिखाना चाहिए था, न कि झूठे बयान देकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करनी चाहिए थी।


🔴 ‘देश विरोधी बयान’ का आरोप और खुली चुनौती

सबसे गंभीर आरोप उस कथित दलील को लेकर है, जिसमें यह कहा गया कि नसीरुद्दीन शाह देश के खिलाफ बयान देते हैं। अभिनेता ने इस आरोप पर तीखा सवाल उठाया और चुनौती दी कि यदि ऐसा है, तो उनके किसी एक बयान का उदाहरण सार्वजनिक किया जाए, जिसमें उन्होंने देश को बुरा कहा हो।

उनका कहना है कि सरकार की आलोचना और देश से नफरत—इन दोनों को एक ही तराजू में तौलना न केवल गलत है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के भी खिलाफ है।


🔴 सत्ता की आलोचना और असहमति का अधिकार

नसीरुद्दीन शाह ने स्पष्ट किया कि वे सत्ताधारी सरकार की नीतियों और कार्यशैली की पहले भी आलोचना करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। उन्होंने इसे एक नागरिक का अधिकार बताया, न कि देशद्रोह।

उनके अनुसार, किसी सरकार से सवाल पूछना या उसकी आलोचना करना देश से प्रेम के विपरीत नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदार नागरिक होने का प्रमाण है।


🔴 समाज में गिरता सिविक सेंस और बढ़ती असंवेदनशीलता

अभिनेता ने समाज में घटते सिविक सेंस और आपसी संवेदनशीलता पर भी गहरी चिंता जताई। उन्होंने लिखा कि जिस दिशा में देश बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है, वह उन्हें परेशान करती है।

उनका कहना है कि आज असहमति को दुश्मनी समझा जाने लगा है और संवाद की जगह टकराव ने ले ली है।


🔴 ‘विश्वगुरु’ की राजनीति पर तीखा प्रहार

नसीरुद्दीन शाह ने अपने लेख में खुद को “विश्वगुरु” कहने वालों पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने लिखा कि उन्होंने कभी ऐसे दावों की प्रशंसा नहीं की और न ही पिछले दस वर्षों में ऐसा कोई काम देखा, जिसने उन्हें प्रभावित किया हो।

उनके मुताबिक, आत्मप्रशंसा और दिखावे की राजनीति वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने का जरिया बन गई है।


🔴 जेल, जमानत और न्याय व्यवस्था पर सवाल

Naseeruddin Shah controversy के बीच अभिनेता ने देश की न्याय व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जहां छात्र कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के वर्षों तक जेल में रखा जाता है, वहीं दोषी बलात्कारियों और हत्यारों को अक्सर आसानी से जमानत मिल जाती है।

उन्होंने गो-रक्षकों द्वारा खुलेआम हिंसा, इतिहास के पुनर्लेखन, पाठ्यपुस्तकों में बदलाव और विज्ञान के साथ छेड़छाड़ जैसे मुद्दों का भी उल्लेख किया।


🔴 ‘मियों’ बयान और नफरत की राजनीति

शाह ने उस राजनीतिक बयानबाजी का भी जिक्र किया, जिसमें एक मुख्यमंत्री द्वारा ‘मियों’ को परेशान करने की बात कही गई थी। उनके अनुसार, ऐसी भाषा समाज में नफरत को वैधता देती है और विभाजन को गहरा करती है।


🔴 ऑरवेल की 1984 और आज का भारत

अपने लेख के अंत में नसीरुद्दीन शाह ने सवाल उठाया कि यह नफरत आखिर कब तक चलेगी। उन्होंने तुलना करते हुए पूछा कि क्या हालात 1984 जैसे नहीं होते जा रहे, जहां बड़े नेता की तारीफ न करना भी देशद्रोह मान लिया जाता है।

उनका कहना है कि आज सोच पर पहरा है, निगरानी बढ़ गई है और नफरत अब क्षणिक नहीं, बल्कि चौबीसों घंटे चलने वाली प्रक्रिया बन चुकी है।


मुंबई यूनिवर्सिटी से जुड़ा यह विवाद केवल एक कार्यक्रम या एक अभिनेता तक सीमित नहीं है। नसीरुद्दीन शाह की नाराज़गी उस व्यापक माहौल की ओर इशारा करती है, जहां सवाल पूछना, असहमति जताना और सत्ता की आलोचना करना धीरे-धीरे जोखिम भरा होता जा रहा है। यह बहस अब विश्वविद्यालयों, छात्रों और समाज के हर उस व्यक्ति तक पहुंच चुकी है, जो अभिव्यक्ति की आज़ादी को लोकतंत्र की आत्मा मानता है।

 

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