नेपाल के पीएम Balen Shah का बड़ा बयान: ‘भारत ही नहीं, नेपाल ने भी कब्जाई भारतीय जमीन’, संसद में दावे से मचा राजनीतिक भूचाल











नेपाल के प्रधानमंत्री Balen Shah ने संसद में ऐसा बयान दिया है जिसने नेपाल की राजनीति के साथ-साथ दक्षिण एशियाई कूटनीतिक हलकों में भी नई बहस छेड़ दी है। प्रधानमंत्री बनने के लगभग दो महीने बाद पहली बार संसद को संबोधित करते हुए बालेन शाह ने कहा कि सीमा विवाद के मामले में केवल भारत द्वारा नेपाली भूमि पर कब्जे की बात नहीं है, बल्कि कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जहां नेपाल द्वारा भारतीय जमीन पर कब्जे की जानकारी सामने आई है।
उनका यह बयान आते ही नेपाल की संसद में हलचल बढ़ गई। विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री के दावे पर सवाल उठाए और उनसे सबूत पेश करने की मांग कर दी। वहीं राजनीतिक विश्लेषक इसे भारत-नेपाल संबंधों के संवेदनशील दौर में दिया गया एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद बयान मान रहे हैं।
पहली बार संसद पहुंचे प्रधानमंत्री, सवालों के जवाब में दिया चौंकाने वाला बयान
मार्च 2026 में प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद यह पहला अवसर था जब बालेन शाह ने नेपाल की संसद में विस्तृत संबोधन दिया। विपक्ष लंबे समय से मांग कर रहा था कि प्रधानमंत्री संसद में उपस्थित होकर सरकार की नीतियों, विदेश संबंधों और राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना पक्ष स्पष्ट करें।
संसद में सीमा विवाद से जुड़े प्रश्न का उत्तर देते हुए बालेन शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें कुछ ऐसी जानकारियां मिलीं जिनसे संकेत मिलता है कि सीमा संबंधी मुद्दा केवल एकतरफा नहीं है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को संयुक्त रूप से इस विषय की जांच करनी चाहिए और तथ्यों के आधार पर समाधान तलाशना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि सीमा विवाद जैसे संवेदनशील विषयों का समाधान भावनाओं से नहीं बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेजों, मानचित्रों और कूटनीतिक संवाद के माध्यम से किया जाना चाहिए।
लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा पर फिर दोहराया नेपाल का दावा
संसद में अपने संबोधन के दौरान बालेन शाह ने भारत और चीन के बीच लिपुलेख मार्ग से होने वाले व्यापार और कैलाश मानसरोवर यात्रा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नेपाल लगातार यह मानता रहा है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र उसके अधिकार क्षेत्र का हिस्सा हैं।
प्रधानमंत्री के अनुसार नेपाल सरकार इस विषय पर पहले ही भारत को राजनयिक नोट भेज चुकी है और भारत की ओर से उसका उत्तर भी प्राप्त हो चुका है। उन्होंने कहा कि नेपाल इस मुद्दे का समाधान बातचीत और कूटनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से चाहता है।
बालेन शाह ने यह भी कहा कि यह विवाद आधुनिक समय का नहीं बल्कि ब्रिटिश भारत के दौर से जुड़ा हुआ है। इसी कारण नेपाल ने इस विषय पर केवल भारत और चीन ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन के साथ भी चर्चा की है ताकि ऐतिहासिक तथ्यों को बेहतर तरीके से समझा जा सके।
ग्रेटर नेपाल की बहस फिर चर्चा में
बालेन शाह पहले भी सीमा और राष्ट्रीय पहचान से जुड़े मुद्दों पर अपने विचारों के कारण चर्चा में रहे हैं। काठमांडू के मेयर रहते हुए उनके कार्यालय में लगाए गए तथाकथित “ग्रेटर नेपाल” के नक्शे ने काफी विवाद पैदा किया था।
उस नक्शे में हिमाचल प्रदेश के पश्चिमी कांगड़ा क्षेत्र से लेकर पश्चिम बंगाल के पूर्वी तीस्ता क्षेत्र तक के कुछ हिस्सों को ऐतिहासिक नेपाल का भाग बताया गया था। हालांकि यह कोई आधिकारिक सरकारी नक्शा नहीं था, लेकिन उस समय भी इस विषय पर व्यापक राजनीतिक चर्चा हुई थी।
अब प्रधानमंत्री बनने के बाद सीमा विवाद पर उनके बयान ने उस पुराने विवाद को फिर से चर्चा में ला दिया है।
भारत-नेपाल संबंधों में हाल के महीनों में दिखी नई असहजता
नेपाल और भारत के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और पारिवारिक संबंध रहे हैं। दोनों देशों के बीच खुली सीमा और लोगों के बीच गहरे सामाजिक रिश्ते दक्षिण एशिया में अनूठे माने जाते हैं।
इसके बावजूद पिछले कुछ महीनों में दोनों देशों के संबंधों में कुछ ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं जिन्हें राजनीतिक पर्यवेक्षक असहजता के संकेत के रूप में देख रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बालेन शाह के नेतृत्व में नेपाल की विदेश नीति अधिक संतुलित और स्वतंत्र छवि प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है। हालांकि इसके कुछ कदमों को भारत में अलग नजरिए से भी देखा गया है।
चार घटनाएं जिन्होंने बढ़ाई कूटनीतिक चर्चा
1. लिपुलेख मार्ग और मानसरोवर यात्रा पर आपत्ति
भारत और चीन द्वारा लिपुलेख दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा पुनः शुरू करने के निर्णय पर नेपाल सरकार ने आपत्ति दर्ज कराई थी। नेपाल ने दोहराया कि संबंधित क्षेत्र पर उसका दावा है और इस मुद्दे का समाधान बातचीत से होना चाहिए।
2. भारतीय विदेश सचिव की प्रस्तावित यात्रा टली
मई 2026 में भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की नेपाल यात्रा प्रस्तावित थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस दौरान प्रधानमंत्री बालेन शाह से मुलाकात की योजना भी थी। लेकिन मुलाकात का समय तय नहीं हो सका और दौरा आगे बढ़ गया।
3. भारतीय राजदूत से अलग मुलाकात नहीं
नेपाल में नई सरकार बनने के बाद परंपरागत रूप से भारतीय राजदूत से अलग शिष्टाचार भेंट होती रही है। हालांकि बालेन शाह ने सभी विदेशी राजदूतों से सामूहिक रूप से मुलाकात की, जिससे राजनीतिक हलकों में विभिन्न प्रकार की चर्चाएं शुरू हो गईं।
4. पहले वर्ष विदेशी दौरे से दूरी
प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने संकेत दिया कि वे अपने कार्यकाल के शुरुआती चरण में घरेलू प्रशासनिक सुधारों पर अधिक ध्यान देना चाहते हैं। इसी कारण उन्होंने पहले वर्ष किसी बड़े विदेशी दौरे की जल्दबाजी नहीं दिखाई।
प्रधानमंत्री के बयान पर विपक्ष का तीखा हमला
संसद में दिए गए बयान के बाद विपक्षी दलों ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। नेपाली कांग्रेस और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के कई सांसदों ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री के पास भारतीय भूमि पर नेपाली कब्जे से संबंधित कोई जानकारी है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
विपक्षी नेताओं का कहना है कि ऐसे संवेदनशील विषय पर बिना पर्याप्त प्रमाण के बयान देना राष्ट्रीय हितों के लिए उचित नहीं माना जा सकता। कई सांसदों ने मांग की कि प्रधानमंत्री या तो तथ्य प्रस्तुत करें या फिर अपने बयान को स्पष्ट करें।
पूर्व राजदूत और पूर्व विदेश मंत्री ने भी उठाए सवाल
भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत दीप कुमार उपाध्याय ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। उनका कहना है कि उनके ज्ञान और उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार नेपाल द्वारा भारतीय भूमि पर कब्जे का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने भी प्रधानमंत्री से स्पष्टीकरण मांगा है। उन्होंने कहा कि इस तरह के बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर प्रभाव डाल सकते हैं और इसलिए सरकार को तथ्यों के साथ अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
सोशल मीडिया पर भी छिड़ी बहस
प्रधानमंत्री के बयान के बाद सोशल मीडिया पर भी व्यापक चर्चा देखने को मिल रही है। कुछ लोग इसे सीमा विवाद के प्रति ईमानदार स्वीकारोक्ति बता रहे हैं, जबकि अन्य इसे अनावश्यक विवाद पैदा करने वाला बयान मान रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सीमा संबंधी मुद्दे नेपाल में लंबे समय से भावनात्मक और राजनीतिक महत्व रखते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के बयान ने स्वाभाविक रूप से लोगों का ध्यान आकर्षित किया है।
100 वादों में 88 पीछे, सरकार पर बढ़ रहा दबाव
सीमा विवाद के मुद्दे के साथ-साथ बालेन शाह सरकार को घरेलू मोर्चे पर भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने 100 बिंदुओं वाला सुधार एजेंडा पेश किया था, जिसका उद्देश्य प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता और विकास परियोजनाओं को गति देना था।
हालांकि प्रधानमंत्री कार्यालय की ट्रैकिंग प्रणाली के अनुसार इन 100 वादों में से 88 लक्ष्य निर्धारित समयसीमा से पीछे बताए जा रहे हैं। इससे विपक्ष को सरकार पर हमला करने का नया मौका मिल गया है।
सरकार के आलोचकों का कहना है कि जनता को बड़े-बड़े वादों के बजाय धरातल पर परिणाम चाहिए। वहीं सरकार समर्थकों का तर्क है कि नई सरकार को काम करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
भारत-नेपाल संबंधों पर सबकी नजर
बालेन शाह के हालिया बयान ने एक बार फिर भारत-नेपाल सीमा विवाद को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हालांकि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक रूप से संवाद और कूटनीतिक चैनल मजबूत रहे हैं, इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि किसी भी विवाद का समाधान बातचीत के जरिए ही खोजा जाएगा।
फिलहाल भारत की ओर से इस विशेष बयान पर कोई नई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन नेपाल के भीतर यह मुद्दा राजनीतिक बहस, मीडिया विमर्श और सार्वजनिक चर्चा का प्रमुख विषय बन चुका है।









