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Pakistan: जनरल असीम मुनीर और आर्मी की लीडरशिप लोकतंत्र का सम्मान करती है और आगे भी करती रहेगी-अहमद शरीफ चौधरी

Pakistanमार्शल लॉ लागू होने के अटकलो के बीच पाक आर्मी का इस पर बड़ा बयान आया है। पाकिस्तान में इंटर-सर्विसेज पब्लिक रिलेशंस (आईएसपीआर) के डायरेक्टर मेजर जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने शुक्रवार को देश में मार्शल लॉ लगाने के अटकलों का खंडन किया है। उन्होंने कहा कि मैं बहुत स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि जनरल असीम मुनीर और आर्मी की लीडरशिप लोकतंत्र का सम्मान करती है और आगे भी करती रहेगी। उन्होंने कहा कि मार्शल लॉ लगाने का सवाल ही नहीं उठता है। 

पूर्व प्रधानमंत्री और पीटीआई चीफ इमरान खान को लेकर मुल्क की संवैधानिक संस्थाएं आपस में टकरा रही हैं। विधायिका और न्यायलियका के बीच जमकर बयानबाजी हो रही है। ऊपरी तौर पर देखें तो इस समय पाकिस्तान में न्यायपालिक, इमरान खान एक पाले में और वहां की सर्वशक्तिमान फौज और केंद्र सरकार एक पाले में नजर आ रही है। पाकिस्तान में सियासी उथल-पूथल कोई नई बात नहीं है।

आजादी के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री की हत्या के बाद से समय-समय पर मुल्क में सियासी बवंडर उठते रहे हैं। जिसमें सेना का किरदार सबसे अहम रहा है। लेकिन इस बार पहली दफा ऐसा हो रहा है जब ताकतवर सेना को एक राजनेता की ओर से जबरदस्त चुनौती मिल रही है। अदालत के द्वारा इमरान खान को राहत देने और फिर उनके द्वारा खुलेआम आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर पर निशाना साधने के बाद मुल्क में मार्शल लॉ को लेकर अटकलें जोरों पर है। पाकिस्तान के सियासी गलियारों में ऐसी चर्चा है कि मुल्क में एक बार फिर तख्तापलट होने की आशंका है और शासन सेना के हाथों में जा सकता है। 

अपने बनने के बाद से अब तक पाकिस्तान में तीन बार मार्शल लॉ लागू हो चुका है। इनमें दो बार सेना प्रमुख ने किसी चुनी हुई सरकार का तख्तापलट कर सत्ता अपने हाथों में ले लिया था। पाकिस्तान के मौजूदा सूरत-ए-हाल को देखते हुए एकबार फिर इसकी चर्चा जोरों पर है। जिस तरह लाहौर में कोर कमांडर के घर को जला दिया गया और रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय में घुसकर बवाल काटा गया, आतंरिक तौर पर सेना को इस तरह की चुनौती का पहली बार सामना करना पड़ा है। 

मेजर जनरल अहमद शरीफ ने आगे कहा कि आंतरिक बदमाशों और बाहरी दुश्मनों के सभी प्रयासों के बावजूद जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व में सेना एकजुट है। उन्होंने कहा कि सेना के अंतर विभाजन पैदा करने के सपने, सपने ही रहेंगे। इस दौरान उन खबरों को भी खारिज किया गया, जिसमें कहा गया कि बड़े पैमाने पर सेना के बड़े अफसरों को बर्खास्त किया गया है, जिन्होंने इमरान खान के समर्थकों पर गोली चलवाने से इनकार कर दिया था। 

मार्शल लॉ लागू होने के बाद पाकिस्तान में सारी चीजें सेना के कंट्रोल में आ जाती हैं। देश की कमान निर्वाचित प्रधानमंत्री के बजाय आर्मी प्रमुख के हाथों में आ जाती है। पुलिस और कानून व्यवस्था को पूरी तरह से सेना कंट्रोल करने लगती है। इस कानून के लागू होने के बाद राजनीतिक दलो की सभाओं को रोक दिया जाती है। सियासी नेताओं के बड़े पैमाने पर गिरफ्तारी की आशंका बनी रहती है। इसके अलावा सिविल लॉ पर रोक लग जाती है। नागरिकों के अधिकार छिन जाते हैं। सेना कभी भी किसी को जेल में डाल सकती है। सैन्य कोर्ट में जज किसी को भी नोटिस देकर बुला सकता है। लोगों के पास विरोध करने का विकल्प नहीं होता। 

पाकिस्तान में तख्तापलटों का इतिहास रहा है। पहला तख्तापलट साल 1953 में हुआ था, तब गर्वनर जनरल गुलाम मोहम्मद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। हालांकि, ये संवैधानिक तख्तापट था। साल 1958 में पहला सैन्य तख्तापलट देखने को मिला तब पहले पाकिस्तानी राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर मिर्जा ने देश की संविधान सभा और प्रधानमंत्री फिरोज खान नून को बर्खास्त कर दिया था। मात्र 13 दिन बाद आर्मी चीफ जनरल अयूब खान ने उनका तख्तापलट कर दिया था। 

इसके बाद फिर 5 जुलाई 1977 को आर्मी चीफ जिया-उल-हक ने देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री रहे जुल्फिकार अली भुट्टो का तख्तापलट कर दिया था। 12 अक्टूबर 1999 को एक नाटकीय घटनाक्रम में तत्कालीन सैन्य प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की सरकार को बर्खास्त कर सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी। 

News-Desk

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