Trump का बड़ा दावा: शी जिनपिंग ने कहा था- आपके कार्यकाल में ताइवान पर हमला नहीं करूंगा
वॉशिंगटन/अलास्का: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड Trump ने एक बड़ा खुलासा करते हुए दावा किया है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने उन्हें आश्वासन दिया था कि जब तक वह (ट्रम्प) राष्ट्रपति पद पर रहेंगे, तब तक चीन ताइवान पर हमला नहीं करेगा।
ट्रम्प ने यह बयान उस समय दिया जब वे अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से अपनी अहम बैठक के लिए रवाना हो रहे थे। एयर फ़ोर्स वन से दिए गए इस इंटरव्यू ने अमेरिका की विदेश नीति और ताइवान को लेकर बहस को फिर से गर्म कर दिया है।
ट्रम्प का खुलासा: जिनपिंग बोले- “हम धैर्यवान हैं”
फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में ट्रम्प ने कहा कि शी जिनपिंग ने उनसे साफ कहा था:
“जब तक आप राष्ट्रपति हैं, मैं ताइवान पर हमला नहीं करूंगा। हम धैर्यवान हैं, लेकिन आगे जाकर कदम उठाया जा सकता है।”
ट्रम्प ने बताया कि उन्होंने उस समय जिनपिंग को समझाने की कोशिश की और कहा कि अभी ऐसा करना ठीक नहीं होगा। हालांकि उनके इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि चीन भविष्य में ताइवान पर सैन्य दबाव बना सकता है।
बाइडेन और ट्रम्प की नीतियों में फर्क
ट्रम्प के इस रुख की तुलना मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन से की जा रही है।
बाइडेन कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि अगर चीन ने हमला किया तो अमेरिका ताइवान का साथ देगा।
वहीं ट्रम्प ने अपने कार्यकाल के दौरान इस पर कभी स्पष्ट वादा नहीं किया।
यानी कि ताइवान पर चीन के संभावित हमले को लेकर बाइडेन का रवैया ज्यादा आक्रामक और सीधा रहा, जबकि ट्रम्प अधिक सतर्क दिखाई दिए।
76 साल पुराना चीन-ताइवान विवाद
चीन और ताइवान के बीच विवाद 1949 से चला आ रहा है।
चीन में गृहयुद्ध के दौरान माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी ने जीत दर्ज की और बीजिंग में सत्ता कायम की।
हारने वाली नेशनलिस्ट सरकार (च्यांग काई शेक) ताइवान भाग गई और वहां अपनी सत्ता बना ली।
तब से चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और कहता है कि एक दिन वह उसे अपने नियंत्रण में लेगा, चाहे बल प्रयोग क्यों न करना पड़े। दूसरी ओर, ताइवान अपनी चुनी हुई सरकार, सेना, पासपोर्ट और मुद्रा के साथ एक स्वतंत्र देश की तरह काम करता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे बहुत कम देशों से मान्यता मिली है।
अमेरिका का बदला रुख: 1979 में चीन को मान्यता
शुरुआती दौर में अमेरिका ताइवान की सरकार (ROC) को ही असली चीन मानता था। यही कारण था कि 1950-60 के दशक में संयुक्त राष्ट्र में चीन की सीट ताइवान के पास थी।
1971 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव पास करके चीन की सीट बीजिंग को दे दी और ताइवान को बाहर कर दिया।
इसके बाद 1979 में अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर चीन को मान्यता दी और ताइवान से औपचारिक राजनयिक रिश्ते खत्म कर दिए।
हालांकि उसी साल अमेरिका ने “ताइवान रिलेशंस एक्ट” पास किया, जिसके तहत ताइवान को हथियार और सुरक्षा मदद देने की गारंटी बनी रही।
आज की स्थिति: चीन की धमकी और ताइवान का संघर्ष
आज चीन लगातार कहता है कि अगर ताइवान ने औपचारिक रूप से स्वतंत्र राष्ट्र बनने की कोशिश की तो वह सैन्य कार्रवाई करेगा।वहीं ताइवान अपने लोकतांत्रिक ढांचे और रक्षा तंत्र को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
अमेरिका ने कभी खुलकर यह नहीं कहा कि वह ताइवान की रक्षा करेगा, लेकिन उसने यह भी साफ नहीं किया कि वह मदद नहीं करेगा। यही “स्ट्रैटेजिक एम्बिग्युइटी” (रणनीतिक अस्पष्टता) अमेरिकी नीति की खासियत रही है।
ट्रम्प का बयान क्यों अहम है?
ट्रम्प के इस बयान ने एक नया राजनीतिक विमर्श छेड़ दिया है।
यह दिखाता है कि उनके कार्यकाल में चीन ने ताइवान पर हमला करने का विचार रोक रखा था।
यह भी संकेत देता है कि बीजिंग भविष्य में परिस्थितियां बदलते ही कदम उठा सकता है।
दूसरी ओर, यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या ट्रम्प ने अमेरिका की सुरक्षा नीति को लेकर जानबूझकर ज्यादा सतर्क रुख अपनाया।

