अमेरिकी चुनाव में AI का खेल! ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े विज्ञापनों में नेताओं के नकली वीडियो, 1300 करोड़ रुपये खर्च का दावा
अमेरिका। अमेरिकी राजनीति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल चुनावी प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनता जा रहा है। मिडटर्म चुनावों से पहले AI से तैयार किए गए राजनीतिक विज्ञापनों को लेकर बहस तेज हो गई है। इन विज्ञापनों में वास्तविक नेताओं के चेहरे और वीडियो को बदलकर ऐसे दृश्य तैयार किए जा रहे हैं, जिनमें वे ऐसी बातें कहते या ऐसी गतिविधियां करते दिखाई देते हैं, जिनकी वास्तविकता की पुष्टि नहीं होती। साझा किए गए एक समाचार विवरण के मुताबिक, अमेरिका में AI से जुड़े राजनीतिक विज्ञापनों पर करीब 1300 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का दावा किया गया है। वेस्लेयन यूनिवर्सिटी से जुड़े शोध में 220 से ज्यादा ऐसे वीडियो की पहचान किए जाने की बात भी सामने आई है, जिनमें AI का इस्तेमाल हुआ था। रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि इनमें 80 प्रतिशत से अधिक विज्ञापन रिपब्लिकन उम्मीदवारों या उनसे जुड़े राजनीतिक समूहों के थे, जबकि 69 प्रतिशत विज्ञापनों में AI के इस्तेमाल का खुलासा नहीं किया गया था। इन आंकड़ों ने चुनावी प्रचार में तकनीक के इस्तेमाल, मतदाताओं तक पहुंचने वाली जानकारी और राजनीतिक विज्ञापनों की पारदर्शिता को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।
अमेरिकी चुनाव में AI विज्ञापन चर्चा में, नेताओं के नकली वीडियो से बढ़ी बहस
अमेरिका में चुनावी प्रचार के तौर-तरीके तेजी से बदल रहे हैं। पहले जहां राजनीतिक विज्ञापन तैयार करने के लिए कलाकारों, कैमरा टीम, लोकेशन और लंबे शूट की जरूरत होती थी, वहीं अब AI टूल्स की मदद से कम समय में ऐसे दृश्य बनाए जा सकते हैं, जिन्हें देखकर दर्शक वास्तविक और कृत्रिम वीडियो के बीच अंतर करने में भ्रमित हो सकते हैं। राजनीतिक दलों और उनसे जुड़े संगठनों के लिए यह तकनीक प्रचार सामग्री तैयार करने का एक नया माध्यम बन रही है।
इस तकनीक का इस्तेमाल केवल किसी उम्मीदवार की उपलब्धियां दिखाने तक सीमित नहीं है। साझा किए गए समाचार विवरण में ऐसे विज्ञापनों का उल्लेख है, जिनमें राजनीतिक विरोधियों को विवादास्पद संदेशों, काल्पनिक परिस्थितियों या दूसरे नेताओं के साथ ऐसे संबंधों में दिखाया गया, जिनसे मतदाताओं की धारणा प्रभावित हो सकती है। कुछ वीडियो में वास्तविक सार्वजनिक हस्तियों के चेहरे या पुरानी तस्वीरों को AI की मदद से बदला गया। इससे विज्ञापन देखने वाले व्यक्ति के लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि दृश्य वास्तविक है या डिजिटल रूप से तैयार किया गया है।
हालांकि, AI से तैयार हर राजनीतिक विज्ञापन को गलत सूचना नहीं कहा जा सकता। इस तकनीक का इस्तेमाल व्यंग्य, रचनात्मक प्रस्तुति और प्रचार सामग्री तैयार करने के लिए भी किया जा सकता है। चिंता उस समय बढ़ती है, जब किसी वास्तविक नेता को ऐसी बात कहते या ऐसा काम करते दिखाया जाए, जिसकी पुष्टि न हो, और दर्शकों को यह जानकारी भी न दी जाए कि वीडियो कृत्रिम रूप से तैयार किया गया है। चुनावी माहौल में ऐसे दृश्य राजनीतिक संदेश को अधिक प्रभावशाली बना सकते हैं और गलतफहमी पैदा कर सकते हैं।
रिपब्लिकन उम्मीदवारों से जुड़े विज्ञापनों में AI के इस्तेमाल का दावा
वेस्लेयन यूनिवर्सिटी के मीडिया शोध से जुड़े समाचार विवरण में 220 से ज्यादा ऐसे राजनीतिक वीडियो की पहचान किए जाने की बात कही गई है, जिनमें AI का इस्तेमाल हुआ था। रिपोर्ट के मुताबिक, इन विज्ञापनों में आधे के करीब ऐसे थे, जिनमें वास्तविक नेताओं के AI से तैयार चेहरे या वीडियो दिखाए गए थे। इसके अलावा, 80 प्रतिशत से अधिक विज्ञापन रिपब्लिकन उम्मीदवारों या उनसे जुड़े राजनीतिक समूहों की ओर से बनाए जाने का दावा किया गया।
यह आंकड़ा अमेरिकी चुनावी प्रचार में AI के इस्तेमाल के राजनीतिक वितरण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे उसी अध्ययन में शामिल विज्ञापनों के संदर्भ में देखना चाहिए। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अमेरिका में हर राजनीतिक विज्ञापन या AI सामग्री का 80 प्रतिशत हिस्सा रिपब्लिकन पार्टी ही तैयार करती है। यह भी जरूरी है कि अध्ययन की समय-सीमा, विज्ञापनों के चयन की प्रक्रिया और शामिल राजनीतिक समूहों की परिभाषा को ध्यान में रखा जाए।
राजनीतिक विज्ञापनों की निगरानी करने वाले शोधकर्ताओं के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि AI से तैयार सामग्री लगातार बदल रही है। कुछ विज्ञापनों में पूरा दृश्य कृत्रिम रूप से तैयार किया जाता है, जबकि अन्य में वास्तविक तस्वीरों, वीडियो और AI से बदले गए चेहरों को एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में केवल वीडियो देखकर यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि उसमें तकनीक का कितना इस्तेमाल हुआ है।
69 प्रतिशत विज्ञापनों में AI इस्तेमाल होने की जानकारी नहीं देने का दावा
समाचार विवरण में शामिल शोध के अनुसार, 69 प्रतिशत विज्ञापनों में यह जानकारी नहीं दी गई थी कि सामग्री तैयार करने में AI का इस्तेमाल किया गया है। यह पहलू इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी वीडियो की प्रस्तुति और उसके पीछे की वास्तविकता के बारे में दर्शकों को पर्याप्त जानकारी मिलना चुनावी पारदर्शिता का हिस्सा है।
यदि किसी विज्ञापन में किसी नेता को ऐसी बात कहते दिखाया जाता है, जो उसने वास्तव में नहीं कही, तो दर्शक उस वीडियो को वास्तविक बयान समझ सकते हैं। इसी तरह, किसी पुरानी तस्वीर को बदलकर उसमें चेहरे के भाव, गतिविधियां या आसपास का दृश्य बदल देना भी संदेश के अर्थ को प्रभावित कर सकता है। AI के इस्तेमाल का खुलासा न होने पर दर्शकों के लिए ऐसी सामग्री का सही संदर्भ समझना और कठिन हो जाता है।
हालांकि, AI के खुलासे से संबंधित नियम अलग-अलग क्षेत्रों और विज्ञापन प्लेटफॉर्म पर अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी विज्ञापन पर लेबल नहीं होने मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसका प्रकाशन निश्चित रूप से गैरकानूनी था। लेकिन जब कृत्रिम दृश्य वास्तविक राजनीतिक घटनाओं की तरह प्रस्तुत किए जाते हैं, तो उनकी स्पष्ट पहचान मतदाताओं को जानकारी के आधार पर राय बनाने में मदद कर सकती है।
जोहरान ममदानी और कैथी होचुल को दिखाकर बनाया गया AI विज्ञापन
समाचार विवरण में एक ऐसे विज्ञापन का उल्लेख किया गया है, जिसमें न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी और गवर्नर कैथी होचुल को महंगाई तथा अपराध के डर से राहत देने वाली दवा बेचते हुए दिखाया गया। इस विज्ञापन को AI से तैयार किया गया बताया गया है। विज्ञापन की प्रस्तुति राजनीतिक संदेश को व्यंग्यात्मक रूप देने वाली थी, जिसमें महंगाई और अपराध जैसे मुद्दों को एक काल्पनिक उत्पाद के माध्यम से पेश किया गया।
राजनीतिक विज्ञापनों में व्यंग्य का इस्तेमाल लंबे समय से होता रहा है। उम्मीदवारों की नीतियों, सार्वजनिक बयानों और शासन संबंधी फैसलों की आलोचना करने के लिए कार्टून, पैरोडी और काल्पनिक दृश्य बनाए जाते हैं। AI ने इस तरह की सामग्री तैयार करना पहले की तुलना में आसान कर दिया है। अब किसी सार्वजनिक हस्ती को किसी काल्पनिक भूमिका में दिखाने के लिए पारंपरिक शूटिंग या कलाकारों की पूरी टीम की जरूरत नहीं रह जाती।
लेकिन AI से तैयार दृश्य की प्रभावशीलता के साथ जिम्मेदारी का सवाल भी जुड़ा है। यदि विज्ञापन को स्पष्ट रूप से व्यंग्य या कृत्रिम प्रस्तुति के रूप में पहचाना जा सकता है, तो दर्शक उसे उसी संदर्भ में समझ सकते हैं। इसके विपरीत, यदि दृश्य वास्तविक घटना की तरह प्रस्तुत हो और AI का इस्तेमाल छिपा रहे, तो गलतफहमी की आशंका बढ़ सकती है।
डॉ. अब्दुल एल-सय्यद के AI वीडियो में विवादास्पद संदेश दिखाने का दावा
एक दूसरे विज्ञापन में मिशिगन के डेमोक्रेटिक सीनेट उम्मीदवार डॉ. अब्दुल एल-सय्यद का AI से तैयार वीडियो दिखाए जाने का उल्लेख है। समाचार विवरण के मुताबिक, इस वीडियो में उन्हें ऐसे कार्ड देखकर हंसते हुए दिखाया गया, जिन पर ‘डेथ टू अमेरिका’ और ‘9/11 हमले का जश्न मनाओ’ जैसे संदेश लिखे थे। ये संदेश बेहद संवेदनशील हैं और अमेरिकी राजनीति में राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आतंकवाद से जुड़े मुद्दों को सामने लाते हैं।
ऐसे वीडियो का प्रभाव इस बात पर निर्भर कर सकता है कि दर्शक उसे किस संदर्भ में देखते हैं और क्या उन्हें यह स्पष्ट जानकारी मिलती है कि दृश्य AI से तैयार किया गया है। यदि किसी उम्मीदवार को कृत्रिम रूप से विवादास्पद संदेशों से जोड़ दिया जाए, तो उसके वास्तविक विचारों और सार्वजनिक रिकॉर्ड के बारे में गलत धारणा बनने का खतरा हो सकता है।
यहां महत्वपूर्ण अंतर वास्तविक बयान और डिजिटल रूप से तैयार दृश्य के बीच है। किसी वीडियो में किसी व्यक्ति का चेहरा दिखाई देना अपने आप इस बात का प्रमाण नहीं होता कि उसने वास्तव में वह बात कही या उस गतिविधि में हिस्सा लिया। ऐसे मामलों में मूल वीडियो, उम्मीदवार के वास्तविक बयान और विज्ञापन के निर्माण संबंधी जानकारी की पुष्टि करना आवश्यक है। उपलब्ध समाचार विवरण में इस AI वीडियो को लेकर किए गए दावे का उल्लेख है, लेकिन उम्मीदवार की वास्तविक प्रतिक्रिया का विवरण शामिल नहीं है।
राजनीतिक विरोधियों को विवादास्पद नेताओं से जोड़ने की रणनीति
समाचार विवरण में ऐसे विज्ञापनों का भी उल्लेख है, जिनमें राजनीतिक विरोधियों को उन नेताओं के साथ दिखाया गया, जिनसे जुड़ाव मतदाताओं के बीच विवाद पैदा कर सकता है। इनमें डेमोक्रेटिक पार्टी की हिलेरी क्लिंटन और अलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज जैसी सार्वजनिक हस्तियों का नाम शामिल है। इस तरह की प्रस्तुति का उद्देश्य दर्शकों के सामने किसी उम्मीदवार की राजनीतिक पहचान को एक खास संदर्भ में रखना हो सकता है, हालांकि किसी विशिष्ट विज्ञापन के पीछे के उद्देश्य की पुष्टि उसके निर्माता या अन्य विश्वसनीय साक्ष्यों से ही की जा सकती है।
राजनीतिक प्रचार में विरोधियों को किसी अन्य नेता के साथ दिखाना अपने आप में असामान्य नहीं है। वास्तविक तस्वीरें, सार्वजनिक कार्यक्रम और प्रमाणित राजनीतिक समर्थन अक्सर विज्ञापनों में इस्तेमाल किए जाते हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब AI की मदद से ऐसा दृश्य तैयार किया जाए जो वास्तविक मुलाकात, समर्थन या राजनीतिक गठबंधन का भ्रम पैदा करे, जबकि वास्तव में ऐसी घटना हुई ही न हो।
इस तरह की सामग्री में संदर्भ का महत्व बढ़ जाता है। किसी वास्तविक तस्वीर को गलत कैप्शन के साथ साझा करना और पूरी तरह कृत्रिम दृश्य बनाना तकनीकी रूप से अलग हो सकते हैं, लेकिन दोनों ही स्थितियों में दर्शक को घटना की वास्तविकता समझने के लिए अतिरिक्त जानकारी की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए विज्ञापनों की पारदर्शिता और उनकी स्वतंत्र जांच महत्वपूर्ण है।
ओक्लाहोमा में हिलेरी क्लिंटन के साथ उम्मीदवार को दिखाने वाला AI वीडियो
समाचार विवरण के अनुसार, ओक्लाहोमा में ‘मेक ओक्लाहोमा ग्रेट अगेन’ नाम के एक समूह ने डेमोक्रेटिक गवर्नर उम्मीदवार को हिलेरी क्लिंटन के साथ दिखाने वाला विज्ञापन तैयार किया। वीडियो में दोनों को हाथ पकड़े और गले मिलते हुए दिखाया गया, जबकि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प किनारे उदास खड़े दिखाई दिए। विज्ञापन पर ‘क्लिंटन का समर्थक, ट्रम्प का विरोधी’ जैसा संदेश लिखा था।
इस तरह की प्रस्तुति दर्शकों को किसी उम्मीदवार की राजनीतिक पहचान के बारे में संदेश देने का प्रयास करती है। लेकिन यदि वीडियो में दिखाया गया मेल-मिलाप या दृश्य वास्तविक नहीं है, तो दर्शकों को यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह कृत्रिम रूप से तैयार की गई प्रस्तुति है। समाचार विवरण में कहा गया है कि इस विज्ञापन में AI के इस्तेमाल की जानकारी नहीं दी गई थी।
इस मामले से यह भी स्पष्ट होता है कि AI विज्ञापन केवल किसी नेता के मुंह से नकली बयान कहलवाने तक सीमित नहीं हैं। तकनीक की मदद से काल्पनिक मुलाकातें, भावनात्मक प्रतिक्रियाएं और ऐसे दृश्य भी तैयार किए जा सकते हैं, जो वास्तविक राजनीतिक घटनाओं की तरह दिखाई दें। इससे चुनावी प्रचार की पारंपरिक सीमाएं बदल रही हैं और दर्शकों के लिए दृश्य सामग्री की सत्यता जांचना पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
चुनावी रैलियों में बड़ी भीड़ दिखाने के लिए भी AI का इस्तेमाल
AI के इस्तेमाल का एक अन्य उदाहरण चुनावी रैलियों में भीड़ को बड़ा दिखाने से जुड़ा है। राजनीतिक अभियान में बड़ी भीड़ को अक्सर लोकप्रियता, संगठन की ताकत या जनसमर्थन के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यदि किसी रैली की तस्वीर या वीडियो में AI की मदद से अतिरिक्त लोगों को जोड़ दिया जाए, तो दर्शकों को वास्तविक उपस्थिति के बारे में गलत धारणा हो सकती है।
हालांकि, उपलब्ध समाचार विवरण में ऐसे इस्तेमाल का सामान्य उल्लेख है, लेकिन हर घटना या रैली की पहचान और उसके आंकड़े नहीं दिए गए हैं। इसलिए किसी विशेष उम्मीदवार या आयोजन के संबंध में AI से भीड़ बढ़ाने का दावा तभी किया जाना चाहिए, जब संबंधित सामग्री की जांच से इसकी पुष्टि हो।
डिजिटल तस्वीरों में बदलाव करना पहले भी संभव था, लेकिन AI टूल्स ने इस प्रक्रिया को अधिक सुलभ बना दिया है। अब कुछ ही निर्देशों के आधार पर भीड़, पृष्ठभूमि, चेहरे और दृश्य के दूसरे हिस्सों को बदला जा सकता है। इससे चुनावी तस्वीरों और वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि की आवश्यकता बढ़ जाती है।
जेम्स फिशबैक के विज्ञापन में इल्हान उमर और ईरानी नेताओं को दिखाने का दावा
समाचार विवरण में फ्लोरिडा के गवर्नर पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार जेम्स फिशबैक के एक विज्ञापन का भी उल्लेख है। इसमें उन्हें डेमोक्रेटिक सांसद इल्हान उमर और ईरान के नेताओं के साथ पार्टी करते हुए दिखाए जाने का दावा किया गया। वीडियो के एक दृश्य में ईरानी नेताओं को तलवारों से यहूदी धर्म के प्रतीक स्टार ऑफ डेविड पर हमला करते हुए दिखाया गया।
इस प्रकार के दृश्य राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और धार्मिक पहचान जैसे संवेदनशील मुद्दों को एक साथ जोड़ते हैं। यदि ऐसे दृश्य कृत्रिम रूप से तैयार किए गए हों, तो यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि उन्हें वास्तविक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। किसी सार्वजनिक व्यक्ति को ऐसे दृश्य में दिखाना उसके वास्तविक विचारों या गतिविधियों का प्रमाण नहीं होता।
राजनीतिक विज्ञापनों में संवेदनशील प्रतीकों का इस्तेमाल दर्शकों की भावनात्मक प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इस तरह की सामग्री को देखते समय वीडियो के स्रोत, उसकी प्रामाणिकता और उसमें किए गए दावों की पुष्टि जरूरी है। समाचार विवरण में विज्ञापन का वर्णन है, लेकिन उसके प्रत्येक दृश्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच का विस्तृत परिणाम उपलब्ध नहीं है।
चिप कीटन की पुरानी तस्वीर को AI से वीडियो में बदला गया
AI का इस्तेमाल केवल पूरी तरह काल्पनिक दृश्य तैयार करने के लिए नहीं किया जा रहा। समाचार विवरण में ओक्लाहोमा के रिपब्लिकन उम्मीदवार चिप कीटन के एक विज्ञापन का उल्लेख है, जिसकी शुरुआत उनकी पुरानी वास्तविक तस्वीर से होती है। यह तस्वीर उस समय की बताई गई है, जब वे ओक्लाहोमा में पुलिस अधिकारी थे। इसके बाद AI की मदद से तस्वीर में उनका सिर ऊपर उठता और चेहरे पर बड़ी मुस्कान आती दिखाई देती है।
इस उदाहरण में वास्तविक तस्वीर को आधार बनाकर उसे गतिशील वीडियो के रूप में प्रस्तुत किया गया। AI टूल्स किसी स्थिर तस्वीर में चेहरे की गतिविधियां, आंखों की दिशा, मुस्कान और सिर की हलचल जैसी चीजें जोड़ सकते हैं। इससे पुरानी तस्वीर को नए दृश्य की तरह पेश करना आसान हो जाता है।
ऐसे इस्तेमाल का अर्थ हर बार गलत सूचना फैलाना नहीं होता। पुरानी तस्वीर को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत करना विज्ञापन का एक सामान्य तरीका भी हो सकता है। लेकिन दर्शकों को यह समझने में मदद मिलनी चाहिए कि तस्वीर में दिखाई देने वाली गतिविधि मूल तस्वीर का हिस्सा थी या बाद में डिजिटल रूप से जोड़ी गई। चुनावी विज्ञापनों में यह अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि दृश्य किसी उम्मीदवार की छवि और उसके सार्वजनिक जीवन की कहानी को प्रभावित कर सकते हैं।
AI से विज्ञापन बनाने की लागत में बड़ी कमी का दावा
समाचार विवरण में हॉलीवुड की विज्ञापन कंपनी स्ट्रैटेजिक परसेप्शन के संस्थापक फ्रेड एन. डेविस के हवाले से कहा गया है कि AI विज्ञापन तैयार करने की लागत कम कर रहा है। उनके अनुसार, एक विज्ञापन को पारंपरिक तरीके से बनाने में लगभग 19 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकते थे, जबकि AI की मदद से उसी तरह का दृश्य तैयार करने का खर्च करीब 1.8 करोड़ रुपये बताया गया।
पारंपरिक विज्ञापन निर्माण में कलाकारों की फीस, कपड़ों और अन्य सामग्री की व्यवस्था, लोकेशन, भोजन, कैमरा, लाइटिंग और पूरी टीम के साथ शूटिंग जैसे खर्च शामिल हो सकते हैं। यदि किसी दृश्य को दोबारा शूट करना पड़े या उसमें बदलाव करना हो, तो लागत और समय बढ़ सकता है। AI आधारित उत्पादन कुछ प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाकर इन खर्चों को कम कर सकता है।
हालांकि, बताए गए आंकड़े एक उदाहरण से जुड़े हैं। इन्हें सभी विज्ञापनों की औसत लागत या हर परिस्थिति में होने वाली बचत नहीं माना जाना चाहिए। AI विज्ञापन की लागत उसकी अवधि, तकनीकी गुणवत्ता, इस्तेमाल किए गए टूल्स, संपादन, आवाज, कानूनी जांच और अन्य आवश्यकताओं पर निर्भर कर सकती है।
इसके बावजूद, कम लागत और कम समय में कई संस्करण तैयार करने की क्षमता राजनीतिक अभियानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। एक ही संदेश को अलग-अलग दर्शकों के लिए बदलना, विभिन्न भाषाओं में तैयार करना या तेजी से नई सामग्री जारी करना आसान हो सकता है। यही सुविधा तकनीक को प्रभावशाली बनाती है, लेकिन इससे अपुष्ट और भ्रामक सामग्री के तेजी से प्रसारित होने की आशंका भी बढ़ती है।
डेमोक्रेटिक उम्मीदवार AI के इस्तेमाल में अधिक सतर्क क्यों बताए गए?
समाचार विवरण में दावा किया गया है कि डेमोक्रेटिक उम्मीदवार और उनसे जुड़े संगठन AI के इस्तेमाल को लेकर अपेक्षाकृत अधिक सतर्क हैं। इसके पीछे एक वजह यह बताई गई है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थकों के बीच इस तकनीक को लेकर आलोचना और इसके नियमन की मांग अधिक दिखाई देती है। ऐसे में AI से तैयार राजनीतिक विज्ञापनों का इस्तेमाल करने पर उम्मीदवारों की अपनी सार्वजनिक छवि प्रभावित होने की आशंका हो सकती है।
वाशिंगटन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और प्रोजेक्ट के सह-निदेशक ट्रैविस एन. रिडआउट के हवाले से कहा गया कि AI का इस्तेमाल डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों और संगठनों की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है, क्योंकि वे स्वयं इस तकनीक पर नियंत्रण के लिए नियम बनाने की मांग कर रहे हैं। यह टिप्पणी AI के राजनीतिक इस्तेमाल और उम्मीदवारों की सार्वजनिक स्थिति के बीच संभावित तनाव को रेखांकित करती है।
हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सभी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार AI से बचते हैं या सभी रिपब्लिकन उम्मीदवार इसका इस्तेमाल करते हैं। किसी राजनीतिक दल के भीतर भी उम्मीदवारों, राज्यों और अभियान समूहों की रणनीतियां अलग-अलग हो सकती हैं। किसी व्यापक निष्कर्ष के लिए विज्ञापनों के नमूने, समय-सीमा और इस्तेमाल की गई पद्धति को समझना आवश्यक है।
AI वीडियो पहचानना क्यों हो रहा है मुश्किल?
AI से तैयार वीडियो की गुणवत्ता में सुधार होने के कारण आम दर्शकों के लिए वास्तविक और कृत्रिम दृश्य के बीच अंतर पहचानना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। चेहरे की गतिविधियां, आवाज, रोशनी और पृष्ठभूमि को अधिक स्वाभाविक तरीके से तैयार किया जा सकता है। कुछ वीडियो में वास्तविक फुटेज के साथ कृत्रिम हिस्से जोड़े जाते हैं, जिससे पूरी सामग्री को देखकर उसकी सत्यता का अनुमान लगाना कठिन हो जाता है।
वेस्लेयन मीडिया प्रोजेक्ट की प्रोफेसर एरिका फ्रैंकलिन फाउलर के हवाले से समाचार विवरण में कहा गया कि कई विज्ञापनों में AI का इस्तेमाल इतनी सफाई से किया गया कि बिना जानकारी के यह पहचानना मुश्किल हो सकता है कि वीडियो में AI का इस्तेमाल हुआ है। यह टिप्पणी इस तकनीक से जुड़ी पहचान संबंधी चुनौती को सामने रखती है।
किसी वीडियो को देखकर संदेह होने पर केवल उसके दृश्य या आवाज के आधार पर निर्णय लेना पर्याप्त नहीं है। वीडियो किस खाते से प्रकाशित हुआ, क्या संबंधित नेता ने ऐसा बयान वास्तव में दिया, क्या दूसरे विश्वसनीय स्रोतों में उसी घटना का उल्लेख है और क्या विज्ञापन पर AI संबंधी जानकारी दी गई है—इन सभी पहलुओं को देखना उपयोगी हो सकता है।
वीडियो की तकनीकी जांच भी मददगार हो सकती है, लेकिन कोई एक संकेत हर बार निर्णायक नहीं होता। AI से बनी सामग्री समय के साथ अधिक स्वाभाविक होती जा रही है। इसलिए स्रोत की विश्वसनीयता, संदर्भ और स्वतंत्र पुष्टि को प्राथमिकता देना जरूरी है।
चुनावी प्रचार में AI: सुविधा के साथ जवाबदेही की चुनौती
AI राजनीतिक संचार को अधिक सस्ता, तेज और रचनात्मक बना सकता है। छोटे अभियान भी कम संसाधनों में वीडियो, पोस्टर और अलग-अलग दर्शकों के लिए सामग्री तैयार कर सकते हैं। भाषाओं में अनुवाद, भाषणों के संपादित संस्करण और सामान्य प्रचार सामग्री बनाने में भी इस तकनीक की उपयोगिता हो सकती है। इस दृष्टि से AI चुनावी प्रचार में प्रवेश की लागत कम कर सकता है।
दूसरी ओर, यही सुविधा किसी सार्वजनिक व्यक्ति के नाम पर नकली बयान, काल्पनिक मुलाकात या भ्रामक दृश्य तैयार करना भी आसान बना सकती है। यदि ऐसी सामग्री तेजी से सोशल मीडिया पर फैलती है, तो उसके बारे में स्पष्टीकरण आने से पहले ही बड़ी संख्या में लोग उसे देख सकते हैं। राजनीतिक विज्ञापन में यह विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि मतदाता उम्मीदवारों के बयानों और गतिविधियों के आधार पर अपनी राय बनाते हैं।
इस चुनौती से निपटने के लिए विज्ञापन तैयार करने वालों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, शोधकर्ताओं और नियामक संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। स्पष्ट लेबल, विज्ञापनदाता की पहचान, सामग्री के स्रोत की जानकारी और शिकायतों की प्रभावी जांच दर्शकों को मदद दे सकती है। साथ ही, दर्शकों के लिए भी किसी वायरल वीडियो को साझा करने से पहले उसकी पुष्टि करना उपयोगी है।
अमेरिकी चुनाव में AI विज्ञापन पर बहस का व्यापक असर
अमेरिकी चुनाव में AI विज्ञापन को लेकर उठे सवाल केवल तकनीक तक सीमित नहीं हैं। इनका संबंध राजनीतिक संवाद, सार्वजनिक विश्वास और मतदाताओं को मिलने वाली जानकारी से भी है। जब वास्तविक और कृत्रिम वीडियो के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है, तो किसी उम्मीदवार के बयान या गतिविधि की पुष्टि के लिए दर्शकों को अतिरिक्त प्रयास करना पड़ सकता है।
वहीं, AI के हर इस्तेमाल को गलत सूचना मानना भी उचित नहीं होगा। व्यंग्य, काल्पनिक प्रस्तुति और रचनात्मक विज्ञापन राजनीतिक संवाद का हिस्सा हो सकते हैं। महत्वपूर्ण यह है कि दर्शक को सामग्री का संदर्भ समझने का अवसर मिले और किसी कृत्रिम दृश्य को वास्तविक घटना का प्रमाण बनाकर पेश न किया जाए।
समाचार विवरण में दिए गए शोध आंकड़े अमेरिकी राजनीतिक प्रचार में AI के बढ़ते इस्तेमाल की ओर संकेत करते हैं। हालांकि, इन आंकड़ों का सही अर्थ समझने के लिए अध्ययन की पद्धति और उसके दायरे को ध्यान में रखना जरूरी है। 220 से ज्यादा वीडियो की पहचान, 80 प्रतिशत से अधिक विज्ञापनों का रिपब्लिकन उम्मीदवारों या उनसे जुड़े समूहों से संबंध और 69 प्रतिशत विज्ञापनों में AI का खुलासा नहीं होने का दावा उसी रिपोर्ट के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
आगे क्या बदलेगा? AI विज्ञापनों की पारदर्शिता होगी अहम
AI तकनीक के विकास के साथ राजनीतिक विज्ञापनों की निगरानी और उनकी पहचान का सवाल भी महत्वपूर्ण बना रहेगा। चुनावी अभियानों में डिजिटल सामग्री का इस्तेमाल जारी रहने की स्थिति में विज्ञापनों के स्रोत, उनके निर्माण के तरीके और AI के इस्तेमाल की जानकारी को लेकर बहस आगे बढ़ सकती है। स्पष्ट पहचान और पारदर्शिता से दर्शकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि वे वास्तविक बयान देख रहे हैं, व्यंग्यात्मक प्रस्तुति या AI से बनाया गया काल्पनिक दृश्य।
मतदाताओं के लिए भी जरूरी है कि वे किसी वायरल वीडियो को केवल इसलिए वास्तविक न मान लें कि उसमें किसी परिचित नेता का चेहरा या आवाज दिखाई दे रही है। संबंधित व्यक्ति का मूल बयान, विश्वसनीय समाचार रिपोर्ट और वीडियो के स्रोत की जांच करना उपयोगी कदम हो सकता है। विशेष रूप से ऐसे विज्ञापनों में, जिनमें हिंसा, आतंकवाद, धर्म या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील संदेश दिखाए जाते हैं, सावधानी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
अमेरिका में चुनावी प्रचार के दौरान AI से तैयार राजनीतिक विज्ञापनों का बढ़ता इस्तेमाल तकनीक की नई संभावनाओं के साथ पारदर्शिता की चुनौती भी सामने ला रहा है। शोध से जुड़े समाचार विवरण में 220 से अधिक AI वीडियो, विज्ञापनों में AI का खुलासा नहीं होने और राजनीतिक विरोधियों को काल्पनिक दृश्यों में दिखाने के दावे किए गए हैं। ऐसे में मतदाताओं के लिए किसी वीडियो को वास्तविक मानने से पहले उसके स्रोत और संदर्भ की पुष्टि करना महत्वपूर्ण है। AI का इस्तेमाल रचनात्मक प्रचार में उपयोगी हो सकता है, लेकिन वास्तविक बयान और कृत्रिम दृश्य के बीच अंतर स्पष्ट होना चाहिए।

