Lucknow के नगराम में नवजात तस्करी कांड का खुलासा – मानसिक रूप से मंदित महिला का बच्चा आशा कार्यकर्ता ने चुपके से दूसरे दंपती को दे डाला, सीएमओ ने बनाई जांच समिति
Lucknow । राजधानी के नगराम क्षेत्र के एक निजी अस्पताल में हुआ नवजात तस्करी का मामला पूरे जिले में हड़कंप मचा गया है। दो महीने पहले एक मानसिक रूप से मंदित महिला ने यहां बच्चे को जन्म दिया था। लेकिन अस्पताल स्टाफ की जानकारी में बिना, स्वास्थ्य विभाग की एक आशा कार्यकर्ता ने चुपके से उस नवजात को एक अन्य दंपती को दे दिया।
यह मामला तब सामने आया जब वह दंपती बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र बनवाने मोहनलालगंज तहसील पहुंचे। वहां के अधिकारियों को जब कागजात संदिग्ध लगे, तो उन्होंने स्वास्थ्य विभाग को सूचित किया।
जांच में मामला खुल गया — और बच्चे को तत्काल चाइल्ड लाइन की देखरेख में भेज दिया गया।
मानसिक रूप से मंदित महिला से जन्मा बच्चा बना सौदेबाज़ी का शिकार
जांच के मुताबिक, नबीनगर चौराहे के पास एक निजी अस्पताल में अगस्त महीने में एक मानसिक रूप से मंदित महिला ने बच्चे को जन्म दिया था।
अस्पताल में मौजूद आशा कार्यकर्ता ने कथित रूप से यह बात अपने परिचितों को बताई और एक संतानहीन दंपती को बच्चा दिलवाने का लालच दिया।
मोहनलालगंज के समेसी गांव निवासी किसान रामहर्ष विक्रम (61) और उनकी पत्नी मायावती का इकलौता बेटा कई साल पहले गुजर चुका था।
रामहर्ष ने बताया कि 12 अगस्त को आशा कार्यकर्ता उनके घर आई और कहा —
“एक महिला ने अस्पताल में बच्चा छोड़ा है, अगर आप चाहें तो वह बच्चा आपको मिल सकता है।”
इसके बाद मायावती उसके साथ अस्पताल गईं और बच्चे को अपने साथ लेकर आ गईं।
अवैध गोद लेने की सच्चाई खुली जन्म प्रमाणपत्र बनवाते समय
रामहर्ष और मायावती ने जब बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र बनवाने की कोशिश की, तो अधिकारियों को मामले पर संदेह हुआ।
जांच में पता चला कि बच्चे के दस्तावेजों में कोई वैध अस्पताल रिकॉर्ड या अभिभावक जानकारी नहीं थी।
दंपती ने जिलाधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को पत्र भेजा, साथ ही 18 अक्टूबर को सम्पूर्ण समाधान दिवस में भी गुहार लगाई।
जांच के दौरान सारा मामला खुल गया — जिसके बाद चाइल्ड लाइन टीम ने बच्चे को अपनी अभिरक्षा में लेकर बाल कल्याण समिति (CWC) के समक्ष प्रस्तुत किया।
वहां से बच्चे को शिशु गृह (बाल आश्रय केंद्र) भेज दिया गया।
अस्पताल और आशा कार्यकर्ता की भूमिका संदिग्ध — जांच समिति गठित
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एन.बी. सिंह ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है, जिसमें शामिल हैं —
डिप्टी सीएमओ,
गायनेकोलॉजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ),
और फिजिशियन (चिकित्सक)।
यह समिति मामले के हर पहलू की जांच कर रिपोर्ट सौंपेगी।
सीएमओ ने कहा कि “जिन लोगों ने कानून तोड़ा है, उन पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।”
अब सवालों के घेरे में अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक लापरवाही और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी प्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं —
अगर बच्चा देने वाली महिला मानसिक रूप से मंदित थी, तो अस्पताल प्रशासन ने इसकी सूचना पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को क्यों नहीं दी?
महिला को अस्पताल में किसने भर्ती कराया, और बच्चे के जन्म के बाद उसके परिजनों से पूछताछ क्यों नहीं की गई?
आशा कार्यकर्ता ने विभाग से पूरा मामला क्यों छिपाया?
नगराम सीएचसी अधीक्षक को पहले ही जांच के निर्देश मिले थे, फिर भी उन्होंने बच्चे का ऑफलाइन टीकाकरण कराकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया।
आखिर क्यों सीएमओ को पूरे मामले की जानकारी समय पर नहीं दी गई?
ये सवाल स्वास्थ्य तंत्र में मौजूद लापरवाही और नैतिक शिथिलता को उजागर करते हैं।
गोद लेने की वैध प्रक्रिया क्या है? जानिए कानून क्या कहता है
कानून के तहत लावारिस या अनाथ बच्चे को बिना कानूनी प्रक्रिया किसी भी व्यक्ति द्वारा अपने पास रखना गैरकानूनी है।
गोद लेने की सही प्रक्रिया इस प्रकार है —
दंपती को केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) के पोर्टल पर ऑनलाइन पंजीकरण करना होता है।
इसके बाद प्रमाणित गोद ग्रहण एजेंसी उनके घर जाकर होम स्टडी रिपोर्ट तैयार करती है।
इसमें आवेदक की मानसिक, शारीरिक, पारिवारिक और आर्थिक स्थिति का आकलन किया जाता है।
रिपोर्ट अनुमोदित होने पर दंपती को बच्चे के चयन का विकल्प मिलता है।
इसके बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी होने पर जिला मजिस्ट्रेट द्वारा गोद ग्रहण आदेश जारी किया जाता है।
इसलिए किसी भी बच्चे को “सीधे” किसी व्यक्ति को देना या लेना कानूनी अपराध माना जाता है।
CMO डॉ. एनबी सिंह बोले – दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एन.बी. सिंह ने कहा,
“मामले की गंभीरता से जांच की जा रही है। बच्चे को जन्म देने वाली महिला का भी पता लगाया जा रहा है। इसमें पुलिस की मदद ली जा रही है।
अगर आशा कार्यकर्ता या अस्पताल की कोई भी भूमिका साबित होती है, तो उनके खिलाफ कड़ी विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाएगी।”
लखनऊ प्रशासन अलर्ट मोड पर – निजी अस्पतालों की होगी जांच
इस घटना के बाद प्रशासन ने सभी निजी अस्पतालों और मातृत्व केंद्रों को सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
हर अस्पताल को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि
हर जन्म का रिकॉर्ड ऑनलाइन दर्ज किया जाए,
और बच्चा या मां के बारे में कोई भी सूचना छिपाई न जाए।
पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीमें नगराम, मोहनलालगंज और आसपास के इलाकों में जांच अभियान चला रही हैं ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।

