“पानी पर जंग” की धमकी! सिंधु जल संधि पर Pakistan के रक्षा मंत्री का बड़ा बयान, भारत के रुख से बढ़ी इस्लामाबाद की बेचैनी
News-Desk
8 min read
india pakistan news, pakistan, south asia news, Water Security, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, ख्वाजा आसिफ, जल विवाद, पहलगाम हमला, पाकिस्तान अर्थव्यवस्था, पाकिस्तान जल संकट, पाकिस्तान रक्षा मंत्री, भारत पाकिस्तान संबंध, सिंधु जल संधि, सिंधु नदी प्रणालीIndus Water Treaty Suspension को लेकर भारत और Pakistan के बीच तनाव एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक टेलीविजन इंटरव्यू में दावा किया है कि यदि पाकिस्तान को अपनी जल सुरक्षा पर गंभीर खतरा महसूस हुआ तो वह भारत के खिलाफ युद्ध जैसे कदम पर भी विचार कर सकता है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत द्वारा सिंधु जल संधि को स्थगित किए जाने के बाद पाकिस्तान पहले से ही बढ़ते जल संकट और आर्थिक दबाव का सामना कर रहा है।
ख्वाजा आसिफ ने पाकिस्तानी चैनल ARY न्यूज से बातचीत के दौरान आरोप लगाया कि भारत पाकिस्तान के हिस्से के पानी के प्रवाह को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है और जल संसाधनों को रणनीतिक दबाव के उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पिछले एक वर्ष में इस विषय पर हुए सभी घटनाक्रमों की उन्हें पूरी जानकारी नहीं है।
उनके बयान ने पाकिस्तान के राजनीतिक और रणनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है, वहीं भारत की ओर से इस विषय पर पहले से घोषित नीति में कोई बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने लिया था बड़ा फैसला
भारत ने अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को निलंबित करने का निर्णय लिया था। उस हमले में 26 लोगों की जान गई थी, जिसके बाद भारत ने आतंकवाद को लेकर अपना रुख और सख्त कर दिया।
नई दिल्ली ने स्पष्ट किया था कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद और आतंकी ढांचे के खिलाफ ठोस तथा विश्वसनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक सिंधु जल संधि को बहाल करने पर विचार नहीं किया जाएगा।
भारत का तर्क है कि आतंकवाद और सामान्य द्विपक्षीय सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। यही कारण है कि जल समझौते का मुद्दा अब केवल संसाधन प्रबंधन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापक सुरक्षा और कूटनीतिक समीकरणों से भी जुड़ गया है।
पानी की कमी से जूझ रहा पाकिस्तान, संकट होता जा रहा गहरा
Pakistan Water Crisis इस समय देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बनता जा रहा है। विभिन्न रिपोर्टों और स्थानीय आंकड़ों के अनुसार पाकिस्तान के कई हिस्सों में जल उपलब्धता लगातार घट रही है।
विशेष रूप से सिंध और बलूचिस्तान जैसे क्षेत्रों में पानी की स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है। सिंध के सिंचाई विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कई प्रमुख नहरों में पानी की भारी कमी दर्ज की गई है।
- नॉर्थ वेस्ट कैनाल में लगभग 64.1 प्रतिशत पानी की कमी।
- राइस कैनाल में करीब 38 प्रतिशत की कमी।
- दादू कैनाल में लगभग 82 प्रतिशत तक जल अभाव।
इन आंकड़ों ने कृषि विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ा दी है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले से ही महंगाई, विदेशी कर्ज और वित्तीय चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में जल संकट स्थिति को और जटिल बना सकता है।
सुक्कुर बैराज और कृषि क्षेत्र पर मंडरा रहा खतरा
पाकिस्तान की सिंचाई व्यवस्था का बड़ा हिस्सा सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। विशेष रूप से सुक्कुर बैराज को देश की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। यदि जल स्तर लगातार गिरता रहा तो इसका सीधा असर फसलों की उत्पादकता पर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पानी की कमी केवल खेती तक सीमित नहीं रहती, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण रोजगार, पशुपालन और स्थानीय उद्योगों पर भी प्रभाव डालती है। पाकिस्तान के कई कृषि क्षेत्रों में पहले ही सिंचाई की लागत बढ़ने और उत्पादन घटने की शिकायतें सामने आ चुकी हैं।
क्या है सिंधु जल संधि, जिसने दशकों तक रोके रखा जल विवाद?
Indus Waters Treaty दुनिया के सबसे चर्चित अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों में से एक मानी जाती है। यह समझौता 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच हस्ताक्षरित हुआ था। इसमें विश्व बैंक ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।
सिंधु नदी प्रणाली में कुल छह प्रमुख नदियां शामिल हैं—
- सिंधु
- झेलम
- चिनाब
- रावी
- ब्यास
- सतलुज
इन नदियों का जलग्रहण क्षेत्र लगभग 11.2 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह क्षेत्र भारत, पाकिस्तान, चीन और अफगानिस्तान तक विस्तारित है और करोड़ों लोगों की आजीविका इन नदियों पर निर्भर करती है।
इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच पानी के बंटवारे को लेकर स्थायी व्यवस्था स्थापित करना था ताकि भविष्य में जल विवाद बड़े संघर्ष का रूप न ले सकें।
1947 के बाद कैसे शुरू हुआ था पानी का विवाद?
भारत और पाकिस्तान के विभाजन के तुरंत बाद जल संसाधनों को लेकर मतभेद उभरने लगे थे। पंजाब और सिंध क्षेत्र की नहर प्रणालियां विभाजन के बाद अलग-अलग देशों में चली गईं, लेकिन पानी का स्रोत और वितरण व्यवस्था एक-दूसरे से जुड़ी हुई थी।
1947 में दोनों देशों के इंजीनियरों के बीच एक अस्थायी समझौता हुआ, जिसके तहत पाकिस्तान को कुछ प्रमुख नहरों से पानी मिलता रहा। लेकिन 1948 में यह व्यवस्था समाप्त होने पर जल आपूर्ति को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया।
बाद में कई दौर की बातचीत और विश्व बैंक की मध्यस्थता के बाद 1960 में सिंधु जल संधि अस्तित्व में आई, जिसे लंबे समय तक दोनों देशों के बीच सबसे सफल द्विपक्षीय समझौतों में गिना जाता रहा।
संधि स्थगित रहने से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है?
विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान की लगभग 90 प्रतिशत सिंचित कृषि भूमि सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है। कृषि क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा इसी पर निर्भर है।
यदि जल उपलब्धता में लगातार गिरावट आती है तो इसका असर कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है—
- कृषि उत्पादन में कमी
- खाद्यान्न संकट की आशंका
- ग्रामीण आय में गिरावट
- रोजगार के अवसरों पर असर
- औद्योगिक उत्पादन में बाधा
- बिजली उत्पादन में कमी
विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट और आर्थिक चुनौतियों का संयुक्त प्रभाव पाकिस्तान की पहले से दबाव में चल रही अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
हाइड्रोपावर परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है असर
पाकिस्तान के प्रमुख जलविद्युत बांधों में मंगल और तारबेला डैम का विशेष महत्व है। जल स्तर में कमी आने की स्थिति में इन परियोजनाओं की उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों के अनुसार यदि जल प्रवाह में उल्लेखनीय गिरावट होती है तो बिजली उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है। इससे उद्योग, व्यापार और घरेलू उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
हालांकि वास्तविक प्रभाव कई तकनीकी और मौसमी कारकों पर भी निर्भर करेगा, इसलिए स्थिति का आकलन विशेषज्ञ संस्थाएं लगातार कर रही हैं।
भारत का रुख फिलहाल सख्त, क्षेत्रीय राजनीति पर टिकी निगाहें
India Pakistan Water Dispute अब केवल जल प्रबंधन का विषय नहीं रह गया है। यह सुरक्षा, आतंकवाद, क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीतिक संबंधों से जुड़ा व्यापक मुद्दा बन चुका है। भारत ने स्पष्ट किया है कि आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय कार्रवाई उसकी प्राथमिक अपेक्षा है, जबकि पाकिस्तान जल सुरक्षा को लेकर चिंता जता रहा है।
ऐसे में दक्षिण एशिया की राजनीति पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले महीनों में यह मुद्दा दोनों देशों के संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि फिलहाल किसी भी संभावित समाधान के लिए दोनों पक्षों के बीच विश्वास बहाली और गंभीर संवाद की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

