Allahabad High Court में बड़ा घटनाक्रम: कोडीन कफ सिरप मामले से खुद को अलग किया जज ने, बोले- न्यायाधीश तक पहुंचने की कोशिश न्यायपालिका पर हमला
Codeine Cough Syrup Case में गुरुवार को एक महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम सामने आया। Allahabad High Court की एकल पीठ के न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने कोडीन कफ सिरप से जुड़े मामलों में दायर 74 जमानत याचिकाओं की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया। सुनवाई के दौरान उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी लंबित मामले को प्रभावित करने अथवा न्यायाधीश तक पहुंच बनाने का प्रयास न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।
न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने इस घटनाक्रम को न्यायालय के इतिहास का “काला दिन” बताया और संबंधित सभी मामलों को आगे की सुनवाई के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष नई पीठ गठित करने हेतु भेजने का निर्देश दिया।
भोला प्रसाद की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान आया आदेश
यह आदेश न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने भोला प्रसाद की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया।
उल्लेखनीय है कि उनकी एकल पीठ कोडीन कफ सिरप से जुड़े कुल 74 जमानत प्रार्थना-पत्रों पर सुनवाई कर रही थी। मामले में अंतिम सुनवाई पूरी हो चुकी थी और न्यायालय को आदेश पारित करना था।
इसी दौरान न्यायमूर्ति ने आदेश में उल्लेख किया कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान कुछ ऐसी परिस्थितियां सामने आईं, जिनके कारण उन्होंने इन मामलों की सुनवाई से स्वयं को अलग होना उचित समझा।
‘न्यायाधीश तक पहुंचने की कोशिश न्यायपालिका पर हमला’
अपने आदेश में न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने न्यायिक व्यवस्था की मूल भावना पर जोर देते हुए कहा कि न्याय प्रणाली की पूरी नींव इस विश्वास पर आधारित है कि प्रत्येक निर्णय निष्पक्ष, निर्भीक और किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त होकर दिया जाता है।
उन्होंने कहा कि यदि कोई पक्षकार अथवा उससे जुड़ा व्यक्ति किसी न्यायाधीश तक निजी तौर पर पहुंचने या संपर्क स्थापित करने का प्रयास करता है, तो यह केवल एक अनुचित आचरण नहीं बल्कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून के शासन पर सीधा आघात है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायालय की निष्पक्षता पर जनता का विश्वास लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिलाओं में से एक है और इसे किसी भी स्थिति में प्रभावित नहीं होने दिया जा सकता।
‘यह न्यायालय के इतिहास का काला दिन’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने इस पूरे घटनाक्रम को अत्यंत गंभीर बताते हुए इसे न्यायालय के इतिहास का “काला दिन” करार दिया।
उन्होंने संकेत दिया कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने अथवा न्यायाधीश तक पहुंचने के प्रयासों को सामान्य घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उनका कहना था कि यदि ऐसे प्रयासों पर कठोर रुख नहीं अपनाया गया तो इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर समाज में गलत संदेश जा सकता है।
मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजे गए सभी मामले
सुनवाई से स्वयं को अलग करते हुए न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने निर्देश दिया कि कोडीन कफ सिरप मामले से जुड़ी सभी 74 जमानत याचिकाओं को इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।
मुख्य न्यायाधीश अब इन मामलों की सुनवाई के लिए नई पीठ गठित करने पर निर्णय लेंगे।
इस प्रक्रिया के बाद संबंधित मामलों की आगे की सुनवाई नई पीठ द्वारा की जाएगी।
आदेश में न्यायिक स्वतंत्रता पर विशेष जोर
अपने विस्तृत आदेश में न्यायालय ने कहा कि न्यायपालिका का अस्तित्व जनता के विश्वास पर आधारित है।
यदि किसी भी स्तर पर यह धारणा बनने लगे कि न्यायिक आदेशों को प्रभावित किया जा सकता है या न्यायाधीशों तक निजी माध्यमों से पहुंच बनाई जा सकती है, तो इससे न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
अदालत ने कहा कि न्याय केवल किया जाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि न्याय होता हुआ दिखाई भी दे और उस पर किसी प्रकार का संदेह न रहे।
अदालत ने क्या कहा घटनाक्रम के बारे में?
आदेश में न्यायालय ने उल्लेख किया कि मामले की अंतिम सुनवाई पूरी हो चुकी थी और निर्णय सुरक्षित था।
इसी बीच संबंधित पक्षों की ओर से पीठासीन न्यायाधीश तक पहुंचने के प्रयास किए गए।
अदालत ने कहा कि यदि ऐसे आचरण को अनदेखा किया गया तो इससे जनता के बीच यह संदेश जा सकता है कि न्यायिक निर्णयों को बाहरी माध्यमों से प्रभावित किया जा सकता है, जो न्यायिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा।
न्यायिक निष्पक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता
भारतीय न्याय व्यवस्था में किसी न्यायाधीश द्वारा स्वयं को किसी मामले की सुनवाई से अलग करना (Recusal) एक स्थापित न्यायिक प्रक्रिया है। ऐसा तब किया जाता है जब न्यायाधीश यह महसूस करें कि किसी भी कारण से निष्पक्षता को लेकर कोई प्रश्न या आशंका उत्पन्न हो सकती है या न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखना आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में न्यायालय का उद्देश्य न्यायिक प्रणाली की निष्पक्षता, पारदर्शिता और जनता के विश्वास को बनाए रखना होता है।
आगे क्या होगा?
अब यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष जाएगा। मुख्य न्यायाधीश इन 74 जमानत याचिकाओं की सुनवाई के लिए नई पीठ गठित करेंगे। इसके बाद नई पीठ संबंधित मामलों पर विधि के अनुसार सुनवाई आगे बढ़ाएगी।
फिलहाल न्यायालय की ओर से किसी पक्षकार के खिलाफ इस आदेश में अलग से कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया है। आदेश मुख्य रूप से न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता और स्वतंत्रता को बनाए रखने की आवश्यकता पर केंद्रित है।

