Allahabad High Court का बड़ा फैसला: सरकारी कर्मचारी के खिलाफ FIR से पहले सुनना होगा पक्ष, डॉ. राहुल वर्मा को मिली राहत
Allahabad High Court ने सरकारी कर्मचारियों को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी पर उसके आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन के दौरान किए गए कथित अपराध को लेकर शिकायत की जाती है, तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट को संबंधित कर्मचारी का पक्ष सुनना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) के तहत सरकारी कर्मचारियों को जो वैधानिक सुरक्षा दी गई है, उसे नजरअंदाज करके सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
यह फैसला गौतमबुद्ध नगर से जुड़े एक मामले में आया, जिसमें सरकारी चिकित्सक डॉ. राहुल वर्मा ने अपने खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के मजिस्ट्रेट के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए 12 अगस्त 2026 को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम, गौतमबुद्ध नगर द्वारा पारित आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही डॉ. राहुल वर्मा के खिलाफ शुरू की गई संबंधित कार्यवाही भी निरस्त कर दी गई।
क्या है पूरा मामला, अस्पताल में सर्जरी के बाद शुरू हुआ विवाद
मामला गौतमबुद्ध नगर स्थित यथार्थ अस्पताल में हुई एक सर्जरी से जुड़ा था। शिकायतकर्ता धीरेंद्र ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी की 31 मई 2025 को अस्पताल में पित्ताशय की पथरी निकालने के लिए सर्जरी हुई थी।
शिकायत में दावा किया गया कि ऑपरेशन के दौरान करीब 10 मिलीमीटर की पथरी रह गई, जिसके बाद उसकी पत्नी को लगातार दर्द की शिकायत बनी रही। बाद में दूसरे अस्पताल में उपचार के दौरान कथित रूप से उस पथरी को निकाला गया।
शिकायतकर्ता ने इस पूरे घटनाक्रम को चिकित्सकीय लापरवाही बताते हुए कार्रवाई की मांग की। मामला आगे बढ़ा तो स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर भी इसकी जांच कराई गई।
शिकायत के बाद स्वास्थ्य विभाग ने बनाई तीन सदस्यीय समिति
शिकायत मिलने के बाद गौतमबुद्ध नगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने 11 जुलाई 2025 को मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की। इस समिति की अध्यक्षता अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. शुभ्रा मित्तल को सौंपी गई थी।
सरकारी चिकित्सक डॉ. राहुल वर्मा भी इस समिति में सदस्य के रूप में शामिल थे।
समिति ने मामले से संबंधित पक्षों को सुना। उपलब्ध दस्तावेजों, तथ्यों और रिपोर्टों पर विचार करने के बाद समिति ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर संबंधित अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत की।
हालांकि शिकायतकर्ता समिति की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हुआ। उसने इसके बाद जिलाधिकारी के समक्ष दोबारा शिकायत की और मामले में आगे कार्रवाई की मांग की।
मजिस्ट्रेट के सामने पहुंचा मामला, FIR की मांग
इसके बाद शिकायतकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(4) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दाखिल किया। आवेदन में डॉ. राहुल वर्मा सहित अन्य लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने की मांग की गई।
मामले की सुनवाई के बाद अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-प्रथम, गौतमबुद्ध नगर ने 12 अगस्त 2026 को पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दे दिया।
यही आदेश बाद में डॉ. राहुल वर्मा के लिए हाईकोर्ट जाने की वजह बना। उन्होंने मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया।
डॉ. राहुल वर्मा की ओर से क्या दलील दी गई?
हाईकोर्ट में डॉ. राहुल वर्मा की ओर से अधिवक्ता विभु राय ने महत्वपूर्ण दलील रखी। उन्होंने अदालत को बताया कि डॉ. राहुल वर्मा जिला संयुक्त अस्पताल, नोएडा में परामर्शदाता शल्य चिकित्सक के पद पर कार्यरत हैं।
उनके मुताबिक डॉ. वर्मा को मुख्य चिकित्सा अधिकारी के आदेश पर गठित जांच समिति का सदस्य बनाया गया था। यानी मामले में उनकी भूमिका किसी उपचार करने वाले चिकित्सक की नहीं, बल्कि सरकारी आदेश के तहत गठित समिति के सदस्य के रूप में आधिकारिक दायित्व निभाने की थी।
याचिका में यह भी कहा गया कि डॉ. राहुल वर्मा का शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या उसकी सर्जरी से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।
‘चिकित्सकीय लापरवाही का कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं’
याची की ओर से हाईकोर्ट में यह भी तर्क दिया गया कि रिकॉर्ड में डॉ. राहुल वर्मा के खिलाफ ऐसा कोई प्रत्यक्ष तथ्य मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो कि वह शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या सर्जरी में शामिल थे।
अधिवक्ता ने कहा कि डॉ. वर्मा केवल सरकारी आदेश के तहत गठित समिति का हिस्सा थे और उन्होंने अपनी आधिकारिक जिम्मेदारी के तहत मामले की जांच में भाग लिया था।
ऐसे में उनके खिलाफ चिकित्सकीय लापरवाही से संबंधित कार्रवाई शुरू करना उचित नहीं था। याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ ऐसी स्थिति में जांच अथवा एफआईआर का आदेश देने से पहले कानून में दी गई सुरक्षा का पालन किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया गया हवाला
डॉ. राहुल वर्मा की ओर से बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट के ओम प्रकाश अंबाडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया गया।
दलील का मुख्य आधार यह था कि जब किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ उसके आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े कथित अपराध को लेकर कार्रवाई की मांग की जाती है, तो संबंधित कर्मचारी को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया जाना चाहिए।
याचिका में इसी कानूनी सुरक्षा को आधार बनाते हुए कहा गया कि मजिस्ट्रेट द्वारा सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश देना उचित नहीं था, क्योंकि डॉ. राहुल वर्मा को अपना पक्ष रखने का अवसर ही नहीं दिया गया।
हाईकोर्ट ने BNSS की धारा 175(4) को माना महत्वपूर्ण
मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4)(बी) के प्रावधान पर विशेष ध्यान दिया।
अदालत ने पाया कि मजिस्ट्रेट ने डॉ. राहुल वर्मा से कोई जवाब नहीं मांगा था। यानी एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने से पहले संबंधित सरकारी कर्मचारी को यह बताने का अवसर नहीं दिया गया कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों में उसकी वास्तविक भूमिका क्या थी।
हाईकोर्ट ने इसी बिंदु को महत्वपूर्ण माना और कहा कि सरकारी कर्मचारी को कानून के तहत मिली सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सरकारी कर्मचारी होना ही पर्याप्त नहीं, लेकिन कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी
अदालत की टिप्पणी का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकारी कर्मचारी को हर प्रकार की आपराधिक कार्रवाई से छूट नहीं दी गई है। बल्कि मुद्दा यह है कि यदि आरोप आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से जुड़े हों, तो कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
यानी किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने मात्र से सीधे एफआईआर का आदेश नहीं दिया जा सकता, जब संबंधित कानूनी प्रावधान पहले कर्मचारी को सुनने की प्रक्रिया निर्धारित करता हो।
इस मामले में हाईकोर्ट ने इसी प्रक्रिया को निर्णायक माना।
डॉ. राहुल वर्मा की भूमिका पर भी उठे सवालों का जवाब
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए यह भी पाया कि ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि डॉ. राहुल वर्मा शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या सर्जरी में शामिल थे।
अदालत के सामने ऐसा कोई ठोस तथ्य भी नहीं था, जिससे यह स्थापित हो कि उन्होंने उपचार के दौरान किसी प्रकार की चिकित्सकीय लापरवाही की थी।
यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मूल विवाद अस्पताल में हुई सर्जरी और कथित रूप से पथरी रह जाने को लेकर था, जबकि डॉ. राहुल वर्मा की भूमिका उस उपचार से अलग बताई गई थी।
उनकी भूमिका बाद में गठित सरकारी जांच समिति के सदस्य की थी।
हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट का आदेश किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फैसले और मामले के रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 अगस्त 2026 के मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया।
अदालत ने डॉ. राहुल वर्मा की याचिका स्वीकार कर ली और उनके खिलाफ शुरू की गई संबंधित कार्यवाही को भी निरस्त कर दिया।
इस तरह हाईकोर्ट के फैसले से डॉ. राहुल वर्मा को बड़ी राहत मिली है। साथ ही फैसले ने यह भी स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े मामलों में एफआईआर का आदेश देते समय मजिस्ट्रेट को कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा।
फैसले का व्यापक महत्व क्या है?
यह फैसला सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक शिकायतों की प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। खासकर उन मामलों में जहां किसी सरकारी कर्मचारी की भूमिका सीधे कथित घटना में नहीं, बल्कि उसके सरकारी पद और आधिकारिक जिम्मेदारी के कारण सामने आती है।
ऐसे मामलों में शिकायत की गंभीरता के साथ-साथ यह देखना भी जरूरी है कि संबंधित कर्मचारी की वास्तविक भूमिका क्या थी और आरोप उसके किस कार्य से जुड़े हैं।
हाईकोर्ट ने इस मामले में इसी अंतर को महत्वपूर्ण माना। डॉ. राहुल वर्मा के खिलाफ शिकायत का मूल विषय एक निजी अस्पताल में हुई सर्जरी और कथित चिकित्सकीय लापरवाही था, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार डॉ. वर्मा उस सर्जरी में शामिल चिकित्सक नहीं थे।
उनकी भूमिका सरकारी आदेश के तहत गठित समिति में सदस्य के रूप में थी।
मजिस्ट्रेट के लिए भी अहम संदेश
फैसले से न्यायिक अधिकारियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया सामने आती है। किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े कथित अपराध की शिकायत आने पर केवल शिकायत में लगाए गए आरोपों के आधार पर एफआईआर का आदेश देना पर्याप्त नहीं हो सकता।
पहले यह देखना होगा कि संबंधित कर्मचारी की भूमिका क्या थी, आरोप किस आधिकारिक कार्य से जुड़े हैं और क्या कानून के तहत उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि डॉ. राहुल वर्मा को अपना जवाब देने का अवसर नहीं दिया गया था। इसी कारण धारा 175(4) के तहत उपलब्ध सुरक्षा के पालन का सवाल महत्वपूर्ण हो गया।
चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में भी अहम पहलू
मामला भले ही एक कथित मेडिकल नेग्लिजेंस शिकायत से जुड़ा था, लेकिन हाईकोर्ट का फैसला केवल चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। सरकारी सेवा में अलग-अलग विभागों के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ उनके आधिकारिक कार्यों को लेकर शिकायतें सामने आ सकती हैं।
ऐसे मामलों में शिकायतकर्ता के आरोपों की जांच के साथ-साथ संबंधित सरकारी कर्मचारी की भूमिका और वैधानिक सुरक्षा भी महत्वपूर्ण होगी।
यही वजह है कि डॉ. राहुल वर्मा से जुड़े इस मामले में अदालत का फैसला व्यापक कानूनी प्रक्रिया के संदर्भ में देखा जा रहा है।
अब इस मामले में क्या बचा?
हाईकोर्ट द्वारा मजिस्ट्रेट का 12 अगस्त 2026 का आदेश रद्द किए जाने के बाद डॉ. राहुल वर्मा के खिलाफ इसी आदेश के आधार पर शुरू की गई संबंधित कार्यवाही भी समाप्त हो गई है।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी देखा कि रिकॉर्ड में डॉ. वर्मा को शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या सर्जरी से जोड़ने वाला कोई तथ्य नहीं था। ऐसे में बिना उन्हें सुने एफआईआर का आदेश देना और सरकारी कर्मचारी को मिली वैधानिक सुरक्षा की अनदेखी करना उचित नहीं माना गया।
इस फैसले ने एक बात साफ कर दी है कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्य से संबंधित शिकायत में कार्रवाई केवल आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार आगे बढ़नी चाहिए। खासकर तब, जब कानून स्वयं संबंधित कर्मचारी को सुनवाई का अवसर देने की सुरक्षा प्रदान करता हो।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डॉ. राहुल वर्मा को बड़ी राहत देते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े कथित अपराध में एफआईआर का आदेश देने से पहले उसका पक्ष सुनना जरूरी है। अदालत ने BNSS की धारा 175(4) के तहत मिली वैधानिक सुरक्षा की अनदेखी को गंभीर माना और 12 अगस्त 2026 का मजिस्ट्रेट आदेश रद्द कर दिया।

