Nepal में बदली कूटनीति की तस्वीर! PM बालेन शाह ने पहली बार अकेले भारतीय राजदूत से की मुलाकात, चीन के दूत से भी बातचीत; आखिर क्यों टूटा अपना ही नियम?
Nepal की राजनीति और कूटनीतिक हलकों में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है। प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने पहली बार किसी विदेशी राजदूत के साथ वन-टू-वन बैठक की और यह मुलाकात भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव के साथ हुई। इसके बाद उन्होंने चीन के राजदूत झांग माओमिंग से भी मुलाकात की।
बालेन शाह की भारतीय राजदूत के साथ अकेले में हुई बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती दौर में उन्होंने विदेशी राजदूतों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ इस तरह की व्यक्तिगत बैठकों से दूरी बनाए रखने की नीति अपनाई थी।
शाह का जोर सामूहिक बैठकों पर था, जहां अलग-अलग देशों के राजदूत एक साथ मौजूद रहते थे। उनका तर्क था कि नेपाल को सभी देशों के साथ समान दूरी और समान सम्मान की कूटनीतिक नीति रखनी चाहिए तथा शक्तिशाली देशों को सरकारी तंत्र को दरकिनार कर सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच बनाने का रास्ता नहीं मिलना चाहिए।
लेकिन अब भारतीय और चीनी राजदूतों के साथ सीधे संवाद ने संकेत दिया है कि नेपाल सरकार की विदेश नीति के संचालन के तरीके में कुछ बदलाव आया है।
प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय राजदूत से पहली वन-टू-वन मुलाकात
प्रधानमंत्री बालेन शाह ने सोमवार को भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव से मुलाकात की। यह बैठक उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद किसी विदेशी राजदूत के साथ पहली वन-टू-वन मुलाकात बताई जा रही है।
भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने शाह को नेपाल का प्रधानमंत्री बनने पर बधाई दी।
बैठक के दौरान भारत की ओर से नेपाल के साथ अच्छे संबंधों को आगे बढ़ाने और विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग जारी रखने की बात कही गई।
दोनों पक्षों ने भारत-नेपाल संबंधों, विकास सहयोग और आपसी हितों से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की।
भारत-नेपाल संबंधों को लेकर शाह ने क्या कहा?
बैठक में बालेन शाह ने भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे संबंधों को महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को पुराने और भरोसेमंद संबंधों के रूप में रेखांकित करते हुए द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।
शाह ने विशेष रूप से व्यापार बढ़ाने, बिजली के क्षेत्र में सहयोग और सड़क सहित विभिन्न विकास परियोजनाओं में मिलकर काम जारी रखने की बात कही।
नेपाल के लिए भारत के साथ व्यापार और ऊर्जा सहयोग हमेशा महत्वपूर्ण मुद्दे रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री स्तर पर इन क्षेत्रों को प्राथमिकता देना दोनों देशों के आर्थिक संबंधों के लिए महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है।
बिजली और सड़क सहयोग पर विशेष जोर
भारत और नेपाल के बीच बिजली सहयोग पिछले कुछ वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरा है।
नेपाल में जलविद्युत उत्पादन की बड़ी संभावनाएं हैं, जबकि भारत के लिए पड़ोसी देश से बिजली आयात और क्षेत्रीय ऊर्जा सहयोग महत्वपूर्ण है।
सड़क और कनेक्टिविटी परियोजनाएं भी दोनों देशों के बीच आर्थिक संपर्क बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
बालेन शाह की बैठक में इन क्षेत्रों का उल्लेख बताता है कि काठमांडू भारत के साथ व्यावहारिक विकास सहयोग को महत्व देता है।
व्यापार बढ़ाने की दिशा में भी बातचीत
भारत नेपाल का एक प्रमुख व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच खुली सीमा, लोगों की आवाजाही और भौगोलिक निकटता के कारण आर्थिक संबंधों का महत्व और बढ़ जाता है।
ऐसे में व्यापार को और विस्तार देने पर जोर देना नेपाल की अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी दोनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
प्रधानमंत्री शाह की भारतीय राजदूत से बैठक में व्यापार और विकास को लेकर बातचीत इसी व्यापक आर्थिक संदर्भ में देखी जा रही है।
चीन के राजदूत से भी मिले बालेन शाह
भारतीय राजदूत से मुलाकात के बाद बालेन शाह ने चीन के राजदूत झांग माओमिंग से भी बातचीत की।
दोनों के बीच नेपाल-चीन संबंधों, आपसी हितों और विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई।
बैठक में अलग-अलग क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने और विकास परियोजनाओं को आगे ले जाने पर भी विचार-विमर्श किया गया।
इस तरह एक ही दौर में भारत और चीन के राजदूतों के साथ सीधे संवाद ने शाह की बदलती कूटनीतिक शैली को चर्चा में ला दिया है।
भारत और चीन दोनों के साथ संतुलन का संदेश
नेपाल भौगोलिक रूप से भारत और चीन दोनों के बीच स्थित है। इसलिए काठमांडू के लिए दोनों पड़ोसी शक्तियों के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखना हमेशा महत्वपूर्ण रहा है।
बालेन शाह का भारतीय और चीनी राजदूतों के साथ संवाद इसी संतुलन की नीति का हिस्सा माना जा सकता है।
भारत के साथ व्यापार, ऊर्जा और कनेक्टिविटी जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं, तो चीन के साथ भी विकास और बुनियादी ढांचे से जुड़े सहयोग का अपना महत्व है।
लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा उनके पुराने नियम की हो रही है
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि शाह ने विदेशी अधिकारियों से वन-टू-वन मुलाकात को लेकर पहले एक अलग नीति अपनाई थी।
प्रधानमंत्री बनने के शुरुआती दौर में उन्होंने विदेश मंत्री के स्तर से नीचे के विदेशी अधिकारियों के साथ व्यक्तिगत बैठकें नहीं करने का रुख अपनाया था।
विदेशी राजदूतों के साथ भी वह आम तौर पर सामूहिक बैठकों को प्राथमिकता देते थे।
अब भारतीय राजदूत के साथ उनकी पहली व्यक्तिगत बैठक ने उसी नीति में बदलाव का संकेत दिया है।
विदेश सचिव विक्रम मिस्री भी नहीं कर पाए थे अकेले मुलाकात
शाह की शुरुआती नीति का एक उदाहरण भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री की नेपाल यात्रा के दौरान भी देखने को मिला था।
11-12 मई की नेपाल यात्रा के दौरान मिस्री की बालेन शाह से वन-टू-वन मुलाकात नहीं हो सकी थी।
यह उस समय शाह की अपनाई गई नीति के अनुरूप था, जिसमें विदेशी अधिकारियों के साथ सीधे व्यक्तिगत संवाद से दूरी बनाए रखने की बात सामने आई थी।
अब परिस्थितियां बदली हुई नजर आ रही हैं।
अमेरिकी अधिकारियों से मुलाकात का अनुरोध भी स्वीकार नहीं किया था
रिपोर्ट के मुताबिक बालेन शाह ने अमेरिकी अधिकारियों समीर पॉल कपूर और सर्जियो गोर के साथ वन-टू-वन बैठक के अनुरोध भी स्वीकार नहीं किए थे।
इसके बजाय उन्होंने सामूहिक बैठकों का रास्ता अपनाया।
9 अप्रैल और 26 मई को काठमांडू में तैनात विभिन्न देशों के राजदूतों के साथ सामूहिक बैठकें की गई थीं।
इन बैठकों के जरिए शाह ने सभी देशों के साथ समान व्यवहार का संदेश देने की कोशिश की थी।
आखिर क्यों अपनाई थी शाह ने यह नीति?
बालेन शाह की इस नीति के पीछे उनका राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण बताया जाता रहा है।
उनका मानना था कि शक्तिशाली देश कभी-कभी नेपाल की सरकारी व्यवस्था को दरकिनार कर सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकते हैं।
शाह चाहते थे कि विदेशी प्रतिनिधियों के साथ बातचीत संस्थागत ढांचे के भीतर हो और नेपाल सरकार की औपचारिक व्यवस्था को प्राथमिकता मिले।
सामूहिक बैठकों को इसी दृष्टिकोण का हिस्सा माना गया।
सभी देशों को बराबरी का संदेश देना चाहते थे शाह
सामूहिक बैठकें करने की एक वजह यह भी मानी गई कि नेपाल किसी एक बड़े देश के साथ विशेष नजदीकी का संकेत न दे।
भारत, चीन, अमेरिका और अन्य देशों के प्रतिनिधियों को एक साथ बातचीत के मंच पर लाने से शाह समानता और संतुलन का संदेश देना चाहते थे।
यह नीति उनके व्यापक विदेश नीति दृष्टिकोण का हिस्सा मानी गई थी।
अब बदली रणनीति क्यों दिखाई दे रही है?
सरकार के 100 दिन पूरे होने के बाद शाह को उनके सलाहकारों ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग लोगों के साथ वन-टू-वन बातचीत बढ़ाने की सलाह दी।
इसके बाद शाह ने नेताओं, कारोबारियों और उद्योगपतियों के साथ व्यक्तिगत बैठकें शुरू कीं।
अब विदेशी राजदूतों के साथ सीधे संवाद भी इसी बदली हुई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
यानी शाह की नीति पूरी तरह पलटने के बजाय धीरे-धीरे अधिक व्यावहारिक और संवाद-केंद्रित होती दिखाई दे रही है।
क्या कूटनीति में दूरी नुकसान पहुंचा रही थी?
मीडिया रिपोर्टों में यह चिंता भी सामने आई कि विदेशी राजदूतों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ लंबे समय तक सीधे संवाद से दूरी बनाए रखने से नेपाल के कूटनीतिक रिश्तों पर असर पड़ सकता है।
कूटनीति में केवल औपचारिक बैठकें ही महत्वपूर्ण नहीं होतीं। व्यक्तिगत संवाद भी कई बार रिश्तों में विश्वास बनाने और संवेदनशील मुद्दों को सीधे समझने का माध्यम होता है।
शाह की नई रणनीति इसी जरूरत को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाई जा रही है, ऐसा माना जा रहा है।
विदेशी राजदूतों से सीधे संवाद की जरूरत क्यों पड़ती है?
राजदूत अपने देशों और मेजबान देश के बीच महत्वपूर्ण संपर्क सूत्र होते हैं।
प्रधानमंत्री स्तर पर उनकी सीधी बातचीत से कई बार औपचारिक कूटनीतिक चैनलों के साथ-साथ राजनीतिक समझ भी मजबूत होती है।
हालांकि ऐसे संवाद में संस्थागत प्रक्रिया और पारदर्शिता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
नेपाल में इसी संतुलन को लेकर शाह की शुरुआती नीति काफी अलग दिखाई दी थी।
नेपाल में पहले से चली आ रही थी अलग परंपरा
बालेन शाह के प्रधानमंत्री बनने से पहले नेपाल में भारत, चीन और अमेरिका जैसे बड़े देशों के राजदूतों की प्रधानमंत्री से वन-टू-वन मुलाकात सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा रही थी।
नई सरकार बनने के बाद विदेशी राजदूत अक्सर सीधे प्रधानमंत्री से मिलने जाते थे।
कई बार ये बैठकें प्रधानमंत्री के निजी आवास पर भी आयोजित होती थीं।
कुछ बैठकों में विदेश मंत्रालय के अधिकारी भी नहीं होते थे
बताया जाता है कि अतीत में प्रधानमंत्री और विदेशी राजदूतों के बीच होने वाली कुछ व्यक्तिगत बैठकों में विदेश मंत्रालय के अधिकारी मौजूद नहीं होते थे।
इन बैठकों का हमेशा औपचारिक रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता था।
यही स्थिति कुछ विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय रही।
अनौपचारिक बातचीत के फायदे और जोखिम दोनों
राजदूतों और प्रधानमंत्री के बीच अनौपचारिक बातचीत के कुछ फायदे हो सकते हैं। इससे व्यक्तिगत संबंध मजबूत होते हैं और संवेदनशील मुद्दों पर खुलकर संवाद का अवसर मिलता है।
लेकिन दूसरी ओर, यदि ऐसी बैठकों में संस्थागत निगरानी या रिकॉर्डिंग का अभाव हो तो पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
इसी कारण कुछ विशेषज्ञों ने पहले ऐसी व्यवस्था से जुड़े संभावित हितों के टकराव को लेकर चिंता जताई थी।
राष्ट्रीय हितों को लेकर भी उठते रहे सवाल
नेपाल जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देश के लिए विदेश नीति में पारदर्शिता और संस्थागत प्रक्रिया का महत्व काफी अधिक है।
भारत और चीन दोनों से नेपाल के गहरे संबंध हैं और अमेरिका सहित अन्य शक्तियों के साथ भी उसके संबंध महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे में शीर्ष नेतृत्व और विदेशी प्रतिनिधियों के बीच होने वाली बातचीत का राष्ट्रीय हितों के अनुरूप होना आवश्यक माना जाता है।
बालेन शाह की पुरानी सोच अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई
यह कहना जल्दबाजी होगी कि शाह ने अपनी पुरानी नीति पूरी तरह छोड़ दी है।
भारतीय और चीनी राजदूतों के साथ वन-टू-वन मुलाकात यह संकेत जरूर देती है कि उन्होंने व्यक्तिगत संवाद को अब पूरी तरह अस्वीकार करने के बजाय आवश्यकता के अनुसार इस्तेमाल करना शुरू किया है।
सामूहिक बैठकें और संस्थागत संवाद अभी भी उनकी कूटनीतिक शैली का हिस्सा रह सकते हैं।
भारत के लिए भी बैठक महत्वपूर्ण
भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव के साथ शाह की पहली व्यक्तिगत मुलाकात भारत-नेपाल संबंधों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।
भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक संबंध हैं।
खुली सीमा और लोगों के बीच व्यापक संपर्क दोनों देशों के रिश्तों को अन्य पड़ोसी देशों से अलग बनाता है।
भारत-नेपाल संबंधों में विकास सहयोग की बड़ी भूमिका
भारत नेपाल में सड़क, ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विकास क्षेत्रों में लंबे समय से सहयोग करता रहा है।
ऐसे में प्रधानमंत्री शाह का विकास सहयोग को लेकर सकारात्मक रुख दोनों देशों के लिए व्यावहारिक महत्व रखता है।
द्विपक्षीय परियोजनाओं की गति और उनके प्रभाव को लेकर आने वाले समय में और बातचीत हो सकती है।
ऊर्जा क्षेत्र बन सकता है अहम सहयोग का आधार
नेपाल के पास विशाल जलविद्युत क्षमता है। भारत और नेपाल के बीच बिजली व्यापार और ऊर्जा सहयोग आने वाले वर्षों में दोनों देशों के संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
नेपाल बिजली उत्पादन बढ़ाकर निर्यात के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना चाहता है, जबकि भारत के लिए क्षेत्रीय ऊर्जा बाजार का विस्तार रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
इसलिए शाह की बातचीत में बिजली सहयोग का उल्लेख महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
सड़क और कनेक्टिविटी पर भी नजर
भारत और नेपाल के बीच सीमा पार कनेक्टिविटी दोनों देशों के नागरिकों और कारोबारियों के लिए महत्वपूर्ण है।
सड़क, रेल और अन्य संपर्क परियोजनाओं के विस्तार से व्यापार और लोगों की आवाजाही को सुविधा मिल सकती है।
शाह की सरकार यदि विकास सहयोग को प्राथमिकता देती है तो कनेक्टिविटी परियोजनाएं भी महत्वपूर्ण एजेंडा बन सकती हैं।
चीन के साथ भी विकास सहयोग जारी रखने का संकेत
भारतीय राजदूत के साथ बैठक के बाद चीनी राजदूत झांग माओमिंग से मुलाकात करना भी महत्वपूर्ण कूटनीतिक संदेश देता है।
नेपाल भारत और चीन दोनों के साथ विकास संबंधों को आगे बढ़ाना चाहता है।
काठमांडू के लिए दोनों पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना उसकी विदेश नीति की प्रमुख आवश्यकता है।
शाह की कूटनीति में आ रहा है व्यावहारिक बदलाव?
बालेन शाह की राजनीति की पहचान पारंपरिक राजनीतिक शैली से अलग दृष्टिकोण के लिए रही है।
प्रधानमंत्री बनने के बाद विदेशी राजदूतों के साथ वन-टू-वन बैठक से दूरी बनाना भी उनकी अलग कार्यशैली का हिस्सा था।
अब भारतीय और चीनी राजदूतों से व्यक्तिगत संवाद यह संकेत देता है कि शासन की वास्तविक जरूरतों के अनुसार उनकी शैली अधिक व्यावहारिक हो रही है।
100 दिन बाद बदली कार्यशैली
सरकार के शुरुआती 100 दिनों में शाह ने जिस तरह व्यक्तिगत कूटनीतिक बैठकों से दूरी बनाए रखी, उसके बाद सलाहकारों की राय पर उन्होंने नेताओं, कारोबारियों और उद्योगपतियों के साथ वन-टू-वन संवाद बढ़ाया।
अब यही बदलाव विदेशी प्रतिनिधियों के साथ भी दिखाई दे रहा है।
इससे लगता है कि सरकार का शुरुआती संस्थागत कठोर रुख अब संवाद के अधिक व्यावहारिक मॉडल की ओर बढ़ रहा है।
क्या यह भारत के लिए सकारात्मक संकेत है?
भारत-नेपाल संबंधों की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रधानमंत्री स्तर पर सीधा संवाद निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है।
भारत के लिए नेपाल के साथ मजबूत और स्थिर संबंध रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं।
व्यापार, ऊर्जा, सीमा संपर्क और लोगों के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक नेतृत्व के बीच नियमित संवाद उपयोगी हो सकता है।
चीन के साथ संतुलन बनाए रखना भी जरूरी
हालांकि नेपाल भारत के साथ संबंध बढ़ाने के साथ चीन से दूरी बनाने की नीति नहीं अपना सकता।
काठमांडू के लिए दोनों पड़ोसी देशों के साथ संतुलित संबंध रखना महत्वपूर्ण है।
बालेन शाह की भारतीय और चीनी राजदूतों से मुलाकातें इसी संतुलन का संकेत देती हैं।
विदेश नीति में व्यक्तिगत संपर्क की वापसी
शाह की नई रणनीति का सबसे स्पष्ट संकेत यही है कि उन्होंने व्यक्तिगत कूटनीतिक संपर्क के दरवाजे फिर से खोल दिए हैं।
अब विदेशी राजदूत सीधे प्रधानमंत्री से अपनी बात रख सकते हैं, लेकिन यह संवाद किस संस्थागत ढांचे में होता है, यह आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा।
शाह के लिए चुनौती यही होगी कि व्यक्तिगत संवाद और संस्थागत पारदर्शिता के बीच संतुलन बना रहे।
नेपाल के लिए बराबरी का संदेश अभी भी महत्वपूर्ण
शाह ने जिस कारण से सामूहिक बैठकें शुरू की थीं, वह पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुआ है।
भारत, चीन और अमेरिका जैसी बड़ी शक्तियों के बीच नेपाल को अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए संतुलन साधना होता है।
इसलिए व्यक्तिगत बैठकें बढ़ाने के बावजूद सभी देशों के साथ समान और सम्मानजनक संबंध बनाए रखना शाह की विदेश नीति की अहम परीक्षा होगी।
भारत और चीन के साथ एक ही दिन संवाद का राजनीतिक संदेश
एक ओर भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव से मुलाकात और दूसरी ओर चीनी राजदूत झांग माओमिंग के साथ बातचीत ने काठमांडू की संतुलित कूटनीति का संदेश दिया।
शाह किसी एक पक्ष के साथ अपनी विदेश नीति को जोड़ने के बजाय दोनों पड़ोसी देशों के साथ संवाद जारी रखना चाहते हैं।
नेपाल की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति को देखते हुए यह रणनीति व्यावहारिक भी है।
अब निगाहें आगे की बैठकों पर
भारतीय और चीनी राजदूतों के साथ इन मुलाकातों के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शाह विदेशी प्रतिनिधियों के साथ व्यक्तिगत बैठकों को किस स्तर तक बढ़ाते हैं।
क्या यह केवल शुरुआती रणनीतिक बदलाव है या नेपाल की विदेश नीति में स्थायी कार्यशैली परिवर्तन का संकेत है, इसका आकलन आने वाले महीनों में होगा।
बालेन शाह की कूटनीति का नया अध्याय
बालेन शाह ने प्रधानमंत्री बनने के बाद विदेशी राजदूतों से वन-टू-वन बैठक न करने की नीति से शुरुआत की थी। अब भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव से उनकी पहली व्यक्तिगत बैठक और उसके बाद चीनी राजदूत से बातचीत बताती है कि उनकी कार्यशैली में बदलाव आया है।
यह बदलाव किसी एक देश के पक्ष में झुकाव का स्पष्ट संकेत नहीं है। बल्कि उपलब्ध जानकारी से यह अधिक दिखाई देता है कि शाह अब संस्थागत सावधानी के साथ व्यक्तिगत कूटनीतिक संवाद को भी जगह देना चाहते हैं।
भारत और नेपाल के पुराने संबंधों, चीन के साथ नेपाल की विकास जरूरतों और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के बीच शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि काठमांडू अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों को कायम रखते हुए दोनों पड़ोसी देशों के साथ व्यावहारिक सहयोग बढ़ाए।

