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Nepal-तिब्बत में फिर फटी झील, हजारों की जान पर संकट! भोटेकोशी-त्रिशूली में बढ़ा पानी, गांव खाली; 32 देशों के लोग लापता

Nepal में हालात एक बार फिर बेहद गंभीर हो गए हैं। नेपाल-तिब्बत सीमा के पास एक और अस्थायी झील टूटने की खबर के बाद बाढ़ का खतरा फिर बढ़ गया है। तिब्बत के ग्यिरोंग इलाके में बर्फ और मलबे के पहाड़ से झील में गिरने के बाद पानी का दबाव बढ़ा और अब चोचेन नदी तथा पुरेपु त्सांगपो नदी के संगम के पास बनी एक अन्य झील के टूटने की सूचना सामने आई है।

इस घटनाक्रम ने नेपाल के उन इलाकों में चिंता बढ़ा दी है, जो पहले ही विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन की मार झेल चुके हैं। भोटेकोशी, त्रिशूली और नारायणी नदी के आसपास रहने वाले लोगों को सतर्क किया गया है। कई गांवों को खाली कराया जा रहा है और लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की गई है।

नेपाल में सेना, पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल के हजारों जवान राहत एवं बचाव कार्य में जुटे हैं। दूसरी ओर, तिब्बत में भी चीन ने नए खतरे को देखते हुए अलर्ट जारी किया है। खराब मौसम, पहाड़ी भूगोल, टूटी सड़कें और पुल तथा लगातार बदलती जलधारा बचाव दलों के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हैं।

इस आपदा में मौतों और लापता लोगों के आंकड़े लगातार बदल रहे हैं। अलग-अलग समय पर जारी सरकारी और प्रशासनिक अपडेट में अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। इसलिए अंतिम मृतक और लापता संख्या आने में अभी समय लग सकता है।

ग्यिरोंग में बर्फ-मलबे के झील में गिरने से शुरू हुआ नया खतरा

तिब्बत के ग्यिरोंग क्षेत्र में बर्फ से ढके पहाड़ पर हिमस्खलन के बाद करीब 50 हजार क्यूबिक मीटर बर्फ और मलबा एक झील में जा गिरा। इस भारी मात्रा में बर्फ और मलबे के पानी में पहुंचने से जलस्तर और दबाव में तेजी से बदलाव आया।

इसके बाद नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बनी एक अन्य झील को लेकर भी खतरे की स्थिति पैदा हुई। यह झील चोचेन नदी और पुरेपु त्सांगपो नदी के संगम के आसपास बनी थी। चीन ने इसके संभावित टूटने को लेकर पहले ही चेतावनी जारी कर दी थी।

अब झील के टूटने के बाद पानी का बहाव निचले इलाकों की ओर बढ़ने लगा है। यही वजह है कि नेपाल में प्रशासन ने नदी किनारे बसे इलाकों को लेकर दोबारा चेतावनी जारी की है।

यह स्थिति इसलिए ज्यादा खतरनाक है क्योंकि पहाड़ी इलाकों में बनी ऐसी झीलें प्राकृतिक रूप से स्थिर जलाशय नहीं होतीं। भूस्खलन, बर्फ, चट्टानों और मलबे से बने अस्थायी अवरोध के पीछे पानी जमा हो सकता है और अचानक बांध टूटने पर बहुत कम समय में नीचे के इलाकों की ओर पानी और मलबे का तेज बहाव पहुंच सकता है।

भोटेकोशी, त्रिशूली और नारायणी किनारे फिर बढ़ी चिंता

नई झील टूटने की सूचना के बाद नेपाल में भोटेकोशी नदी का जलस्तर बढ़ने लगा। इसके बाद स्याब्रुबेसी और आसपास के इलाकों में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए कहा गया।

प्रशासन की चिंता केवल भोटेकोशी तक सीमित नहीं है। पानी का बहाव आगे त्रिशूली नदी और फिर नारायणी नदी प्रणाली को प्रभावित कर सकता है। नदी किनारे बसे निचले इलाकों में अचानक पानी बढ़ने की आशंका को देखते हुए लोगों को हाई अलर्ट पर रहने को कहा गया है।

कई स्थानों पर लोग अपने जरूरी सामान के साथ सुरक्षित जगहों की ओर जाते दिखाई दिए। कुछ इलाकों में प्रशासन और सुरक्षाकर्मी लोगों को घर खाली कराने में जुटे हैं।

पहाड़ी बाढ़ की सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि सामान्य नदी बाढ़ की तुलना में पानी और मलबे का बहाव बहुत तेज हो सकता है। रास्ते में आने वाली सड़कें, पुल और इमारतें भी इसकी चपेट में आ सकती हैं।

चीन ने राहत और बचाव अभियान पर भी लगाया ब्रेक

नए खतरे के बीच चीन ने तिब्बत में राहत और बचाव अभियान को लेकर भी सावधानी बढ़ा दी है। दोबारा बाढ़ आने की आशंका के मद्देनजर लेवल-4 अलर्ट जारी किया गया है।

अधिकारियों की प्राथमिकता फिलहाल लोगों को जोखिम वाले क्षेत्रों से हटाना है। जिन स्थानों पर पानी और मलबा पहुंचने की आशंका है, वहां सुरक्षाकर्मियों और आम नागरिकों को तुरंत सुरक्षित स्थानों पर जाने की अपील की गई है।

चीन की ओर से अस्थायी झील और उसके आसपास के क्षेत्र की निगरानी भी बढ़ाई गई है। इंजीनियरों की टीम हवाई सर्वे और तकनीकी आकलन के जरिए स्थिति समझने की कोशिश कर रही है।

ग्यिरोंग में पहले ही मच चुकी है भारी तबाही

नया खतरा उस समय सामने आया है जब ग्यिरोंग और नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में पहले से ही भारी नुकसान हो चुका है।

ग्यिरोंग पोर्ट और आसपास के इलाकों में अचानक आई बाढ़ ने सड़कें, भवन और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया। कुछ स्थानों पर सड़कें दो मीटर से अधिक मलबे के नीचे दब गईं।

नेपाल की ओर रसुवा, स्याब्रुबेसी और आसपास के क्षेत्रों में भी बाढ़ तथा भूस्खलन ने सामान्य जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया।

सीमा क्षेत्र में होने के कारण समस्या और जटिल है। दोनों तरफ जाने वाले रास्ते क्षतिग्रस्त हुए हैं और कई जगह संपर्क व्यवस्था बाधित हुई है।

ग्लेशियर टूटने के बाद भोटेकोशी में आया अचानक उफान

आपदा की शुरुआत बुधवार को ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने से जुड़ी बताई गई है। बर्फ, चट्टान और मिट्टी का विशाल मलबा नीचे की ओर आया और नदी प्रणाली में पहुंच गया।

मलबे के नदी में गिरने से भोटेकोशी का जलस्तर अचानक बढ़ा। इसके बाद पानी और मलबे का तेज बहाव नीचे की ओर बढ़ता गया।

नेपाल में त्रिशूली नदी का जलस्तर भी बहुत कम समय में तेजी से बढ़ने की जानकारी सामने आई है। इससे नदी किनारे के कई इलाकों में अचानक बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हुई।

चीन के अधिकारियों ने शुरुआती आकलन में ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर टूटने को इस आपदा की संभावित वजह बताया है। हालांकि, आपदा की पूरी वैज्ञानिक तस्वीर के लिए विस्तृत जांच और भू-वैज्ञानिक आकलन जरूरी होगा।

नेपाल में मौतों और लापता लोगों की संख्या लगातार बदल रही

बाढ़ और भूस्खलन की इस आपदा में नेपाल और तिब्बत दोनों तरफ बड़ी संख्या में लोगों की मौत और गुमशुदगी की सूचना है।

नेपाल से जारी अलग-अलग अपडेट में मृतकों और लापता लोगों के आंकड़ों में बदलाव देखा गया है। एक अपडेट में नेपाल में 547 मौतों की पुष्टि और 977 लोगों के लापता होने की जानकारी दी गई, जबकि दूसरे चरण के अपडेट में कुछ इलाकों से शव बरामद होने के बाद आंकड़े और बढ़े हैं।

तिब्बत की ओर भी मौतों और लापता लोगों की संख्या सामने आई है। कुल आंकड़ों में विदेशी नागरिक भी शामिल हैं।

आपदा के बीच आंकड़ों में अंतर की एक बड़ी वजह यह है कि कई इलाके अब भी पूरी तरह पहुंच से बाहर हैं। मलबे में दबे लोगों की तलाश जारी है और कई शवों की पहचान की प्रक्रिया भी चल रही है।

इसलिए अंतिम आंकड़ा राहत और बचाव अभियान पूरा होने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा।

नेपाल के आठ जिलों से सैकड़ों शव बरामद

नेपाल के विभिन्न जिलों में शव बरामद होने का सिलसिला जारी है। उपलब्ध प्रशासनिक आंकड़ों में चितवन से सबसे ज्यादा शव बरामद होने की जानकारी सामने आई है।

जिलेवार आंकड़ों में चितवन से 221, नवलपरासी पूर्व से 134, गोरखा से 46, नुवाकोट से 37, धादिंग से 33, तनहूं से 28, नवलपरासी पश्चिम से 27 और रसुवा से 12 शव बरामद होने की जानकारी दी गई है।

गोरखा में बरामद आंकड़े में मानव अंग भी शामिल बताए गए हैं।

कई शवों को पहचान और पोस्टमार्टम के लिए दूसरे शहरों में भेजा गया है। नवलपरासी, धादिंग, तनहूं और गोरखा से बरामद 102 शवों को पहचान और मेडिकल प्रक्रिया के लिए पोखरा भेजे जाने की जानकारी भी सामने आई है।

काठमांडू में परिजन अपनों की तलाश में परेशान

आपदा का सबसे दर्दनाक चेहरा राहत केंद्रों और अस्पतालों के बाहर दिखाई दे रहा है। काठमांडू में परिजन अपने लापता रिश्तेदारों की तस्वीरें और जानकारी लेकर अलग-अलग केंद्रों के चक्कर लगा रहे हैं।

मुर्दाघरों के बाहर मृतकों की पहचान के लिए तस्वीरें लगाई गई हैं। परिवार के लोग तस्वीरों में अपनों को तलाश रहे हैं और प्रशासन से किसी भी तरह की जानकारी मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

कई जगह दीवारों पर लापता लोगों के नाम, जन्मतिथि और संपर्क विवरण लगाए गए हैं। राहत केंद्रों में लोग सैनिकों और अधिकारियों को अपने रिश्तेदारों के नाम और फोन नंबर बता रहे हैं।

आपदा के बाद की यह स्थिति उन परिवारों की बेचैनी को दिखाती है जिनके पास अभी तक यह पुष्टि नहीं है कि उनके प्रियजन सुरक्षित हैं या नहीं।

नेपाल में 13 हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी रेस्क्यू में जुटे

नेपाल सरकार के मुताबिक, राहत और बचाव अभियान में 13,295 सुरक्षाकर्मी लगाए गए हैं।

इनमें करीब 7,250 नेपाल पुलिस, 4,200 नेपाली सेना और 1,845 आर्म्ड पुलिस फोर्स के जवान शामिल हैं।

सरकारी जानकारी के अनुसार, अब तक 3,253 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।

बचाव अभियान को कई स्तरों पर चलाया जा रहा है। ऊंचे पहाड़ी इलाकों और सुरंगों में फंसे लोगों के लिए हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। नदी किनारे और निचले गांवों में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है।

इसके अलावा भारी मशीनों और खोजी कुत्तों की मदद से मलबे में फंसे लोगों और शवों की तलाश की जा रही है।

नेपाली सेना का तीन-स्तरीय रेस्क्यू प्लान

नेपाली सेना ने बचाव अभियान को कई हिस्सों में बांटा है। पहला महत्वपूर्ण हिस्सा एयरलिफ्ट है। हेलिकॉप्टरों की मदद से उन लोगों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है जो ऊंचे पहाड़ों, दुर्गम इलाकों या सुरंगों में फंसे हैं।

दूसरा हिस्सा इवैक्यूएशन है। नदी किनारे और निचले इलाकों के गांवों को खाली कराकर लोगों को सुरक्षित कैंपों तक पहुंचाया जा रहा है।

तीसरा महत्वपूर्ण हिस्सा फॉरेंसिक सर्च है। इसमें मलबे के नीचे फंसे लोगों और शवों की तलाश की जा रही है।

घायलों को नजदीकी अस्पतालों तक पहुंचाना भी अभियान का अहम हिस्सा है।

हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग बनी बड़ी चुनौती

बाढ़ के कारण रसुवा क्षेत्र में हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंग में बड़ी संख्या में लोगों के फंसने की खबर ने चिंता बढ़ा दी है।

त्रिशूली-3ए हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग में करीब 100 लोगों के फंसे होने की जानकारी सामने आई है। नेपाली सेना की हेलिकॉप्टर और ग्राउंड रेस्क्यू टीमें उन्हें बाहर निकालने की कोशिश कर रही हैं।

मुश्किल पहाड़ी परिस्थितियों और पानी-मलबे के बीच सेना ने अब तक सुरंग से दो लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की जानकारी दी है।

हालांकि, सुरंग में वास्तव में कितने लोग फंसे हैं, इसकी अंतिम संख्या स्पष्ट नहीं है। इसी कारण तलाशी अभियान लगातार जारी रखा गया है।

रसुवा में फंसे लोगों तक पहुंचना आसान नहीं

रसुवा और आसपास का इलाका पहले से ही कठिन भौगोलिक क्षेत्र माना जाता है। बाढ़ और भूस्खलन के बाद सड़कें तथा पुल क्षतिग्रस्त होने से कई स्थानों तक पहुंचना और मुश्किल हो गया है।

स्याब्रुबेसी, तिमुरे और अन्य इलाकों में राहत दलों को लोगों तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक मार्गों और हेलिकॉप्टरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

नेपाली सेना के जनरल राजाराम बसनेत के मुताबिक, गुरुवार को रसुवा के तिमुरे और स्याफ्रुबेसी से करीब 900 लोगों को सुरक्षित निकाला गया। इनमें बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक भी शामिल थे।

उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने इससे पहले इतने बड़े पैमाने की आपदा नहीं देखी।

121 विदेशी नागरिकों का रेस्क्यू, इनमें 85 भारतीय

नेपाल पर्यटन बोर्ड के अपडेट के अनुसार, भोटेकोशी बाढ़ के बाद 121 विदेशी नागरिकों को सुरक्षित निकाला गया।

इनमें 85 भारतीय नागरिक, 16 चीनी, 9 दक्षिण कोरियाई, 2 अमेरिकी और 2 रूसी नागरिक शामिल बताए गए हैं।

इसके अलावा नेपाली सेना ने अलग-अलग बचाव अभियानों में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिकों को सुरक्षित निकालने की जानकारी दी है।

एक अन्य अपडेट में सेना द्वारा 1,024 विदेशी नागरिकों को बचाए जाने की जानकारी सामने आई। अलग-अलग आंकड़ों में अंतर इस बात का संकेत है कि विभिन्न समय और अलग-अलग अभियानों के आंकड़े अलग-अलग दर्ज किए जा रहे हैं।

नेपाल में सैकड़ों विदेशी नागरिक अब भी लापता

नेपाल सरकार की ओर से जारी सूची में 537 विदेशी नागरिकों के लापता होने की जानकारी दी गई। इसमें 178 भारतीय, 65 अमेरिकी, 53 यूक्रेनी, 51 मलेशियाई, 33 ऑस्ट्रेलियाई और 33 ब्रिटिश नागरिक शामिल बताए गए हैं।

अन्य अपडेट्स में 32 देशों के नागरिकों के लापता होने की बात सामने आई है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा, ट्रेकिंग और पर्यटन के लिए इस सीमा क्षेत्र में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक मौजूद थे। बाढ़ ने कई यात्रा मार्गों और सीमा संपर्कों को प्रभावित किया, जिससे उनकी सुरक्षित निकासी भी चुनौती बन गई।

भारत के करीब 320 नागरिकों से संपर्क नहीं

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के मुताबिक, बाढ़ के बाद करीब 320 भारतीय नागरिकों से संपर्क नहीं हो पा रहा था या वे लापता बताए गए।

इसके अलावा करीब 100 भारतीय मूल के लोग भी संपर्क से बाहर बताए गए हैं, जिनमें ऐसे लोग शामिल हो सकते हैं जो किसी दूसरे देश के नागरिक हैं और कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए थे।

नेपाल से रेस्क्यू किए गए 21 भारतीय शुक्रवार को काठमांडू से दिल्ली पहुंच गए।

इससे पहले त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना में काम कर रहे 63 भारतीयों को भी सुरक्षित निकाल लिया गया था। चीन की तरफ फंसे 96 भारतीय नागरिकों के सुरक्षित नेपाल पहुंचने की जानकारी भी सामने आई है।

उन्हें भारत लाने की प्रक्रिया जारी बताई गई है।

कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गईं इंजीनियर स्वाती बागरेचा लापता

मध्य प्रदेश के विदिशा की रहने वाली और कनाडा के टोरंटो में रह रहीं इंजीनियर स्वाती बागरेचा भी इस आपदा के दौरान लापता बताई गई हैं।

परिवार के मुताबिक, 26 अगस्त की सुबह करीब 9 बजे उनसे संपर्क टूट गया। उनका मोबाइल फोन अभी भी रिंग कर रहा है, लेकिन कॉल रिसीव नहीं हो रही।

परिजनों के अनुसार, मोबाइल की लोकेशन चीन की सीमा के आसपास दिखाई दे रही है। परिवार ने संबंधित एजेंसियों से तकनीकी माध्यम से मोबाइल लोकेशन का पता लगाकर स्वाती की स्थिति जानने की अपील की है।

ऐसे मामलों में रेस्क्यू एजेंसियों के लिए समय सबसे महत्वपूर्ण होता है। खराब मौसम और बाधित संचार व्यवस्था के कारण मोबाइल लोकेशन तथा अन्य तकनीकी माध्यमों का इस्तेमाल तलाश अभियान में उपयोगी साबित हो सकता है।

जयशंकर ने नेपाल से लौटे 21 तीर्थयात्रियों से की मुलाकात

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नेपाल में बाढ़ से सुरक्षित निकाले गए तमिलनाडु के 21 तीर्थयात्रियों से मुलाकात की।

उन्होंने तीर्थयात्रियों की आपबीती सुनी और इस मुश्किल परिस्थिति से उन्हें सुरक्षित निकालने के लिए नेपाली सेना और नेपाल सरकार का धन्यवाद किया।

जयशंकर ने भारतीय दूतावास की भूमिका की भी सराहना की, जिसने तीर्थयात्रियों की सुरक्षित भारत वापसी में सहायता की।

यह मुलाकात ऐसे समय हुई जब बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों के नेपाल और तिब्बत क्षेत्र में फंसे होने की खबरें सामने आ रही हैं।

पूर्व DRDO चेयरमैन जी. सतीश रेड्डी समेत 35 कैलाश यात्री सुरक्षित

हैदराबाद से कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गया 45 सदस्यीय दल भी इस आपदा के बीच सुरक्षित बताया गया है। इसमें 35 यात्री और 10 सपोर्ट स्टाफ शामिल हैं।

दल में पूर्व DRDO चेयरमैन जी. सतीश रेड्डी और उनका परिवार भी शामिल है।

MSR चैरिटेबल ट्रस्ट के तहत आयोजित इस यात्रा में शामिल लोगों ने कैलाश की परिक्रमा पूरी कर ली थी। वापसी के दौरान जिस कीरुंग मार्ग का इस्तेमाल किया जाना था, वहां बाढ़ के कारण रास्ता बदलना पड़ा।

चीनी और तिब्बती अधिकारियों ने दल के लिए वैकल्पिक मार्ग तय किया। यात्रा कार्यक्रम के अनुसार दल सागा और न्यालम होते हुए नेपाल की ओर लौटने की तैयारी में था।

सतीश रेड्डी ने फोन पर सभी लोगों के सुरक्षित होने की जानकारी दी और बताया कि बाढ़ के कारण वापसी का रास्ता बदला जा रहा है।

नेपाल सरकार ने विदेशी रेस्क्यू टीमों की पेशकश क्यों नहीं स्वीकार की?

आपदा के बीच कई देशों ने नेपाल को राहत और बचाव सहायता की पेशकश की। भारत, चीन, अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई देशों की ओर से मदद की पेशकश की गई।

लेकिन नेपाल सरकार ने विदेशी रेस्क्यू टीमों को सीधे बुलाने के बजाय आर्थिक और मानवीय सहायता को प्राथमिकता देने का निर्णय लिया।

नेपाली अधिकारियों के अनुसार, 2015 के भूकंप के दौरान बड़ी संख्या में विदेशी बचाव दलों की मौजूदगी से अभियान के समन्वय में कुछ कठिनाइयां आई थीं। इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस बार नेपाली सेना और पुलिस को मुख्य जिम्मेदारी दी गई।

भारत की ओर से NDRF भेजने की पेशकश भी की गई थी, लेकिन नेपाल ने उसे स्वीकार नहीं किया।

यह निर्णय नेपाल की अपनी आपदा प्रबंधन क्षमता और राष्ट्रीय एजेंसियों के अनुभव के आधार पर लिया गया बताया गया है।

भारत और दूसरे देशों ने बढ़ाया सहायता का हाथ

नेपाल में तबाही के बीच कई देशों ने राहत सहायता की घोषणा की है।

संयुक्त अरब अमीरात ने प्रभावित लोगों की मदद के लिए एक करोड़ डॉलर की आपातकालीन सहायता देने का ऐलान किया है। यह सहायता UAE के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के निर्देश पर दी जा रही है।

ऑस्ट्रेलिया ने भी नेपाल को 50 लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की सहायता देने की घोषणा की है, जिसकी भारतीय मुद्रा में कीमत करीब 35 करोड़ रुपये बताई गई है।

ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्रालय ने प्रभावित ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों की मदद के लिए अतिरिक्त कर्मचारियों को नेपाल भेजने की जानकारी दी है।

ऑस्ट्रेलिया के 39 नागरिक अब भी लापता

ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्रालय के मुताबिक, नेपाल में कम से कम 39 ऑस्ट्रेलियाई नागरिक अभी भी लापता बताए गए हैं।

बाढ़ और भूस्खलन के कारण कई सड़कें और पुल नष्ट हो चुके हैं। इससे कई समुदाय दूसरे इलाकों से कट गए हैं और राहत सामग्री तथा बचाव दलों को वहां पहुंचने में कठिनाई हो रही है।

यही कारण है कि विदेशी सरकारों के लिए अपने नागरिकों की स्थिति पता करना और उन्हें सुरक्षित निकालना भी बड़ी चुनौती बन गया है।

अमेरिकी नागरिक भी लापता

नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र में करीब 90 अमेरिकी नागरिकों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।

अमेरिकी विदेश विभाग ने किसी अमेरिकी नागरिक की मौत की पुष्टि नहीं की थी और तीन अमेरिकी नागरिकों के बचाए जाने की जानकारी दी गई।

लापता लोगों में ऐसे लोग भी शामिल हैं जो कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए थे। कैलाश पर्वत हिंदू, बौद्ध और अन्य धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसके कारण हर साल अलग-अलग देशों से तीर्थयात्री इस क्षेत्र की यात्रा करते हैं।

बाढ़ ने 80 पुल और करीब 40 किलोमीटर सड़कें तबाह कीं

आपदा का असर केवल जान-माल के नुकसान तक सीमित नहीं है। नेपाल के बुनियादी ढांचे को भी भारी क्षति पहुंची है।

राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार, बाढ़ से करीब 80 पुल और 40 किलोमीटर पक्की सड़कें क्षतिग्रस्त हुई हैं।

चीन सीमा के पास स्थित कई सड़कें और पुल व्यापार तथा आवाजाही के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं। सीमा क्षेत्र में इन मार्गों के टूटने से स्थानीय लोगों के साथ-साथ व्यापारिक गतिविधियों पर भी असर पड़ सकता है।

किसी प्राकृतिक आपदा के बाद सड़कों और पुलों का टूटना राहत अभियान को भी प्रभावित करता है, क्योंकि बचाव दलों के लिए प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचना कठिन हो जाता है।

स्याब्रुबेसी में तबाही की सैटेलाइट तस्वीरें

बाढ़ के पहले और बाद की सैटेलाइट तस्वीरों ने तबाही का पैमाना और स्पष्ट किया है।

स्याब्रुबेसी में बाढ़ के बाद कई इमारतों और पुलों के बह जाने की तस्वीरें सामने आई हैं। एक सीमेंट प्लांट के आसपास का क्षेत्र भी बाढ़ के बाद पूरी तरह बदला हुआ दिखाई देता है।

त्रिशूली पुल की पुरानी और नई तस्वीरों की तुलना से पता चलता है कि तेज बहाव ने नदी किनारे के बुनियादी ढांचे को कितना नुकसान पहुंचाया।

रसुवागढ़ी सीमा पोस्ट की तस्वीरों में भी बाढ़ और भूस्खलन के बाद भारी विनाश दिखाई देता है।

गांवों में लोग जरूरी सामान लेकर सुरक्षित जगहों की ओर

बाढ़ की चेतावनी के बाद नेपाल के कई इलाकों में लोग अपने घरों से जरूरी सामान लेकर ऊंचे और सुरक्षित स्थानों की ओर जाते दिखाई दिए।

कुछ स्थानों पर महिलाओं और बच्चों को बचावकर्मियों की मदद से सुरक्षित निकाला गया। कई परिवार अपने घरों में मौजूद जरूरी दस्तावेज, कपड़े और अन्य सामान बचाने की कोशिश करते नजर आए।

लेकिन ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी प्राथमिकता लोगों की जान बचाना है। तेज बहाव और मलबे के बीच घरों में वापस जाकर सामान निकालना भी जोखिम भरा हो सकता है।

प्रशासन लगातार लोगों से नदी और निचले इलाकों से दूर रहने की अपील कर रहा है।

तिब्बत में 1,000 से ज्यादा लोगों को निकाला गया

चीन के अधिकारियों के मुताबिक, तिब्बत-नेपाल सीमा के पास ग्यिरोंग काउंटी से 1,000 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला गया है।

इनमें 555 पर्यटक शामिल बताए गए हैं। चीनी सरकारी समाचार एजेंसी के अनुसार, 499 स्थानीय लोगों और निर्माण श्रमिकों के साथ 555 प्रभावित पर्यटकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया।

चीनी सरकारी मीडिया की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि इलाके में कोई पर्यटक अब फंसा हुआ नहीं है।

हालांकि, अलग-अलग स्रोतों से आने वाले आंकड़ों में अंतर को देखते हुए रेस्क्यू के आंकड़ों को समय और क्षेत्र के संदर्भ में समझना जरूरी है।

ग्यिरोंग में अगले कुछ दिन भी अहम

ग्यिरोंग क्षेत्र में अगले कुछ दिनों के दौरान बारिश की संभावना ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।

यदि पहले से अस्थिर पहाड़ी ढलानों पर दोबारा बारिश होती है, तो भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है। इसी तरह अस्थायी झीलों या मलबे से बने प्राकृतिक अवरोधों पर पानी का दबाव भी बढ़ सकता है।

ऐसी स्थिति में एक नया भूस्खलन या झील का अचानक टूटना नीचे के क्षेत्रों में दोबारा बाढ़ ला सकता है।

इसी वजह से चीन और नेपाल दोनों तरफ निगरानी बढ़ाई गई है।

शी जिनपिंग ने बुलाई बैठक, हालात की समीक्षा

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने तिब्बत-नेपाल सीमा पर आई आपदा से बने हालात की समीक्षा के लिए कम्युनिस्ट पार्टी की बैठक बुलाई।

बैठक में राहत और बचाव अभियान को तेज करने तथा प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने पर चर्चा हुई।

बैठक के दौरान मृतकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक मिनट का मौन भी रखा गया। लापता चीनी और विदेशी नागरिकों की तलाश के लिए हर संभव प्रयास करने पर जोर दिया गया।

यह बैठक ऐसे समय में हुई जब सीमा क्षेत्र में एक और झील के टूटने से नए बाढ़ खतरे की आशंका बढ़ गई थी।

चीन ने झील के सर्वे के लिए इंजीनियरिंग टीम भेजी

अस्थायी झील की स्थिति का आकलन करने के लिए चीन ने इंजीनियरों की टीम भेजी है। टीम हवाई सर्वे और 3D मॉडलिंग जैसी तकनीकों के जरिए झील तथा आसपास के भूभाग की स्थिति समझने की कोशिश कर रही है।

ऐसी तकनीकी निगरानी का उद्देश्य यह पता लगाना है कि झील में कितना पानी जमा है, प्राकृतिक बांध कितना स्थिर है और यदि वह टूटता है तो पानी किस दिशा में और कितनी तेजी से नीचे की ओर जा सकता है।

यह जानकारी समय रहते निचले इलाकों में चेतावनी और निकासी की योजना बनाने में उपयोगी हो सकती है।

नेपाल में गंडक नदी को लेकर बिहार में भी चिंता

नेपाल में आई बाढ़ का प्रभाव सीमा पार बिहार तक महसूस किया जा रहा है। नेपाल में पानी बढ़ने के बाद गंडक नदी का जलस्तर भी बढ़ा है।

बिहार के कुछ गांवों में बाढ़ और कटाव का खतरा बढ़ने की जानकारी सामने आई है। पुचहरिया गांव के बाबू टोला में भी लोगों ने पानी बढ़ने की बात कही।

स्थानीय स्तर पर लोगों को ऊंचे स्थानों पर जाने की सलाह दी गई है।

नेपाल की पहाड़ी नदियों का पानी नीचे की ओर भारतीय मैदानी क्षेत्रों तक पहुंचता है। इसलिए नेपाल में अचानक आने वाली बड़ी बाढ़ का असर भारत के सीमावर्ती राज्यों में भी महसूस किया जा सकता है।

सचिन तेंदुलकर ने जताई संवेदना

पूर्व भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने नेपाल की आपदा से प्रभावित परिवारों के प्रति संवेदना जताई।

उन्होंने उन परिवारों का विशेष उल्लेख किया जो अब भी अपने प्रियजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं।

तेंदुलकर ने बचाव टीमों के प्रयासों का भी उल्लेख किया और उनके लिए प्रार्थना की।

ऐसे समय में जब हजारों परिवार अपने लोगों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, सार्वजनिक हस्तियों की संवेदनाएं लोगों का ध्यान राहत और बचाव प्रयासों की ओर भी खींचती हैं।

नेपाल-तिब्बत सीमा पर आपदा का सबसे कठिन चरण अभी जारी

इस पूरी आपदा में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि खतरा अभी पूरी तरह टला नहीं है। एक ओर पहले से हुए नुकसान से निपटने के लिए राहत और बचाव अभियान जारी है, तो दूसरी ओर नई झील टूटने से फिर बाढ़ आने की आशंका पैदा हो गई है।

नदी का बढ़ता जलस्तर, अस्थिर पहाड़, लगातार बारिश, मलबे से बंद रास्ते और क्षतिग्रस्त पुल बचाव कार्य को कठिन बना रहे हैं।

ऐसे में प्रशासन के लिए एक साथ दो मोर्चों पर काम करना जरूरी है—पहले से प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाना और नए संभावित खतरे वाले क्षेत्रों से लोगों को समय रहते निकालना।

आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण इस समय लोगों की सुरक्षित निकासी

आपदा के दौरान मौत और लापता लोगों के आंकड़े स्वाभाविक रूप से सबसे ज्यादा ध्यान खींचते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि प्रभावित क्षेत्रों में हर घंटे नई जानकारी सामने आ सकती है।

कई लोग ऐसे हैं जिनसे केवल संपर्क टूट गया है और अभी यह पुष्टि नहीं हुई कि वे लापता हैं या सुरक्षित। इसी तरह कई शवों की पहचान भी बाकी है।

इसलिए अलग-अलग समय पर जारी आंकड़ों में अंतर होना संभव है। प्रशासन द्वारा सत्यापित और अपडेट किए गए आंकड़ों को प्राथमिकता देना जरूरी है।

फिलहाल सबसे बड़ा लक्ष्य यह है कि जिन इलाकों में फिर बाढ़ का खतरा है, वहां मौजूद लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जाए।

कैलाश मानसरोवर यात्रियों के लिए भी बना बड़ा संकट

नेपाल-तिब्बत सीमा का यह क्षेत्र केवल स्थानीय आबादी के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। कैलाश मानसरोवर यात्रा के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में भारतीय और विदेशी तीर्थयात्री भी इस क्षेत्र में पहुंचते हैं।

बाढ़ और भूस्खलन ने यात्रा मार्गों को प्रभावित किया है। कई यात्रियों को अपने निर्धारित मार्ग बदलने पड़े हैं।

कुछ यात्रियों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, जबकि कई अन्य की स्थिति को लेकर परिवार चिंतित हैं।

स्वाती बागरेचा जैसे मामलों में परिवारों के लिए हर बीतता घंटा बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में स्थानीय प्रशासन, भारतीय मिशन और संबंधित चीनी तथा नेपाली एजेंसियों के बीच समन्वय अहम हो जाता है।

प्राकृतिक आपदा के पीछे बदलता हिमालय भी बड़ा सवाल

ग्लेशियर टूटना, भूस्खलन और ग्लेशियल झीलों का अचानक फटना हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर प्राकृतिक जोखिम हैं। ऊंचे पहाड़ों में जमा बर्फ और मलबे से बनी अस्थायी झीलें कभी-कभी बेहद अस्थिर हो सकती हैं।

ऐसे जलाशयों के टूटने से नीचे की ओर अचानक बहुत बड़ी मात्रा में पानी और मलबा पहुंच सकता है। इसे ग्लेशियल झील विस्फोटक बाढ़ यानी Glacial Lake Outburst Flood के संदर्भ में देखा जाता है।

हालांकि किसी विशेष आपदा के लिए जलवायु परिवर्तन को सीधे जिम्मेदार ठहराने से पहले वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है, लेकिन हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों, झीलों और पहाड़ी ढलानों की निगरानी को लेकर वैज्ञानिक और प्रशासनिक तंत्र का महत्व लगातार बढ़ रहा है।

नेपाल और तिब्बत में अब सबसे बड़ी जरूरत सतर्कता की

नए खतरे के बीच नदी किनारे बसे लोगों को प्रशासन के निर्देशों का पालन करना बेहद महत्वपूर्ण है। अचानक आने वाली बाढ़ में कुछ मिनटों की देरी भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है।

लोगों से कहा गया है कि वे नदी के बेहद करीब न जाएं, पानी बढ़ने की स्थिति में पुलों या कमजोर रास्तों को पार करने की कोशिश न करें और सुरक्षित स्थानों पर जाने में देरी न करें।

बचावकर्मियों के लिए भी यही चुनौती है कि वे लोगों को निकालते समय स्वयं खतरे में न पड़ें। पहाड़ी बाढ़ में मलबे का बहाव अचानक दिशा बदल सकता है और दूसरी लहर का खतरा हमेशा बना रहता है।

नेपाल-तिब्बत आपदा ने फिर दिखाया हिमालय की नाजुकता

नेपाल और तिब्बत में आई इस विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर दिखाया है कि हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाएं कितनी तेजी से बड़े मानवीय संकट में बदल सकती हैं।

एक तरफ ग्लेशियर और भूस्खलन से बनने वाले अस्थायी जलाशय हैं, तो दूसरी तरफ उनके नीचे बसे गांव, सड़कें, पुल, हाइड्रोपावर परियोजनाएं और अंतरराष्ट्रीय यात्रा मार्ग हैं। किसी एक स्थान पर प्राकृतिक अवरोध टूटने का असर कई किलोमीटर दूर तक महसूस किया जा सकता है।

इस बार भी यही हुआ। ग्यिरोंग से शुरू हुई तबाही का असर नेपाल के रसुवा, स्याब्रुबेसी, त्रिशूली और आगे नदी तंत्र के कई हिस्सों तक पहुंचा। हजारों सुरक्षाकर्मी मैदान में उतरे, विदेशी नागरिकों को हेलिकॉप्टर से निकाला गया, परिवार अस्पतालों और राहत केंद्रों के बाहर अपनों की तलाश करते रहे और कई इलाकों में बाढ़ के बाद जिंदगी फिर से खड़ी करने की कोशिश शुरू हुई।

लेकिन नई झील टूटने से खतरा फिर सामने आ गया है। यही वजह है कि राहत अभियान के साथ-साथ अगले कुछ दिनों में जलस्तर, बारिश और पहाड़ी झीलों की निगरानी सबसे महत्वपूर्ण होगी।

नेपाल-तिब्बत सीमा पर बाढ़ और भूस्खलन की स्थिति अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। ग्यिरोंग में बर्फ और मलबे के झील में गिरने के बाद एक अन्य झील के टूटने से नेपाल के भोटेकोशी, त्रिशूली और आसपास के नदी क्षेत्रों में फिर खतरा बढ़ा है। कई गांवों को खाली कराया जा रहा है और नेपाल तथा चीन की एजेंसियां राहत, बचाव और निगरानी अभियान चला रही हैं। मृतकों और लापता लोगों के आंकड़े अलग-अलग समय पर जारी अपडेट के साथ बदल रहे हैं, इसलिए अंतिम संख्या की पुष्टि आधिकारिक जांच और रेस्क्यू अभियान पूरा होने के बाद ही संभव होगी। बड़ी संख्या में भारतीय और अन्य विदेशी नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा चुका है, जबकि कुछ लोगों से अब भी संपर्क नहीं हो पाया है। फिलहाल सबसे अहम प्राथमिकता प्रभावित लोगों की सुरक्षित निकासी, लापता लोगों की तलाश और संभावित नई बाढ़ के खतरे वाले इलाकों में समय रहते चेतावनी पहुंचाना है।

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