Pakistan-सिख पत्रकार हरमीत सिंह के डिजिटल स्टूडियो पर पुलिस रेड से मचा हड़कंप, कैमरे-कंप्यूटर जब्त करने के आरोप; बोले- ‘अब पत्रकारिता के लिए न नौकरी बची, न संसाधन’
News-Desk
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हरमीत सिंह ने 31 अगस्त को एक वीडियो जारी कर अपनी स्थिति सामने रखी। उनका दावा है कि करीब दो दिन पहले पुलिस ने उनके डिजिटल स्टूडियो पर रेड की। इस दौरान वहां मौजूद कर्मचारियों को हिरासत में लिया गया और उनके साथ कथित तौर पर दुर्व्यवहार किया गया। पत्रकार के मुताबिक, पुलिस स्टूडियो से कई जरूरी उपकरण भी अपने साथ ले गई।
हरमीत सिंह का कहना है कि टेलीविजन स्क्रीन से दूर किए जाने और नौकरी जाने के बाद उन्होंने अपनी जमा-पूंजी लगाकर डिजिटल माध्यम से पत्रकारिता जारी रखने की कोशिश की थी। लेकिन अब उनके सामने ऐसी स्थिति पैदा हो गई है, जहां न तो उनके पास टेलीविजन की नौकरी है और न ही वह संसाधन जिनके जरिए वह अपना डिजिटल काम जारी रख सकें।
हालांकि, हरमीत सिंह के इन आरोपों पर इस्लामाबाद पुलिस की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इसलिए पुलिस कार्रवाई से जुड़े उनके आरोपों को फिलहाल उनके द्वारा लगाए गए आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
हरमीत सिंह कौन हैं? पाकिस्तान की टीवी पत्रकारिता में बनाई अलग पहचान
हरमीत सिंह सिख समुदाय से आते हैं और पाकिस्तान के मुख्यधारा मीडिया में टेलीविजन एंकर तथा पत्रकार के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले प्रमुख सिख चेहरों में गिने जाते हैं।
उनका पारिवारिक संबंध पाकिस्तान से पुराना है। वर्ष 1947 में भारत के विभाजन के समय उनका परिवार पाकिस्तान में ही रह गया था। उनके परिवार और रिश्तेदारों के संबंध भारतीय पंजाब से भी जुड़े हुए हैं। मौजूदा समय में हरमीत सिंह पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के चाकेसर, शांगला क्षेत्र से हैं।
एक अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले व्यक्ति के रूप में पाकिस्तान के मुख्यधारा मीडिया में उनकी मौजूदगी को उनके लिए महत्वपूर्ण पेशेवर पहचान के रूप में देखा गया। हरमीत सिंह का कहना है कि उन्होंने हमेशा पाकिस्तान की सकारात्मक तस्वीर दुनिया के सामने रखने की कोशिश की।
लेकिन उनका दावा है कि संविधान की सर्वोच्चता, लोकतंत्र, कानून के शासन और पीड़ित लोगों की आवाज उठाने के कारण वह सत्ताधारियों की नाराजगी का सामना करते रहे।
टीवी स्क्रीन से दूरी के बाद डिजिटल मीडिया को बनाया सहारा
हरमीत सिंह के मुताबिक, मुख्यधारा के टेलीविजन से उनका रास्ता बंद होने के बाद उन्होंने पत्रकारिता छोड़ने के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म का रास्ता चुना।
उनका कहना है कि उन्होंने अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी और फिल्मों से मिले कुछ पैसों का इस्तेमाल कर दो-तीन दोस्तों के साथ मिलकर एक छोटा कार्यालय और डिजिटल स्टूडियो शुरू किया।
इस स्टूडियो का उद्देश्य बेहद सीधा था—टेलीविजन पर काम करने का अवसर नहीं मिलने के बावजूद डिजिटल माध्यम के जरिए व्लॉग, पॉडकास्ट और अन्य पत्रकारिता संबंधी सामग्री तैयार करना तथा इसी के माध्यम से अपनी आजीविका चलाना।
यानी जिस माध्यम को उन्होंने अपने पेशे को बचाए रखने का रास्ता समझा था, अब वही स्टूडियो कथित पुलिस कार्रवाई के कारण उनके लिए एक नई परेशानी का केंद्र बन गया है।
30 अगस्त की कथित पुलिस रेड ने खड़े किए कई सवाल
हरमीत सिंह के अनुसार, 30 अगस्त को पुलिस ने उनके डिजिटल कार्यालय पर रेड की। उनका आरोप है कि पुलिसकर्मी वहां मौजूद सामान को अपने साथ ले गए।
उनके मुताबिक, जिन उपकरणों को ले जाया गया, उनमें पांच कंप्यूटर सिस्टम, कैमरे, पॉडकास्ट माइक्रोफोन, माइक स्टैंड, प्रॉम्प्टर और बैटरियां शामिल हैं।
ये सभी उपकरण डिजिटल पत्रकारिता के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। खासकर पॉडकास्ट और वीडियो पत्रकारिता में कैमरा, कंप्यूटर, माइक्रोफोन और प्रॉम्प्टर जैसे उपकरण पूरे प्रोडक्शन सिस्टम का आधार होते हैं।
ऐसे में यदि ये उपकरण लंबे समय तक उपलब्ध नहीं रहते हैं तो किसी छोटे डिजिटल मीडिया ऑपरेशन के लिए काम जारी रखना बेहद मुश्किल हो सकता है।
हरमीत सिंह का कहना है कि उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से यह पूरा सेटअप तैयार किया था और इसी के जरिए दोबारा अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रहे थे।
स्टूडियो में काम कर रहे दो लोगों को हिरासत में लेने का आरोप
हरमीत सिंह ने अपनी वीडियो में दावा किया कि कार्रवाई के दौरान स्टूडियो में काम करने वाले मुल्तान निवासी सैफ और उनके सहयोगी रजी ताहिर को हिरासत में लिया गया।
उनका आरोप है कि हिरासत में लिए गए लोगों के साथ कथित तौर पर मारपीट और प्रताड़ना की गई।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी के आधार पर नहीं हुई है और पुलिस की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
फिर भी, यदि किसी पत्रकार के कार्यस्थल पर पुलिस कार्रवाई होती है और वहां काम करने वाले कर्मचारियों को हिरासत में लिया जाता है, तो कार्रवाई की कानूनी प्रक्रिया, आधार और जब्ती की परिस्थितियों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
रजी ताहिर को लेकर हरमीत सिंह ने उठाया बड़ा सवाल
हरमीत सिंह ने पुलिस कार्रवाई के औचित्य पर सवाल उठाते हुए विशेष रूप से अपने सहयोगी रजी ताहिर का मुद्दा उठाया।
उनका कहना है कि यदि रजी ताहिर ने पत्रकार के तौर पर कश्मीर यानी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था, तो उसके आधार पर पूरे डिजिटल स्टूडियो का सामान जब्त करने और दूसरे कर्मचारियों के कंप्यूटर सिस्टम ले जाने का क्या औचित्य था?
यही सवाल इस पूरे मामले को केवल एक व्यक्ति की शिकायत से आगे ले जाता है।
किसी पत्रकार या सहयोगी के खिलाफ यदि कोई विशेष कानूनी कार्रवाई आवश्यक समझी जाती है, तो क्या उस कार्रवाई का दायरा पूरे मीडिया संस्थान के उपकरणों तक बढ़ाया जाना चाहिए? क्या अन्य कर्मचारियों के कंप्यूटर भी उसी कार्रवाई का हिस्सा बन सकते हैं? और जब्त किए गए उपकरणों की कानूनी प्रक्रिया क्या होगी?
हरमीत सिंह की शिकायतों के केंद्र में यही सवाल दिखाई देता है।
‘पुलिस मेरे कैमरों और कंप्यूटरों का क्या करेगी?’
हरमीत सिंह ने अपनी स्थिति बताते हुए पुलिस और प्रशासन से यह भी सवाल किया कि उनके कैमरे, कंप्यूटर सिस्टम और अन्य डिजिटल उपकरणों का आखिर क्या किया जाएगा।
उनके मुताबिक, इन उपकरणों का इस्तेमाल पत्रकारिता और डिजिटल सामग्री तैयार करने के लिए किया जाता था। उनका दावा है कि इन संसाधनों के चले जाने के बाद उनके लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करना बेहद कठिन हो गया है।
डिजिटल पत्रकारिता में उपकरण केवल कार्यालय का सामान नहीं होते। कैमरा और माइक्रोफोन से लेकर कंप्यूटर और स्टोरेज सिस्टम तक पूरी प्रक्रिया इन्हीं संसाधनों पर निर्भर करती है। इसलिए उपकरणों की जब्ती किसी छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म की पूरी कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकती है।
परिवार ने दी देश छोड़ने या कारोबार बदलने की सलाह
हरमीत सिंह ने बताया कि उनकी सिख बिरादरी और परिवार के लोग अब उन्हें पत्रकारिता छोड़कर कोई दूसरा कारोबार शुरू करने या पाकिस्तान छोड़ने की सलाह दे रहे हैं।
उनका कहना है कि पत्रकारिता के कारण उनकी जान को खतरा बताया जाता है और इसका असर उनके परिवार की जिंदगी पर भी पड़ा है।
इसके बावजूद हरमीत सिंह का कहना है कि उन्होंने पाकिस्तान में रहकर ही अपना काम जारी रखना पसंद किया।
यह स्थिति पाकिस्तान जैसे देश में अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले पत्रकार के पेशेवर संघर्ष को भी सामने लाती है। हालांकि उनके व्यक्तिगत सुरक्षा संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं की जा सकती।
हरमीत सिंह ने मानवाधिकार संगठनों से लगाई मदद की गुहार
स्टूडियो पर कथित कार्रवाई के बाद हरमीत सिंह ने पाकिस्तान के नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठनों से हस्तक्षेप की अपील की है।
उन्होंने पत्रकारों के साथ कथित तौर पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने और जब्त किए गए सामान को वापस दिलाने की मांग की।
उनका कहना है कि पत्रकारों को आर्थिक रूप से कमजोर करके भी उनके काम को प्रभावित किया जा सकता है। यदि किसी पत्रकार से कैमरा, कंप्यूटर और अन्य पेशेवर संसाधन छीन लिए जाएं, तो उसके लिए पत्रकारिता जारी रखना स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाएगा।
यही वजह है कि हरमीत सिंह ने अपने मामले को केवल व्यक्तिगत नुकसान के रूप में नहीं बल्कि पत्रकारिता के अधिकार और मीडिया स्वतंत्रता के व्यापक मुद्दे के रूप में पेश किया है।
टीवी से बैन के आरोपों ने पहले ही खड़े किए थे सवाल
हरमीत सिंह का कहना है कि डिजिटल स्टूडियो शुरू करने के पीछे सबसे बड़ा कारण टेलीविजन पत्रकारिता में उनके लिए रास्ते बंद होना था।
उनके मुताबिक, उन्होंने संविधान की सर्वोच्चता, लोकतंत्र, कानून के शासन और पीड़ितों की आवाज को उठाने की कोशिश की। उनका दावा है कि इन्हीं कारणों से सत्ताधारियों की नाराजगी उन्हें झेलनी पड़ी और इसके बाद उन्हें टीवी स्क्रीन पर आने से रोक दिया गया तथा उनकी नौकरी चली गई।
यह दावा हरमीत सिंह की ओर से किया गया है और इसके अलग-अलग पहलुओं पर संबंधित संस्थाओं की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना जरूरी होगा।
लेकिन उनका मामला पाकिस्तान में पत्रकारों के सामने मौजूद व्यापक चुनौतियों की बहस को जरूर फिर से सामने लाता है।
पत्रकारिता से डिजिटल प्लेटफॉर्म तक का सफर भी संघर्ष भरा
हरमीत सिंह के मामले की एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने टीवी से बाहर होने के बाद पत्रकारिता को पूरी तरह छोड़ने का फैसला नहीं किया।
उन्होंने अपनी जमा-पूंजी से डिजिटल स्टूडियो बनाया। यह कदम बताता है कि पारंपरिक मीडिया के बाहर डिजिटल माध्यम पत्रकारों के लिए वैकल्पिक मंच बनता जा रहा है।
पॉडकास्ट, वीडियो ब्लॉग और स्वतंत्र डिजिटल चैनल अब ऐसे माध्यम हैं जिनके जरिए पत्रकार बिना किसी बड़े टीवी नेटवर्क का हिस्सा बने अपनी आवाज दर्शकों तक पहुंचा सकते हैं।
लेकिन डिजिटल मीडिया की स्वतंत्रता भी संसाधनों पर निर्भर है। कैमरा, कंप्यूटर, इंटरनेट, माइक्रोफोन और संपादन प्रणाली के बिना स्वतंत्र पत्रकारिता को लंबे समय तक चलाना मुश्किल हो सकता है।
यही वजह है कि हरमीत सिंह के स्टूडियो से कथित तौर पर उपकरण ले जाने का आरोप इस मामले को और गंभीर बनाता है।
मामला केवल उपकरणों का नहीं, पत्रकारिता के भविष्य का भी सवाल
हरमीत सिंह की शिकायतों में एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि किसी पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई और उसके पूरे पेशेवर ढांचे को प्रभावित करने के बीच सीमा कहां तय होगी।
यदि किसी व्यक्ति पर कानूनी आरोप हैं तो कानून के तहत जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया हो सकती है। लेकिन पत्रकारिता से जुड़े उपकरणों की जब्ती के मामले में पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
किस आधार पर सामान जब्त किया गया? क्या जब्ती का रिकॉर्ड तैयार किया गया? उपकरणों को किस जांच के लिए रखा गया? क्या उन्हें वापस किया जाएगा? और संबंधित लोगों को कानूनी प्रक्रिया की जानकारी दी गई या नहीं?
इन सवालों के जवाब इस मामले की वास्तविक स्थिति को समझने में महत्वपूर्ण होंगे।
हरमीत की प्रशासन से तनातनी के पीछे क्या है? दो मामलों का जिक्र
हरमीत सिंह ने अपनी बात रखते हुए प्रशासन के साथ पहले से चली आ रही तनातनी का भी जिक्र किया है। उनके मुताबिक, उनके खिलाफ या उनसे जुड़े विवादों में अलग-अलग कानूनी और प्रशासनिक घटनाक्रम रहे हैं।
उनके द्वारा बताए गए मामलों में एक तरफ पत्रकारिता और राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों को कवर करने से जुड़ा विवाद सामने आता है, जबकि दूसरी तरफ उनके सहयोगियों तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म की गतिविधियों को लेकर कार्रवाई का आरोप है।
हालांकि, इन मामलों की पूरी कानूनी स्थिति और आरोपों का आधिकारिक विवरण सामने आए बिना किसी पक्ष को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
यही कारण है कि इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस, प्रशासन और संबंधित कानूनी संस्थाओं की आधिकारिक प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होगी।
पाकिस्तान में मीडिया स्वतंत्रता की बहस फिर तेज होने के संकेत
हरमीत सिंह का मामला ऐसे समय सामने आया है जब पाकिस्तान में पत्रकारिता की स्वतंत्रता, राजनीतिक दबाव और डिजिटल मीडिया की भूमिका को लेकर पहले से ही बहस होती रही है।
पारंपरिक टीवी मीडिया पर नियंत्रण या दबाव के आरोपों के बीच डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से वैकल्पिक माध्यम के रूप में उभरे हैं। पत्रकार सोशल मीडिया, यूट्यूब, पॉडकास्ट और स्वतंत्र डिजिटल स्टूडियो के जरिए अपनी बात लोगों तक पहुंचा रहे हैं।
लेकिन इसके साथ डिजिटल पत्रकारों के लिए नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। कानूनी मामलों, ऑनलाइन सेंसरशिप, उपकरणों की जब्ती, धमकियों और आर्थिक दबाव जैसे मुद्दे डिजिटल मीडिया की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं।
हरमीत सिंह का आरोप इसी व्यापक बहस में एक नया मामला जोड़ता है।
सिख समुदाय के पत्रकार के रूप में हरमीत की पहचान भी महत्वपूर्ण
हरमीत सिंह का मामला इसलिए भी अलग महत्व रखता है क्योंकि वह पाकिस्तान के सिख समुदाय से आने वाले पत्रकार हैं जिन्होंने मुख्यधारा के टेलीविजन मीडिया में अपनी पहचान बनाई।
विभाजन के बाद पाकिस्तान में रहने वाले सिख समुदाय की संख्या अपेक्षाकृत कम है, लेकिन धार्मिक और सामाजिक स्तर पर समुदाय की अपनी विशिष्ट पहचान है। ऐसे में राष्ट्रीय मीडिया में किसी सिख पत्रकार का प्रमुख चेहरा बनना अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
हरमीत सिंह खुद भी अपनी पहचान और पत्रकारिता के सफर को पाकिस्तान के संदर्भ में पेश करते रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने पाकिस्तान की सकारात्मक छवि को दुनिया के सामने रखने की कोशिश की।
उनका मौजूदा विवाद इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एक ओर वह खुद को पाकिस्तान में रहकर पत्रकारिता करने वाला पत्रकार बताते हैं, जबकि दूसरी ओर उनका आरोप है कि अब परिस्थितियां उनके लिए इतनी कठिन हो गई हैं कि परिवार उन्हें देश छोड़ने की सलाह दे रहा है।
अब पुलिस के जवाब का इंतजार
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण अगला कदम इस्लामाबाद पुलिस और संबंधित प्रशासन की प्रतिक्रिया होगी।
हरमीत सिंह ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए हैं—स्टूडियो पर रेड, कर्मचारियों को हिरासत में लेना, कथित मारपीट और उपकरणों को अपने साथ ले जाना। इन आरोपों की पुष्टि या खंडन संबंधित पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के आधिकारिक बयान से ही हो सकेगा।
जब तक पुलिस का पक्ष सामने नहीं आता, तब तक इन आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
यदि पुलिस के पास कार्रवाई का कोई कानूनी आधार था, तो उसके बारे में जानकारी सार्वजनिक होना इस मामले में उठ रहे सवालों को स्पष्ट कर सकता है। वहीं, यदि उपकरण किसी जांच के सिलसिले में जब्त किए गए हैं तो उनकी कानूनी स्थिति और आगे की प्रक्रिया भी स्पष्ट की जानी जरूरी होगी।
डिजिटल पत्रकारिता पर कार्रवाई या कानूनी प्रक्रिया? असली तस्वीर जांच के बाद साफ होगी
हरमीत सिंह का आरोप है कि उनके पास अब पत्रकारिता जारी रखने के लिए न नौकरी है और न जरूरी उपकरण। दूसरी तरफ, पुलिस की ओर से फिलहाल कोई सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है।
इसलिए इस मामले को एकतरफा निष्कर्ष के बजाय तथ्यों और आधिकारिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर देखना जरूरी है।
यदि किसी पत्रकार के खिलाफ कोई कानूनी मामला है तो जांच और न्यायिक प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। वहीं पत्रकारिता करने के अधिकार, व्यक्तिगत सुरक्षा और पेशेवर संसाधनों से जुड़े सवालों का भी कानून के दायरे में समाधान होना चाहिए।
इस घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण बहस जरूर शुरू कर दी है—क्या डिजिटल प्लेटफॉर्म उन पत्रकारों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक जगह बन पाएंगे जिन्हें पारंपरिक मीडिया में काम करने में मुश्किलें आती हैं? और अगर डिजिटल स्टूडियो भी कार्रवाई की जद में आते हैं, तो स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए रास्ता कितना खुला रहेगा?
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