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Muzaffarnagar में किसानों के लिए बड़ा प्रशिक्षण अभियान पूरा, 980 से अधिक कृषकों ने सीखी आधुनिक खेती की तकनीकें

Muzaffarnagar में किसानों से जुड़ी महत्वपूर्ण खबर सामने आई है। आत्मा योजना के अंतर्गत आयोजित दो दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का गुरुवार को समापन हो गया। जिले के अलग-अलग ब्लॉकों से बड़ी संख्या में किसानों ने प्रशिक्षण में भाग लेकर खेती, फसल प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य, पशुपालन और आधुनिक कृषि तकनीकों से जुड़ी उपयोगी जानकारी प्राप्त की।

प्रशिक्षण के दूसरे दिन कृषि विज्ञान केंद्र बघरा और कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़ा में कार्यक्रम आयोजित किए गए। दोनों केंद्रों पर किसानों की उल्लेखनीय भागीदारी रही। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुल 980 से अधिक किसानों ने प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। बघरा केंद्र पर 548 किसानों की मौजूदगी रही, जबकि चित्तौड़ा केंद्र पर 436 कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल हुए।

प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को केवल पारंपरिक खेती तक सीमित न रखते हुए बदलती कृषि परिस्थितियों, बेहतर उत्पादन, मृदा स्वास्थ्य, फसल विविधीकरण, पशुपालन और टिकाऊ कृषि पद्धतियों के बारे में व्यावहारिक जानकारी देना रहा।

आत्मा योजना के तहत किसानों को आधुनिक कृषि से जोड़ने की पहल

आत्मा योजना के अंतर्गत आयोजित इस प्रशिक्षण में किसानों को खेती से जुड़े विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों ने जानकारी दी। बदलते मौसम, बढ़ती कृषि लागत, मिट्टी की गुणवत्ता में बदलाव, फसल अवशेष प्रबंधन और बाजार की बदलती मांग के बीच किसानों के लिए वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।

प्रशिक्षण के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को अपनी खेती में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने, वैज्ञानिक सलाह के आधार पर निर्णय लेने और फसल उत्पादन के साथ-साथ कृषि से जुड़े दूसरे आय स्रोतों पर भी ध्यान देने के लिए प्रेरित किया।

इस तरह के कार्यक्रम किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच सीधे संवाद का अवसर भी उपलब्ध कराते हैं। किसान अपनी स्थानीय समस्याओं को विशेषज्ञों के सामने रख सकते हैं और उनके समाधान के लिए वैज्ञानिक सुझाव प्राप्त कर सकते हैं।

कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़ा में मिलेट्स पर विशेष जानकारी

कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़ा में कार्यक्रम का संचालन डॉ. पूजा ने किया। उन्होंने किसानों को मिलेट्स यानी श्री अन्न की खेती के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

प्रशिक्षण के दौरान ज्वार, बाजरा, मडुआ, रागी, कांगनी और कोदो जैसी फसलों की आधुनिक उत्पादन तकनीकों पर चर्चा हुई। किसानों को बताया गया कि इन फसलों की वैज्ञानिक तरीके से खेती करने से उत्पादन क्षमता को बेहतर करने के साथ कृषि विविधीकरण को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।

मिलेट्स को लेकर देश और दुनिया में बढ़ती रुचि के बीच किसानों के लिए इन फसलों की जानकारी उपयोगी मानी जा रही है। श्री अन्न में मौजूद पोषक तत्वों और मानव स्वास्थ्य पर उनके सकारात्मक प्रभावों के बारे में भी किसानों को जानकारी दी गई।

श्री अन्न की खेती से किसानों के सामने खुल सकते हैं नए विकल्प

ज्वार, बाजरा, रागी और अन्य मिलेट्स लंबे समय से भारतीय कृषि और खान-पान का हिस्सा रहे हैं। बदलती जीवनशैली के दौर में पोषणयुक्त खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने के कारण इन फसलों का महत्व फिर से बढ़ा है।

कृषक प्रशिक्षण में इन फसलों को लेकर किसानों को नवीन तकनीकों की जानकारी देना फसल विविधीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त फसल का चयन, उत्पादन तकनीक और बेहतर प्रबंधन अपनाने पर ध्यान देने की जरूरत बताई गई।

आम के बागों में एकांतर फलन की समस्या पर चर्चा

कृषि वैज्ञानिक डॉ. यशपाल सिंह ने आम के बगीचों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण समस्या पर किसानों का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने आम के पेड़ों में होने वाले एकांतर फलन यानी एक वर्ष अच्छी मात्रा में फल आने और अगले वर्ष उत्पादन कम होने या नहीं होने की समस्या के समाधान से संबंधित जानकारी साझा की।

आम उत्पादकों के लिए यह विषय खास महत्व रखता है, क्योंकि बागवानी में उत्पादन का नियमित रहना किसानों की आय और बाजार व्यवस्था दोनों से जुड़ा होता है।

वैज्ञानिकों ने किसानों को बागों के बेहतर प्रबंधन और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने की दिशा में जागरूक किया।

पराली को समस्या नहीं, उपयोगी कृषि संसाधन के रूप में देखने पर जोर

डॉ. रीना देवी ने फसल अवशेष यानी पराली प्रबंधन के विषय पर किसानों को जानकारी दी। उन्होंने बताया कि फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन मिट्टी के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है।

फसल कटाई के बाद खेत में बचे अवशेषों को जलाने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधित करने से पर्यावरणीय नुकसान को कम करने के साथ मृदा में जैविक पदार्थ की मात्रा और मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

किसानों को पराली प्रबंधन के ऐसे विकल्पों के बारे में जागरूक करना कृषि और पर्यावरण दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

गन्ने के साथ सहफसली खेती के फायदे बताए

डॉ. सुरेंद्र सिंह ने गन्ने के साथ सहफसली खेती के लाभों पर किसानों के साथ चर्चा की। सहफसली खेती में मुख्य फसल के साथ उपयुक्त दूसरी फसल को वैज्ञानिक तरीके से उगाया जाता है।

किसानों के लिए इसका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि एक ही खेत से अलग-अलग फसलों के माध्यम से अतिरिक्त उत्पादन और आय के अवसर बनाए जा सकते हैं। हालांकि, सहफसली खेती का चुनाव स्थानीय मिट्टी, मौसम, सिंचाई, फसल अवधि और संसाधनों को ध्यान में रखकर करना आवश्यक होता है।

प्रशिक्षण के दौरान किसानों को इसी तरह की वैज्ञानिक सोच के साथ खेती की योजना बनाने के लिए प्रेरित किया गया।

पशुओं की बीमारी और टीकाकरण की जानकारी

पशु चिकित्साधिकारी डॉ. दिनेश कर्णवाल ने पशुओं में होने वाली बीमारियों और समय पर टीकाकरण के महत्व के बारे में जानकारी दी।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन का महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसे में पशुओं की नियमित देखभाल, बीमारी के शुरुआती संकेतों की पहचान और समय पर पशु चिकित्सकीय सलाह पशुधन की सुरक्षा के लिए अहम है।

किसानों को पशुओं के स्वास्थ्य संबंधी मामलों में लापरवाही न बरतने और आवश्यक टीकाकरण को समय पर कराने के लिए जागरूक किया गया।

बघरा केंद्र पर कृषि यंत्रों और मशरूम उत्पादन की जानकारी

कृषि विज्ञान केंद्र बघरा में प्रशिक्षण कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ प्राविधिक सहायक ग्रुप-ए श्रीमती मीतू ने किया।

उन्होंने किसानों को कृषि यंत्रों के उपयोग, पराली प्रबंधन और मशरूम की खेती से संबंधित जानकारी दी। आधुनिक कृषि यंत्र किसानों के श्रम और समय को कम करने में उपयोगी हो सकते हैं, वहीं छोटे स्तर पर मशरूम उत्पादन कृषि से अतिरिक्त आय का विकल्प बन सकता है।

मशरूम उत्पादन के लिए वैज्ञानिक तकनीक, तापमान, नमी, स्वच्छता और उत्पादन प्रबंधन जैसे पहलुओं की समझ आवश्यक होती है। ऐसे विषयों को प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल करने से किसानों को खेती से जुड़े विविध विकल्पों की जानकारी मिलती है।

मृदा परीक्षण के आधार पर खाद डालने की सलाह

कृषि वैज्ञानिक डॉ. हंसराज ने किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया।

किसान अक्सर खेत की वास्तविक पोषण स्थिति की जानकारी के बिना उर्वरकों का प्रयोग कर देते हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि मिट्टी की जांच के आधार पर आवश्यक पोषक तत्वों की स्थिति समझी जाए और उसी के अनुसार उर्वरक प्रबंधन किया जाए।

मृदा परीक्षण आधारित खेती से अनावश्यक उर्वरक उपयोग को कम करने और खेत की उत्पादकता को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

कीटों से फसल बचाने के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन

डॉ. वीरेंद्र ने किसानों को फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों से बचाव के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन यानी Integrated Pest Management की जानकारी दी।

इस पद्धति में फसल की निगरानी, कीटों की पहचान और आवश्यकता के अनुसार विभिन्न नियंत्रण उपायों का समन्वित इस्तेमाल किया जाता है। किसानों को फसल में कीट की समस्या दिखाई देने पर बिना जानकारी के किसी भी रसायन का प्रयोग करने के बजाय वैज्ञानिक सलाह लेने की दिशा में जागरूक किया गया।

फसल सुरक्षा के लिए सही समय पर सही उपाय करना उत्पादन लागत और फसल नुकसान दोनों को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है।

पशुपालन से आय बढ़ाने पर भी दिया गया ध्यान

पशु चिकित्साधिकारी डॉ. वंदना ने पशुओं के रखरखाव, दुग्ध उत्पादन बढ़ाने और बांझपन की रोकथाम से जुड़े उपायों पर किसानों को जानकारी दी।

ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक किसान खेती के साथ पशुपालन भी करते हैं। ऐसे परिवारों के लिए पशुओं का स्वस्थ रहना सीधे घरेलू आय से जुड़ा होता है।

बेहतर पशु पोषण, साफ-सफाई, उचित देखभाल, समय पर चिकित्सा और प्रजनन संबंधी समस्याओं की समय पर पहचान पशुपालन को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

जैविक खेती के पर्यावरणीय और स्वास्थ्य लाभों पर चर्चा

विषय वस्तु विशेषज्ञ रवि कुमार ने जैविक खेती के पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़े लाभों पर विस्तार से चर्चा की।

कृषि में मिट्टी की गुणवत्ता और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण लंबे समय के लिए महत्वपूर्ण है। जैविक खेती से जुड़े तरीकों में जैविक खाद, प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग और रासायनिक इनपुट के विवेकपूर्ण प्रबंधन जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है।

किसानों को खेती की स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार टिकाऊ कृषि पद्धतियों को समझने के लिए प्रेरित किया गया।

सरकारी योजनाओं की जानकारी से किसानों को लाभ की उम्मीद

उप कृषि निदेशक मुजफ्फरनगर श्री प्रमोद सिरोही ने प्रशिक्षण में मौजूद किसानों को कृषि विभाग द्वारा संचालित विभिन्न लाभकारी योजनाओं के बारे में जानकारी दी।

सरकारी कृषि योजनाओं की जानकारी किसानों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि योजनाओं के माध्यम से कृषि क्षेत्र में तकनीकी सहायता, प्रशिक्षण और विभिन्न प्रकार के लाभ उपलब्ध कराए जाते हैं।

उन्होंने किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया और कृषि विभाग की योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ लेने की दिशा में जागरूक किया।

980 से अधिक किसानों की भागीदारी ने दिखाया बढ़ता उत्साह

दोनों कृषि विज्ञान केंद्रों पर हुई किसानों की भागीदारी इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के व्यापक दायरे को दर्शाती है। बघरा में 548 और चित्तौड़ा में 436 किसानों की मौजूदगी रही।

कुल संख्या 980 से अधिक बताई गई है। इतनी बड़ी संख्या में किसानों का प्रशिक्षण से जुड़ना यह भी बताता है कि कृषि से संबंधित नई तकनीकों, वैज्ञानिक सलाह और सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी लेने की जरूरत ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार बनी हुई है।

कृषि क्षेत्र में नई तकनीकों की जानकारी तभी प्रभावी परिणाम दे सकती है, जब किसान उन्हें अपने स्थानीय खेतों और परिस्थितियों के अनुसार समझकर लागू करें। ऐसे प्रशिक्षण इस दिशा में एक माध्यम उपलब्ध कराते हैं।

किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच संवाद का मंच

कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण पहलू विशेषज्ञों और किसानों के बीच सीधा संवाद है। केवल पुस्तकीय जानकारी के बजाय खेतों में आने वाली वास्तविक समस्याओं पर चर्चा किसानों के लिए अधिक उपयोगी हो सकती है।

मिट्टी, कीट, फसल अवशेष, सिंचाई, बागवानी, पशुपालन और फसल विविधीकरण जैसे विषय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए खेती को समग्र कृषि प्रणाली के रूप में समझना किसानों के लिए महत्वपूर्ण है।

चित्तौड़ा और बघरा में आयोजित कार्यक्रम में कृषि के साथ पशुपालन और वैकल्पिक कृषि गतिविधियों को भी शामिल किया गया, जिससे प्रशिक्षण का दायरा व्यापक रहा।

बदलते कृषि दौर में वैज्ञानिक खेती की जरूरत

कृषि क्षेत्र में मौसम संबंधी बदलाव, उत्पादन लागत, मिट्टी की गुणवत्ता, पानी की उपलब्धता और बाजार की मांग जैसी कई चुनौतियां किसानों के सामने रहती हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक अनुभव पर निर्भर रहने के साथ-साथ वैज्ञानिक जानकारी को भी खेती में शामिल करना जरूरी हो गया है।

मृदा परीक्षण से लेकर कीट प्रबंधन, सहफसली खेती से लेकर मिलेट्स, पराली प्रबंधन से लेकर पशुपालन तक अलग-अलग क्षेत्रों में वैज्ञानिक तरीके अपनाने से किसान अपने संसाधनों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल कर सकते हैं।

प्रशिक्षण कार्यक्रम में इन्हीं विविध पहलुओं को शामिल किया गया, जिससे किसानों को खेती की पूरी प्रक्रिया को अलग-अलग कोणों से समझने का अवसर मिला।

फसल विविधीकरण से मजबूत हो सकती है कृषि व्यवस्था

एक ही फसल पर पूरी तरह निर्भरता किसानों के लिए कई बार जोखिम बढ़ा सकती है। फसल विविधीकरण इस जोखिम को कम करने की दिशा में एक विकल्प माना जाता है।

मिलेट्स, सहफसली खेती, बागवानी और मशरूम उत्पादन जैसे विषयों को प्रशिक्षण में शामिल किया जाना इसी व्यापक कृषि दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है।

किसानों के लिए जरूरी है कि किसी भी नई फसल या तकनीक को अपनाने से पहले स्थानीय जलवायु, मिट्टी, सिंचाई, बाजार और लागत का मूल्यांकन करें तथा कृषि विशेषज्ञों से सलाह लें।

मुजफ्फरनगर के किसानों के लिए प्रशिक्षण से आगे की चुनौती

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद वास्तविक चुनौती इन जानकारियों को खेतों तक पहुंचाने की है। किसानों को प्राप्त तकनीकी जानकारी का प्रयोग स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार करना होगा।

मृदा परीक्षण, संतुलित उर्वरक उपयोग, पराली का वैज्ञानिक प्रबंधन, कीटों की समय पर पहचान, पशुओं का टीकाकरण और फसल विविधीकरण जैसे उपाय लगातार अपनाने पर ही उनके संभावित लाभ सामने आ सकते हैं।

कृषि विशेषज्ञों और विभागीय अधिकारियों की नियमित सलाह किसानों को नई तकनीकों को व्यवहार में लाने में मदद कर सकती है।

कृषि प्रशिक्षण से गांवों तक पहुंच सकती है नई तकनीक

आधुनिक कृषि तकनीकों का लाभ तभी व्यापक स्तर पर दिखाई देगा, जब वैज्ञानिक जानकारी गांव-गांव तक पहुंचे और किसान उसे अपनी परिस्थितियों के अनुरूप अपनाएं।

आत्मा योजना के तहत आयोजित यह दो दिवसीय कार्यक्रम इसी प्रक्रिया का हिस्सा रहा। अलग-अलग ब्लॉकों के किसानों को एक मंच पर लाकर कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से सीधे जानकारी दिलाने से उन्हें खेती से जुड़े कई महत्वपूर्ण विषयों को समझने का अवसर मिला।

मुजफ्फरनगर जैसे कृषि प्रधान जिले में ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों की उपयोगिता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में परिवार अपनी आजीविका के लिए खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर हैं।

कृषि विज्ञान केंद्रों की भूमिका भी अहम

कृषि विज्ञान केंद्र किसानों तक कृषि वैज्ञानिकों की जानकारी पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बघरा और चित्तौड़ा में आयोजित प्रशिक्षण में अलग-अलग विषयों के विशेषज्ञों ने किसानों के साथ संवाद किया।

मिलेट्स, आम के बाग, पराली प्रबंधन, गन्ने की सहफसली खेती, मृदा परीक्षण, कीट नियंत्रण, पशुपालन, जैविक खेती और मशरूम उत्पादन जैसे विषयों को एक ही प्रशिक्षण में शामिल किया गया।

इससे किसानों को यह समझने का अवसर मिला कि आधुनिक खेती केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि मिट्टी, पानी, पशुधन, पर्यावरण और आर्थिक स्थिरता को भी साथ लेकर चलना जरूरी है।

समापन के साथ किसानों को आधुनिक तकनीक अपनाने का संदेश

दो दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम के समापन के अवसर पर किसानों को आधुनिक और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया। प्रशिक्षण में शामिल विषय सीधे तौर पर खेती की लागत, उत्पादन, मिट्टी की गुणवत्ता, फसल सुरक्षा, पशुपालन और वैकल्पिक आय के अवसरों से जुड़े रहे।

980 से अधिक किसानों की भागीदारी के साथ संपन्न हुए इस कार्यक्रम ने कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक जागरूकता को बढ़ाने का अवसर प्रदान किया। अब प्रशिक्षण के दौरान मिली जानकारी को किसान अपने खेतों में किस तरह अपनाते हैं, यही इस तरह की पहल की वास्तविक उपयोगिता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

मुजफ्फरनगर में आत्मा योजना के अंतर्गत आयोजित दो दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का गुरुवार को समापन हुआ। कृषि विज्ञान केंद्र बघरा और कृषि विज्ञान केंद्र चित्तौड़ा में आयोजित प्रशिक्षण में जिले के विभिन्न ब्लॉकों से 980 से अधिक किसानों ने भाग लिया। किसानों को मिलेट्स, मृदा परीक्षण, पराली प्रबंधन, सहफसली खेती, एकीकृत कीट प्रबंधन, जैविक खेती, मशरूम उत्पादन और पशुपालन जैसी गतिविधियों से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आधुनिक तकनीकों को अपनाने, मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों का इस्तेमाल करने और पशुओं के स्वास्थ्य का समय पर ध्यान रखने के लिए जागरूक किया। उप कृषि निदेशक श्री प्रमोद सिरोही ने कृषि विभाग की विभिन्न योजनाओं की जानकारी देते हुए किसानों को आधुनिक कृषि पद्धतियों से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया।

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